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03
April

मो. इरशाद

बहराइच। जनपद बहराइच के डूडा विभाग से गरीब बेघर लोगो को आवास आवंटन किया गया था किंतु कार्यदायी संस्था समाज कल्याण निगम की लापरवाही उदासीनता के चलते आज बारह वर्षों के बाद भी गरीबो को आवंटित आवास नही मिल सका है। अपने घर का सपना संजोये जिले के गरीब दो सौ छिहत्तर परिवार आज भी घर मिलने की आस में आंखे पथरा गयी है।परियोजना प्रबंधक संजय सिंह ने कार्यदायी संस्था को पत्र लिखकर बन रहे दो सो छिहत्तर आवासों को विभाग को सौपने के लिए कहा है लेकिन कार्यदायी संस्था पर इसका कोई असर होता नही दिखाई दे रहा है। आखिर समय से निर्माण कार्य पूरा न करने वालो की जिम्मेदार अधिकारियो कर्मचारियो के लापरवाही से आज गरीबो को बारह वर्ष बाद भी सरकार की आवासीय योजना का लाभ नही मिल सका। सरकारी आवास पाने वाले आवंटियों को आज भी मकान पाने का इंतजार है। अब तो लापरवाही बरतने वालो पर कार्यवाही की मांग उठाने लगी है। गरीबो के मसीहा बनने का दम भरकर शासन सत्ता में आई बसपा सपा व भाजपा सरकार के लगभग पौने दो साल के कार्यकाल के बाद भी भवन निर्माण ज्यो की त्यों पर लटकी हुई है।

03
April
भारत में सरकारी फसल बीमा कार्यक्रम 1985 में व्यापक फसल बीमा योजना सीसीआईएस को लागू करने के साथ शुरू हुआ। सीसीआईएस को  1999 में रबी की फसल के दौरान राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना एनएआईएस द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था जो 2015—16 तक जारी रहा।

योजना के शुभारंभ के दो वर्षों में सभी 18 कंपनियों ने मिलकर 15795 करोड़ रुपए का लाभ कमाया। ऐसा लगता है कि किसानों को राहत प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा शुरू की गई योजना के उद्देश्य को ही खत्म कर दिया गया है। पीएमएफ बीवाई का उद्देश्य मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण किसानों को राहत प्रदान करना है। न्यूनतम पैदावार से 50 फीसद से कम उपज होने की स्थिति में बीमित किसानों को तत्काल राहत देने के लिए पीएमएफ बीवाई अंतिम उपज के डेटा की प्रतीक्षा किए बिना लेखागत आंशिक भुगतान संभावित दावों के 25 फीसद तक के लिए व्यवस्था करना है। साल 2017—18 के लिए भारतीय बीमा विनियामक और  विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष सुभाष सी खुंतिया ने वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग के सचिव को रिपोर्ट भेजी, भारत सरकार ने इसकी पुष्टि भी की।

03
April

bhola natha misra via whatsapp

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यह हमारे लिए गौरव की बात है कि हमारा देश दुनिया में सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है लेकिन दुर्भाग्य है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने वाली  राजनीति का स्वरूप आजादी के बाद से ही धीरे धीरे बदलता जा रहा है। स्वस्थ राजनीति की परिकल्पना लोकतांत्रिक व्यवस्था में की गई थी लेकिन आज उसका स्वरूप राजनीतिक सत्ता तक पहुंचने का माध्यम मात्र तक सीमित होता जा रहा है। आजादी के बाद से राजनीति कूटनीति मैं बदल कर लोकतंत्र एवं देश दोनों के भविष्य के लिए खतरा बनती जा रही है। राजनीतिक लोग सत्ता तक पहुंचने के लिए सारे उसूलों सिद्धांतों को ताक पर रखकर देश की अस्मिता तक को दांव पर लगाने से नहीं चूक रहे हैं। आज जम्मू कश्मीर की समस्या हमारी राजनीति का ही प्रतिफ ल है जिसे आज पूरा देश झेल रहा है। हम ने यह भी कहा था की हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीति ऐसी है जिसके चलते आज जम्मू कश्मीर में कुछ लोग राजनीतिक लाबादा ओढआतंकवाद को बढ़ावा  एवं आतंकवादियों को बना दे रहे हैं और हम लोकतांत्रिक व्यवस्था के चलते उन पर प्रतिबंध नहीं लगा पा रहे हैं। राजनीति में सत्ता तक पहुंचने के लिए ही आज हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान आतंकवाद समर्थक अपनी गुप्तचर एजेंसी और सेना के हाथों खेलने पर मजबूर हैं और उसे मजबूरी में राजनीति लोकतांत्रिक व्यवस्था एवं सिद्धांतों के विपरीत खिलौने की तरह खेलना पड़ रहा है।

03
April

राजनेताओं द्वारा शहीदों के परिजनों को ढांढस बधाने की प्रक्रिया का खुलेआम मजाक उड़ाया जा रहा है। जिसका उदाहण उत्तर प्रदेश स्थित देवरिया जिले के भटनी थाना क्षेत्र के छपिया जयदेव के विजय कुमार मौर्य का है। जो पुलवामा हमले में शहीद हुए सीआरपीएफ जवानों में से एक थे। इनके परिजनों को ढांढस बधाने वालो में जहां तमाम नातेदारों रिश्तेदारों, शीर्ष नौकरशाहों थे तो वही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी थे। जो शहीद के घर शोक संवेदना व्यक्त करने गए थे। राज्य के मुख्यमंत्री का शहीद के घर जाकर शोक व्यक्त करना और यह आश्वासन देना कि शहीद के परिवार की सभी मांगों को समयबद्ध ढंग से पूरा किया जाएगा। निश्चित तौर पर अच्छी बात है। मगर योगी आदित्यनाथ भी पुरुष वर्चस्ववादी उसी समाज के प्रतिनिधि निकले। जिनके लिए शायद महिलाओं की भावनाओं का कोई मतलब नहीं रहता या फि र महिला के साथ हमेशा दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है। ये उनकी मानसिकता में भी पैठा हुआ है। नहीं तो ऐसा क्यों होता कि जिस औरत का पति उसका जीने का आसरा उससे छिन गया हो, शहीद हो गया हो, उससे मुख्यमंत्री दो सांत्वना के बोल न बोल पाए। शायद योगी जी को यह अपने मर्दवादी अहं का अपमान लगा हो कि वे एक महिला से सांत्वना के दो बोल बोले उनसे मिले। इसीलिए तो शहीद विजय कुमार मौर्य की पत्नी विजयलक्ष्मी ने कहा है कि उनके लिए मुख्यमंत्री के उनके घर तक आने का कोई मतलब नहीं है। विजयलक्ष्मी कहती हैं, मुख्यमंत्री को एक बार को मुझसे कुछ पूछना तो चाहिए था। आखिर सुहाग उजड़ा है मेरा। मगर योगी जी केवल मेरे ससुर जी से बात किए। हमसे उन्होंने कुछ नहीं पूछा। हम वहीं पर बैठे हुए थे। योगी आदित्यनाथ को हमसे भी पूछना चाहिए, पति शहीद हुए हैं मेरे। एक बच्ची है। कैसे रहोगी और आगे क्या करोगी? इस बारे में दो बोल तक न निकले उनके मुंह से। यह सही है कि किसी के शोक संवेदना व्यक्त करने से विजयलक्ष्मी को अपना पति वापस नहीं मिल जाता। मगर एक उम्मीद जरूर बंधती कि मैं अकेले नहीं हूं। हमारें साथ हमारी सरकार खड़ी है। मेरी बच्ची का भविष्य अंधकारमय नहीं होगा।