01
August

अंग्रेजी उपनिवेशवाद के युग में भारत सहित विश्व के लगभग 54 देशों में अंग्रेजी राज के प्रति नफ रत और आक्रोश फैला हुआ था। उपनिवेशवाद में यूरोपीय देशों ने पूँजी के द्वारा सर्वोच्च लाभ प्राप्त किया है। उपनिवेशवाद का पूरे यूरोप का मुख्य केन्द्र इंग्लैण्ड रहा है। उपनिवेशवाद का तात्पर्य है आर्थिक दृष्टि से विकसित देशों के द्वारा अविकसित देशों का शोषण। पिछड़े देशों की सारी आर्थिक व्यवस्था उनपर निर्भर रहती है। अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की अन्यायपूर्ण विचारधारा के कारण अंग्रेजी हुकूमत के गुलाम 54 देशों के मूल निवासी गरीबी, बीमारी, अशिक्षा तथा गुलामी से भरा अपमानजनक जीवन यापन कर रहे थे। विश्व के इन देशों की प्राकृतिक सम्पदाओं का दोहन करके तथा मानव संसाधन का शोषण करके अंग्रेज अपने देश इंग्लैण्ड को समृद्ध कर रहे थे। इस काल खण्ड में गुलाम भारत में अंग्रेजों के प्रति आक्रोश चरम सीमा पर था। स्वाधीनता आन्दोलन के लिये पूरे राष्ट्र में एक दबी हुई चिगांरी धधक रही थी। ऐसे विकट समय में अमर बलिदानी, भारत माँ के वीर, क्रान्तिकारी सपूत, अप्रतिम साहस के पर्याय चन्द्रशेखर आजाद भारत की प्राचीन सभ्यता, संस्कृति तथा स्वाभिमान को पुन: स्थापित करना चाहते थे। आजाद ने मातृभूमि की आजादी के लिये खुद के प्राणों को न्योछावर कर दिया यही बलिदान आगे चल कर आजादी का सुप्रभात बना।

03
April
भारत में सरकारी फसल बीमा कार्यक्रम 1985 में व्यापक फसल बीमा योजना सीसीआईएस को लागू करने के साथ शुरू हुआ। सीसीआईएस को  1999 में रबी की फसल के दौरान राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना एनएआईएस द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था जो 2015—16 तक जारी रहा।

योजना के शुभारंभ के दो वर्षों में सभी 18 कंपनियों ने मिलकर 15795 करोड़ रुपए का लाभ कमाया। ऐसा लगता है कि किसानों को राहत प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा शुरू की गई योजना के उद्देश्य को ही खत्म कर दिया गया है। पीएमएफ बीवाई का उद्देश्य मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण किसानों को राहत प्रदान करना है। न्यूनतम पैदावार से 50 फीसद से कम उपज होने की स्थिति में बीमित किसानों को तत्काल राहत देने के लिए पीएमएफ बीवाई अंतिम उपज के डेटा की प्रतीक्षा किए बिना लेखागत आंशिक भुगतान संभावित दावों के 25 फीसद तक के लिए व्यवस्था करना है। साल 2017—18 के लिए भारतीय बीमा विनियामक और  विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष सुभाष सी खुंतिया ने वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग के सचिव को रिपोर्ट भेजी, भारत सरकार ने इसकी पुष्टि भी की।

29
March

भगवान राम की परम भक्त भाजपा ने उन नरेश अग्रवाल को लाल कालीन बिछाकर पार्टी में शामिल कर लिया जो राज्यसभा में श्री राम के बारे में अनर्गल टिप्पणी करने के कारण रामभक्तों की नजर में खलनायक बन गए थे। सपा द्वारा अगले कार्यकाल के लिए राज्यसभा टिकिट न दिए जाने से भन्नाए नरेश ने भाजपा में घुसते समय न तो अपने उस बयान पर क्षमा मांगी और न ही भाजपा की नीतियों और सिद्धांतों के प्रति आस्था व्यक्त की। भाजपा मुख्यालय में आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान रेलमंत्री पीयूष गोयल की मौजूदगी में भाजपाई बनते समय नरेश ने सपा द्वारा जया बच्चन को फिर राज्यसभा टिकिट दिए जाने का रोना रोया। उन्हें इस बात पर गुस्सा था कि अखिलेश यादव ने उनकी उपेक्षा करते हुए एक अभिनेत्री को महत्व दिया। इस दौरान उन्होंने कुछ ऐसी बातें भी कह डालीं जिनका विरोध विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपने ट्वीट के जरिये कर पार्टी के लिए शोचनीय स्थिति पैदा कर दी।

29
March

हमारे लोकजीवन में शगुन-अपशगुन का बड़ा महत्व है। घर में वधु प्रवेश, पुत्र-पुत्री रत्नों की प्राप्ति से लेकर मेहमानों के आने के बाद की शुभ-अशुभ घटनाओं को इसी नजरिए से देखा जाता है। राजनीति में तो शगुन- अपशगुन को बड़ी ही गंभीरता से लिया जाता है। कैबिनेट मीटिंग भले ही छूट जाए यदि किसी बिल्ली ने रास्ता काट दिया तो मंत्रीजी का काफिला वहीं जाम, मान्यताओं के आगे वैज्ञानिक तर्क भी पानी मांगने लगते हैं। अपने यहां तो विज्ञान की प्रक्रियाएं टोटकों से शुरू होती हैंं। सेटेलाइट छोड़ना हो या पनडुब्बी उतारना, नारियल फोड़ने के साथ गणपति वंदना होती है। इसलिये हम देखते हैं कि नेताओं के साथ डॉक्टर, लीगल एडवाइजर से ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका ज्योतिषियों और टोटका विशेषज्ञ की होती है। मुझे लगता है कि नरेश अग्रवाल के भाजपा में प्रवेश को लेकर टोटका विशेषज्ञों और ज्योतिषियों की राय नहीं ली गई होगी, शायद इसीलिये उनके आते ही भाजपा की राजनीति में पुलह चरण मच गया। यह निष्कर्ष मेरा नहीं उस सोशल मीडिया का है जिसकी लहर पर सवार होकर मोदी जी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया और दिल्ली में परचम लहरा, मेरे लिए तो पार्लियामेंट में राम को रम, जानकी को जिन और बजरंगबली को ठर्रा प्रेमी बताने वाले मसखरे नरेश अग्रवाल एक दिन की सनसनीखेज खबर से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं। उनके आने से रामभक्तों को कैसा लगा यह उनकी सोच का मामला है।

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