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01
October

उद्योग धंधे ठप, अर्थव्यवस्था पस्त, मालिक-मजदूर सभी त्रस्त

मैनफोर्स

लखनऊ। देश में मंदी की मार और त्राहि-त्राहि कर रही आवाम हालत देखते ही बन रहा है। मंदी की मार से पीडि़त लोग भी दो वर्ग में विभाजित हो गये है। प्रथम वर्ग चिल्ला-चिल्लाकर भाजपा सरकार की कार्यशैली पर गालियां दे रहा है और कोस रहा है। भाजपा सरकार पर भड़ास निकालते हुए कह रहा है कि जिस सरकार को हम लोगों ने अच्छे दिन लाने के लिए चुना। आज वही सरकार आम आवाम के पीठ में छुरा भोकने का काम कर रही है। नित नये-नये हिटलरशाही कानून को जनता के ऊपर थोप कर जनता के जख्मों पर नमक रगडऩे का काम कर रही है। सरकार ने जनता की हालत धोबी के कुत्ते के जैसी कर रखी है। जो न तो चैन से खुद खा सकता है और ना ही अपने परिवार का पालन-पोषण कर सकता है। सम्पूर्ण उद्योग धंधों को ऐसे-ऐसे करों से आच्छादित कर दिया गया है कि उद्योग धंधे बंद होने लगे है और लोग बेरोजगार हो रहे है। वही दूसरा वर्ग मन ही मन घुट रहा है। कारण उद्योग धंधों की दयनीय होती दशा और स्वयं के रोजगार पर खड़े हो रहे संकट की चिन्ता है। मन में बहुत सारे गुबार है। मगर गुबार निकालने का परिणाम संबंधित कंपनी में प्राप्त रोजगार से हाथ धोना है। क्योंकि संबंधित कंपनी का यदि कर्मचारी कंपनी की दयनीय दशा का वर्णन करेगा तो सरकार उक्त कंपनी के मालिकान से खफा हो जायेगी और पुन: उक्त कंपनी पर जजिया कर लगा कर उसकी मंदी में भी धीरे-धीरे रेंगती हुई दुकान पर ताला लगा देगी। जिससे ना केवल संबंधित कर्मचारी प्रभावित होगा बल्कि संबंधित कंपनी का मालिक भी बुरी तरह से प्रभावित होगा। मगर इस भय के बावजूद भी देश के उद्योग धंधों में कार्यरत रोजगारपरक लोग भले ही खुलकर अपने मन का गुबार न निकाल पा रहे हो। मगर दबे मन गुबार को व्यक्त करने का प्रयास अवश्य कर रहे है। इसी का उदाहरण मैनफोर्स समाचार पत्र अपने पाठकों के समक्ष इस प्रकार वर्णित कर रहा है। इन दिनों राजधानी लखनऊ के चिनहट इंडस्ट्रीयल एरिया स्थित टाटा मोटर्स से अपना कार्य पूर्ण कर बाहर निकल रहे कर्मचारियों के मुंह से जो बाते निकल रही थी। वह बातेें हैरान कर देने वाली है।

यहां कर्मचारी एक दूसरे सहकर्मी से यह सवाल करते नजर आये कि बाजार में छाई मंदी की वजह से जब कंपनी के उत्पादन में कमी आ रही है और कर्मचारियों की कटौती हो रही है तो कैसे जीवन गुजारा जायेगा ? आज अन्य कर्मचारियों की छटनी हुई है तो कल हम लोगों की भी तो हो सकती है ? कंपनी छटनी करें, इससे पहले हम लोगों को अपनी जीविका चलाने के लिए कुछ ठोस प्रबंध करना ही होगा। अन्यथा हम लोग भी सड़क पर आ जायेगे। ऐसे ही सवालों के चक्र में फंसे कर्मचारी वर्तमान और भविष्य की चिन्ता अपने माथे पर लिए दिखाई दिए। मगर उसके बावजूद भी सरकार और उसके नुमाईन्दों को मंदी की मार नहीं दिखाई दे रही हैं। इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि लोगों के पास आंख होने के बावजूद भी लोग जानबूझकर स्वयं का हित साधने के उद्देश्य से अंधे बने हुए है। टाटा मोटर्स से कार्य समाप्त कर बाहर आने वाले कर्मचारियों की माने तो पूरे अगस्त माह में मात्र दस दिन ही कंपनी में कार्य हुआ। शेष दिन कंपनी बंद रही। कर्मचारियों की माने तो इसी प्रकार यदि मंदी रही तो आगामी दिनों में भी कंपनी का उत्पादन कार्य ठप रहेगा। कंपनी के कर्मचारियों की माने तो पहले जहां प्रतिमाह लगभग 5000 से 7000 वाहनों का उत्पादन होता था। अब बमुश्किल 1800 से 2000 वाहनों का उत्पादन हो रहा है। कर्मचारियों ने बताया कि अब तो अनिश्चितता का माहौल है। अब हमें भी नहीं पता कि अगले हफ्ते हमारी ड्यूटी लगेगी या नहीं ? हम लोगों की नौकरी रहेगी या नहीं ? यह भय सभी कर्मचारियों में व्याप्त हो गया है। पाठकों को बता दें कि भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार विगत 20 वर्षो में सबसे अधिक मंदी के दौर का सामना कर रहा है। सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्यूफैक्चर्स के आंकड़ों की माने तो अप्रैल-जुलाई 2019 की तिमाही में भारत में वाहनों की बिक्री विगत वर्ष की तुलना में 21.56 फीसदी कम रही। जहां कामर्शियल वाहनों की बिक्री में 13.57 फीसदी की गिरावट हुई। वहीं दोपहिया वाहनों की बिक्री में भी करीब 12.93 फीसदी की गिरावट देखने को मिली। सवारी ढोने वाले तिपहिया वाहनों की बिक्री में भी लगभग 7.43 फीसदी की कमी देखने को मिली। चूंकि बिक्री कम हो रही है। इसलिए वाहनों का उत्पादन भी कम हो रहा है। सियाम के ही आंकड़ों की माने तो अप्रैल-जुलाई 2019 के तिमाही में पिछले साल की तुलना में वाहनों का उत्पादन करीब 10.65 फीसदी की कम रहा। जहां अप्रैल से जुलाई 2018 की तिमाही में 10,883,730 वाहनों का उत्पादन हुआ। वहीं वर्ष 2019 के इसी तिमाही के दौरान सिर्फ 9,724,373 वाहनों का उत्पादन किया गया। जिन चीजों का उत्पादन कम हुआ है या बिक्री में गिरावट हुई। उसका सीधा प्रभाव ग्रामीण भारत से है। टाटा, होंडा और मारुती, महिद्रा जैसी बड़ी कंपनियों का उत्पादन प्रभावित होने से इन कंपनियों से संबंधित हजारों छोटी इकाईयों में सैकड़ों प्रकार के कार्य ठप हो गये है। जिससे लाखों लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा। इसमें काम करने वाले अधिकतर ऐसे लोग है। जिनका विवरण किसी रजिस्टर में दर्ज नहीं है। वाहनों के उत्पादन में कमी का यह सिलसिला जुलाई-सितंबर की तिमाही में भी जारी रहा। टाटा, मारूति सुजुकी, महिंद्रा, अशोक लेलैंड, हुंडई, होंडा, टोयोटा और हीरो जैसी बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियां लगातार अपने उत्पादन में कटौती कर रही हैं। प्लांट और गोदाम पर वाहनों की कतार लगी है। उत्पादन कम होने से ये कंपनियां कॉस्ट कटिंग के नाम पर कर्मचारियों की छंटनी कर रही हैं। जिस प्रकार राजधानी लखनऊ के टाटा मोर्टस की हालत है। ठीक उसी प्रकार जमशेदपुर, पुणे, चेन्नई, आदित्यनगर, जमशेदपुर-झारखंड और मानेसर-गुरूग्राम जैसे बड़े ऑटोमोबाइल औधोगिक क्षेत्रों की भी हालत दयनीय बनी हुई है। लगातार कर्मचारियों के छंटनी की खबर आ रही है। 

महिंद्रा और मारूति सुजुकी ने क्रमश: 1500 और 3000 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। फेडरेशन ऑफ  ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (फाडा) की माने तो ऑटोमोबाइल सेक्टर में आई मंदी से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अब तक लगभग दो लाख लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा है। फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन का अनुमान है कि यदि यही स्थिति बनी रहे तो आगामी दो माह में ऑटो सेक्टर से लगभग 10 लाख लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है। पाठकों को बता दें कि लखनऊ के इस औधोगिक क्षेत्र में टाटा मोटर्स के बड़े कॉमर्सियल वाहनों जैसे ट्रक, बस और पिकअप का उत्पादन होता है। इस कंपनी में करीब 5000 से अधिक कर्मचारी कार्य करते हैं। कंपनी के कर्मचारियों का कहना है कि पहले यहां तीन शिफ्ट में कार्य होता था। मगर अब सिर्फ  एक ही शिफ्ट में कार्य होता है। ओवर टाइम तो लगभग समाप्त ही हो चुका है। कर्मचारियों ने बताया कि आटो कंपनियों में लगातार छंटनी की बात सामने आ रही है। एक-दो कर्मचारियों के आत्महत्या की भी बात सामने आ रही है। कर्मचारियों ने कहाकि हमें नहीं पता कि अगले माह हमारी नौकरी रहेगी या नहीं ? कंपनी में कार्य ठप पड़ा है। सर्वाधिक नुकसान उन कर्मियों का हो रहा है। जो दिहाड़ी पर काम करते हैं। कंपनी में काम करने वाले दिहाड़ी मजदूरों ने भी बताया कि आजकल प्लांट में कार्य कम हैं। उनसे भी कार्य नहीं कराया जा रहा है। प्लांट कभी भी बंद हो जाता है। जिसकी वजह से दिन भर की दिहाड़ी चली जाती है। पाठकों को बता दें कि मंदी की मार सिर्फ ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में ही नहीं है। बल्कि मंदी की मार का शिकार पूरा अर्थतंत्र हो गया है। राजधानी लखनऊ के चिनहट इंडस्ट्रियल एरिया में स्थिति आरके पाल का ढाबा है। ढाबे पर जहां तीन माह पूर्व एक समय में 40 से 50 लोग बैठे रहते थे। आज उनके उसी ढाबे पर यह संख्या बमुश्किल चार से पांच लोगों तक सीमित रह गई है। ढाबे पर काम करने वाले एक कर्मचारी ने बताया कि दोपहर दो बजे तक ढाबे की बिक्री जहां पहले साढ़े तीन से चार हजार प्रतिदिन तक हो जाती थी। आज बमुश्किल सुबह से देर रात तक एक से डेढ़ हजार की ही बिक्री हो पाती है। पहले दिन भर में 10 किलो तक चावल समाप्त हो जाता था। अब दो या तीन किलो चावल खपाना मुश्किल हो रहा है। उक्त कर्मचारी ने बताया कि बिक्री कम होने की वजह से मालिक ने ढाबे पर काम करने वाले तीन कर्मचारियों को निकाल भी दिया है। इंडस्ट्रीयल एरिया के ही पास के गांवों में रहने वाले लोगों ने बताया कि पहले सड़क पर ट्रकों की लम्बी-लम्बी लाइने लगी रहती थी। हमेशा जाम का माहौल रहता था। अब टाटा मोटर्स से वाहनों का उत्पादन ही नहीं हो रहा है। जिसकी वजह से वाहनों की लाइने भी समाप्त हो गई है। 

40 वर्षो में आज तक इतनी भयानक मंदी नहीं देखी : मो. अबरार

पाठकों को बता दें कि मंदी की मार का शिकार मात्र बड़े उद्योग ही नहीं हुए बल्कि छोटे उद्योग भी लगभग बंद होने के कगार पर पहुंच गये है। राजधानी लखनऊ के नादरगंज औधोगिक क्षेत्र में नेशनल इंजीनियरिंग वक्र्स नाम से एक छोटी सी कंपनी चलाने वाले मो. अबरार का कहना है कि वे टाटा मोटर्स सहित अन्य आटो मोबाइल कंपनियों के लिए पार्ट बनाते थे। मगर मंदी की मार की वजह से टाटा मोटर्स में वाहनों के उत्पादन में कमी देखने को मिल रही है। उन्होंने बताया कि विगत 40 वर्षो के अपने कारोबारी जीवन में कभी भी ऐसी भयानक मंदी का दौर नहीं देखा था। मो. अबरार ने अपनी बंद पड़ी मशीनों को दिखाते हुए बताया कि पहले उनके यहां आठ नियमित मजदूर थे। इसके अलावा चार-पांच मजदूरों को प्रतिदिन दिहाड़ी पर रख कर कार्य कराते थे। कार्य अधिक होने से मजदूर ओवरटाइम तक करते थे। मगर अब कार्य इतना कम है कि अपने नियमित मजदूरों से साफ-सफाई का कार्य कराना पड़ रहा है। दिहाड़ी और ठेके के मजदूरों से पूरी तरह कार्य लेना बंद कर दिया गया है। नियमित वेतन वाले भी एक मजदूर की छंटनी कर दी गई है। उन्होंने बताया कि सारें मजदूरों को हटाया भी नहीं जा सकता है। क्योंकि बाद में इतने बेहतर कारीगर भी नहीं मिलेंगे। मो. अबरार ने बताया कि बड़े मुश्किल से काम चल रहा है। पाठकों को बता दें कि आटोमोबाइल सेक्टर में मंदी की मार की वजह से इससे संबंधित सभी छोटे उद्योगों को बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। ये सभी छोटे उद्योग टाटा और अन्य आटोमोबाइल कंपनियों के लिए नट, बोल्ट, रिम, बंपर, फ्रेम बोल्ट, क्लैम्प, स्टॉपर, सीट मेटल सहित कई बॉडी पाट्र्स बनाते हैं। इन छोटी कंपनियों में 10 से लेकर 200 तक कर्मचारी कार्य करते है। इस कारोबार से संबंधित 50 हजार से अधिक कर्मी सिर्फ लखनऊ इंडस्ट्रियल एरिया में प्रभावित हुए हैं। ऑटोमोबाइल सेक्टर से संबंधित इन कंपनियों के पास कार्य ना होने की वजह से इनकी मशीने और कर्मी सभी ठप पड़े है। 

मंदी की मार से 90 प्रतिशत छोटी कंपनियां पूरी तरह से ठप : बीके सिंह

एक छोटी सी कंपनी के मालिक बीके सिंह की माने तो उनकी जैसी करीब 1000 कंपनियां हैं। जो आटोमोबाइल कंपनियों के लिए पार्ट बनाती है। मगर मंदी की जबरदस्त मार की वजह से करीब ९0 प्रतिशत कंपनियां ठप पड़ गई है। इन सभी कंपनियों की हालत दयनीय हैं। पता नहीं कब मंदी की मार से बाजार ऊबर पायेगा? उन्होंने बताया कि विगत वर्षों में जो कमाया गया था। अब उसी जमा पूंजी को बैठकर खाया जा रहा है। बीके सिंह की माने तो विगत माह जमशेदपुर की सबसे बड़ी मोटर कंपनी टाटा मोटर्स माह में मात्र 15 दिन ही बमुश्किल कार्य कर रही है। इसी प्रकार आदित्यपुर लौह मंडी में भी मंदी की मार की वजह से कार्र्य का अभाव हो गया है। जिसकी वजह से करीब 30 हजार कर्मचारी बेरोजगार हो गये है। पाठकों को बता दें कि आदित्यपुर वही क्षेत्र है। जहां विगत दिनों एक कर्मचारी ने नौकरी जाने के भय से आत्महत्या कर लिया था। 

छोटे उद्यमियों का लोन चुकाना भी मुश्किल : पुनीत अरोरा

पाठकों को बता दें कि टाटा मोटर्स के लिए कार्यरत उपरोक्त फर्म जिस प्रकार से मंदी की मार से त्राहि-त्राहि कर रहे है। ठीक उसी प्रकार टाटा के लिए काम करने वाली कंपनी इंजीनियरिंग इंटरप्राइजेज लखनऊ के पुनीत अरोरा भी मंदी की मार से त्राहि-त्राहि कर रहे है। पुनित अरोरा के मुताबिक टाटा में वाहनों का उत्पादन कम होने की वजह से इससे संबंधित 50 लघु और मध्यम कंपनियां और इन कंपनियों से संबंधित 50 और कंपनियां लगभग पूरी तरह से बंदी के कगार पर पहुंच गई है। कई उद्यमियों ने अपने उद्योग के लिए लोन लिया है। अब ऐसे उद्यमियों के लिए लोन की राशि का ब्याज चुकाना भी मुश्किल हो गया है। मंदी की मार की उपरोक्त झलक पूरे देश में देखने को मिल रही है। पाठको बता दें कि जमशेदपुर के आदित्यपुर इंडस्ट्रीयल एरिया में भी वाहनों के लिए गियर बनाने वाली एग्जियोम  कंपनी भी करीब दो माह से ठप पड़ी है। कंपनी में करीब 10 लोग थे, जिन्हें निकाल दिया गया है। 

मंदी की वजह से उत्पादन में 70 प्रतिशत की गिरावट : यूके सिंह

पाठकों को बता दें कि टाटा मोटर्स लखनऊ के लिए फ्रे म बनाने वाले करीब 200 कामगारों वाली कंपनी ओमैक्स आटो के यू.के सिंह का भी मानना है कि विगत दिनों की अपेक्षा उत्पादों के उत्पादन में करीब 70 फीसदी से अधिक की गिरावट देखने को मिल रही है। इसलिए कंपनी को कॉस्ट कटिंग करनी पड़ रही है। इसके लिए वे कच्चा माल खरीद रहे हैं और मैनपावर में कमी कर रहे हैं। श्री सिंह ने स्वीकार किया कि कर्मचारियों की छंटनी की जा रही है। कितने कर्मचारी छांटे गये है। इसको बताने से उन्होंने इंकार कर दिया। 

मंदी की वजह से वाहनों के उत्पादन में भारी गिरावट : एसके राय

उपरोक्त की कंपनियों की भांति टाटा मोटर्स के लिए टायर, ब्रेक, एअर टैंक, आदि बनाने वाली कंपनी टीवीएस के प्रबंधन का जिम्मा संभालने वाले एसके राय ने बताया कि पहले की तुलना में सिर्फ 30 प्रतिशत कार्य संपादित हो पा रहा है। टाटा मोटर्स के वाहनों का उत्पादन कम होने की वजह से उनकी भी कंपनी के उत्पादों की बिक्री में भारी गिरावट देखने को मिल रही है। इसलिए कर्मचारियों की उपयोगिता लगभग समाप्त हो गई है। कंपनी ने सर्वप्रथम दिहाड़ी पर कार्य करने वाले कर्मचारियों की छटनी की है। यदि इसी प्रकार मंदी रही तो अगले माह से हो सकता है कि नियमित कर्मचारियों की भी छटनी हो जाये।

शर्म करो बुद्धिजीवियों !

कंपनियों के पास इतना भी काम नहीं है कि अपने नियमित कर्मचारियों से कार्य ले सके। कंपनियों में उत्पादन कार्य लगभग ठप है। इतने के बावजूद भी लोग विवेक शून्य होकर तमाशा देख रहे है। भाजपाई नुमाईन्दों को कही भी बेरोजगारी और मंदी की मार नजर नहीं आ रही है। धर्म-जाति के अफीम का नशा लोगों की नसों में इस कदर भाजपाई नुमाईन्दों ने घोल दिया है कि ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवि धर्म-जाति के अफीम के नशे में मदमस्त होकर बेरोजगारों की बेबशी पर नमक रगड़ते हुए कहते फिर रहे है कि ''भाजपा सरकार से पहले तुम क्या कलेक्टर थे कि आज बेरोजगार हो गये हो।'' ऐसे लोगों के इस प्रकार के वाक्यों से एक बात तो स्पष्टï हो गया कि यदि समाज में ऐसे लोग रहेगे तो निश्चय ही समाज का पतन हो जायेगा। ऐसे लोगों को यह पता नहीं कि भले ही भाजपा सरकार के पहले लोग चपरासी ही क्यों न रहे हो ? लोग 5-10 हजार रूपये ही क्यों ना प्रतिमाह कमाते रहे हो। मगर इसी कमाई के दम पर वे किसी कलेक्टर से कम स्वयं को नहीं समझते थे। मगर भाजपा की संवेदनहीन सरकार ने आम आवाम के साथ अनैतिकता की सारे हदें ही पार कर दी। भाजपा सरकार ने लोगों के अच्छे दिन लाते-लाते लोगों के हाथों में कटोरा थमा कर भिखारी तक बना दिया। फिर भी ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवियों की आंखे नहीं खुल रही है। इसे देश का दुभाग्र्य नहीं तो और क्या कहा जाये? 

 

 

 

01
September

 

 

 

मैनफोर्स

लखनऊ। आज देश और देशवासियों की दयनीय हालत पर तरस आ रहा है। तरस इसलिए कि जो शिक्षित और प्रबुद्ध वर्ग कहे जाते है। दरअसल वे राजनैतिक पार्टियों के हाथों में अपना जमीर और उत्तरदायित्व बेच चुके है। ऐसे लोग कुछ संक्षिप्त लाभ अथवा स्वार्थपूर्ति हेतु अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ रहे है। ऐसे पढ़े लिखे लोग शिक्षित होने के बावजूद भी किसी मूर्ख से कम नहीं है। ऐसे लोग रानैतिक दलों के इशारों पर अपने ही समाज में, अपने ही परिवार में विघटन डालने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे है। जो अशिक्षित वर्ग है। वह लोगों के बहकावे में आकर जातिगत आग में झुलस रहा है। ये दोनों वर्ग समाज का विघटन करने के लिए राजनैतिक दलों के हाथों से हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहे है और स्वयं के समाज और स्वयं का विनाश कर रहे है। इन दोनों वर्गो के पास एक दूसरे का विनाश करने के अतिरिक्त इतनी भी फु र्सत नहीं है कि ये अपनी सामाजिक, आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ कर सके। समाज में ऐसे तथाकथित शिक्षित और अशिक्षित वर्गो की संख्या इन दिनों दिन दूनी रात चौगुनी की रफ्तार से बढ़ रही है। ऐसे ही वर्गो को इन दिनों भारतीय जनता पार्टी हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है। ऐसे ही वर्गो के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी समाज में जातिगत विद्वेश डालकर समाज को विघटित करने का प्रयास कर रही है। मात्र इसलिए कि वह समाज में फूट डालकर राज कर सके। इतनी सी बात हैं। जो ऐसे तथाकथित समाज के शिक्षित वर्गो और अशिक्षित वर्ग के मूखों को समझ में नहीं आ रही है। ऐसे लोग भारतीय जनता पार्टी का प्रवक्ता बनकर स्वयं के संक्षिप्त लाभों के लिए समाज में जहर घोल रहे है। ऐसे तथाकथित प्रबुद्ध वर्गो को हिन्दू-मुस्लिम और तथाकथित देशभक्ति के अतिरिक्त कुछ और दिखाई नहीं दे रहा है। आज राजनेताओं के बहकावें में आकर ऐसे तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग के लोग जातिगत राजनीति के रंग में रंगकर सरेआम हिन्दू-मुस्लिम, गाय-सूअर, राम-रहीम के नाम पर एक दूसरे का कत्लेआम कर रहे है। मगर अफसोस की बात है कि इसे देशद्रोह नहीं कहा जा रहा है। मगर जो व्यक्ति सरकार की कार्यशैली पर सवालियां निशान लगा दे। उसे देशद्रोही करार दिया जा रहा है। आज लोगों को देशभक्ति दिखाने के लिए प्रमाण की आवश्यकता पड़ रही। यह शर्मनाक बात है कि जिस भारत देश ने एक से आले-आले वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, समाजसेविओं, दार्शनिकों को न केवल जन्म देकर भारत को गौरवान्वित किया बल्कि विदेशी राष्ट्रों को भी गौरवान्वित किया। आज उसी देश में ना जाने कहां से ऐसे लोग पैदा हो गये हैं। जो स्वयं को सबसे श्रेष्ठ और शिक्षित व्यक्ति मानते हैं। वे भारतीय जनता पार्टी के हाथों हथियार के रूप में इस्तेमाल होकर अपनी शिक्षा से समाज का विघटन कर रहे हैं। आज ऐसे ही लोगों की मूर्खता की वजह से देश की सत्ता की बागडोर संभालने वाली भारतीय जनता पार्टी देश की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था का पतन कर रही है। जब से केन्द्र और उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में भाजपा सत्ता में आयी है। तब से लगातार देश की आर्थिक व्यवस्था चरमराती जा रही है। मगर देश के इन तथाकथित शिक्षित वर्गो को समझ में नहीं आ रहा है। घर में भूजी भांग नहीं है। महंगाई आसमान पर है। निजी कंपनियों लगातार बंद हो रही है। लोग धड़धड़ा बेरोजगार हो रहे है। भ्रष्टाचार पूर्व की सरकारों के कार्यकाल की अपेक्षा की चार गुना अधिक बढ़ गया है। मगर उसके बावजूद भी ऐसे तथाकथित शिक्षित और प्रबुद्ध वर्गो को यदि सरकार चाहिए तो सिर्फ भारतीय जनता पार्टी की ही चाहिए। यदि ऐसे तथाकथित शिक्षित और प्रबुद्ध वर्गो से यह पूछा जाता है कि आखिर सरकार ने क्या विकास कार्य किया है कि आपको सरकार भारतीय जनता पार्टी की चाहिए ? ऐसे लोग झटपट भारतीय जनता पार्टी का प्रवक्ता बनकर उत्तर देते है कि क्या सरकार ने नहीं किया है। आप ही बता दीजिए। लोग उल्टा सवाल पूछने वालों पर ही चढ़ जाते है और पूछते है कि आजादी से अब तक 70 सालों में क्या हुआ जरा बताईये। हमारे प्रधानमंत्री पाकिस्तान पर सर्जिकल स्टाईक किये। पाकिस्तान पर गोले दागे है। यह कौन सी सरकार ने किया है। जरा बताईये। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अयोध्या में मंदिर बनाने का वादा किया है। जब से सत्ता में आये है, तबसे मुसलमानों की बोलती बंद है, और कितना विकास चाहिए आपको। यदि किसी ने भूल वश यह पूछ लिया कि देश में दिनों दिन महंगाई बढ़ रही है, लोग बेरोजगार हो रहे है, क्या आपको नहीं लगता कि देश की आर्थिक व्यस्था गड़बड़ा रही है ? ऐसे तथाकथित शिक्षित और प्रबुद्ध वर्ग के लोग तत्काल भाजपा का प्रवक्ता बनकर मुंह से जुबान खिचने के लिए तैयार हो जाते है। जब आगे वाला भारी पड़ जाता है। तब ऐसे लोगों को जवाब ही नहीं सूझता है। तब ऐसे तथाकथित वर्ग के लोग कहते है कि मात्र एक ही दो कार्यकाल में क्या आप सोचते है कि 70 साल की बीमारी दूर हो जायेगी? आदि-आदि तर्क देकर वर्तमान भाजपा सरकार की निष्क्रियता और नाकामी पर पानी फेरने का प्रयास करते है। जब सवाल पूछने वाला व्यक्ति ऐसे तथाकथित शिक्षित व्यक्तियों से जर्जर हो रही देश की आर्थिक व्यवस्था से संबंधित कुछ अन्य गंभीर सवाल करता है तो ऐसे तथाकथित शिक्षित व्यक्ति सवाल पूछने वाले का मुंह नोंचने लगते है और कहते है कि तुम कांग्रेसी हो। तुम लोग देश के गद्दार हो। आदि-आदि तर्क देकर स्वयं को भाजपा का प्रवक्ता और देश का सबसे बड़ा देशभक्त घोषित करने का प्रयास करते है। आज मैनफोर्स समाचार पत्र ऐसे तथाकथित शिक्षित प्रबुद्ध वर्गो को देश की जर्जर आर्थिक व्यवस्था का दिग्दर्शन कराने का प्रयास कर रहा है। जो स्वयं को देश का सबसे बड़ा देशभक्त घोषित करते है। मगर उन्हें देश के गरीबों, मजदूरों, रोजगार विहीन हो रहे लोगों की परवाह नहीं है। ऐसे तथाकथित देशभक्त यह देखे कि कैसे व्यसायिक संस्थानों, उद्योगों, व्यवसायों का पतन हो रहा है। लोगों का पेट पालना दुभर हो रहा है। यदि थोड़ा भी जेहन में जमीर शेष हो तो वास्तविक परिस्थितियों का अवलोकन करों। यदि इसके बावजूद भी बहुत बड़ा देशभक्त बनने का शौक चर्रा रहा हो तो समाज के बीच आओ और लोगों का पेट पालने में सहयोग करों, लोगों को रोजगार दो, डूबती हुए व्यवासायिक प्रतिष्ठानों और संस्थओं को बचाओ, उद्योगों की खस्ताहाल हो रही हालत को दुरूस्त करों। अन्यथा देशभक्ति का ढोंग रचना बंद करों।

सबसे बड़ी पत्थर मंडी बंद, दो लाख मजदूर बेरोजगार

पाठकों को बता दें कि जबसे केन्द्र की सत्ता पर भारतीय जनता पार्टी आसिन हुई है। तबसे लगातार उसकी गलत नीतियों के चलते देश की अर्थव्यवस्था चरमाराती जा रही है। देश में इन दिनों जबरदस्त मंदी का दौर चल रहा है। जिसका परिणाम यह हुआ कि उत्तर प्रदेश के महोबा जनपद स्थित एशिया की सबसे बड़ी पत्थर मंडी की आर्थिक व्यवस्था चरमरा गई गई। उक्त पत्थर मंडी तालाबंदी के दौर से गुजर रही है। पाठकों को बता दें कि इतनी बड़ी पत्थर मंडी के बंद होने के कारण लगभग 2 लाख मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का व्यापक संकट खड़ा हो गया है। मजदूरों की बेरोजगारी के अतिरिक्त भी पत्थर मंडी से हो रहे आयात-निर्यात के साधन में सम्मिलित लगभग 6 हजार ट्रक बेकार खड़े हो गये है। पाठकों को बता दें कि इस पत्थर मंडी की ऐसी दशा यूपी की सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी की सरकार की नई खनिज नीति के कारण हुआ है। स्टोन क्रेशर मालिकों ने सरकार की नई खनिज नीति के विरोध में हड़ताल भी किया। हालात दिनों दिन बिगड़ता जा रहा है। स्टोन क्रेशर की नीलामी तक बिगडऩे लगी है। पाठकों को बता दें कि जो नेशनल हाइवे 34, पत्थर मंडी के सामान ढोने वाले ट्रकों व मजदूरों से गुलजार रहता था। आज वह सन्नाटें के दौर से गुजर रहा है। क्रेशर मालिकों का कहना है कि शासन की नई खनिज नीति के कारण अनिश्चितकालीन हड़ताल करने के लिए विवश होना पड़ा रहा है। पाठकों को बता दें कि उत्तर प्रदेश के महोबा जनपद के कबरई कस्बा पत्थर उद्योग की नगरी के नाम से जाना जाता है।  यह एशिया का सबसे बड़ा पत्थर बाजार है। पत्थर मंडी के चारों ओर तकरीबन 350 स्टोन क्रेशर लगे हैं। मगर अब यह सन्नाटें के दौर से गुजर रहा है। पत्थर मंडी के ठेकेदारों और स्टोन क्रेशर के मालिकों ने सरकार की नई खनिज नीति के विरोध में जिला प्रशासन को ज्ञापन भी सौंपा था। जिसमें उल्लेखित किया गया था कि सरकार इस प्रकार की अनैतिक नीति लागू करके मजदूरों, मालिकों के पेट पर लात न मारे। मगर जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो क्रेशर मालिक ठेकेदार सभी संयुक्त रूप से 17 अगस्त 2019 को अनिश्चितकालिन हड़ताल पर चले गये।

पारले बिस्किट कंपनी पर पड़ी मंदी की मार दस हजार श्रमिक होंगे बेरोजगार 

जिस प्रकार उत्तर प्रदेश की पत्थर मंडी सरकार की गलत नीति का शिकार हुई। ठीक इसी प्रकार केन्द्र सरकार की गलत नीतियों के कारण अब खाद्य पदार्थों के उत्पादन पर भी मंदी का जबदरस्त साया मंडरा रहा है। आर्थिक मंदी की यह जबरदस्त मार बिस्किट बनाने वाली जानी मानी मशहूर कंपनी पारले के प्रोडक्ट्स पर भी पड़ रही है। पारले कंपनी से जुड़े 8 से 10 हजार श्रमिक बेरोजगारी की कगार पर है। कंपनी की माने तो यदि आर्थिक हालातों पर सरकार ने शीघ्र विचार नहीं किया तो उन्हें कड़े फैसले लेने के लिए विवश होना पड़ेगा। कंपनी के मुताबिक पारले बिस्किट की बिक्री में लगातार गिरावट हो रही है। इसी प्रकार अन्य बिस्किट कंपनियों के उत्पादों की बिक्री में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। पारले प्रोडक्ट्स के कैटेगरी हेड मयंक शाह का कहना है कि उन्होंने सरकार से मांग है कि 100 रुपये प्रति किलो या उससे कम कीमत वाले बिस्किट पर जीएसटी घटा दें। उन्होंने कहाकि यूं तो यह बिस्किट आमतौर पर 5 रुपये या उससे भी कम के पैक में बिकता हैं। यदि सरकार ने हमारी मांग नहीं मानी तो हमें अपनी फैक्टरियों में काम करने वाले आठ से दस हजार कर्मचारियों को न चाहते हुए भी नौकरी से निकालना पड़ेगा। उन्होंने कहाकि महंगाई की वजह से सेल्स घटने से हमें भारी नुकसान हो रहा है। पाठकों को बता दें कि इसी प्रकार पिछले हफ्ते बिस्किट निर्माता कंपनी ब्रिटानिया के प्रबंध निदेशक वरुण वैरी ने भी कहा था कि यदि सरकार ने आर्थिक नीतियों पर गंभीरता से विचार नहीं किया तो वर्तमान हालात में उपभोक्ता को 5 रुपये का बिस्कुट खरीदने के लिए भी सोचना पड़ेगा। पाठकों को बता दें कि नुस्ली वाडिया की कंपनी ब्रिटानिया का शुद्ध लाभ जून माह की तिमाही में 3.5 प्रतिशत से घटकर 249 करोड़ रुपये रहा गया है। इतना ही नहीं ब्रिटानिया कंपनी ने भी मजदूरों की छटनी शुरू कर दी है। कंपनी का रूख आगे भी बड़े पैमाने पर मजदूरों को छांटने की है। पारले कंपनी की सबसे ज्यादा बिकने वाले बिस्किट पारले जी, मोनेको और मैरी ब्रांड है। कंपनी की बिक्री 10,000 करोड़ से अधिक है। यूं तो कंपनी के सीधे तौर पर 10 प्लांट है। जहां एक लाख श्रमिक काम करते हैं। इतना ही नहीं पारले के पास 125 थर्ड पार्टी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट भी है। जब से केन्द्र की भाजपा सरकार ने सत्ता संभाला है। उसने जीएसटी के नाम पर व्यवसायियोंं की कमर तोड़ दी है। कंपनी के अधिकारियों का कहना है कि देश में जीएसटी लागू होने से पूर्व 100 रुपये प्रति किलो से कम कीमत वाले बिस्किट पर 12 प्रतिशत टैक्स वसूला जाता था। मगर जब से भाजपा सरकार ने जीएसटी लागू किया है। तब से कंपनियों से सभी बिस्किटों पर 18 प्रतिशत के स्लेब में जीएसटी वसूला जा रहा है। जैसे ही जीएसटी बढ़ा वैसे ही कंपनियों को भी अपने बिस्किटों के दाम बढ़ाने पड़े। जिसका सीधा असर बिक्री पर पड़ा। जिस तरह से अन्य क्षेत्रों में व्याप्त जबरदस्त मंदी के कारण लोगों को बेहाल और बेरोजगार होना पड़ा। ठीक ऐसे ही खाद्य सामग्रियों के क्षेत्र में भी लाखों लोगों को बेहाल और बेरोजगार होना पड़ रहा है। लाखों-करोड़ों लोग बेरोजगारी के कगार पर है। फिर भी देश के तथाकथित शिक्षित प्रबुद्ध वर्ग के लोगों को भारतीय जनता पार्टी की प्रवक्तागिरी और धर्म-जाति की गंदी राजनीति से फुर्सत नहीं मिल रही है कि देशवासियों की पीड़ा को समझ सके। लोग बेरोगारी के दंश से मर रहे है। मगर इन्हें देश को विघटित करने वाले राजनीतिक प्रपंच से फु र्सत नहीं है। शर्म आनी चाहिए कि ऐसे लोग स्वयं को मानव कहते है।

टैक्सटाइल कारोबार में हुए लाखों बेरोजगार

देश के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि पूंजीपतियों की समस्या और बाजार की मंदी का समाचार देश का कोई अखबार या चैनल नहीं दिखा रहा है। पूंजीपति अपने क्षेत्र की मंदी का समाचार भी बतौर विज्ञापन के तौर पर पैसे देकर छपवाने के लिए विवश हो रहे है। इसी प्रकार का एक वाकया टैक्सटाईल क्षेत्र से आ रहा है। जिस प्रकार लोग आटोमोबाइल, खाद्य सामग्रियों के उत्पादन आदि अन्य क्षेत्रों से बेरोजगार हो रहे है। ठीक उसी प्रकार टैक्सटाइल और चाय के क्षेत्र से भी बेरोगार हो रहे है। मगर अफ सोस की इतने गंभीर विषयों पर आज की बिकाऊ मीडिया प्रकाश डालने का साहस नहीं कर पा रही है। लाखों लोगों के बेरोजगार होने का समाचार आज की पत्रकारिता के लिए समाचार नहीं है। मगर एक नेता बीमार हो जाये या उसके घर बच्चा पैदा हो जाये या शादी विवाह हो जाये तो उसके लिए पहले पन्ने की खबर या 20 से 30 मिनट के टीवी चैनल के मनोरंजन का साधन बन जाता है। धर्म के नाम पर उन्माद फैलाने के लिए विवादास्पद खबरों को परोसना उसके लिए आवश्यक है। मगर जब बात देश के भविष्य की हो, देश में व्याप्त बेरोगारी की हो, देश की अर्थ व्यवस्था की हो, समाज के दिनों दिन हो रहे विघटन की हो, तो यह उसके लिए समाचार नहीं है। मीडिया की निरंकुशता का परिणाम है कि देश की अर्थव्यवस्था का रीढ़ माने जाने वाले टैक्सटाइल कारोबार के कारोबारियों को देश में व्याप्त मंदी की खबरें विज्ञापन के रूप में छपवाने के लिए विवश होना पड़ रहा है। इसका एक छोटा सा उदाहरण अभी हाल ही में 20 अगस्त 2019 को एक तथाकथित सम्मानित समाचार पत्र में देखने को मिला। उक्त तथाकथित सम्मानित समाचार पत्र के पहले पृष्ठ पर विज्ञापन के तौर यह उल्लेखित किया किया गया था कि नॉर्दन इंडिया टैक्सटाइल मिल्स भारी मंदी के दौर से गुजर रही है। मिल को लगातार घाटा हो रहा है। जिसके कारण बड़ी संख्या में नौकरियां जा रही हैं। उक्त प्रकाशित विज्ञापन में भारी तादाद में मजदूरों की नौकरियां जाने के बाद फैक्ट्री से बाहर आते लोगों के स्केच को भी दशार्या गया था। बहुत छोटे शब्दों में यह भी लिखा था कि एक तिहाई धागा मिलें अब तक बंद हो चुकी हैं और जो चल रही हैं, वो भारी घाटे में हैं। अर्थात मिलों की हालत इतनी अधिक खराब है कि वे कपास खरीदने की हालत में भी नहीं है। इसका सीधा असर किसानों पर पड़ेगा। क्योंकि आगे उनकी कपास की तैयार फ सल का कोई खरीददार नहीं होगा। करोड़ों रुपये की कपास की फ सल किसान कहां खपाएंगे? इतने गंभीर मुद्दे के इस समाचार को उक्त तथाकथित सम्मानित समाचार पत्र नि: शुल्क और समाजहित में प्रकशित करने में दिलचस्पी नहीं दिखाया। बड़े अफ सोस के साथ यह कहना पड़ रहा है कि जिन अखबारों के पहले पृष्ठ की यह सुर्खिया होनी चाहिए। उन्हीं अखबारों में यह खबर विज्ञापन का रूप धारण कर लिया। जो समाचार जनहित में नि: शुल्क प्रकाशित होना चाहिए। वही समाचार पैसे लेकर विज्ञापन के स्वरूप में प्रकाशित किया जा रहा है। जब समाज का वह आधार जिसके कंधे पर समाज की वास्तविकता का आईना दिखाना है। जब वही सूरदास बन जाये तो फिर समाज का क्या होगा ? इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। जब से केन्द्र की सत्ता में भाजपा की सरकार शासित हुई है। तबसे लगातार देश की अर्थव्यवस्था धाराशायी होती जा रही है। मगर इतने गंभीर मुद्दे भी हमारे तथाकथित शिक्षित प्रबुद्ध वर्गो के लिए कोई मायने नहीं रखती है। इससे स्पष्ट होता है कि समाज और देश गर्त में जा रहा है। 

आटोमोबाइल सेक्टर में भयंकर मंदी

पाठकों को बता दें कि उपरोक्त के अतिरिक्त भी आटोमोबाइल के क्षेत्र में भारी मंदी देखने के मिली है। जिस प्रकार अशोक लेलैंड, टाटा आदि कंपनियां मंदी की मार झेल रही है। ठीक उसी प्रकार मंदी की मार का शिकार मारूति सुजुकी भी हुई है। इस कंपनी ने भी 3,000 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। मारुति सुजुकी ने पिछले सात महीनों में काफी प्रोडक्शन घटाया है। जिसका सीधा असर मजदूरों के रोजगार पर पड़ा है। जुलाई माह 2019 में मारुति सुजुकी की पैसेंजर कारों की बिक्री में 36.2 फीसदी की गिरावट आयी। दक्षिण भारत के ऑटो सेक्टर में भी भारी गिरावट आयी। दक्षिण भारत के आटो सेक्टर में काम करने वाले मजदूरों को भी छंटनी का शिकार होना पड़ा है। पाठकों को बता दें कि चेन्नई के ऑटो इंडस्ट्री हब में 5000 से अधिक ठेका मजदूरों और ट्रेनी मजदूरों की छंटनी कर दी गई है। विगत जनवरी माह से लेकर मई माह तक यात्री वाहनों की बिक्री में पिछले वर्ष के मुकाबले 8.9 प्रतिशत व दोपहिया वाहनों की बिक्री में 11.3 प्रतिशत की भारी कमी दर्ज की गयी है। करीब 35 हजार करोड़ रुपए मूल्य के 5 लाख यात्री वाहन व 17500 करोड़ रुपए मूल्य के 30 लाख दो पहिया वाहन, खरीददारों की प्रतीक्षा में बाजारों में धूल फांक रहे हैं। सरकार ने भले ही इनकी बिक्री बढ़ाने के लिए ब्याज दरों में कटौती की हो। मगर उसके बावजूद भी यह नीति ग्राहकों को आकर्षित करने में असफ ल रही। सोसायटी आफ इंडियन आटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर के मुताबिक मई 2019 में मई 2018 के मुकाबले यात्री वाहनों की बिक्री में पिछले 18 वर्षों की सबसे भारी गिरावट देखने को मिल रही है। मई 2018 में 301238 यात्री वाहनों की बिक्री हुई थी। जबकि मई 2019 में 20.55 प्रतिशत घटकर 239347 रह गई। वहीं कॉमर्शियल वाहनों में 10.02 प्रतिशत, तिपहिया में 5.76 की कमी दर्ज की गयी। जबकि दो पहिया वाहनों की बिक्री पिछले मई 2018 में 1850698 के मुकाबले 8.62 प्रतिशत घटकर 1726206 ही रह गयी। मगर इसके बावजूद भी देश के तथाकथित बुद्धिजीवी बड़े बेशर्मी के साथ देश बदल रहा है का नारा लगाते-लगाते देश को गर्त में धकेले जा रहे है। इसी विकास के पैमाने पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार ताल ठोंक रही है।

ट्रक कंपनी अशोक लेलैंड में छंटनी तालाबंदी का दौर जारी

जिस प्रकार सरकार की गलत नीतियों के कारण अन्य क्षेत्रों में मंदी का जबरदस्त दौर देखने को मिला। ठीक उसी प्रकार देश की प्रतिष्ठित ट्रक निर्माता कंपनी अशोक लेलैंड में भी देखने को मिल रहा है। पाठकों को बता दें कि ट्रक निर्माता कंपनी अशोक लेलैंड के पंतनगर प्लांट में 14 अगस्त 2019 से 22 अगस्त 2019 तक लेऑफ अर्थात कर्मचारियों से कार्य लेना बंद कर दिया गया था। इससे पूर्व पिछले माह भी अशोक लेलैंड का पंतनगर संयंत्र 16 जुलाई 2019 से 15 दिन तक बंद था। वर्तमान में प्लांट में कंपनी के स्थाई श्रमिक बेहद कम हैं। पाठकों को बता दें कि ऐसी कंपनियों में बड़ी संख्या में ठेका मजदूर कार्य करते है। जब मंदी का दौर प्रारम्भ होता है तो सीधे तौर पर ऐसे मजदूर बेरोजगार हो जाते हैं। इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है। अशोक लेलैंड जैसी कंपनियां अपने यहां उत्पादों को तैयार कराने के लिए सीमेंस आदि जैसी कंपनियों से ठेके पर मजदूरों की सेवा लेती है। जैसे ही मंदी का दौर प्रारम्भ होता है। अशोक लेलैंड जैसी कंपनियां सर्वप्रथम सीमेंस जैसी कंपनियों से ठेके पर लिये गये मजदूरों की संख्या को धीरे-धीरे कम करने लगती है। कभी-कभी तो अचानक 30 प्रतिशत से लेकर 50 प्रतिशत तक की कटौती कर दी जाती है। अर्थात एक ही झटके में हजारों से अधिक लोग बेरोजगार हो जाते है। कभी-कभी तो ये कंपनियां मंदी की मार के चलते अपने कर्मचारियों को जबरन निकालने लगती है। इसी प्रकार का हथकण्डा अपनाने के लिए इस बार अशोक लेलैंड को विवश होना पड़ा। वाहन क्षेत्र में भारी सुस्ती के के कारण अशोक लेलैंड की चेन्नई शाखा ने अपने कर्मचारियों के लिए नौकरी छोडऩे की एक योजना की घोषणा की। इस घोषणा के तहत उसने छंटनी की दो योजना शुरू की है। पहली योजना यह कि कर्मचारी स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति अर्थात  वीआरएस ले ले। जो कर्मचारी वीआरएस के दायरे में नहीं आ रहे है, उनके लिए दूसरी योजना है एम्प्लाई सेपरेशन स्कीम (ईएसएस)। कंपनी के सूत्रों के मुताबिक ये योजनाएं एक्जीक्यूटिव स्तर के लिए घोषित की गई हैं। ईएसएस योजना के तहत ए श्रेणी में आने वाले एक्जीक्यूटिव को अधिकतम 30 लाख रुपये मिलेंगे। इसी तरह से बी श्रेणी में आने वाले एक्जीक्यूटिव को नौकरी छोडऩे पर न्यूनतम 60 लाख रुपये दिए जाएंगे। इस प्रकार की योजनाएं प्रारम्भ कर अशोक लेलैंड ने अपने कर्मचारियों से पल्ला झाडऩे का काम किया है। कंपनी ने जून और जुलाई में मांग में कमी को देखते हुए उत्पादन घटाने के लिए उत्तराखंड के पंतनगर के प्लांट को छह दिनों के लिए बंद करने का निर्देश दिया था। वाहन क्षेत्र की सुस्ती के कारण कई वाहन निर्माता कंपनियों और कंपोनेंट आपूर्तिकर्ताओं को उत्पादन घटाना पड़ा है और अस्थायी तौर पर कुछ दिनों के लिए प्लांट को बंद करना पड़ा है। इसी प्रकार इस कंपनी की जुलाई माह 2019 में पैसेंजर वाहनों की घरेलू बिक्री में करीब 31 फीसदी की गिरावट हो गई। जिसका मुख्य कारण गलत नीतियों के चलते अर्थव्यवस्था का चरमराना है। यह गिरावट दो दशक की सबसे बड़ी गिरावट है। इतने के बावजूद भी भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र सरकार विकास के बड़े-बड़े दम्भ भरने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है। ऐसे ही तथाककथित विकास के दावों के दम पर भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र शासित सरकार देश की अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन डॉलर करने का ख्वाब देख रही है।

टाटा मोटर्स की उत्तराखण्ड यूनिट अस्थायी रूप से बंद

जिस प्रकार अशोक लेलैण्ड के प्लांट बंद हुई। ठीक उसी प्रकार टाटा मोटर्स लिमिटेड के पंतनगर प्लांट में भी ब्लॉक क्लोजर (ले.ऑफ जैसा जो केवल टाटा में काम बंदी के लिए अपनी मर्जी का कानून है। जिसमें स्थाई श्रमिकों की अपनी छुट्टी जाती है) के तहत 11 से 20 अगस्त तक प्लांट बंद हो गया। टाटा से जुड़ी सभी वेंडर कंपनियां भी बंद हैं। इससे बड़े पैमाने पर अस्थाई-ठेका, ट्रेनी मजदूर प्रभावित हुए हैं। यह हाल केवल पंतनगर प्लांट का नहीं है बल्कि टाटा के जमशेदपुर से लेकर पुणे तक सभी प्लांटों का यही हाल है। जहां एक तरफ  ब्लॉक क्लोजर के तहत प्लांट और वेंडर कंपनियां बंदी का शिकार हैं। वही दूसरी तरफ बंदी और छंटनी का यह दौर देश के सम्पूर्ण आटोमोबाइल क्षेत्र में जारी है। लोग धड़ाधड़ बेरोजगार हो रहे है। घर परिवार चलाने के लिए दाने-दाने के लिए मोहताज हो रहे है। मगर उसके बावजूद देश के तथाकथित शिक्षित प्रबुद्ध वर्ग धर्म और जातिगत राजनीति के गंदी मानसिकता से उबर नहीं पा रहे है। देश की इतनी दयनीय दशा होने के बावजूद भी ऐसे लोग बेरोगारी की मार से जख्मी लोगों के घावों पर नमक रगडऩे से बाज नहीं आ रहे है।

 

 

 

 

 

 

 

 

29
August

ग्रामिणों के घरों में लगाया बिजली का मीटर, गांव में लगाया बिजली का पोल

शिकायत करने के बावजूद भी बिजली विभाग के अधिकारी और कर्मचारी नहीं दौड़ा रहे करन्ट

मैनफोर्स
बहराइच। सूबे की भारतीय जनता पार्टी की सरकार जितनी भी आलोचना की जाये, कम ही होगी। क्यों कि एक तरफ उत्तर प्रदेश सरकार विकास के दावों का हवाई पुल बांधने में कोई कोसर नहीं छोड़ रही है तो वही दूसरी इस सरकार के सरकारी महकमों के नुमाईन्दें सरकार की शेष बची विश्वसनियता को भी तार—तार करने में कोई कोसर नहीं छोड़ रहे है। आप उत्तर प्रदेश सरकार के बिजली महकमें को ले लीजिए। इसकी कार्यप्रणाली की जितनी भी निन्दा की जाये, वह कम ही होगी। इस विभाग ने एक तरफ ऐसे घरों को बिजली का बिल थमा थमाने का कारनामा किया। जिसके घरों में कभी बिजली का कनेक्शन ही नहीं लगा था।

वही दूसरी ओर जिन घरों में बिजली का कनेक्शन और बिजली का मीटर लगे वर्षो हो गया। मगर उन घरों में आज तक बिजली की आपूर्ति तक नहीं कर सका है। सरकारी महकमों के ऐसे ही कारनामों के दम पर उत्तर प्रदेश सरकार विकास के तथाकथित विकास के दावों पर इतराती है और लम्बे चौड़े विकास के दावों का हवाई पुल बांधती नजर आ जाती है। सूबे की सरकार के बिजली महकमें की इसी प्रकार की एक कार्यशैली मैनफोर्स समाचार वर्णित कर रहा है। पाठकों को बता दें कि जनपद बहराइच के विकासखंड कैसरगंज का एक ऐसा भी गांव है। जहां गांव के लोगोंं को बिजली का कनेक्शन लिए एक वर्ष से अधिक का समय हो गया। मगर आज तक उक्त गांव में बिजली का कनेक्शन नहीं लगा।

पाठकों को बता दें कि ग्राम पंचायत कल्याण कोठी साठा में ग्रामिणों को बिजली विभाग के अधिकारियों ने कनेक्शन वितरित किया था। बिजली विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों ने ग्रामिणों के घरों में बिजली का मीटर भी लगा दिया मगर आज तक ग्रामिणों के घरों में रोशनी नहीं आयी। इस संबंध में स्थानीय निवासी राकेश निषाद, रघुलाल निषाद, रामसनेही राजपूत, दिनेश निषाद, अनिल कुमार, मिंटू राजपूत आदि ने बताया कि उनके गांव में करीब एक साल पूर्व बिजली विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों ने सभी ग्रामीणों को बिजली का कनेक्शन दिया था। कनेक्शन लेने के उपरान्त बिजली विभाग के अधिकारियों ने सभी ग्रामिणों के घरों में बिजली का मीटर भी लगाया था। मगर आज तक किसी भी ग्रामीण के घर में रोशनी नहीं आई है। उपरोक्त ग्रामिणों ने बताया कि बिजली विभाग के कर्मचारी गांव में खंभे भी लगा दिये है। मगर उसमें बिजली नहीं दौड़ा रहे है।

ग्रामीणों ने बताया कि सभी ग्रामीण कई बार बिजली विभाग के अधिकारियों से शिकायत किये है। मगर शिकायत के बावजूद भी आज तक बिजली विभाग का कोई अधिकारी या कर्मचारी मामले की जांच या पड़ता करने नहीं आया है। बिजली विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की उदासिनता की वजह से ग्रामिणों को अंधेरे में जीवन गुजारना पड़ रहा है। ग्रामिणों ने कहाकि एक सरकार जनता की हितैषी होने का दावा करती है। वही दूसरी ओर उसके नुमाईन्दे सरकार द्वारा चलाई जाने वाली योजना में न केवल घालमेल करते है बल्कि लोगों को मूलभूत सुविधाएं देने के नाम पर आवाम का शोषण करते है। ग्रामिणों ने बताया कि आज तक सरकार द्वारा चलाई जा रही शौचालय योजना का लाभ तक ग्रामिणों को नहीं मिल पाया। सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना देने के लिए भी तमाम बड़े—बड़े दावे कर रही है। मगर अपने दावों की हकीकत परखने के लिए उसे इन ग्रामीण क्षेत्रों का भी दौरा करना चाहिए। जो गरीब है, उन्हें आज तक प्रधानमंत्री आवास नहीं मिला है। मगर जिनके पास पहले से ही मकान था। उन्हें दोबारा, मकान मिल गया। ग्रामीणों ने कहाकि सरकारी नुमाईन्दें आवाम के जख्मों पर नमक रगड़ने का काम रही है। मगर उसके बावजूद भी सरकार सबकुछ जानकर खामोश है।


 

 

 

 

 

 

 

09
August

मैनफोर्स

लखनऊ। भाजपा ने बड़े ही शातिराने तरिके से वर्ष २014 में प्रचण्ड बहुमत के साथ सत्ता की बागडोर संभाली। जिसका सारा श्रेय नरेन्द्र मोदी और भाजपा की मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को दिया गया। भाजपा ने जिस कलाकारी से वर्ष 2014 में सत्ता हथियायी उसी कलाकारी से उसने एक बार फिर वर्ष  2019 में सत्ता को हथियाने की बाजीगरी दिखाई। इस बाजीगरी में एक बार फिर प्रचण्ड बहुमत के साथ देश की सत्ता भाजपा के हाथ में आ गई। भाजपा सरकार ने अपने पूर्ववर्ती कार्यकाल में जितने भी कार्य किये उसमें से दो-चार कार्यो को छोड़ दिया जाये तो ऐसा कोई भी कार्य जमीनी स्तर पर नहीं दिखा। जिसमें उसने कद्दू में तीर मारने की योग्यता का प्रदर्शन न किया हो। अर्थात अधिकतर विकास के कार्यो में उसने मात्र कागजी घोड़े ही दौड़ाने की महारत हासिल की। यदि भाजपा ने अपने वर्ष 2014 के प्रथम कार्यकाल की सम्पूर्ण अवधि में वास्तविकता के धरातल पर कोई तमगा पाने वाला कार्य किया है तो वह है विपक्षी दलों को कोसने और ताने मारने का कार्य। भाजपा ने इस अवधि में विकास के कार्यो को करने  से ज्यादा दिलचस्पी विपक्ष का पतन करने में दिखाया। इस कार्यकाल में भाजपा के वरिष्ठ और कनिष्क नेता जनता की समस्याओं का समाधान करने और विकासात्मक कार्यो की रूप रेखा बनाने की बजाय धार्मिक, जातिगत राजनीति की खिचड़ी पकाने में व्यर्थ किया। भाजपा सरकार के तोपचियों ने भले ही देश की अस्त-व्यस्त आंतरिक व्यवस्था को व्यवस्थित न कर पाये हो। मगर अंतराष्ट्रीय स्तर पर सम्पूर्ण राष्ट्रों में  नया भारत बनाने का तथाकथित डंका जरूर पीट दिया। भाजपा सरकार ने देश की आवाम के तथाकथित विकास के नाम पर भारी भरकम बजट की व्यवस्था का ऐलान भी किया। मगर उसके किसी भी बजट में  मेहनतकश मजदूरों के लिए कोई व्यवस्था नहीं हुई। मेहनतकश मजदूरों को निचोड़कर पूँजीपतियों के हित में भाजपा सरकार ने अर्थव्यवस्था को सरपट दौड़ाने ढोंग किया है। भाजपा सरकार का दूसरा कार्यकाल भी प्रारम्भ हो गया। अभी हाल ही में पहला पूर्णकालिक बजट भी घोषित कर दिया गया। इस बजट में तथाकथित कराये जाने वाले विकास के कार्यो का रोडमैप भी तैयार कर दिया गया। मगर अफसोस कि इस बजट के रोडमैप में एक बार फिर मेहनतकश मजदूर बलि का बकरा बन गया।

भाजपा सरकार मेहनतकश मजदूरों के हक पर हमला

भाजपा सरकार ने अपने दूसरे के कार्यकाल में जो पहला बजट पेश किया। उसमें अब तक की सरकारों के द्वारा 44 श्रम कानूनों के तहत बेखौफ  घोषित किये गये मजदूरों को चार श्रम संहिताओं में बदलकर असहाय बनाने का कुचक्र रचा गया है। अब इन चार श्रम संहिताओं के तहत कंपनियों को मेहनतकश मजदूरों को रखने और निकालने की खुली छूट दे दी गई। इतना ही नहीं स्वयं के अधिकारों के हनन के विरूद्ध आवाज उठाने वाली यूनियनों के विरोध मार्ग को भी संकुचित कर दिया गया है। इतना ही नहीं अब कंपनियों के स्वामियों को आयकर दाखिले और पंजीकरण में भी छूट दे दी गई है। इसके अतिरिक्त कंपनियों को विवादों को घटाने के बहाने मजदूर के अधिकारों पर खुलेआम हमला करने की भी भाजपा सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में खुली छूट दे दी है। इस कार्यकाल में भी मेहनकश मजदूर के कल्याण के लिए भाजपा सरकार के पास कोई नीति नहीं रहीं। कही भी, किसी भी प्रकार की, मेहनतकश मजदूरों के कल्याण के लिए भाजपा सरकार के कार्यकाल में कोई व्यवस्था नहीं की गई। फिर भाजपा सरकार सबका साथ, सबका विकास की ढपली तेजी से पीट रही है।

भाजपा सरकार मजदूरों की या धनकुबेरों की?

धन कुबेरों पर भाजपा सरकार ने गजब की नजरें इनायत की। धनकुबेरों पर सरचार्ज का जो ढोल पीटा गया। दरअसल, उसके पीछे की हकीकत चार हजार करोड़ रुपये तक के कारोबारियों की 99.3 फीसदी कम्पनियों के आयकर में पांच फीसदी की बड़ी राहत देना हैं। पूंजीपतियों को मिल रही छूट की अवधि पांच साल से बढ़ाकर 10 साल तक कर दिया गया है। उनके लाभ के लिए सम्पत्ति कर को पूर्ण विलोपित करने करने की घोषणा कर दी गई है। बैलेन्स शीट के माध्यम से विदेशी पूँजी की परतन्त्रता के लिए भाजपा सरकार ने सारे रास्ते खोल दिये है। बीमा क्षेत्र में 100 फीसदी एफ डीआई, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की खुली छूट दे दी है। सिंगल ब्रांड खुदरा व्यापार व मीडिया में भी एफ डीआई को बढ़ा दिया गया। भाजपा सरकार ने सरकारी कंपनियों को बेचकर डेढ़ लाख करोड़ रुपये का विनिवेश अर्थात शेष सरकारी कंपनियों को कौडिय़ों के मोल अम्बानी-अडानी को बेचने का षडय़ंत्र रचा है। भाजपा सरकार ने रेलवे ट्रैक, रेल इंजन, रेलकोच व वैगन निर्माण कार्य तथा यात्री माल सेवाएं पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत निजी हाथों में सौंपने का कुचक्र रचा है। भाजपा सरकार के इस कार्यकाल में भारतीय रेलवे निगमीकरण से निजीकरण के दिशा में तेजी से अग्रसित हो रहा है। सर्वाधिक रोजगार देने वाले रेलवे में स्थाई रोजगार खत्म करने का षडय़ंत्र किया गया है। इसी प्रकार वन नेशन, वन ग्रीड के तहत विद्युत विभाग के निजीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई है। पूँजीपतियों के भ्रष्टाचार की दरिया बने सरकारी बैंकों को 70 हजार करोड़ रुपये दिया जाएगा। इतना ही नहीं, पूँजीपतियों द्वारा मचायी जाने वाले लूट से सार्वजनिक बैंकों को होने वाले घाटे का 10 फीसदी खर्च 6 माह तक सरकार उठाने के लिए तैयार है। मगर देश के बेरोजगारों को रोजगार देने के लिए किसानों का कर्ज मांफ करने के लिए उसके पास धन नहीं है। भाजपा सरकार देश के लुटेरे पूँजीपतियों को को मजबूत कर रही है। मगर देश के मेहनतकश मजदूरों और किसानों का खून चुसने में लेस मात्र भी परहेज नहीं कर रही है। भाजपा सरकार भारतीय पासपोर्ट वाले एनआरआई को आधार कार्ड की सुविधा देने के लिए सशक्त है। मगर देश में रहने वाले गरीब नागरिकों को एनआरसी के तहत देश से भगाने में परहेज नहीं कर रही है। भाजपा सरकार ने अपने इस कार्यकाल में भी बेरोजगारी कम करने और कल्याणकारी योजनाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा के क्षेत्र में मेहनतकशों के लाभ और उनके विकास के लिए किसी प्रकार की योजना का साकारात्मक क्रियान्वयन नहीं किया है। मनरेगा के बजट में भी सरकार ने 1084 करोड़ रूपए की कटौती कर दी। गरीबों की एलपीजी योजना में 500 करोड़ की कटौती कर दी गई। प्रत्येक  गरीब परिवारों को दी जाने वाले बिजली विभाग की ग्राम ज्योति योजना के बजट में 1000 करोड़ रूपये की कमी कर दी गई। प्रधानमंत्री आवास योजना के बजट में भी 600 करोड़ रूपये की कमी कर दी गई। महिलाओं, बालिकाओं व बच्चों के पोषण और अन्य जनहितकारी मदों में भी कमी कर दी गई। महिलाओं के संरक्षण व सशक्तीकरण बजट में 36 करोड़ की कमी कर दी गई। अनुसूचित जाति के बजट को घटाकर 5445 करोड़ कर दिया गया। अल्पसंख्यकों के विकास के लिए आवंटित बजट को 2017 की तुलना में आधा कर दिया गया। दिव्यांगजनों और विधवा महिलाओं आदि जैसे वंचित समूहों के विकास के बजट में 400 करोड़ की कटौती कर दी गयी है। बुनियादी शिक्षा जहां गरीबों के बच्चे पढ़ते हैं। ऐसी शिक्षा व्यवस्था के बजट को घटाकर तीन फ ीसदी कर दिया गया। भाजपा सरकार की इस कार्यशैली से देश की आवाम स्वयं आंकलन करें कि वर्तमान सरकार किसकी ? आम आवाम की या धनकुबेरों की?

भाजपा सरकार में सच कहना बना सकता निराशावादी और देशद्रोही

भाजपा सरकार वरिष्ठ कर्णधार किसी चमत्कारी बाबाओं से कम नहीं है। सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ही ले लीजिए। उनका विकास भाजपा की मातृ संस्था ने चमत्कार दिखाने के लिए किया। जब से इन्हें भाजपा की कमान और सरकार का मुखिया बनाया गया। तब से इन्होंने विपक्ष को कोसने का नया-नया चमत्कार दिखाया है। इन्होंने शब्दों का इन्द्रजाल बुना कि अच्छे-अच्छे शब्दों के बाजीगर भी इनके शब्दोंके चमत्कार के आगे पानी मांगने लगे। प्रधानमंत्री मोदी की निगाहों में वह व्यक्ति पेशेवर निराशावादी जो उनके फैसलों और नीतियों पर सवाल उठाने की हिमाकत करें। चुनाव मौसम में इन्होंने शब्दों के इन्द्रजाल बुनकर देश में रोजगार की बाढ़ ला दी थी। जैसे ही चुनावी मौसम समाप्त हुआ। वैसे ही देश में सरकारी आंकड़ों के अनुसार रोजगार का अकाल पड़ गया। इन्हीं के सरकारी महकमों के आंकड़े रोजगार की भयावह स्थिति का चीख-चीख वर्णन करने लगे। मगर अफसोस कि यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नजर में पेशेवर निराशावादी दृष्टिकोण नहीं है। उनकी पार्टी के तमाम सांसद कभी मारपीट तो कभी अधिकारियों से अभद्र व्यवहार करने का सेहरा अपने सिर पर बांधते रहे, और हमहूं सजनी राजकुमार का ढोंग करते रहते। मगर उसके बावजूद भी प्रधानमंत्री की नजर में इस प्रकार की कार्यशैली पेशेवर निराशावाद के पैमाने पर खरी नहीं उतरी। प्रधानमंत्री के इस पेशेवर निराशावाद का सबसे बड़ा उदाहरण तो यह है कि यदि आज कोई तथाकथित निराशावादी उनकी पार्टी में शामिल हो जाए तो वह आशावादी हो जाता है। ऐसे बहुत सारे निराशावादियों को आशावादियों में परिवर्तित करने की प्रक्रिया देखते ही देखते उत्तर-पूर्व से प्रारम्भ होकर कोलकाता के मार्ग से कर्नाटक तक जा पहुंची। अब देखना यह है कि देश चलाने वाले और कहां तक  और किस हद तक जा सकते हैं? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सही कहते हैं कि सवाल पूछने वाले सभी व्यक्ति पेशेवर निराशावादी हैं। पेशेवर मतलब रोजगार धारक और पेशेवर कहकर कम से कम रोजगार के आंकड़े तो बढ़ाए ही जा सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ वे कैसे निराशावादी हैं? जो गाय के नाम पर किसी की हत्या करके भी सुरक्षित रहते हैं और जिसकी हत्या होती है, उसके ही घर वाले ही मुजरिम हो जाते हैं? वे कैसे निराशावादी हो सकते हैं जो सोशल मीडिया पर खुलेआम बलात्कार करने और गर्दन काटने की धमकी देते है ? वे कैसे निराशावादी हो सकते हैं, जो खुलेआम किसी को इसलिए भी अधमरा कर देते है कि अमुक व्यक्ति ने अमुक के कहने पर जय श्री राम नहीं कहा ? यह कितना आश्चर्यजनक है कि प्रधानमंत्री केवल पेशेवर निराशावादी शब्द का इन्द्रजाल बुनने और परिभाषा गढऩे के लिए वाराणसी तक का सफर किया। सन्दर्भ यह भी दिलचस्प है कि देश की अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन की  हो गई है। तमाम अर्थशास्त्री यही कह रहे हैं कि इस बजट में इसका सन्दर्भ जरूर था। मगर इसके लिए किसी प्रकार की कोई रूप रेखा नहीं बनायी है। भाजपा सरकार के दिग्गज अर्थशास्त्रियों के कला कौशल को देश की आवाम विगत पांच वर्षों से देखती आ रही है। भाजपा सरकार जिस सुद्ढ़ अर्थव्यवस्था का डंका पिटती आ रही है। दरअसल उक्त तथाकथित सुद्ढ़ता की पोल रिजर्ब बैंक के आंकड़े स्वत: खोलते है। भाजपा सरकार में रिजर्व बैंक कुछ और आंकड़ा देता है और सरकार के कुशल और काबिल अर्थशास्त्री कोई और आंकड़ा देते हैं। इनता ही नहीं अर्थव्यवस्था के मामले में वित्त मंत्री कुछ और आकड़ा प्रस्तुत करते है और प्रधानमंत्री कुछ आकड़ा प्रस्तुत करते है। जो सबसे अलग और आकर्षक आंकड़ा होता है। इतना नहीं नहीं इन आंकड़ों की बाजीगरी के कला प्रदर्शन को एक ही दिन में देश की अर्थव्यवस्था सहित अन्य सामानान्तर मुद्दों पर भाजपा सरकार के नेताओं के अलग-अलग भाषणों में दिये गये आंकड़ों के रूप में देखा जा सकता है। वास्तविक मायने में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यही आशावादी दृष्टिकोण है। जो आवाम को मूर्ख बनाने के लिए पर्याप्त है। यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आशावादी आत्मविश्वास है। इसी के माध्यम से वे अपनी कलाकारी का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते है। वैसे भी पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था से आर्थिक असमानता और गंभीर होगी। अर्थव्यवस्था बड़ी होने का तात्पर्य जो प्रधानमंत्री समझाते हैं कि सबका विकास होगा और गरीब अमीर हो जाएगा। यह सारी बातें मात्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शब्दों का इन्द्रजाल है। ये मात्र जुमला है। आज हमारे देश की अर्थव्यवस्था 2.4 ट्रिलियन है। मगर उसके बावजूद भी देश में जितनी व्यापक आर्थिक असमानता है, उतनी दुनिया में दो-चार देश को छोड़ दिया जाये तो किसी भी देश में नहीं है। तमाम काबिल और तजुर्बेकार अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वर्तमान में हमारे देश में व्याप्त आर्थिक असमानता विगत 100 वर्षों में सबसे अधिक है। अर्थात परतंत्र भारत के दौर में भी इस प्रकार की बद्तर हालत नहीं थी। आज हमारे देश की सम्पूर्ण आबादी में से मात्र 10 प्रतिशत लोग देश की सम्पूर्ण संपत्ति में से 52 प्रतिशत संपत्ति पर अपना अधिकार जमाये बैठे हैं। देश के सबसे अमीर 9 व्यक्तियों के पास जितनी संपत्ति है। उस संपत्ति से देश की 50 प्रतिशत जनता आसानी से जीवन यापन कर सकती है। ऑक्सफेम की रिपोर्ट की माने तो देश के अमीर दिन दूनी रात चौगुनी की रफ्तार से अमीर होते जा रहे हैं। जबकि गरीब उसी रफ्तार से और अधिक गरीब होता जा रहा है। देश के 10 प्रतिशत सबसे अमीर लोगों की संपत्ति में एक वर्ष के भीतर ही 39 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो गयी है। जबकि देश की सबसे गरीब 50 प्रतिशत आबादी की संपत्ति में मात्र तीन प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। देश के सबसे गरीब 60 प्रतिशत आबादी के पास कुल राष्ट्रीय संपत्ति में से मात्र 4.8 प्रतिशत संपत्ति है। वर्ष 2018 में देश के 10 प्रतिशत सबसे अमीर आबादी के पास देश की कुल 77.4 प्रतिशत संपत्ति थी। जबकि वर्ष 2017 में इनके पास 73 प्रतिशत संपत्ति थी। इसका सीधा सा तात्पर्य यह है कि अमीर पहले से अधिक अमीर हो रहे हैं। जबकि बजट के समय और योजनाओं को बनाते समय भी हमेशा गरीबों की बात कही जाती है। मगर ध्यान हमेशा अमीरों कर रखा जाता है। अर्थात आवाम को मात्र मूर्ख बनाया जाता है। वर्ष 2014 के बाद देश में केवल दो वर्ग थे। अमीर (आशावादी, देशभक्त) और गरीब  (निराशावादी, देशद्रोही)। यह अंतर साल दर साल बढ़ता रहा। मात्र यह फासला ही नहीं बढ़ा बल्कि इस अंतर का लाभ उठाते हुए पूंजीपति ने सरकार को बनाने और बिगाडऩे के खेल में भी हाथ आजमाना शुरू कर दिया। पूंजीपति अपनी मर्जी से सरकार बनाने और बिगाडऩे लगे। स्वयं के फायदे के लिए इन लोगों ने नीतियों को बनाने और बिगाडऩे का काम करने लगे। धीरे-धीरे इन लोगों ने सरकारों को अपने इशारें पर चलाना प्रारम्भ कर दिया। मगर इसके बाद भी सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास का नारा देने वाली भाजपा सरकार की ऐसी नीतियां आम आवाम की समझ में नहीं आ रही है। या यूं कहें कि समझ में आ रही है। मगर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा ? इसी के इंतजार में आवाम इंतजार की घडिय़ा गिन रही है। अडानी, अम्बानी समेत तमाम पूंजीपतियों की पूंजी कई गुना बढ़ती जाती है। मगर इसके बावजूद भी ये लोग बैंक के कर्ज को वापस नहीं करते है। एक तरफ  कई गुना बढ़ती पूंजी और दूसरी तरफ  दीवालियापन घोषित करना इन पूंजीपतियों का शगल बन गया है। वही दूसरी ओर ये वही बैंक हैं। जो किसानों को कुछ हजार या लाख का लोन देते हैं। मगर जो किसान समय से चुकाने में थोड़ा भी विलम्ब कर गया या नहीं चुका पाया। ऐसे किसानों को ये बैंक इतना अधिक परेशान कर देते है कि उक्त किसान आत्महत्या करने के लिए विवश हो जाता। पूंजीवाद की सबसे बड़ी कलाकारी यही है कि अर्थ व्यवस्था के साथ धीरे-धीरे सारे प्राकृतिक संसाधन उसकी गिरफ्त में हो जाते है। सम्पूर्ण प्राकृतिक संसाधन सम्पूर्ण आबादी के कुछ प्रतिशत लोगों के हाथ में चली जाती है। देश की जमीन इनके हाथ में चली जाती है। पहाड़़, नदियाँ सब कुछ इन्हीं का हो जाता है। देश की शेष आबादी जो इनका विरोध करती है। उसे नक्सली या माओवादी कहा जाता है। आज आजाद भारत में इसी प्रकार के कुकृत्यों को अंजाम दिया जा रहा है। जो लोग अपने अधिकारों के लिए या अपने जल, जमीन और जंगल की लड़ाई लड़ रहे है। उन्हें सरकार पूंजीपतियों के समर्थन में खड़ी होकर मार रही है। पूंजीवाद की प्रगति देखिए कि वर्ष 1990 में देश में कुल दो प्रतिशत अरबपति थे। 2016 में 84, 2017 में 101 और पिछले वर्ष 2018 में 119 अरबपति थे। इन्हीं के प्रगति के साथ-साथ देश में भूखे लोगों की संख्या में जबरदस्त बढ़ोत्तरी होती गई। साथ ही बैंकों का एनपीए भी बढ़ता गया। वर्ष 2016 में देश की कुल अर्थव्यवस्था 2.3 ट्रिलियन डॉलर थी और उस समय देश में 84 अरबपति थे। चीन में इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था 2006 में थी और तब वहां मात्र 10 अरबपति थे। वर्ष 2017 में जो 101 अरबपति थे, उनके पास सम्मिलित तौर पर 440 अरब डॉलर की पूंजी थी। अरबपतियों के पास इससे अधिक पूंजी केवल अमेरिका और चीन में है। वहीं इसके विपरीत देश की औसत आदमी की आय महज 1700 डॉलर प्रतिवर्ष है। भारत के धनाढ्यों ने किसी भी देश के किसी भी काल की तुलना में सबसे ज्यादा धन एकत्रित किया है। यह कहना मुश्किल नहीं है कि हाल के वर्षों में भारत में पूंजीपतियों ने आम आदमी को और संसाधनों को खूब लूटा है। वर्तमान भाजपा सरकार में इस लूटपाट की रफ्तार चार गुना अधिक बढ़ गई है। वर्ष 2016 में देश के सर्वाधिक अमीर 10 प्रतिशत आबादी के पास राष्ट्रीय आय का 55 प्रतिशत से अधिक धनराशि जमा थी। जो किसी भी देश की तुलना में सर्वाधिक थी। वर्ष 1980 में देश के सर्वाधिक अमीर एक प्रतिशत धनाढ्यों के पास 7 प्रतिशत संसाधन थे। जबकि सबसे गरीब 50 प्रतिशत आबादी 23 प्रतिशत संसाधनों पर निर्भर थी। वर्ष 2014 तक सबसे ऊपर के एक प्रतिशत अमीरों का हिस्सा बढ़कर 22 प्रतिशत तक पहुंच गया। जबकि सबसे नीचे के गरीबों की 50 प्रतिशत आबादी का हिस्सा घटकर 15 प्रतिशत हो गया। इससे स्पष्ट हो रहा है कि बढ़ती आर्थिक असमानताओं की इतनी बड़ी खाई कैसे भाजपा सरकार ने खींचा है। भाजपा सरकार के पूंजीपतियों प्रेम का अंजाम है कि गरीबों का जीवन जीना दूभर हो गया है। यह सब अंतर तब है। जब हमारे देश की अर्थव्यवस्था 2.4 ट्रिलियन की है। जाहिर है कि पांच ट्रिलियन का लाभ भी मात्र उन्हीं अमीरों के लिए है। जिसके पर भाजपा सरकार की निगेहबान हैं आंखे। इन बातों को समझाने के लिए उम्मीद है कि पेशेवर निराशावादी होना आवश्यक नहीं है। मगर सच को सच कहना शायद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नजर में आपको निराशावादी और देशद्रोही भी बना सकता है।