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March

ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के अधिकारी जब्त बजट डकारने का कर रहे जुगाड़

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वित्त नियंत्रक और डीडीओ ने किया वास्तविक व्यय के आंकड़ों में हेराफेरी

शासन की नोटिस पर वित्त नियंत्रक फाइलों में उलझाने का कर रहे प्रयास

मैनफोर्स

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजशाही और नौकरशाही के अजीबोगरीब करनामों की जितनी भी चर्चा की जाये कम है। इन्हें काम न करना पड़े इसके लिए इनके पास हजारों बहाने रहते है। ये उन्हीं कार्यो को करने में दिलचस्पी लेते है, जिसमें इन्हें कमीशन का लाभ मिले। यदि इन्हें अपना लाभ नहीं दिखाई देता है, तो ये जनहित के विकास कार्यो के लिए आवंटित बजट का सदुपयोग करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई देते है।

जिसके परिणामस्वरूप अंतत: बजट जब्त अर्थात लैप्स हो जाता है। नौकरशाहों और राजशाहों का इसी प्रकार का एक नायाब नजारा ग्रामीण अभियंत्रण विभाग में देखने और सुनने को मिल रहा है। गौरतलब हो कि वित्तीय वर्ष 2016-17 के लिए ग्रामीण अभियंत्रण विभाग  के  अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन, भत्ते तथा वाहनों आदि की सुविधा प्रदान करने के उद्देश्य से शासन द्वारा रूपया 350.32 करोड़ का बजट स्वीकृत किया था। इस बजट की धनराशि में से 275.45 करोड़ रूपये के बजट का आवंटन ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के जिला स्तरीय कार्यालयों तथा मुख्यालय पर तैनात डीडीओ को किया गया था। शेष 74.87 करोड़ रूपये की धनराशि का समर्पण शासन के वित्त विभाग को कर दिया गया। मामले की कवायद यहां तो दुरूस्त रही। इसके बाद मुख्यालय पर तैनात डीडीओ अशोक कुमार अधिशाषी अभियंता के निवर्तन पर जो बजट आवंटित किया गया था। उस बजट की धनराशि से तकरीबन 34.96 लाख रूपये का न तो व्यय किया गया और न ही वापस समर्पण किया गया। समर्पण किये गये 74.87 करोड़ रूपये जो वाहन आदि की खरीद के लिए आवंटित किया गया था। उस धनराशि में 34.96 लाख रूपये की धनराशि शामिल नहीं की गई। निदेशालय स्तर पर पुन: जब्त बजट को दूसरे विभाग के पर्सनल लेजर अकाउन्ट अर्थात पीएलए खाते में स्थानांतरित करने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया गया। जो किसी भी स्तर पर नियम के अनुकूल नहीं था। कारण, ग्रामीण अभियंत्रण विभाग में कोई पर्सनल लेजर अकाउन्ट की व्यवस्था लागू नहीं है। इतना ही नहीं, जिस विभाग में पर्सनल लेजर अकाउन्ट की व्यवस्था है, वहां भी एक वर्ष के जब्त बजट को उसके अगले वर्ष में पर्सनल लेजर अकाउन्ट में स्थानांतरित करने की व्यवस्था या अनुमति नहीं है।  वित्तीय वर्ष की शुरुआत में ही कुछ इसी प्रकार का कारनामा नेडा के तत्कालीन वित्त नियंत्रक द्वारा किया गया था। जिन्हें तत्काल प्रभाव में निलम्बित कर दिया गया था। इस प्रकार का कृत्य जब दूसरे विभाग के अधिकारियों द्वारा किये जाने पर नियम विरूद्ध और अपराध की श्रेणी में स्वीकार किया गया है तो फिर ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के वित्त नियंत्रक और डीडीओ विभाग के आलाधिकारियों और शासन की मेहरबानी क्यों? यह गंभीर सवाल है। वित्त नियंत्रक और डीडीओ के स्तर से वास्तविक व्यय के आंकड़ों में न केवल हेराफेरी की गई बल्कि अवशेष धनराशी के बारे में शासन के वित्त विभाग को गुमराह किया गया। इनता नहीं इन लोगों के द्वारा शेष रकम को वित्त विभाग के संज्ञान में नहीं लाये जाने का प्रयास किया गया। इस मामले में हर स्तर पर वित्त नियंत्रक और डीडीओ द्वारा पत्राचार में न केवल शिर्षस्थ अधिकारियों को उलझाया गया बल्कि इस सम्पूर्ण मामले पर व्यापक पैमाने पर लीपापोती करने की भी कोशिश की गई जो अभी तक जारी है। सूत्रों की माने तो वित्त नियंत्रक की विभाग के मंत्री से खूब अच्छी तरह से छनती है। इसी का फायदा उठाते हुए वित्त नियंत्रक विभाग के जिला स्तरीय अधिकारियों पर मंत्री महोदय का नाम लेकर अपना रौंब जमाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते है। विभाग के मंत्री महोदय के इस मधुर रिश्ते का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस प्रकरण में वित्त नियंत्रक स्वयं तो स्वयं डीडीओ को भी इस भ्रष्टचार की कालिख से बचाने में कामयाब हो गये। हालांकि अभी भी इन अधिकारियों द्वारा संपादित किये गये भ्रष्टचार के कुकृत्यों से संबंधित दस्तावेज आरोप तय करने और कार्यवाही करने के लिए शासन और विभागीय मंत्री के बीच हिचकोले खा रही है। इस मामले इन अधिकारियों पर क्या कार्यवाही संपन्न की जायेगी, इसकी भविष्यवाणी का अंदाजा उम्मीद है पाठकगणों को भी लग गया होगा।

 

 

 

 

 

 

Read 591 times Last modified on Sunday, 31 March 2019 09:28
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