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20
November

सहायता प्राप्त विद्यालयों के प्रबंधतंत्रों की अनैतिक कार्यप्रणाली के खिलाफ उ.प्र. माध्यमिक शिक्षक संघ लामबंद

मैनफोर्स

लखनऊ। लखनऊ जनपद के सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों के प्रबंधकों और प्रबंधतंत्रों द्वारा अवैध और अनैतिक तरीके से सहायता प्राप्त विद्यालयों की भूमि और भवनों को हथियाने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे सहायता प्राप्त विद्यालयों के प्रबंधकों और प्रबंधतंत्रों द्वारा इन विद्यालयों के भवनों का न केवल व्यवसायिक उपयोग किया जा रहा है बल्कि अवैध तरीके से विक्रय करने का प्रयास किया जा रहा है। जिसका साक्षात् उदाहरण लखनऊ इण्टर कालेज के प्रबंधतंत्र और प्रबंधक की कार्यप्रणाली के रूप में देखा जा सकता है। इस प्रकार की अनैतिक कार्यप्रणाली से क्षुब्ध होकर उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ जनपद लखनऊ की कार्यकारिणी ने ऐसे प्रबंधतंत्रों और प्रबंधकों के खिलाफ चरणबद्ध तरीके से संघर्ष करने का निर्णय लिया है। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ ने संघर्ष के प्रथम चरण के तहत सर्वप्रथम लखनऊ इण्टर कालेज लालबाग की करोड़ों रूपये की भूमि को हथियाने के लिए विद्यालय प्रबंधक द्वारा जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन से साठगांठ करके विद्यालय के भवन को हड़पने की नियत से विद्यालय के भवन को ध्वस्त कराने की कार्यप्रणाली का व्यापक विरोध करेगा और माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के क्रम में प्रमुख सचिव माध्यमिक शिक्षा द्वारा प्रबंधक को दिये गये आदेश दिनांक 07 अप्रैल 2018 के अनुपालन में विद्यालय के एक कक्ष की मरम्मत का कार्य शुरू कराये जाने की मांग को लेकर 29 नवम्बर 2018 को विद्यालय के शिक्षकों एवं कर्मचारियों के साथ जिला संगठन के पदाधिकारी सहित अन्य संघ के अन्य कार्यकर्ता विद्यालय के द्वार पर व्यापक प्रदर्शन करेंगे। यह जानकारी माध्यमिक शिक्षक संघ के मंत्री एवं प्रवक्ता डा. आरपी मिश्रा ने दी। श्री मिश्रा ने बताया कि लखनऊ इण्टर कालेज के प्रबंधक द्वारा कई वर्ष से विद्यालय की करोड़ों रूपये की भूमि को हथियाने का प्रयास किया जा रहा है। प्रबंधक ने पहले बिजली ओर पानी का बिल जमा करना बन्द कर दिया। जिससे विद्यालय की बिजली कट गई और पानी की आपूर्र्ति बंद हो गई। इतना ही नहीं प्रबंधक ने विद्यालय के भवन की मरम्मत, रंगाई एवं पुताई, फर्नीचर  आदि का मरमम्त कराना भी बंद कर दिया। जिससे विद्यालय में छात्रों की संख्या तेजी से घटने लगी। श्री मिश्रा ने बताया कि लखनऊ इण्टर कालेज के प्रबंधक द्वारा विद्यालय को समाप्त करने की साजिश को समझकर विद्यालय के शिक्षकों एवं कर्मचारियों ने ऐसे विषम परिस्थितियों में स्वयं आगे बढ़कर विद्यालय के संचालन की जिम्मेदारी संभाल ली और प्रत्येक शिक्षक द्वारा रूपया 2000 तथा शिक्षणेत्तर कर्मचारियों द्वारा रूपया 1000 प्रतिमाह बिजली बिल और पानी की बिल जमा की गई। इतना ही नहीं इन लोगों के द्वारा विद्यालय की रंगाई-पुताई और फर्नीचर की मरम्मत करायी गई। यहां तक कि गत वर्ष से विद्यालय की छात्र संख्या भी बढऩे लगी। शिक्षकों और कर्मचारियों ने छात्रों को घर से लाने और ले जाने की सुविधा मुहैया कराने के लिए वाहनों की व्यवस्था की। श्री मिश्रा ने बताया कि जब शिक्षकों और कर्मचारियों ने विद्यालय का खर्च उठाना प्रारम्भ किया तो प्रबंधक ने दिनांक 4 मई २013 को विद्यालय को जर्जर बताकर  गिराये जाने के लिए शासन को पत्र प्रेषित किया। जब शासन ने प्रबंधक के पत्र पर उनके पक्ष में कोई आदेश नहीं दिया तो प्रबंधक ने लखनऊ एजुकेशन सोसाइटी की ओर से उच्च न्यायालय में याचिका और बाद में अवमानना याचिका दायर की। जिस पर प्रमुख सचिव माध्यमिक शिक्षा मनोज कुमार सिंह ने दिनांक 21 अगस्त 2014 को निर्णय दिया। जिसमें विद्यालय के भवन को जर्जर भवन बताकर विद्यालय की भूमि को हड़पने के प्रयास पर रोक लगाते हुए प्रबंधतंत्र को एक-एक कक्ष की मरम्मत कराने का आदेश दिया गया। किन्तु प्रबंधक द्वारा आज तक उक्त आदेश का अनुपालन नहीं किया गया। विद्यालय के प्रबंधक द्वारा उच्च न्यायालय और प्रमुख सचिव माध्यमिक शिक्षा तथा मुख्य अभियन्ता नगर निगम के आदेश को छुपाकर अब पुलिस और जिला प्रशासन से साठगांठ करके उक्त विद्यालय के भवन को जर्जर बताकर ध्वस्त कराने का प्रयास किया जा रहा है ताकि विद्यालय की भूमि को अनैतिक तरीके से बेचा जा सके। श्री मिश्रा ने बताया कि उक्त विद्यालय के प्रबंधक की इस प्रकार की अनैतिक कार्यप्रणाली के खिलाफ संघ के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के संयुक्त सहयोग से उक्त विद्यालय के मुख्य द्वार पर विरोध प्रदर्शन किया जायेगा। श्री मिश्रा ने बताया कि जिस प्रकार लखनऊ इण्टर कालेज के प्रबंधक द्वारा विद्यालय की भूमि को अनैतिक तरीके से हथियाने और विक्रय करने का षणयंत्र रचा गया है। ठीक इसी प्रकार खुनखुन जी गल्र्स इण्टर कालेज के भवन को भी लीज पर देकर विद्यालय के भवन को विद्यालय के प्रबंधक और भवन मालिक शिव नारायण अग्रवाल द्वारा संयुक्त रूप से हड़पने का प्रयास किया जा रहा है। श्री मिश्रा ने बताया कि खुनखुन जी गल्र्स इण्टर कालेज के भवन का मरम्मत कराने के संबंध में विद्यालय के प्रधानाचार्य के पत्र पर मकान मालिक द्वारा अनुमति नहीं दी जा रही है और अब नगर निगम से ध्वस्तीकरण संबंधी नोटिस जारी करायी गई। जिस पर नगर निगम के मेयर द्वारा नगर आयुक्त को जांच कर नोटिस वापस लेने का आदेश दिया गया है। श्री मिश्रा ने बताया कि शिक्षा अधिकारी से लखनऊ जनपद के अनेक विद्यालयों की भूमि एवं भवन का उ.प्र. शैक्षिक संस्थाएं आस्तियों का अपव्यय निवारण अधिनियम 1974 का उल्लंघन किये जाने की शिकायतें की गई थी। मगर शिक्षा अधिकारी ने योगेश्वर ऋषिकुल इण्टर कालेज को छोड़कर किसी भी विद्यालय प्रबंधतंत्र पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। श्री मिश्रा ने बताया कि उपरोक्त मामलों के अतिरिक्त भी शिक्षा अधिकारी से बप्पा श्रीनारायण वोकेशनल इण्टर कालेज के सांसद एवं विधायक निधि से निर्मित आडिटोरियम के व्यवसायिक इस्तेमाल तथा विद्यालय के शिक्षक आवास एवं एग्रीकल्चर विभाग  की भूमि एवं भवन को अवैध तरीके से डिग्री कालेज को सौंपने की भी शिकायत की गई थी। यशोदा रस्तोगी गल्र्स इण्टर कालेज के खेल के मैदान को प्रबंधक द्वारा ट्रस्ट को सौंपकर उसका व्यवसायिक उपयोग किये जाने की शिकायत की गई थी। स्वतंत्र इण्टर कालेज आलमबाग की भूमि को बिल्डर को बेच दिया गया। जिसकी शिकायत शिक्षा अधिकारी से की गई। मगर इस संबंध में शिक्षा अधिकारी ने कोई कार्यवाही नहीं की। इसी प्रकार रामधीन सिंह इण्टर कालेज के खेल के मैदान में मार्केटिंग काम्पलेक्स, गेस्ट हाउस तथा मैरिज हाल एवं विद्यालय के हाल में गेस्ट हाउस बनाकर उसके व्यवसायिक उपयोग की शिकायतें की गई थी। बाबा ठाकुरदास इण्टर कालेज की भूमि एवं भवन का एक दूसरे विद्यालय दादा ठाकुरदास को हस्तान्तरण करने की शिकायत की गई। दयानन्द गल्र्स इण्टर कालेज के खेल के मैदान को एक निजी विद्यालय को सौंपने की शिकायत की गई थी। नवयुग कन्या विद्यालय की भूमि एवं भवन तथा आडिटोरियम पर नवयुग रेडियन्स का अवैध कब्जा है। विद्यालय की अधिकांश भूमि एवं भवन को अवैध तरीके से डिग्री कालेज को सौंपने की शिकायत की गई है। मगर उसके बावजूद भी आज तक शिक्षा अधिकारी द्वारा इस मसले पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। श्री मिश्रा ने बताया कि महिला इण्टर कालेज की भूमि एवं भवन के अधिकांश भाग को डिग्री कालेज को सौंप को दिया गया है। लालबाग गल्र्स इण्टर कालेज की भूमि एवं भवन का अनैतिक तरीके विक्रय कर दिया गया है। मुमताज इण्टर कालेज, डीएवी इण्टर कालेज, इस्लामियां इण्टर कालेज, राम पाल त्रिवेदी इण्टर कालेज गोसाईगंज, बक्शी का तालाब इण्टर कालेज, राम भरोसे मैकूलाल इण्टर कालेज, जगन्नाथ प्रसाद साहू इण्टर कालेज आदि अनेकों विद्यालयों की भूमि और भवनों  का अनैतिक तरीके से उपयोग करने, विक्रय करने, कब्जा करने की शिकायतें संघ ने की थी। मगर आज तक शिक्षा अधिकारी ने एक भी मामले में कोई कार्यवाही नहीं की। श्री मिश्रा ने चेतावनी देते हुए कहाकि संघ द्वारा इन मामलों की शिकायतें पुन: जिलाधिकारी एवं शिक्षा अधिकारी के समक्ष आवश्यक कार्यवाही हेतु प्रेषित की जायेगी। कार्यवाही नहीं होने पर जनपद स्तरीय व्यापक विरोध प्रदर्शन किया जायेगा। 

 

 

 

 

11
November

विद्यालय-शौचालय सब हो गये बदहाल, ग्रामीणों की शिकायत पर भी नहीं हुई कार्यवाही

मैनफोर्स

श्रावस्ती। सूबे की भाजपा सरकार जब से सत्ता में आयी है तब से विकास के तमाम बड़े-बड़े दावे करती रही है। मगर उसके विकास के दावों की हकीकत क्या रही है। उसका एक दृश्य मैनफोर्स समाचार पत्र पाठकों के समक्ष इस प्रकार वर्णित कर रहा है। जनपद श्रावस्ती में ग्राम प्रधान द्वारा सूबे के मुख्यमंत्री के आदेशों की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही। जनपद श्रावस्ती के विकासखंड हरिहरपुर रानी के अंतर्गत ग्राम सभा महरौली मजरा खाले ककरा स्थिति है। यहां पर ग्राम प्रधान की खुलेआम दबंगई देखने को मिल रही है। ग्राम प्रधान द्वारा सत्र 2017-2018 में विकास कार्यों के नाम पर कई करोड़ो रुपये का वारा-न्यारा कर दिया गया है। मगर उसके बाद भी लेसमात्र भी विकास कार्य देखने को नहीं मिला है। इस संदर्भ में ग्रामीणों ने कई बार जिम्मेदार अधिकारियों से शिकायत की गई। मगर कार्यवाही के नाम पर लेसमात्र भी कार्यवाही नहीं की गई। यहां के स्थानीय ग्रामीणों ने ग्राम प्रधान पर आरोप लगाते हुए जिलाधिकारी को विगत 17 सितम्बर 2018 को शिकायती सौंपा था। जिसमें उल्लेखित किया कि उनके ग्राम सभा में एक भी विकास अभी तक वास्तविक धरातल पर दिखाई नहीं दे रहा है। यहां के विद्यालय की दशा दिनों जर्जर और दयनीय होती जा रही है। विद्यालय के विकास कार्यों के नाम पर 3,75000 रूपया प्रधान के खाता में आया था। इस पैसे को प्रधान द्वारा निकाल लिया गया। मगर विद्यालय का विकास कार्य नाम मात्र भी नहीं किया गया। इसका सबसे बड़ा साक्ष्या स्वयं विद्यालय की जर्जर स्थिति चिल्ला कर बयां कर रही है।

इस संबंध में जब प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक लोकेन्द्र नाथ से जानकारी की गई तो उन्होंने बताया कि विद्यालय की स्थिति जो आप को दिखाई दे रही है। वही उसके विकास हकीकत को बयां कर रही है। मैं यहां जब से आया हूं। तब से मैं देख रहा हूं कि यहां का जो शौचालय हैं। वह इस्तेमाल करने के योग्य नहीं है। इस विद्यालय में टाइल्स व बाउन्ड्री वाल का गेट लगवाने के लिये कई बार कहा गया। मगर ग्राम प्रधान द्वारा इस संबंध में कोई सुनवाई नहीं की जाती है। ग्राम प्रधान विद्यालय के विकास पर जरा सा भी ध्यान नहीं दे रहे। उन्होंने बताया कि विद्यालय की बाउन्ड्री का उधड़ा हुआ प्लास्टर  और जर्जर दिवारें आपको खुद ही अपने विकास की कहानी चिल्ला-चिल्ला कर बता रही है। कुछ ग्रामीणों ने जब विद्यालय की बाउंड्री की दीवार पर हाथ लगाया तो अस्पष्ट देखा गया कि जो प्लास्टर विद्यालय की दीवार पर किया गया है। उसमें वह सिर्फ  बालू ही बालू है। जो हाथ लगाने पर दीवार से छूटकर नीचे गिर जाती है। जब उक्त गांव का अवलोकन किया गया तो पता चला कि ग्राम प्रधान ने विकास के नाम पर कुछ ग्रामीण को तो शौचालय लाभ दिया है। मगर अधिसंख्यक लोगों को ग्राम प्रधान ने शौचालय के नाम पर सिर्फ जर्जर दीवार खड़ी करके शौचालय की आवश्यकताओं को पूरा कर दिया है। इन दीवारों के बीच ना तो गड्ढे खोदे गए हैं और ना शौचालय की सीट लगाई गयी हैं। ग्राम प्रधान ने शौचालयों के आवश्यकता की पूर्ति सिर्फ  नाम के बनाये गये शौचालय के माध्यम से पूरा किया है। उम्मीद है कि पाठकगण भी उपरोक्त गांव और ग्राम प्रधान द्वारा कराये गये विकास कार्यो की यथास्थिति से बखूबी वाकिफ हो गये होंगे। ग्रामीणों ने ग्राम प्रधान पर आरोप लगाते हुए कहाकि कुछ लोगों के मकान के सामने पुराना ईट का खडंजा लगा था। जिसको प्रधान द्वारा हटवा दिया गया है। मगर आज तक नया खडंजा नहीं लगवाया गया। जिससे ग्रामीणों को आवागमन में भारी कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। अब उपरोक्त ग्राम सभा के ग्रामिणों की आस भी संदेह के घेरे में है। क्यों उन्हें संदेह है कि क्या उन्हें भी सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाले आवास व शौचालय की सुविधा का लाभ मिल पायेगा ? ग्रामिणों ने इन्हीं मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले जिम्मेदार प्रधान की कार्यप्रणाली से असंतुष्टï होकर जनपद श्रावस्ती के जिलाधिकारी को प्रार्थना पत्र दिया था। मगर आज तक जिलाधिकारी द्वारा इस मसले पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। अब पुन: ग्रामीणों ने फि र से एक जुट होकर एकजुट होकर प्रार्थना पत्र लिख कर ग्राम प्रधान की अनैतिक कार्यप्रणाली की शिकायत जिलाधिकारी से की है।

ग्रामीणों का आरोप, ग्राम सभा में नहीं हुआ विकास

जनपद श्रावस्ती के विकास खंड हरिहरपुर रानी के अंतर्गत ग्राम सभा महरौली खाले ककरा में ग्रामीणों ने प्रधान के ऊपर आरोप लगाया कि उन्होंने 55,47,000 रूपये का विकास के नाम पर बंदरबांट किया है। ग्रामिणों ने कहाकि जब हम लोग ग्राम प्रधान से पूछते है कि इतने पैसे में क्या विकास का कार्य कराया है तो ग्राम प्रधान ग्रामीणों को जवाब देता है सारे विकास के कार्य करा दिये है। खाले ककरा में अब कोई भी विकास का कार्य नहीं होगा। जब कोई जांच के लिए आला अधिकारी पहुंचते है, तो वहां उसे विकास के नाम पर लेसमात्र भी विकास का कार्य नहंी दिखाई देता है। इस गांव में ना तो नाली का निर्माण कार्य हुआ है और ना नया खडंजे का निर्माण कार्य हुआ है! सबसे बड़ा सवाल यह है कि वद्यालय के लिए 3 लाख 75000 हजार आया था। ताकि विद्यालय में टाइल्स लगाने का कार्य पूरा किया जा सके। मगर ग्राम प्रधान ने इस कार्य को भी धांधली की भेंट चढ़ा दिया। खाले ककरा में ग्रामीणों के लिए दो पुल का निर्माण होना था। मगर पुल के निर्माण की धनराशि खर्च हो गई। मगर पुल का निर्माण कार्य आज तक संपन्न नहीं हुआ। ग्रामिणों ने आरोप लगाते हुए कहाकि ग्राम प्रधान का कहना है 2014 से 19 के बीच तो अब कोई भी विकास कार्य खाले ककरा में नहीं कराऊंगा। जो करना है कर लो, सूचना कहीं देने गए तो हरिजन एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराऊंगा। जब हम फंसेंगे तो ग्राम विकास अधिकारी, एडीओ पंचायत सारे लोग जाएंगे साथ! अब सवाल यह उठता है कि एक तरफ सूबे की सरकार विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है तो वही दूसरी ओर उसके नुमाईन्दे विकास के नाम पर आम आवाम के अधिकारों पर खुलेआम डकैती डाल रहे है। इस खेल में ग्राम प्रधान से लेकर ग्राम विकास अधिकारी, एडीएओ सभी सरकार के न केवल निर्देशों की धज्जियां उड़ा रहे हैं बल्कि आम आवाम की भावनाओं के साथ भी खिलवाड़ कर रहे है। विकास के नाम पर धनराशि खर्च हो रही है। मगर विकास लेसमात्र नहीं हो रहा है। फिर भी सरकार विकास के ऐसे ही तथाकथित दावों के दम्भ पर पुन: 2019 में भाजपा सरकार प्रदेश में सरकार बनाने का ख्वाब देख रही है। इस संबंध में ग्रामीणों ने 29/9/2018  को जिलाधिकारी दीपक मीणा को सूचना भी। जिला अधिकारी ने डीपीएआरओ श्रावस्ती को आदेश कर दिया। इस मामले में जांच टीम भी गठित करने का निर्देश दिया। मगर अभी तक इस मसले में कोई कार्यवाही नहीं हुई।

 

 

 

11
November

कब जागेगा पर्यटन विभाग, कब सील होगा फोनिक्स लॉन एंड बैंक्वेट

मैनफोर्स

लखनऊ। राजधानी में खुलेआम सराय एक्ट की धज्जिया उड़ाई जा रही है, और प्रशासन खामोश होकर तमाशा देख रहा है। राजधानी में करीब यहां चार सौ अधिक होटल, गेस्ट हाउस और लॉज हैं। जिसमें  से कुछ ही सराय एक्ट के तहत पंजीकृत हैं। जिला प्रशासन और पर्यटन विभाग को भी गैर पंजीकृत होटल और गेस्ट हाउस का पता है। मगर सभी अपनी ऊपर की कमाई के लोभ के खातिर अपनी आंखों पर पट्टी बांधे हुए है। यात्रियों के ठहरने के लिए बनाए गए इन व्यवसायिक भवनों, धर्मशालाओं, गेस्ट हाउसों, होटलों लॉज, मैरिज हालों,  प्रीत भोज स्थलों आदि का सराय एक्ट 1867 के तहत पंजीकरण करना आवश्यक होता है। पंजीकरण के लिए इन प्रतिष्ठानों के संचालकों को निर्धारित मानक पूरे करने अनिवार्य होते है। जैसे स्वास्थ्य विभाग, नगर निगम, प्रदूषण विभाग, अग्निशमन विभाग, विद्युत विभाग आदि सहित कई सरकारी संस्थओं से अनापत्ति प्रमाण सहित अन्य आवश्यक अनुमति प्राप्त करनी होती है। इन सभी विभागों में सबसे महत्तवपूर्र्ण जिम्मेदारी पर्यटन विभाग की होती है। मगर अधिसंख्यकों के पास सराय एक्ट के तहत पंजीकरण प्रमाण पत्र ही नहीं है। ऐसे में ये व्यवसायिक भवन किसकी अनुमति से चल रहे है ? यह सबसे अहम सवाल है। इन व्यवसायिक भवनों से अपरोक्ष लाभ किन-किन विभागोंं के आलाधिकारियों द्वारा अनैतिक तरीके से अर्जित किया जा रहा है ? यह भी एक जांच का गंभीर विषय है। राजधानी में कई दर्जन होटल, लॉज, मैरिज हाल, प्रीत भोज स्थल और गेस्ट हाउस अवैध संचालित हो रहे है। राजधानी के आलमबाग क्षेत्र में भी इसी प्रकार एक प्रीति भोज स्थल जिसका नाम फोनिक्स बैनक्वीट हाल है। यह भी अवैध रूप से संचालित हो रहा है। इस बैनक्वीट हाल का संचालन पर्यटन विभाग, लखनऊ विकास प्राधिकरण, स्वास्थ्य, आग्निशमन विभाग व क्षेत्रीय पुलिस के संरक्षण मे अनैतिक रूप से हो रहा है। मगर सभी जानबूझकर खामोश है। कारण यह है कि इसके संचालन से होने वाले लाभ में सभी की अनैतिक कमाई का एक माध्यम बंध हुआ है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार फोनिक्स बैनक्वीट हाल की वार्षिक बुकिंग लगभग पचास लाख से पचहत्तर लाख रूपये का है। मगर इसके बावजूद भी सरकार को राजस्व का ढेला भर भी लाभ नहीं हो पा रहा है। उपरोक्त सभी विभागों के अधिकारियों और फोनिक्स बैनक्वीट हाल के संचालक की सांठगाठ की देन है कि सरकार को फोनिक्स बैनक्वीट हाल का संचालक खुलेआम वर्ष 2013 से लाखों रूपये का का चूना लगा रहा है और जिम्मेदार खामोश होकर तमाशा देख रहे है। नियमानुसार बगैर पंजीकरण के होटल, गेस्ट हाउस, लॉज, मैरिज हाल, प्रीत भोज स्थल आदि का संचालन किया जाना अपराधिक कृत्य माना जाता है। मगर आज तक जिम्मेदार विभागों द्वारा फोनिक्स बैनक्वीट हाल के संचालक के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गई। जबकि नियमानुसार होटलों, गेस्ट हाउसों, लॉजो, मैरिज हाला आदि व्यवसायिक भवनों के संचालन में सरकार को किराये का पांच प्रतिशत टैक्स देना अनिवार्य होता है। मगर बगैर पंजीकरण कराये ही विभागीय अधिकारियों से सांठगाठ होटल संचालकों द्वारा खुलेआम राजस्व की चोरी की जा रही है। फोनिक्स बैनक्वीट हाल का संचालक न केवल बिना पंजीकरण और टैक्स चुकाये बगैर हाल का संचालन कर रहा है बल्कि कृषि योग्य भूमि पर अनैतिक तरीके से इस व्यवसायिक भवन को खड़ाकर व्यवसायिक इस्तेमाल कर रहा है। सूत्रों की माने तो फोनिक्स बैनक्वीट हाल के संचालक विजय अरोड़ा के पुत्र अमित अरोड़ा हैं। विजय अरोड़ा ने अपने शातिराना दिमाग का इस्तेमाल करते हुए एनजीओ का संचालन प्रारंभ किया था। किसी को कानो कान खबर भी न हुई थी कि एनजीओ की आड़ में अनैतिक कार्य भी इनके द्वारा संपादित किये जाते रहे है। जैसे चिट फं ड कंपनी चलाना, जमीनों पर अवैध कब्जे करना आदि इस प्रकार के अनैतिक कार्य संपादित किये गये। हालकि समाचार पत्र ऐसे आरोपों की पुष्टि नहीं करता है। फि लहाल यह सब जांच का विषय है। अगर किसी जिम्मेदार अधिकारी द्वारा लगभग वर्ष 2000 के आस-पास से जांच करायी जाये तो लखनऊ से दिल्ली तक इनके कारनामों का चिट्ठा परत दर परत खुलता जायेगा। फिलहाल विजय अरोड़ा जिस फोनिक्स बैनक्वीट हाल का संचालन कर रहे है। दरअसल फोनिक्स हाल बैनक्वीट हाल की जमीन जिसका खसरा संख्या 455 स है। जिसका क्षेत्रफल 0.1700 है। उक्त जमीन ग्राम बरगवां परगना बिजनौर तहसील सरोजनीनगर जनपद लखनऊ फसली वर्ष 1421-1426 खाता संख्या 00210 पर दर्ज है। जिसके स्वामी क्रमश: चन्द्र प्रकाश लाल, चेतन प्रकाश लाल, कुन्दल लाल पुत्र सुन्दरलाल निवासी फतेहगंज शहर लखनऊ है। मगर विजय अरोड़ा अपने तिकड़मी दिमाग से साजिश रचकर उक्त स्वामियों की जमीन पर फोनिक्स बैनक्वीट हाल खड़ा करा दिये है। जिसकी जमीन है, वह व्यक्ति अपना कब्जा पाने के लिए तमाम हाथ पैर मार रहा है। मगर वह इनके चंगुल से निकल नहीं पा रहा है। फोनिक्स बैनक्वीट हाल का का निर्माण जिस उपरोक्त भूमि पर हुआ है, उसका कुल एरिया लगभग 34000 स्क्वायर फिट है। जिसमें से लगभग 17000 स्क्वायर फि ट जमीन चन्द्र प्रकाश लाल, चेतन प्रकाश लाल, कुन्दल लाल पुत्र सुन्दरलाल निवासी फतेहगंज शहर लखनऊ की है। जो कृषि योग्य भूमि के रूप में आज भी अभिलेखों में दर्ज है। ऐसी भूमि पर खुलेआम व्यवासियक इस्तेमाल किया जा रहा है। फिर प्रशासन खामोश है। अर्थात दाल में कुछ काला अवश्य है।

 

 

 

11
November

विभाग के कर्णधार बीएस तिवारी की अनैतिक कार्यशैली का कर रहे बीच बचाव

मैनफोर्स

लखनऊ। मैनफोर्स समाचार पत्र अपने विगत कई अंकों से बिजली विभाग में कार्यरत निदेशक तकनीकी बीएस तिवारी की अनैतिक और भ्रष्ट कार्यशैली का पर्दाफाश किया था। उसी कड़ी में एक बार फिर समाचार पत्र बीएस तिवारी की अनैतिक कार्यशैली पर चर्चा कर रहा है। जो इस प्रकार है। बीएस तिवारी अपने रूतबे और ताकत से इस कदर बेखौफ था कि हरदुआगंज हादसे के बाद बिजली इंजीनियरों और कर्मियों की सामान्य सी बात भी उसे बर्दाश्त नहीं होती थी। बीएस तिवारी की इसी प्रकार की अनैतिक कार्यशैली से विवश होकर बिजली कर्मी और इंजीनियर उसके खिलाफ लामबंद होने लगे थे। बिजली कर्मियों और इंजीनियरों ने बीएस तिवारी की भ्रष्टï और अनैतिक कार्यशैली से विवश होकर उनके साथ काम नहीं करने का पत्र लिख डाला। जो बाद में बीएस तिवारी के गले की फांस बनने लगा। इसलिए बीएस तिवारी ने उक्त पत्रों को रिकार्ड से निकलवा कर जला दिया। दरअसल मजदूरों के खून से रंगे बीएस तिवारी से सभी कर्मी मुक्ति चाहते थे। मगर मिल नहीं पायी। अब तीन साल बाद फिर उस जलाई गयी चिट्ठी की राख से बीएस तिवारी की अनैतिक कार्यशैली का भूत सामने आ गया है। बिजली कर्मियों और इंजीनियरों का लिखा गया पत्र बीएस तिवारी के न चाहने के बाद भी उनके गले का फांस बनकर सामने आ गया है। आपको बता दें कि वर्ष 2015 में बीएस तिवारी की अनैतिक कार्यशैली से विवश होकर हरदुआगंज में तैनात लगभग सभी इंजीनियरों ने स्वयं को उनके साथ कार्य करने में असमर्थ जताने लगे थे। इसके लिए इंजीनियरों ने निगम हित में स्वयं की तैनाती हरदुआगंज से अन्यत्र किये जाने की मांग की थी। इस संबंध में इंजीनियरों ने सामूहिक रूप में स्व: हस्ताक्षरित पत्र तत्कालीन चेयरमैन व प्रबंध निदेशक को सौंपा था। यूं तो बीएस तिवारी ने इंजीनियरों द्वारा लिखे गए इस पत्र को रिकार्ड से निकलवाकर जलवा दिया था। मगर कुछ लोग बीएस तिवारी से भी कलाकार निकले। जिन्होंने उक्त पत्रों की छायाप्रतियां बचाकर रखी थी कि ताकि वक्त बेवक्त बीएस तिवारी की अनैतिक कार्यशैली के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके। यह बीएस तिवारी का दुर्भाग्य था कि वे लाख प्रयास के बाद भी सारे साक्ष्य नष्ट करने में सफल नहीं हो सके। आज वही साक्ष्य उनकी अनैतिक कार्यशैली को चिल्ला-चिल्ला कर बयां कर रहा है और उनके गले का फांस बना हुआ है। आपको बता दे कि हरदुआगंज के सभी इंजीनियरों जो पत्र अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को लिखा था, उसमें यह उल्लेख किया था कि वे समस्त अधिकारी हरदुआगंज तापी परियोजना में कार्यरत हैं। वह सभी हरदुआगंज तापी परियोजना में काम करने में स्वयं को असमर्थ महसूस कर रहे हैं। इंजीनियरों ने प्रबंध निदेशक से अनुरोध किया था कि समस्त अधिकारियों का स्थानांतरण निगम हित में शीघ्र हरदुआगंज तापीय परियोजना से अन्यत्र कर दें। वर्ष 2015 में हरदुआगंज में बीएस तिवारी के नीचे काम करने वाले अधिकारियों की स्थिति यह थी कि कोई भी उनके साथ कार्य करने को तैयार नहीं था। इसलिए वे सभी स्थानांतरण के लिए पत्र लिखे थे। मगर अपने प्रभुत्व और दब दबे के दम पर बीएस तिवारी ने उक्त पत्रों पर कार्यवाही को ठंडे बस्ते में डलवा दिया। आश्यर्च की बात है कि यह सब कुछ चेयरमैन संजय अग्रवाल की नाक के नीचे होता रहा। मगर वे सब कुछ जानने के बाद भी सारे मामले को ठंडे बस्ते में डलवा दिये। उन्होंने इस मामले में मजिस्ट्रेटी जांच के साथ-साथ विभागीय जांच बैठाकर पूरे मामले पर पर्दा डलवा दे दिया। जबकि विभागीय जांच जिस अधिकारी को दी गयी थी। वह अधिकारी बीएस तिवारी से जूनियर था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कैसे कोई जूनियर अधिकारी अपने सीनियर अधिकारी के खिलाफ  निष्पक्ष जांच करने की हिमाकत कर सकता है। इतना ही नहीं यह विभागीय नियमावली के भी खिलाफ है। कोई जूनियर अधिकारी अपने सीनियर अधिकारी की जांच करने के लिए अर्ह नहीं माना जाता है। इतना ही नहीं समकक्ष पद पर कार्यरत अधिकारी भी जांच नहीं कर सकता है। जांच का अधिकार वरिष्ठï अधिकारी ही कर सकता है। मगर बिजली विभाग में सारे के सारे नियम कानून तार-तार हो गये। सभी ने अपने ही घोड़े दौड़ाये है। चाहे वह ठीक से दौड़ा हो या गस्त खाकर गिर गया हो। इस बात से किसी का कोई लेना देना नहीं रहा। आपको बता दें कि हरदुआगंज पावर हाउस में हुई मजदूरों की मौत के जिम्मेदार बीएस तिवारी को बचाने के लिए भले ही तत्कालीन चेयरमैन संजय अग्रवाल ने कारखाना रिपोर्ट को दरकिनार कर दिया हो। मजिस्ट्रेटी जांच के उपर जांच बैठाकर मामले को रफादफा कर दिया हो। मगर किया गया गुनाह कभी भी किसी का पीछा नहीं छोड़ता है। वह आज नहीं तो कल गले का फांस बनकर सामने जरूर आयेगा। यह फांस आज खुद बखुद बीएस तिवारी के गले में पड़ गया। आपको बता दें कि हरदुआगंज में मजदूरों की मौत के बाद हुई कारखाना आगरा और मजिस्ट्रेटी जांच में बीएस तिवारी को घटना का जिम्मेदार बताया गया था। बीएस तिवारी के संबंध में संजय अग्रवाल की भूमिका की तर्ज पर वर्तमान चेयरमैन अलोक कुमार की भी रही है। इसी हरदुआगंज काण्ड की जांच करीब 8 माह पूर्व उस संजय तिवारी को सौंपी गई थी। जहां पर निदेशक बनने से पूर्व बीएस तिवारी तैनात थे। इस प्रकार एक जूनियर अधिकारी को जांच देकर चेयरमैन आलोक कुमार ने न केवल वर्तमान सरकार के उस आदेश की अवहेलना की है। जिसमें यह उल्लेखित किया गया है किसी भी आरोपी की जांच उससे एक पद का सीनियर अधिकारी ही करेगा। बल्कि सरकार की निष्ठा पर सवालिया निशान लगाया है। हरदुआगंज कांड के जिस प्रकरण में कारखाना आगरा की रिपोर्ट, मजिस्ट्रेट जांच की रिपोर्ट, तत्कालीन प्रमुख सचिव श्रम द्वारा केस चलाये जाने की अनुमति पत्र और 20 से ज्यादा इंजीनियरों का निगम हित में निगम के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक को लिखा पत्र यह साबित करता है कि बीएस तिवारी की कार्यशैली कैसी है ?  मगर इतने के बावजूद भी सेटिंग में माहिर और पैसे के खिलाड़ी बीएस तिवारी को तत्कालीन चेयरमैन संजय अग्रवाल अपनी आंखों पर पट्टी बाँधकर खुद को बचाने में जुटे हुए है। 

काली कमाई करने वालों पर रहम, ईमानदारों पर सितम

बिजली विभाग में स्थानांतरण भी रस्म अदायगी के है। चेयरमैन की इच्छा है कि स्थानांतरण के बाद भी उनके हमराहों का अहित न हो और वे अपने पुराने और मलाईदार पदों पर बने रहे। मलाईदार पदों पर बैठे इंजीनियरों का स्थानांतरण महज रस्म अदायगी है। वास्तविक मायने में वे अपने इच्छित पदों पर ही बने रहते हैं। अलबत्ता परेशानियों और कठिनाईयों का सामना ईमानदार इंजीनियर को करना पड़ता है। उन्हें स्थानांतरण का दंश झेलना पड़ता है। ऐसे में विभागीय कर्मियों की नाराजगी सरकार के सामने विरोध के रूप में मुखर होता है। जो आये दिन कोई न कोई एक नयी मुसीबत खड़ी करता है। बिजली विभाग के मुखिया और प्रबंधन की इस भेदभावपूर्ण कार्यशैली को लेकर कर्मचारियों में व्याप्त नाराजगी आगाती चुनावी वर्ष में कितना लाभदायक सिद्ध होगी। इसका अंदाजा शायद ही सत्ताधारी दल की पार्टी को हो। आपको बता दें कि अधिकारियों व कर्मचारियों के स्थानान्तरण की समीक्षा प्रत्येक वर्ष होती है। मगर परियोजना प्रबंधक और डायरेक्टर पर्सनल की आपसी मिली भगत से मलाईदार पदों पर तैनात अधिशाषी अभियंताओं को रिलीव नहीं किया जाता है। जिसके कारण वे वहीं पर लगभग 1 वर्ष और 6 माह से तैनात होते है और रिलीव नही पाते है। आश्चर्यजनक बात यह है कि स्थानांतरित हुए इन अधिकारियों और कर्मचारियों को यथावत बनाये रखने जैसे किसी आदेश के बिना ही ये वहां तैनात होते है। आदेश में वेतन रोकने की बात लिखने के बाद भी जब उसका पालन नहीं किया जाता है तो डायरेक्टर पर्सनल द्वारा उस पर कोई कार्यवाहीं नहीं की जाती। जबकि कई ऐसे अफसरों/कर्मचारियों को जिनकी खुद अथवा पारिवारिक समस्याएं होती है। संज्ञान में होने के बावजूद उस पर ध्यान नहीं दिया जाता है। मात्र इनकी गलती यह है कि यह सब नान मलाईदार पदों पर तैनात होते है। बिजली विभाग के चेयरमैन आलोक कुमार के एक फ रमान से मामूली तनख्वाह पर काम करने वाले संविदाकर्मीयों को उनके मूल निवास से इतर दूसरी तहसील में स्थानांतरित तो कर दिया जाता है। मगर उसी बिजली विभाग में अलोक कुमार की नाक के नीचे बैठे तमाम अधिशाषी अभियंताओं को वर्षों से नहीं हटाया जाता है। स्थानांतरण की भी मानकों के अनुरूप हर वर्ष समीक्षा भी की गयी होती और स्थान्तरित होने वाले अफ सरों/कर्मचारियों को रिलीव करने के आदेश भी परियोजना प्रबंधकों को जारी किये गए होते तो मलाईदार पदों पर बैठे अधिशाषी अभियंताओं को हटाने में केवल लीपापोती नहीं करनी पड़ती। उच्चाधिकारियों के इस प्रकार के दोहरे वर्ताव और निर्णय से कर्मियों में असंतोष व्याप्त है। जोकि इस चुनावी वर्ष में रोजगार को लेकर दावों, वादों मे उलझी वर्तमान सरकार की उलझनें बढाने वाली चुनौति साबित हो रही हैं और आने वाले समय में हड़ताल की समस्या से जूझ रही सरकार के सामने एक और हड़ताल की स्थिति कर सकती है। कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे पावर कारपोरेशन के लिए संविदा कर्मियों को लेकर आलोक कुमार का फ रमान और भ्रष्ट व मलाईदार पदों पर तैनात अधिशाषी अभियंताओं को संरक्षण दिया जाना मुसीबतों को और बढ़ाने वाला है। कर्मियों में बिजली विभाग के मुखिया का इस तरह का कदम एकदम तानाशाही वाला करार दिया जा रहा है। जहां छोटे कर्मचारियों पर चाबुक और बड़ों को संरक्षण देने का काम किया जा रहा है। दरअसल शासन में पावर कारपोरेशन प्रबंधन को विभिन्न स्रोतों से शिकायतें मिल रही थी कि तहसील में तैनात आउटसोर्स श्रमिक बिजली कंपनियों के हितों के विपरीत काम कर रहे हैं और स्थानीय प्रभाव के चलते यह श्रमिक पक्षपात पूर्ण तरीके से काम करते हैं। जिसके मद्देनजर निर्णय किया गया कि आउट आउटसोर्स श्रमिकों की तैनाती उनके गृह तहसील से बाहर किया जाए। जबकि इसके विपरीत खुद चेयरमैन आलोक कुमार की नाक के नीचे हो रहे कारनामे उनको दिखाई नहीं दे रहे। संविदा कर्मियों पर चाबुक चलाने वाले आलोक कुमार बताएं कि उन अधिशाषी अभियंताओं पर चाबुक क्यूं नहीं चलाया जा रहा है। जिन्हें डायरेक्टर पर्सनल संजय तिवारी के 19 सितम्बर  2018 के आदेश में कहा गया कि स्थान्तरित होने वाले अधिकारी/ कर्मचारी अपनी तैनाती 1 अक्टूबर तक नयी जगह पर कर लें। फिर भी उनको परियोजना प्रबंधक द्वारा रिलीव नहीं किया गया। आदेशों को दरकिनार करते हुए उनके वेतन को रोकने की बात केवल कागजों में ही की गई। वास्तविकता के धरातल पर लेसमात्र भी नहीं उतरी। कई तो ऐसे कर्मचारी/अधिकारी हैं जोकि 3 दशक से एक ही जगह पर तैनात हैं। ऐसे अफ सरों पर मेबरवानी की वजह क्या है। इस संबंध जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब क्यूं नहीं लिया गया। जिन्होंने कागजी खाना पूर्ति करके तैनाती को यथावत बनाये रखा।  करीब छह माह या वर्ष भर से बिना किसी अनुमति के रिलीव न होने वाले ये अधिकारी क्यूं मुखिया आलोक कुमार को दिखाई नहीं दे रहे हैं। इसके अतिरिक्त जनपद एटा के जवाहरपुर तापीय परियोजना के चर्चित सरिया चोरी प्रकरण के सरगना यूएस गुप्ता जिसको एटा जिला प्रशासन अपनी प्रथम रिपोर्ट में दोषी मान रहा है। उसे सजा देने के बजाय विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा यूएस गुप्ता को आफि स अटैच क्यों बताया जा रहा है। जबकि उसके आदेश में अटैच जैसे किसी शब्द का उल्लेख ही नहीं किया गया है। मामले की लीपापोती करते हुए यूएस गुप्ता को जवाहरपुर से हटाकर निदेशालय में जिस मुख्य अभियंता प्रगति ईकाई के पद पर तैनाती दी गयी। मूलत: वह पद सृजत ही नहीं है। जबकि इसी प्रकरण में यूएस गुप्ता के सहयोगी रहे और जिला प्रशासन की रिपोर्ट में दोषी जेई सुरेन्द्र कुमार को सोनभद्र में परियोजना प्रबंधक के साथ अटैच कर दिया गया है। यूएस गुप्ता को निदेशालय पर इसलिए बैठाया गया ताकि वह पूरे मामले को मैनेज कर सके और वह इस काम में जिसे वे पूरी शिद्दत से कर रहे है। निदेशालय स्तर पर ही तैनात निदेशक तकनीकी बीएस तिवारी के कारनामें अलोक कुमार को नजर नहीं आ रहेेे। सरिया चोरी के सरगना यूएस गुप्ता भ्रष्टाचार और घोटाले के जनक उत्पादन निगम के तकनीकी निदेशक बीएस तिवारी और डायरेक्टर पर्सनल संजय तिवारी के स्थानांतरण को लेकर लीपापोती करने के बाद भी इन सब पर मेहरबानी दिखाई जा रही है। जबकि छोटे कर्मचारियों पर हंटर चलाया जा रहा है। आखिर विभाग के आलाधिकारियों की मंशा क्या ? आलोक कुमार का यह कदम शासन की पारदर्शिता को कितना सटीक व उचित ठहराता है ? यह एक गंभीर सवाल है।  

 

बीएस तिवारी की भांति रिपोर्ट में दोषी करार दिये जाने वाले यूएस गुप्ता को बचाने के लिए हो रही जबरदस्त पैरोकारी

जवाहरपुर की सरिया चोरी के मामले जिला प्रशासन की प्रथम जांच रिपोर्ट में संलिप्त पाए जाने के बाद भी दोषी अफ सर यूएस गुप्ता और जेई सुरेन्द्र कुमार को बिजली विभाग के आलाधिकारी बचाने की कवायद में जुटे हुए है। सूत्रों से मिली ताजा जानकारी के अनुसार एटा के जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन ने अपनी जांच में यूएस गुप्ता और सुरेन्द्र कुमार की संलिप्तता को पाते हुए अपनी प्रथम रिपोर्ट शासन को भेज दी है। शासन द्वारा इस फाईल को कार्यवाही के लिए बिजली विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों के पास भेजा गया है। मगर उर्जा विभाग में शीर्ष पर बैठे अधिकारी शासन व मुख्यमंत्री की की आंखों में धूल झोकने का कार्य कर रहे है और दोषी यूएस गुप्ता और जेई सुरेन्द्र कुमार को बचाने की जुगत लगा रहे है। एटा के जवाहरपुर परियोजना की सरिया चोरी के प्रकरण की लीपापोती करने के लिए पहले तो विभाग के आलाधिकारियों ने यूएस गुप्ता को वहीं तैनात रखा था। मगर चौतरफ  ा दबाव के कारण यूएस गुप्ता को जवाहरपुर से हटाकर मुख्यालय में तैनाती दे दी गई। ताकि वह मुख्यालय में बैठकर अपने कारनामों पर पर्दा डाल सके। विभाग के नियुक्ति प्रभाग की जिम्मेदारी देख रहे यूएस गुप्ता के हमराहों ने सरिया चोरी के इस खिलाड़ी यूएस गुप्ता को निदेशालय में तैनाती बिना पद के ही दे दी। जबकि दूसरे सुरेन्द्र कुमार को सोनभद्र भेज दिया। अब सवाल यह है कि पैसे और प्रभाव के बल पर तैनाती पाने वाला यूएस गुप्ता मुख्यालय पर बैठकर क्या जांच को प्रभावित नहीं करेगा या फिर उसके कर्णधारों द्वारा उसे मौका दिया जा रहा है। सूत्रों की माने तो यूएस गुप्ता खुद को बचाने के लिए अपने आकाओं के परिक्रमा कर रहा है। जानकारी में तो यह तक है कि यूएस गुप्ता को बचाने के लिए बिजली विभाग के कुछ अधिकारी लाबिंग करते हुए प्रबंध निदेशक पर दबाव बना रहे है। नवनियुक्त एमडी को विभाग में हड़ताल का काल्पनिक भय भी दिखाया जा रहा  है। आपको बता दें कि पिछले दिनों एटा जनपद के जवाहरपुर तापीय परियोजना में इस्तेमाल होने वाली सरिया की चोरी के एक बड़े गैंग का खुलासा वहां के एसडीएम के द्वारा किया गया। सरिया चोरी के इस पूरे प्रकरण में विभागीय संलिप्तता का भी मुद्दा उठाया तो शासन भी हरकत में आ गया और मुख्यमंत्री सचिवालय द्वारा पूरे प्रकरण की मानिटरिंग शुरू कर दी गई। इसके अतिरिक्त यूएस गुप्ता को जवाहरपुर परियोजना का जनरल मैनेजर बनवाने में कुछ विभागीय अधिकारियों के अतिरिक्त एक बीजेपी के प्रवक्ता का भी नाम सामने आ रहा है। यूूएस गुप्ता अपने राजनैतिक रसूख और बिजली विभाग में शीर्ष पर बैठी अफ सरशाही की मेहरबानियों के चलते जवाहरपुर के साथ ही साथ हरदुआगंज में बिना स्वीकृत पद के ही अतिरिक्त प्रभार लेने में कामयाब थे। मगर जब इस सवाल को प्रमुखता से उठाया गया तो दूसरे ही दिन यूएस गुप्ता के पास से यह प्रभार अधिकारियों ने अपनी गर्दन फंसने के भय से हटा लिया। इसी तरह एटा की सरिया चोरी के इस प्रकरण का खुलासा होने के बाद भी जनरल मैनेजर यूएस गुप्ता और जेई सुरेन्द्र कुमार को कई दिनों तक वहीं तैनात रखा गया था। वहीं चेयरमैन आलोक कुमार के भेजे गए जांच अधिकारी सुबीर चक्रवर्ती भी पूरे प्रकरण की जांच के नाम पर लीपापोती करके लौट आये थे। मगर जब यूएस गुप्ता और सुरेन्द्र कुमार की तैनाती को लेकर सवाल खड़ा किया गया कि आखिर निष्पक्ष जांच कैसे होगी ? तब यूएस गुप्ता को जवाहरपुर से हटा कर निदेशालय में तैनात कर दिया गया। मगर इंजीनियर सुरेन्द्र कुमार की तैनाती वही रही। जब दोबारा यह सवाल उठाया गया तब इंजीनियर को भी वहां से हटाकर सोनभद्र मेंं तैनात कर दिया गया। ऐसे में अफ सरों की इस तरह की लीपापोती के पीछे की वजह राजनैतिक है  उनका कुछ व्यक्तिगत हित है। 

एमडी पांडियन ने दिखाया कड़ा तेवर, यूएस गुप्ता को किया शंट 

जवाहरपुर तापीय बिजली परियोजना में निर्माण सामाग्री की चोरी के मामले में सीधे शामिल रहने वाले महाप्रबंधक यूएस गुप्ता पर एक बार फिर गाज गिर गई है। पहले जवाहरपुर से हटाए गए यूएस गुप्ता को मुख्यालय में महत्वपूर्ण पद पर बैठाया गया था। मगर अब जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है। यूएस गुप्ता की एक-एक करतूत सामने आ रही हैं। यूएस गुप्ता की अनैतिक कार्यशैली का लगातार प्रकाश में आने पर विद्युत उत्पादन निगम के प्रबंध निदेशक सेंथिल पांडियन ने कड़क रुख अपनाया है। एमडी पांडियन ने गुप्ता को झांसी स्थित पारीछा परियोजना के परियोजना प्रबंधक के साथ अटैच कर दिया। इसके पूर्व गुप्ता को विभाग के जिम्मेदारों ने मामले की लीपापोती करते हुए एटा से हटाकर मुख्यालय पर तैनात किया था। एक आदेश जारी कर एमडी पांडियन ने घोटाले के आरोपी यूएस गुप्ता को झांसी में परीछा बिजली परियोजना के महाप्रबंधक के साथ अटैच कर दिया है। अर्थात अब सरकारी माल की लूट करने वाला यूएस गुप्ता अपने ही समकक्ष एक अधिकारी का मातहत बन कर रह गया है। परीछा का महाप्रबंधक भी चीफ  इंजीनियर स्तर का अधिकारी होता है। जबकि यूएस गुप्ता भी चीफ  इंजीनियर ही है। प्रबंध निदेशक सैंथिल पांडियन का कहना है कि जवाहरपुर में जैसे-जैसे सरकारी धन के लूट की जांच आगे बढ़ेगी वैसे-वैसे यूएस गुप्ता सहित अन्य पर विभागीय कारवाई कड़ी की जाती रहेगी। साथ ही भ्रष्टाचार के अन्य मामलों में भी उचित कार्यवाई करते हुए दोषियों पर शिकंजा कसा जाएगा। गौरतलब हो कि इससे पूर्व बिजली विभाग के जिम्मेदारानों ने यूएस गुप्ता की तैनाती को लेकर प्रबंध निदेशक को गुमराह करने की कोशिश भी किया था। मगर अपनी छवि और कार्यशैली के अनुरूप जिस तरह से प्रबंध निदेशक ने यूएस गुप्ता पर जिला प्रशासन की प्रथम रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए विभागीय कार्यवाही की है। उससे यह स्पष्ट हो रहा है कि विभाग इस प्रकरण में न्याय की राह पर आगे बढ़ रहा है। 

बीएस तिवारी ने एमडी को खुश करने के लिए संचालित की खराब यूनिट

ओबरा बिजली घर में हुआ हादसा बेहद गंभीर और दु:खद था। ओबरा बिजली घर के हादसे के पीछे भी बीएस तिवारी की ही मुख्य भूमिका है। उत्पादन निगम के प्रबंध निदेशक सेंथिल पांडियन के दौरे से ऐन पहले निदेशक तकनीकी बीएस तिवारी ओबरा पहुंचता और वहां के जनरल मैनेजर व सीजीएम को तकनीकी रूप से खराब दो यूनिटों को जबरन चलाने का निर्देश दिया। आग लगने के कारणों की ताजा जानकारी यह है कि बंद पड़ी यूनिट को लेकर सवालों से बचने के लिए निदेशक तकनीकी होने के नाते बीएस तिवारी ने ओबरा यूनिट की 2 बंद पड़ीं वाल मिल को चलाने का निर्देश परियोजना प्रबंधक और मुख्य परियोजना प्रबंधक को दे दिया। बीएस तिवारी ने इन अधिकारियों पर इतना दबाव डाला कि ये दोनों अधिकारी स्वयं जाकर आपरेशन रूम में बैठ गए और इंजीनियर्स पर दबाव बनाने लगे। यह सारी प्रक्रिया सामान्य दिनचर्या से हटकर रही। सामान्यत: होता यह था कि वाल मिल चलावाने के लिए कभी परियोजना प्रबंधक अथवा मुख्य परियोजना प्रबंधक उस आपरेशन रूम में नहीं जाता था। वाल मिल चलाने के काम में एक्सपर्ट इंजीनियर्स की जांच पड़ताल के बाद उस वाल मिल को चालू किया जाता था। बीएस तिवारी द्वारा परियोजना प्रबंधक और मुख्य प्रबंधक पर दबाव इतना था कि वह आपरेशन रूम में पहुंच गए और इंजीनियर्स पर वाल मिल को चलाने के लिए दबाव बनाया। वाल मिल में खराबी और चेकिंग की बात इंजीनियर्स द्वारा कहे जाने के बावजूद वाल मिल को चलवा दिया गया। पहले एक वाल मिल के न चलने पर दूसरी वाल मिल को चलाने का आदेश दिया गया। इस तरह दोनों वाल मिल के चलाये जाने से वाल मिल और ट्रांसफ ार्मर के बीच का पावर केबल गर्म होकर जलना शुरू हो गया। दबाव और जबरदस्ती झेल रहे इंजीनियर्स भी ट्रांसफार्मर की जांच किये बिना सुबह करीब 3 बजे घर चले गए। यही केबल जलते हुए इतना बड़ा रूप ले लिया कि यह हादसा हो गया। इसके पूर्व भी वर्ष 2013 में अनपरा तापीय परियोजना पर महाप्रबंधक के पद पर रहते हुए बीएस तिवारी ने 500 मेगावाट की इकाईयों का जीटी जनरेटर ट्रांसफार्मर अपने भ्रष्टाचारी रवैये के कारण समय से नहीं खरीदा था। जिसकी वजह से अनपरा की 500 मेगावाट की इकाई की जीटी के खराब हो गई। जिसके उपरांत नये जीटी के अभाव में इकाई को बहुत समय तक नहीं चलाया जा सका था। इस मामले में आरोप पत्र भी दाखिल हुआ था लेकिन बीएस तिवारी इस मामले से बच निकला। फिर 2015 में हरदुआगंज में भी इनके परियोजना प्रबंधक रहने के दौरान एक बड़ा हादसा हुआ और मजदूरों की मौत हो गई। मजिस्ट्रेटी जांच में दोषी पाए जाने के बाद भी यह बच निकला और अब ओबरा में भी इसने अपने कारनामों को दोहरा दिया। पाठकों को बता दें कि ओबरा थाना इलाके के ओबरा विद्युत बी परियोजना के बिटीपीएस माइनस के केबिल गैलरी में शार्ट सर्किट से घटना के दिन सुबह  आग लग गई थी। परियोजना में लगी आग से ओबरा बी परियोजना की 200 मेगावाट की तीन इकाई 9,10 और 11 ट्रिप हो गयी। आग पर काबू पाने के लिए सीआईएसएफ की 6 फ ायर बिग्रेड गाडिय़ां लगाई गई और साथ ही 5 ट्रक बालू और 5 एम्बुलेंस भी लगाई गई थी। परियोजना की सुरक्षा के लिए लगी सीआईएसएफ  और जिला प्रशासन ने आग पर काबू पाने के लिए व्यापक इंतजाम किये और आग पर काबू पा लिया था। अब आग लगने के कारणों और नुकसान का पता लगाने के लिए जांच की जा रही है। जानकारों का कहना है कि यह अत्यंत दुखद है। आग लगने की वजह जो भी रही हो। मगर इस सम्पूर्ण मामले में हर स्तर पर लापरवाही उजागर हो रही है। जिसके कारण आग लगी और परियोजना को लाखों का नुकसान हुआ है।