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March

भाजपा से बाजी मारने के बाद बसपा के भीमराव अंबेडकर यहां खा गए मात

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लखनऊ। अंतिम बॉल के सरीखे उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के बाद बीजेपी ने नौवीं सीट पर बाजी मार ली. तमाम सियासी तिकड़म और जोड़गांठ के बाद उसके उम्मीदवार अनिल अग्रवाल का राज्यसभा का टिकट कटाने में वह कामयाब रही. वहीं अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए अपनी 25 साल पुरानी दुश्मनी को भी भुलाने वाली बीएसपी के हाथ मायूसी लगी। बीजेपी अनिल अग्रवाल के मुकाबले प्रथम वरीयता के वोटों में बढ़त हासिल करने के बावजूद बीएसपी कैंडिडेट दूसरी वरीयता के वोटों के मामले में बौने साबित हुए. शुक्रवार को उत्तर प्रदेश में हुए राज्यसभा की 10 सदस्यों के चुनाव में सूबाई सियासत का खासा ध्रुवीकरण हुआ। एक ओर बीजेपी और उसके सहयोगी दल थे तो दूसरी ओर सपाकृबीएसपी के साथ गैरबीजेपी पार्टियां. यह ध्रुवीरकण यूं ही नहीं था, दरअसल सूबे की विधानसभा में सत्ता पक्ष और उसके खिलाफ खड़े दलों के विधायकों का आंकड़ा ही कुछ ऐसा था। बीजेपी के पास जहां अपने आठ उम्मीदवार जिताने के बाद भी नौवें कैंडिडेट के लिए जरूरी मतों से आधे से अधिक वोट शेष थे.

वहीं सपा के पास एक उम्मीदवार को भेजने के बाद भी 10 वोट बच रहे थे। विधानसभा में विधायकों के संख्याबल के लिहाज से सबसे खराब स्थिति में बीएसपी थी. उसके पास जरूरी विधायकों की संख्या की आधे से महज एक ही ज्यादा थी। पहली बार उसे अपना एक भी सदस्य राज्यसभा न पहुंचने की चिंता सता रही थी. लेकिन, इसी बीच यूपी के गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट के उपचुनाव में उसे उम्मीद की किरण नजर आई. गैरबीजेपी दलों की एकता की बात कहने वाले समाजवादी पार्टी के विधायकों की संख्या में उसे अपनी जीत दिखाई दी. लेकिन, यह ऐसे संभव भी नहीं था, बीएसपी के लिए तो कतई नहीं. ढाई दशक पहले दोस्ती से दुश्मनी में तब्दील हए रिश्तों को फिर से उसी ठौर पर ले जाना एक बड़ा काम था. लेकिन, मायावती ने राज्यसभा चुनाव की सियासी मजबूरी को देखते हुए यह बड़ा फैसला भी ले लिया. अखिलेश यादव को लोकसभा उपचुनाव में समर्थन करने के साथ ही उन्होंने राज्यसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार को जिताने का भी वादा ले लिया. सपा ने दोनों ही सीटों पर जीत दर्ज की और प्रदेश की सियासत में बीजेपी के खिलाफ भविष्य की एक बड़ी रणनीति तैयार होने की ओर भी सपा और बीएसपी ने इशारा कर दिया। लोकसभा उपचुनाव की जीत के बाद राज्यसभा चुनाव का घमासान शुरू हुआ तो बीजेपी बदले हालात में कोई चूक न करने को लेकर हर मुमकिन गणित बैठाने लगी। विपक्ष को महज एक सीट पर सीमित रखने की रणनीति को अंजाम पर पहुंचाने के लिए पार्टी के शीर्ष नेताओं से लेकर विधायक तक जुट गएं हालांकि उसे यह अहसास था कि अपना नौवां उम्मीदवार उताकर उसने जो दांव खेला है, वह उसे उलटा भी पड़ सकता है। इसके बावजूद उसने हार नहीं मानी और अपने विधायकों के साथ सहयोगी दलों और विपक्षी विधायकों के वोटों को एक-एक कर जुटाना शुरू किया। दूसरी ओर सपा और बीएसपी भी बीजेपी को नौवीं सीट को रोकने के लिए डिनर डिप्लोमैसी से लेकर हर सियासी तिकड़म लगाती रही. शुक्रवार को मतदान हुआ और देर शाम नतीजे आए तो नौवीं सीट का नतीजा बीजेपी के पाले में था। बीएसपी का अपने उम्मीदवार भीमराव अंबेडकर के राज्यसभा पहुंचाने का सपना टूट गया. सपा विधायकों के साथ कांग्रेस और रालोद विधायकों के समर्थन के बाद भी उसके हाथ मायूसी लगी। दरअसल, 403 विधायकों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा में 400 विधायकों ने राज्यसभा चुनाव में वोट किया. बीएसपी के मुख्तार अंसारी और सपा के हरिओम को जेल में होने की वजह से वोट देने की इजाजत नहीं मिल सकी। वहीं नूरपुर से बीजेपी विधायक लोकेंद्र सिंह चैहान का दुर्घटना में निधन की वजह से यह वोट भी नहीं पड़ा. राज्यसभा सदस्य के निर्वाचित होने के लिए 37 वोटों की जरूरत थी. बीजेपी के विधानसभा में 311 सदस्य हैं और उसके सहयोगी अपना दल के नौ और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के चार विधायकों को मिलाकर उसके पास 323 का आंकड़ा था. अपने आठ उम्मीदवरों का जिताने के बाद भी उसके पास 27 विधायकों के वोट अधिक थे. यानि नौवें के लिए उसे महज 10 वोटों की और आवश्यकता थी. बीजेपी के नौवें उम्मीदवार अनिल अग्रवाल की जीत में कम पड़ रहे इन वोटों की भरपाई निषाद पार्टी के विजय मिश्रा, निर्दलीय अमनमणि त्रिपाठी, सपा के बागी नितिन अग्रवाल और बीएसपी के अनिल सिंह के वोटों ने की. अखिलेश यादव का समर्थन करने का एलान करने वाले राजा भैय्या ने अपना वोट सपा को दिया, लेकिन उनके करीबी विनोद सरोज ने बीजेपी कैंडिडेट पर मेहरबानी दिखाई. अनिल अग्रवाल को बीजेपी के 14, अपना दल के नौ, सुहेलदेव पार्टी के चार, निषाद पार्टी का एक, निर्दलीयों दो व दो अन्य के वोट ने 32 के आंकड़े पर पहुंचा दिया. लेकिन, अनिल अग्रवाल के हिस्से में प्रथम वरीयता के महज 16 वोट पड़े. दूसरी ओर बीएसपी के कैंडिडेट भीमराव अंबेडकर को बीएसपी के 17, कांग्रेस के सात, रालोद का एक, राजा भैय्या का एक वोट और सपा के शेष विधायकों के वोट मिले. बीएसपी उम्मीदवार को प्रथम वरीयता के 32 वोट दर्ज हुए. देखा जाए तो प्रथम वरीयता के वोट को देखते हुए उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार अनिल अग्रवाल को पछाड़ दिया. मगर, राज्यसभा चुनाव में जरूरी वोट के आंकड़े तक किसी भी कैंडिडेट के न छूने पर उनके दूसरी वरीयता के वोटों से विजेता तय किया जाता है. इस मामले में बीएसपी उम्मीदवार कहीं पीछे छूट गए. तीन सौ पार सदस्यों वाली बीजेपी के विधायकों ने दूसरी वरीयता में अनिल अग्रवाल को वोट दिया. उन्हें तीन सौ से अधिक वोट मिले और उन्होंने बीएसपी कैंडिडेट को मात दे दी. बीएसपी उम्मीदवार भीमराव अंबेडकर को दूसरी वरीयता के नाम पर महज एक वोट मिला. बीएसपी कैंडिडेट के पक्ष में मतदान से एक दिन पहले तक 39 विधायक थे. बीएसपी के 19, सपा के 10, कांग्रेस के सात, राजा भैय्या व उनके करीबी विनोद सरोज के दो, आरएलडी का एक वोट उसके पक्ष में जाते साफ नजर आ रहे थे। अखिलेश की डिनर डिप्लोमैसी के दौरान भी सपा और बीएसपी खेमा अपने भीमराव अंबेडकर की जीत को लेकर करीबकृकरीब आश्वस्त था. बस, नरेश अग्रवाल के बीजेपी में शामिल होने से उनके बेटे नितिन अग्रवाल का वोट बीजेपी की ओर जाता दिख रहा था. लेकिन, बीएसपी मुख्तार अंसारी और सपा के हरिओम को जेल से आकर वोट डालने की इजाजत न मिलने से दोनों पार्टियों का एककृएक वोट कम हो गया. वहीं बीएसपी के अनिल सिंह ने बीजेपी को वोट देकर बीएसपी को एक और झटका दे दिया. कहा जाता है कि इंद्रजीत सरोज भी मतदान आते-आते अंबेडकर से छिटक गए। मतदान से पहले ही बीएसपी के हिस्से के वोट महज 33 रह गए थे।

 

 

 

 

Read 101 times Last modified on Thursday, 29 March 2018 05:57
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