29
March

भाजपा की सिद्धांत विहीन राजनीति

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Published in vichar vimrash

भगवान राम की परम भक्त भाजपा ने उन नरेश अग्रवाल को लाल कालीन बिछाकर पार्टी में शामिल कर लिया जो राज्यसभा में श्री राम के बारे में अनर्गल टिप्पणी करने के कारण रामभक्तों की नजर में खलनायक बन गए थे। सपा द्वारा अगले कार्यकाल के लिए राज्यसभा टिकिट न दिए जाने से भन्नाए नरेश ने भाजपा में घुसते समय न तो अपने उस बयान पर क्षमा मांगी और न ही भाजपा की नीतियों और सिद्धांतों के प्रति आस्था व्यक्त की। भाजपा मुख्यालय में आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान रेलमंत्री पीयूष गोयल की मौजूदगी में भाजपाई बनते समय नरेश ने सपा द्वारा जया बच्चन को फिर राज्यसभा टिकिट दिए जाने का रोना रोया। उन्हें इस बात पर गुस्सा था कि अखिलेश यादव ने उनकी उपेक्षा करते हुए एक अभिनेत्री को महत्व दिया। इस दौरान उन्होंने कुछ ऐसी बातें भी कह डालीं जिनका विरोध विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपने ट्वीट के जरिये कर पार्टी के लिए शोचनीय स्थिति पैदा कर दी।

बाद में प्रवक्ता सम्बित पात्रा ने भी सभी के प्रति सम्मान की बात कहकर स्थिति सम्भालने की कोशिश की किन्तु जिस तेजी और मात्रा में भाजपा का समर्थक वर्ग सोशल मीडिया के माध्यम से पार्टी के इस निर्णय के विरोध में मुखर हुआ उससे ही पता चलता है कि नरेश को लेकर कितना गुस्सा भरा हुआ था। यूँ भी उप्र का यह नेता अवसरवाद का पर्याय माना जाता है। भाजपा में उनकी पहली एंट्री कल्याण सिंह की सरकार बचाने हुई थी। तब से वे मौका पाते ही पाला बदलते रहे और मंत्री से लेकर सांसदी तक का सुख लूटा। पिछले विधानसभा चुनाव में उनका बेटा भी सपा से विधायक बन गया। मौजूदा गणित के मुताबिक सपा केवल एक राज्यसभा प्रत्याशी जिता सकेगी। फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में बसपा द्वारा सपा प्रत्याशी के समर्थन की कीमत स्वरूप अखिलेश यादव ने राज्यसभा हेतु सपा के अतिरिक्त मत बसपा को देने का वायदा कर डाला। कांग्रेस और लोकदल भी ऐसा ही करने जा रहे हैं। उधर भाजपा ने भी अपने अतिरिक्त मतों को भुनाने के लिए एक उम्मीदवार अड़ा दिया और यही नरेश के पार्टी प्रवेश का आधार बना। क्योंकि बसपा प्रत्याशी को प्रथम वरीयता का एक मत भी कम मिला तो भाजपा दूसरी वरीयता में सब पर भारी पड़ जाएगी और उसका अतिरिक्त उम्मीदवार भी जीत सकेगा। सम्भवत: नरेश का बेटा और उनके प्रभाव वाले कुछ विधायकों की तोड़ाफोड़ी की रणनीति के तहत इस दलबदलू के लिए भाजपा ने आनन फानन अपने दरवाजे खोल दिये। इसका लाभ राज्यसभा चुनाव में एक सीट के रूप में उसे मिल सकता है किंतु संसद में भगवान राम के बारे में स्तरहीन बातें कहने वाले को इतनी आसानी से स्वीकार करने का फैसला भाजपा के पार्टी विथ डिफरेंस के दावे की धज्जियां उड़ाने के लिए पर्याप्त है। लोकसभा और उप्र विधानसभा चुनाव के पहले भी भाजपा ने इसी तरह का भर्ती अभियान चलाया था। लेकिन की और अब की स्थितियां भिन्न हैं। ऐसे समय जब राम मंदिर बनाने का मुद्दा जोरों पर हो तब श्री राम का मखौल उड़ाने वाले नरेश अग्रवाल सरीखे नेता को पार्टी में जगह क्यों दी गई ये छोटा प्रश्न नहीं है। ऐसी ही फजीहत अतीत में बाहुबली डीपी यादव को भाजपा में लेने पर हुई थी और तब समर्थकों की भावनाओं को सम्मान देते हुए उसी दिन डीपी यादव को निकाल भी दिया गया लेकिन नरेश को लेकर ऐसा कोई संकेत भाजपा ने नहीं दिया और तो और श्री राम सम्बन्धी अपनी आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर क्षमा या खेद प्रगट करना तो दूर रहा उल्टे नरेश ने जया बच्चन पर बेवजह घटिया कटाक्ष करते हुए भाजपा को शर्मसार होने मज़बूर कर दिया। बहुत लोग राजनीति में सब कुछ जायज होने की दुहाई देकर नरेश प्रकरण में भाजपा को क्लीन चिट दे रहे हैं लेकिन वे भूल जाते हैं कि सिद्धांतविहीन राजनीति केवल क्षणिक लाभ देती है। इसके दूरगामी नतीजे नुकसानदेह होते हैं, जिसका ज्वलन्त उदाहरण कांग्रेस है। भाजपा को यदि ये लगने लगा है कि सफलता से बढ़कर दूसरी कोई सफलता नहीं होती तब उसके वैचारिक पतन की आशंकाएं प्रबल होना सुनिश्चित है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को सफलतम मानने के बाद भी ये कहना गलत नहीं होगा कि सफलता के साथ पवित्रता भी कोई चीज होती है जिसका त्याग करते ही तमाम उपलब्धियों की गुणवत्ता पर प्रश्नचिन्ह लग जाते हैं। भाजपा के समर्थकों के अलावा राजनीति में रुचि रखने वाले निरपेक्ष लोग भी ये देखकर हैरान हैं कि चाल, चरित्र और चेहरे जैसी बातें इतनी जल्दी भुला दी गईं। दो चार दिन बाद नरेश विवाद खत्म हो जाएगा और राजनीति अपने रास्ते पर चलती रहेगी किन्तु भाजपा नेतृत्व के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है कि क्या नैतिकता का पालन केवल निचले स्तर के कार्यकर्ताओं के लिए जरूरी है और पार्टी चला रहे बिग बॉस पूरी तरह स्वच्छन्द हैं। बड़ी बात नहीं राम मंदिर का शिलान्यास होते समय सबसे आगे राम द्रोही नरेश अग्रवाल ही खड़े दिखाई दें। शायद पार्टी विथ डिफरेन्स की परिभाषा संशोधित कर दी गई है ।
लेखक—रवीन्द्र वाजपेयी

 

 

 

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