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11
May

पैसा देकर वोट खरीदा हूं ! पैसा लेकर ही विकास कार्य करूंगा: ग्राम प्रधान मो. तारिक

मो. इसरार

बहराइच। केन्द्र और प्रदेश में सत्ता की बागडोर संभालने वाली भाजपा की देश और प्रदेश में विकास के दावों का जोर शोर से ताल ठोक रही हैं। मगर इनके विकास के दावों में कितनी हकीकत और कितना फंसाना है। इसका पर्दाफाश मैनफोर्स समाचार पाठकों के समक्ष जनपद बहराइच में हुए तथाकथित विकास के दावों की हकीकत आम जनता की जुबानी सुनाकर कर रहा है। जो अग्रलिखित इस प्रकार है—पाठकों को बता दें कि जनपद बहराइच के फखरपुर ब्लॉक स्थिति कुण्डास पारा नामक गांव है। इस गांव को प्रधान का नाम मो. तारिक है। पाठकों को अवगत करा दें कि यहां कि आवाम का आरोप है कि जब से मो. तारिक ग्राम प्रधानी की बागडोर संभाले है। तब से उनके पास जनता से मिलने का समय नहीं है। इसका एक कारण यह है भी है कि प्रधान जी को नींद लेने से ही फुर्सत नहीं है तो भला अपने गांव की जनता को क्या समय देंगे।

ग्रामिणों को कहना है कि ग्राम प्रधान दिन के 10 बजे तक सोते है। जब उठते है तो जनता उन्हें तलाशती रह जाती है। ग्रामिण अपनी समस्याओं के समाधान के लिए अपनी—अपनी अर्जी लेकर उनके दरवाजे पर खडे रहे है। मगर प्रधान  जी अर्जी तो लेते है। मगर उनके पास अर्जी में उल्लेखित समस्याओं के समाधान के संदर्भ में ग्रामिणों से वार्ता करने की फुर्सत नहीं है। जिस प्रधान के पास अपने ही ग्राम प्रधानी क्षेत्र के ग्रामिणों से वार्ता करने की फुर्सत नहीं है तो वह भला क्या विकास के दावों की ताल ठोकेंगे ? पाठकगण इसका अंदाजा स्वयं लगा लिए होगे। अब समाचार पत्र अपने पाठकों को ले चलता है कि ग्राम प्रधान मो. तारिक के द्वारा कराये गये विकास के तथाकथित कार्यो के दावों की हकीकत से रूबरू कराने के लिए है। पाठकों को बता दें कि केन्द्र सरकार ने गरीबों को आवास मुहैया कराने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना का शुभारम्भ किया गया। ग्राम प्रधान दस्तावेजों में दावा कर रहे है कि उन्होंने केन्द्र सरकार की मंशा के अनुरूप गरीबों को आवास मुहैया कराने के लिए शत प्रतिशत प्रयास किया गया है। मगर उन्हीं की ग्राम पंचायत के नागरिकों का आरोप है कि जो गरीब इस के लिए पात्र है, उसे ग्राम प्रधान ने आवास नहीं दिया है। इन गरीबों से पैसा लेने के बावजूद भी ग्राम प्रधान मो. तारिक ने उन्हें आवास नहीं दिया। जो व्यक्ति पैसा ज्यादा दिया, ग्राम प्रधान ने उसे ही प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभार्थी घोषित कर दिया। जो व्यक्ति इस योजना का पात्र नहीं है, उससे अधिक पैसा लेकर ग्राम प्रधान मो. तारिक ने आवास पाने की पात्रता सूची में नाम डाल दिया।

ग्राम प्रधान मो. तारिक ने वास्तविक लाभार्थियों और तथाकथित लाभार्थियों दोनों से पैसा लिया। मगर दो—चार को छोड दिया जाये तो ग्राम प्रधान मो. तारिक ने किसी भी गरीब नागरिक को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास का लाभ नहीं दिया। ग्रामिणों ने आरोप लगाते हुए कहाकि एक तरफ केन्द्र सरकार और राज्य सरकार खुले में शौच मुक्त अभियान चलाकर लोगों को शौचालय बनवाने के लिए प्रेरित कर रही और लोगों को आर्थिक सहयोग दे रही है तो वही दूसरी ग्राम कुण्डास पारा का प्रधान लोगोंं से शौचालय बनवाने के नाम पर पैसा ऐंठ रहा है। ग्राम प्रधान मो. तारिक शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं को देने के नाम पर भी पैसा लेने में परहेज नहीं कर रहा है। ग्राम कुण्डासा की ग्रामीण महिला फईदा ने बताया कि वह निहायत ही गरीब है। वह झुग्गी झोपडी में बमुश्किल अपना जीवन गुजारती है। जब सरकार ने आवासीय सुविधा का लाभ देने की घोषणा की थी तो से भी ऐसा लगा कि अब झुग्गी झोपडी से राहत मिलेगी और उसे भी पक्का मकान मिल जायेगा। वह अपने ग्राम प्रधान मो. तारिक के पास गई और पीएम आवास योजना के तहत आवास की मांग की।

फईदा ने बताया कि उसने प्रधान ने आवास पाने के बाबत बात की तो प्रधान ने उससे पैसे की मांग की। फईदा ने प्रधान मो. तारिक को 5 हजार रूपये पीएम आवास के नाम पर घूस देने की बात कही। फईदा का कहना है कि करीब साल डेढ होने वाला है। अभी तक उसे न तो आवास की सुविधा का लाभ मिला और ना ही शौचालय की सुविधा का लाभ मिला। जब वह प्रधान से मिलने जाती है तो प्रधान मिलता ही नहीं है। जब कभी मिल जाता है तो कहता है कि जब आवास बनेगा तो मिलेगा। मगर आज तक ना तो आवास बना और ना ही मिला। ग्राम कुण्डास पारा निवासी सोहराब ने बताया कि जब मो. तारिक प्रधान हुआ है तब से आज तक ना तो सडक बन पाई है और ना ही घरों से निकले वाली नालियों के जल निकासी के लिए नालियों का निर्माण हो पाया है। सोहराब ने बताया कि केन्द्र सरकार ने घर—घर शौचालय बनाने का निर्देश दिया था।

मगर बिना पैसे लिये ग्राम प्रधान मो. तारिक शौचालय नहीं बनवा रहा है। कुछ लोग कम पैसा दिये थे तो उनका ना तो पैसा वापस किया और ना ही उन्हें शौचालय की सुविधा का लाभ दिया है। कुछ लोगों से शौचालय बनवाने के लिए गड्ढे खुदवा दिया था। मगर उक्त गड्ढों पर न तो आज तक शौचालय की टायलेट सीट लगी और ना ही शौचालय की दीवार ही खडी हुई। सोहराब ने कई बार नालियों की सफाई और मरम्मत और शौचालय बनवाने के लिए ग्राम प्रधान मो. तारिक से संपर्क किया तो उसने कहाकि तुम लोगों ने हमको तो वोट दिया नहीं था तो हमसे काम कराने के लिए क्यों कहते हो ? मैं तुम लोगों का ठेका नहीं लिया हूं। मैं कुछ भी नहीं करूंगा। जाओ जो मन करें कर लो। ग्राम कुण्डास पारा के नागरिक फरीद ने कहाकि गर्मी का मौसम है।

घरों का गंदा पानी ऐसे ही खुले में बह रहा है। जिससे मच्छरों का प्रकोप बढ रहा है। मच्छरों के प्रकोप से आये दिन बीमारियां हो रही है। इसका समाधान करने के लिए प्रधान से मुलाकात करने जब हम लोग उसके घर जाते है तो प्रधान सोता हुआ मिलता है। बमुश्किल किसी प्रकार यदि प्रधान से मुलाकत हो भी गई तो प्रधान समस्या का समाधान करने का आश्वासन देता है। मगर काम नहीं कराता है। फरीद ने आरोप लगाया कि प्रधान कहता है कि वह पैसे देकर वोट खरीदा है। इसलिए किसी को कोई काम कराना है तो उसके बदले पैसा देना ही होगा। बिना पैसे के एक भी काम नहीं किया जायेगा। अब शायद पाठकगण भी समझ गये होंगे कि जब एक जनता का प्रतिनिधि ग्राम प्रधान खुलेआम विकास कार्य कराने के नाम पर अपने ही ग्रामवासियों से पैसा मांग रहा है तो देश किस प्रकार विकास के मार्ग पर प्रशस्त हो रहा है ?

 

 

 

30
April

नबाबी शौक पूरा कराने के लिए वन्य जीव संरक्षण विभाग करा रहा बाघों की हत्या

योगेश पाण्डेय

लखनऊ। वन्य जीवों पर हो रहे अत्याचार को रोकने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 1972 में भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम पारित किया था। इसका मकसद वन्य जीवों के अवैध शिकार, मांस और खाल के व्यापार पर रोक लगाना था। इस अधिनियम में वर्ष 2003 में संशोधन किया गया। जिसका नाम भारतीय वन्य जीव संरक्षण (संशोधित) अधिनियम 2002 रखा गया। इस अधिनियम के तहत दंड और जुर्माना के साथ कठोर सजा देने का भी प्रावधान किया गया था। मगर इस अधिनियम का इस्तेमाल सिर्फ वन संरक्षित क्षेत्रों में रहने वाले गरीबों और मजलूमों पर किया जाता है। मगर रसूखदार लोगों पर इस अधिनियम प्रयोग मात्र मजाक बन कर रह गया है। जिसका परिणाम है कि वन्य जीवों का शिकार प्रतिबंधित होने के बावजूद भी अमीरों के मनोरंजन का मात्र साधन बनकर रहा गया है। यही वजह है कि खुलेआम बड़े-बड़े धन्ना सेठों और नबाबों द्वारा वन्य जीव विभाग के अधिकारियों को नोटों की सूंघनी सूंघाकर वन्य परिक्षेत्रों में खुलेआम वन्य जीवों का धड़ल्ले से शिकार किया जा रहा है। यदि अमीर शिकारी प्रतिबंधित वन्य जीवों का शिकार करने में कामयाब हो जाते है तो वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी ऐसे वन्य जीवों की खुलेआम हत्या को छिपाने के लिए वन्यजीवों को मानव जीवन के लिए खतरनाक बताते हुए दस्तावेजों की खानापूर्ति कराते है और मीडिया को गुमराह कर या लोभ लालच देकर वन्य जीवों की हत्या को छिपाने के लिए वन्य जीवों को मानव जीवन के लिए खतरा बनाने का प्रोपोगण्डा रचवाते और उसका प्रचार करते है। ताकि उन्हें कानूनी स्वीकृति मिल जाये और उनके दामन पर वन्य जीवों की हत्या का दाग न लगे और ना ही उनकी भ्रष्ट कार्यशैली पर कभी सवाल उठे। मैनफोर्स समाचार पत्र पाठकों के समक्ष वर्ष 2009 में हुए ऐसे ही वन्य जीव की हत्या की वारदात का ससाक्ष्य वर्णन कर रहा है। जो इस प्रकार है:- पाठकों को बता दें कि 24 फ रवरी 2009 को फैजाबाद वन प्रभाग के कुमारगंज रेंज में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत संरक्षित वन्य जीव बाघ की हत्या कर दी गई। मगर इस बाघ की हत्या को वन प्रभाग फैजाबाद के प्रभागीय वनाधिकारी ओपी सिंह और सरयू वृत्त उप्र फैजाबाद के वन संरक्षक/क्षेत्रीय निदेशक आरएस मिश्रा ने आवश्यक बताते हुए वक्तव्य दिया कि उक्त बाघ मानव जीवन के लिए खतरानाक है। जबकि विगत दो-तीन दशक से आज तक की अवधि में वन प्रभाग फैजाबाद के कुमारगंज रेंज और रूदौली रेंज में कभी भी इस बात की सुगबुगाहट नहीं हुई कि उक्त वन प्रभाग परिक्षेत्र में किसी बाघ या अन्य वन्य जीवों ने मानव जीवन को हानि पहुंचायी हो। मगर वन प्रभाग फैजाबाद के प्रभागीय वनाधिकारी ओपी सिंह और सरयू वृत्त उप्र फैजाबाद के वन संरक्षक/क्षेत्रीय निदेशक ने अपने लखनऊ स्थित आकाओं के इशारे पर हैदराबाद के नबाब शफत अली के शिकार करने के नबाबी शौक को पूरा करने के लिए वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत संरक्षित वन्य जीव बाघ का शिकार करने की लिखित इजाजत दे दी। प्रतिबंधित वन्य जीव बाघ की हत्या कैसे, क्यों और किस प्रयोजन के लिए की गई। इसका पर्दाफाश सर्वप्रथम दिनांक 24 फ रवरी 2009 को प्रतिबंधित वन्य जीव बाघ को मारे जाने के संबंध में वन विभाग के द्वारा की गई कार्यवाही के पत्र से स्वत: हो जाता है। पाठकगण कृपया उक्त पत्र में उल्लेखित बातों को ध्यान पूर्वक अध्ययन करें, यथास्थिति स्वयं समझ में आ जायेगी। इस पत्र में यह उल्लेख किया गया है कि वन प्रभाग फैजाबाद के प्रभागीय वनाधिकारी ओपी सिंह और सरयू वृत्त उ प्र फैजाबाद के वन संरक्षक/क्षेत्रीय निदेशक ने यह उल्लेखित किया कि ट्रैकर्स टीमें कुमारगंज रेंज व रूदौली रेंज के स्थानीय वन कर्मी आज प्रात: ही बाघ की लोकेशन ज्ञात करने के लिए निकल पड़े थे। पत्र में उल्लेखित इस वाक्य से ऐसा प्रतीत हो रहा है। मानों उक्त बाघ मानव जाति के लिए हानिकारक नहीं बल्कि मानव जाति स्वयं उस बाघ के जीवन के लिए हानिकारक है। शायद यही वजह है कि एक बछिया की मौत पर वन विभाग के कर्मी आग बबूला होने का ढोंग रचते हुए एक राष्ट्रीय वन्य जीव की हत्या करने की साजिश कर रहे थे। अब सवाल यह है कि वन में बाघ बछिया का शिकार नहीं करेगा तो किसका करेंगा ? यदि वह शिकार नहीं करेगा तो खायेगा ? क्या उसके भोजन की व्यवस्था वन्य जीव प्रशासन ने कर रखी है ? यदि हां तो क्या ? उसे क्या खाने को दिया जाता है ? क्या उक्त वन में रहने वाले बाघों को प्रशिक्षित किया जाता  कि मानव जीवन या अन्य जानवरों को बाघ महाराज खतरा ना पहुंचाये ? क्या बाघों को सही और गलत सोचने की समझ विकसित करने के लिए वन विभाग के अधिकारियों द्वारा बाघों को प्रशिक्षित किया जाता है या वन विभाग बाघों के मस्तिष्क में सोच और समझ विकसित करने के लिए बाघों के शरीर में कोई इलेक्ट्रानिक चिप या डिवाइस लगायी जाती है ? ताकि बाघ महराज मानव जीवन या अन्य जीवों की सुरक्षा के संदर्र्भ में अपने मस्तिष्क में विचार विकसित कर सके ? यदि हां तो इसका जवाब तो वन विभाग के जिम्मेदारों को जरूर देना चाहिए। यदि ना तो कैसे वन विभाग ने यह निर्णय ले लिया कि उक्त बाघ मानव जीवन के लिए खतरा बना है ? भाई सीधी सी बात है कि बाघ या जंगली जानवर जंगल में नहीं रहेंगे तो क्या पिंजरे में रहेंगे ? जब मानव जाति स्वयं जंगल में जंगली जानवरों का शिकार करने और उन्हें अपने शौक के लिए हानि पहुंचाने का षडय़ंत्र करता है और इस बीच जानवर जब स्वयं की प्रतिरक्षा में मानव जाति को नुकसान पहुंचा देता है तो फिर उक्त जंगली जानवर दोषी कैसे ? जंगलों में प्रत्येक स्थानों पर यह लिखित रूप में अंकित किया जाता है कि जंगल में जंगली जानवरों का शिकार वर्जित है। जिधर जानवरों की संख्या ज्यादा रहती है। ऐसे क्षेत्रों में लिखित रूप अंकित गया होता है कि इस परिक्षेत्र में खतरनाक जानवर रहते है। आगे जाना मना है। कोई भी अप्रिय घटना हो सकती है। आदि आदि निर्देश वाक्य अंकित और मुद्रित किये गये होते है। यदि इसके बाद भी कोई मानव जाति उक्त प्रतिबंधित परिक्षेत्र में जाकर यदि वन्य जीवों का शिकार करता है और उसके साथ कोई अप्रिय घटना हो जाती है तो इसका दोषी कौन होगा ? वन्य जीव या मानव जाति ? इसका निर्धारण तो  पाठकगण और वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी स्वयं करें। पाठकों को स्पष्ट कर दें कि उक्त बाघ मानव जीवन के लिए खतरा नहीं था बल्कि वन विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों के लोभ और नबाब शफत अली खां के शिकार करने के नबाबी शौक उक्त बाघ के जीवन के लिए खतरा था। मानव जीवन की सुरक्षा की दुहाई देकर वन विभाग ने उक्त बाघ की नबाब शफत अली खां के शिकार के शौक को पूरा करने लिए हत्या कराने का षणयंत्र रचा था। खैर पुन: मूल मुद्दे पर आते है। पत्र में आगे यह भी उल्लेखित किया गया कि बकचुना वन रक्षक चौकी के समीप में ही बाघ के पद चिन्ह मिला व एक स्थान पर बाघ द्वारा मारी गई बछिया का मृत शव मिला। पाठकगण ध्यान दें कि यहां बछिया के शव के मिलने की बात कही गई है, ना कि मानव शव मिलने की बात कही गई है। इसके बाद पत्र में यह उल्लेख किया गया है कि बाघ के पद चिन्ह के आधार पर बाघ की लोकेशन बकचुना वन क्षेत्र में ही आंकी गई। अर्थात बाघ की हत्या करने के लिए उसकी तलाश वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा की जाने लगी ताकि नबाब शफत अली के शिकार के शौक को पूरा किया जा सके। इसके बाद उक्त पत्र में यह उल्लेखित किया गया कि बाघ द्वारा बछिया के मारे गये शव के मिलने की सूचना मिलते ही मौके पर श्री महेन्द्र सिंह मुख्य वन संरक्षक इको, प्रभागीय वनाधिकारी फैजाबाद, उप प्रभागीय वनाधिकारी फैजाबाद, क्षेत्रीय वनाधिकारी कुमारगंज पहुंचे। मौके का सूक्ष्म निरीक्षण कर बछिया के शव के पास ही आम के पेड़ पर मचान बनाने हेतु महेन्द्र सिंह मुख्य वन संरक्षक इको द्वारा निर्णय लिया गया। मचान आदि बनाने का कार्य अपरान्ह 2:00 बजे तक पूर्ण कर लिया गया। पाठकगण स्वत: ध्यान दें कि इस पत्र में कही भी यह उल्लेखित नहीं किया गया कि उक्त या किसी भी बाघ ने किसी मानव जाति को नुकसान पहुंचाया है। मगर मुख्य वन रक्षक ने बछिया की मौत को गंभीर विषय मानते हुए बाघ को मारने की इजाजत दे दी। दिलचस्प बात यह है कि बाघ के मारने का निर्देश बाद में दिया गया और बाघ को मारने की तैयारी पहले से ही की गई है। अर्थात बाघ की हत्या की साजिश पहले से ही तैयार की जा रही थी। इसी लिए तो पहले मचान बनाने का निर्देश दिया गया, उसके बाद बाघ को मारने का निर्देश दिया गया। यह सब कुछ इसलिए ताकि नबाब शफत अली खां के शिकार के शौक को पूरा किया जा सके। इस पत्र में आगे यह भी उल्लेखित किया गया कि वन क्षेत्र में दो अन्य मचान पर भी टीम बैठाने का निर्णय लिया गया। प्रमुख वन संरक्षक वन्य जीव उप्र लखनऊ ने दिनांक 24 फरवरी 2009 को ही नबाब हैदराबाद शफत अली को खां को इस बाघ को मारने के लिए अधिकृत कर दिया गया। अपरान्ह 5:00 बजे बछिया के शव के पास के मचान पर नबाब शफत अली खां बैठे थे। उनके साथ चिडिय़ाघर लखनऊ के कर्मी कमाल को सर्चलाइट दिखाने के लिए बैठाया गया। दूसरे मचान पर डिप्टी रेंजर संजय श्रीवास्तव तथा उनके साथ सर्च लाइट दिखाने के लिए वन रक्षक मदन गोपाल बैठे थे। तीसरे मचान पर डब्ल्यूटीआई के डा. एके सिंह व डा0 प्रशान्त बोरो अपनी ट्रांक्यूलाइजिंग गन (मूर्छित या बेहोश करने वाली बन्दूक) के साथ बैठे थे। ताकि बाघ को सामने आने पर ट्रांक्यूलाइज (मूर्छित या बेहोश) किया जा सके। पाठकगण ध्यान दें कि पत्र मेें नबाब शफत अली खां के साथ अन्य वनकर्मी और अधिकारी अगल-बगल मचानों पर बैठे बताये जा रहे है। साथ ही तीसरे मचान पर डब्ल्यूटीआई के डा. एके सिंह व डा. प्रशांत बोरो को ट्रांक्यूलाइजिंग गन (मूर्छित या बेहोश करने वाली बन्दूक) के साथ बैठा हुआ दिखाया गया। अर्थात इससे स्पष्ट हो रहा है कि बाघ को मारने की प्राथमिकता नहीं थी बल्कि उसे मूर्छित कर पकडऩे की प्राथमिकता थी। यह बात सत्य भी है कि लिखित रूप में बीके पटनायक प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक उत्तर प्रदेश ने अपने पत्र संख्या 2469-दिनांक 6 फरवरी 2009 को यह निर्देश दिया था कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 11(1)(ए) के प्राविधानों के अंतर्गत प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए उक्त बाघ को ट्रांक्यूलाइज/ट्रैप कर पकडऩे के लिए वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया नई दिल्ली के वन्य जीव विशेषज्ञ प्रशांत बोरों को प्राधिकृत किया था। फिर ऐसी क्या आवश्यकता आ पड़ी कि आनन-फानन में प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव उप्र ने दिनांक 24 फरवरी 2009 को उक्त बाघ को मारने के लिए अधिकृत कर दिया ? अब सवाल यह उठता है कि प्रमुख वन संरक्षक उक्त बाघ की सुरक्षा करते-करते कैसे अचानक उसे मारने का निर्देश दे दिये ? क्या उन्होंने अपने दिनांक 6 फरवरी 2009 के उपरोक्त पत्र पर विचार नहीं किया कि जिसमें उन्होंने उक्त बाघ को ट्रांक्यूलाइज करके जिन्दा पकडऩे का निर्देश दिया था ? क्या उक्त बाघ को मारने का निर्देश देते वक्त प्रमुख वन संरक्षक को यह आभास नहीं हुआ कि उन्होंने वन्य संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 11(1)(ए) का उल्लंघन किया और संरक्षित वन्य जीव की हत्या का अपराध कारित किया है? इस पत्र में उपरोक्त के बाद यह भी उल्लेखित किया गया कि वन्य जीव प्रभागीय वनाधिकारी फैजाबाद ने क्षेत्रीय वनाधिकारी कुमारगंज एवं रूदौली को निर्देशित कर बकचुना रौदपुर वन मार्ग को सायंकाल 4 बजकर 30 बजे सीलकर आवागमन अवरूद्ध करावा दिया। ताकि ट्रैक्टर आदि के आवागमन से अभियान बाधित ना हो। वनक्षेत्र में दो पिंजड़े भी लगाये गये थे। अंधेरा होने तक डब्ल्यूटीआई के मचान पर बाघ नहीं आया। महेन्द्र सिंह मुख्य वन संरक्षक इको, प्रभागीय वनाधिकारी फैजाबाद, क्षेत्रीय वन अधिकारी कुमारगंज, डब्ल्यूटीआई के एके सिंह व डा. प्रशांत बोरो लगभग 300 मीटर की दूरी पर बकचुना वन चौकी पर बैठकर अभियान की सफलता की प्रतीक्षा करने लगे। पाठकगण अब ध्यान दें कि जब बाघ को ट्रांक्यूलाइज करने के लिए डल्यूटीआई के डा. एके सिंह व डा. प्रशांत बोरो अपनी ट्रांक्यूलाइज गन के साथ नबाब शफत अली की मचान के अगल-बगल स्थित मचान पर बैठे थे ताकि बाघ आये और उसे मूर्छित कर सके। मगर अचानक ऐसा क्या हो गया कि डल्यूटीआई के डा. एके सिंह व डा. प्रशांत बोरो 300 मीटर दूर बकचुना वन चौकी पर बैठकर अभियान की सफलता का इंतजार करने लगे ? जिस व्यक्ति के कंधे पर इस बात की जिम्मेदारी थी कि वह अपनी विशेषज्ञता से उक्त बाघ को मूर्छित करके पकड़ ले। मगर वही व्यक्ति बाघ की मौत का इंतजार करना लगा ? ये बात समझ से परे है। डा. प्रशांत बोरो और प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव की कार्यप्रणाली उनके स्वयं के उल्लेखित दस्तावेजों में ही संदिग्ध प्रतीत हो रही है। उक्त दस्तावेजों के अध्ययन मात्र से यह स्पष्ट होता है कि उक्त बाघ मानव जीवन के लिए नहीं बल्कि वन विभाग और नवाब शफत अली खां के नबाबी शौक उक्त बाघ के जीवन के लिए खतरा था। मगर अफसोस कि उस अनबोलते बाघ ने 10 साल बाद आज अपनी हत्या की कहानी चिल्ला-चिल्ला कर बयां करने के लिए लोगों को विवश कर दिया है। उक्त बाघ ने अपने हत्यारों के लोभ और उनकी दूषित मानसिकता और कार्यशैली का इतने दिन बाद भाण्डा फोड़ दिया कि कैसे एक व्यक्ति के शिकार के शौक को पूरा करने के लिए वन्यजीव प्रशासन ने इतनी बड़ी साजिश की। उपरोक्त के बाद इस पत्र में यह वर्णित किया गया कि अपरान्ह लगभग 6:40 बजे बाघ के बछिया के शव के पास आने का आभास बछिया के शव के पास मंडरा रहे घरेलु कुत्तों को हुआ। बाघ कुत्तों पर हल्का गुर्राया भी, जिससे कुत्ते भाग गये। इस गुर्राहट से मचान पर बैठे नबाब हैदराबाद शफत अली खां व कमाल सावधान हो गये। तभी कमाल को अपरान्ह 6:50 बजे बछिया के शव के पास बाघ के आने का एहसास हुआ। तुरन्त कमाल ने सर्चलाइट का प्रकाश बाघ के ऊपर डाला। नबाब शफत अली खां ने बिना कोई विलम्ब किये बाघ पर गोली दाग दी। बाघ रोशनी की तरफ झपटा, तब तक नबाब शफत अली खां ने बाघ पर दूसरी गोली दाग दी। बाघ पुन: झपट कर गिर गया। नबाब शफत अली खां ने तीसरी गोली बाघ के सिर में मार दी। इस गोली के बाद बाघ उठ नहीं सका। कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद बाघ की मृत्यु सुनिश्चित हो गई। पाठकगण ध्यान दे कि बाघ को ट्रांक्यूलाइजर गन से ट्रांक्यूलाइज नहीं किया गया और ना ही ट्रांक्यूलाइज करने का प्रयास किया गया। जबकि पत्र में उल्लेखित किया गया है कि नबाब शफत अली के बगल में तीसरे मचान पर डब्ल्यूटीआई के डा. एके सिंह व डा0 प्रशान्त बोरो अपनी ट्रांक्यूलाइजिंग गन (मूर्छित या बेहोश करने वाली बन्दूक) के साथ बैठे थे। जब तीसरे मचान पर डब्ल्यूटीआई के डा. एके सिंह व डा0 प्रशान्त बोरो अपनी ट्रांक्यूलाइजिंग गन लेकर बैठे थे तो उन्होंने क्यों नहीं बाघ को मूर्छित करने का प्रयास किया ? ऐसी क्या वजह थी कि नबाब शफत अली खां ने बाघ को गोली मार दी ? नबाब शफत अली खां को किस हैसियत से प्रमुख वन संरक्षक उत्तर प्रदेश ने बाघ को गोली मारने की इजाजत दी थी। जब बाघ को आराम से मूर्छित किया जा सकता था तो फिर उसे गोली क्यों मारी गई ? कही ऐसा तो नहीं कि प्रमुख वन संरक्षक ने एक तीर से दो निशाना किया हो ताकि नबाब शफत अली के नबाबी शौक के बदले मोटी कमाई भी मिल जाये और बाघ के खाल को भी अवैध तरीके से बेचकर मोटा धन प्राप्त हो जाये? पाठक ध्यान दें कि बाघ को आराम से मूर्छित करके पकड़ा जा सकता था। मगर धन लोभ के कारण प्रमुख संरक्षक वन्य जीव उत्तर प्रदेश, प्रभागीय वनाधिकारी फैजाबाद और क्षेत्रीय वन संरक्षक सरयू वृत्त फैजाबाद ने नबाब शफत अली खां के नबाबी शौक को पूरा करने के लिए उक्त संरक्षित वन्य जीव बाघ की हत्या करा दी। बाघ की इस हत्या को छिपाने के लिए वन्य जीव प्रशासन ने खूब कागजी घोड़े दौड़ाये। मगर अफसोस की वन्य जीव प्रशासन स्वयं के बुने गये कागजी दस्तावेजों के जाल में फंस गया। इस पत्र में आगे यह भी उल्लेखित किया गया कि बाघ के मारे जाने के बाद महेन्द्र सिंह मुख्य वन संरक्षक इको, ओपी सिंह प्रभागीय वनाधिकारी फैजाबाद, जावेद अख्तर उप प्रभागीय वनाधिकारी फैजाबाद व एपी यादव क्षेत्रीय वनाधिकारी कुमारगंज, थानाध्यक्ष खण्डासव व अन्य वनकर्मी मौके पर पहुंच गये। घटना स्थल का निरीक्षण किया गया व बाघ के शव का भी निरीक्षण किया गया। आसपास के गामीणों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। अत: बाघ के शव को उठवाकर कुमारगंज विश्रामगृह ले जाने का निर्णय लिया गया। तत्काल सरकारी कैम्पर पर बाघ के शव को सुरक्षित व सम्मानजनक रूप से रखकर कुमारगंज वन विश्रामगृह लाया गया। मौके पर वन संरक्षक सरयू फैजाबाद भी पहुंच गये। वन विश्राम गृह पर ग्रामीणों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। पाठकों को बता दें कि यह भीड़ इसलिए नहीं बढ़ रही थी कि लोग मरे हुए बाघ को देखने के लिए आ रहे है बल्कि यह भीड़ इसलिए बढ़ रही थी कि वन्य जीव प्रेमियों और वन्य जीव प्रेमी सामाजिक संगठनों ने इस संरक्षित वन्य जीव बाघ के मारे जाने का विरोध शुरू कर दिया था। यह विरोध इतना व्यापक हो गया था कि वन्य जीव प्रशासन और पुलिस प्रशासन को वन्य जीव प्रेमियों और वन्य जीव संरक्षण संस्थाओं की भीड़ के विरोध के दबाना मुश्किल हो गया था। इसी विरोध के स्वर को दबाने के लिए प्रभागीय वनाधिकारी फैजाबाद ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक फैजाबाद से अनुरोध कर पर्याप्त पुलिस बुलवा लिया था। प्रमुख वन संरक्षक वन्य जीव उप्र लखनऊ द्वारा इस बाघ के शव को पोस्टमार्टम के लिए आईपीआरआई बरेली भेजने का निर्देश दिया गया। प्रमुख वन संरक्षक वन्य जीव उप्र लखनऊ के निर्देश के क्रम में प्रभागीय वनाधिकारी फैजाबाद ने अपने पत्रांक मेमो/35-5 दिनांक 24 फरवरी 2009 के द्वारा क्षेत्रीय वन अधिकारी कुमारगंज के नेतृत्व में गठित टीम के साथ बाघ के शव को आईवीआरआई बरेली रात्रि 9:30 बजे भेज दिया गया। पाठकगण ध्यान दें कि बाघ के शव को बरेली तो भेज दिया और पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी तैयार कर दी गई। मगर अफसोस की पोस्टमार्टम के बाद बाघ के मृत शव का क्या किया गया और उसके शव से उतारी गई खाल का क्या हुआ है ? यह सवाल सुनते ही सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश वन्य जीव संरक्षण विभाग और नबाब शफत अली का नबाबी शौक काफूर हो जाता है। पोस्टमार्टम के बाद बाघ के मृत शव का क्या किया गया और उसके शव से उतारी गई खाल का क्या हुआ है ? समाचार पत्र में स्थान के अभाव के कारण इसका पर्दाफाश आगामी अंको में क्रमवार जारी रहेगा। 

नबाब के नबाबी शौक को पूरा करने के लिए वन्यजीव संरक्षण विभाग ने की बाघ की हत्या

पाठक ध्यान दे कि उप्र वन्यजीव विभाग उत्तर प्रदेश ने फैजाबाद के कुमारगंज रेंज में बाघ की हत्या हैदराबाद के नबाब के नबाबी शौक को पूरा कराने के लिए कराया था। जबकि वन्यजीव प्रशासन ने यह तर्क दिया कि उक्त बाघ मानव जीवन के लिए हानिकारक था। यदि उक्त बाघ मानव जीवन के लिए हानिकारक था तो फिर तो स्थानीय नागरिकों ने बाघ के मारें जाने का विरोध क्यों किया ? क्यों वन्यजीव संरक्षण संस्थाओं ने वन्यजीव संरक्षण विभाग उत्तर प्रदेश और नबाब हैदराबाद शफत अली खां के द्वारा किये गये शिकार का विरोध किया ? क्या इन संस्थाओं और आम नागरिकों को मानव जीवन की सुरक्षा की चिन्ता नहीं थी कि वन्यजीव प्रशासन के इस फैसले का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया ? आम नागरिकों और वन्यजीव संरक्षण संस्थाओं के इस विरोध ने स्पष्ट कर दिया कि उक्त बाघ मानव जीवन के लिए खतरा नहीं था। जाहिर सी बात है कि उक्त बाघ की हत्या वन्यजीव प्रशासन ने अनैतिक रूप से कमाई करने के लिए हैदराबाद के नबाब शफत अली खां से साठगांठ किया। ताकि उनके नबाबी शौक को पूरा करके मोटी आमदनी की जा सके। इसलिए वन विभाग ने उक्त बाघ को मानव जीवन के लिए खतरा बताया और उसे मूर्छित करके जिन्दा पकडऩे का निर्देश दिया। कागजों में बाघ को जिन्दा पकडऩे का निर्देश दिया गया है। मगर जब तक उसको मारा नहीं जाता तो कैसे नबाब शफत अली खां की वीरता का परचम फहरता और उनका नबाबी शौक पूरा होता ? यदि बाघ को मारा नहीं जाता तो कैसे उसकी खाल को उतार अंतर्राष्ट्रीय बाजार में मोटी कीमत में बेचा जाता ? इसीलिए वन्यजीव प्रशासन ने बाघ को मूर्छित करने के अपने लिखित पत्र की परवाह नहीं कि और उसने हैदराबाद के नबाब शफत अली खां को बाघ की हत्या करने की खुली छूट दे दी। 

 

किस हैसियत से एक स्पोर्टस शूटर को वन्यजीव की हत्या की दी गई इजाजत ?

पाठकों को बता दें कि नवाब शफत अली खां और उनका पुत्र असगर अली खां ये दोनों स्वयं को राष्ट्रीय राइफल संघ का प्रसिद्ध निशानेबाज मानते है। मगर दोनों पिता-पुत्र निशानेबाजी की आड़ में वन्यजीवों का शिकार करते है। अक्सर कई राज्यों से यह देखने और सुनने को मिला कि हैदराबाद के नवाब शफत अली खां और उनके पुत्र असगर अली खां ने खूंखार बाघ का शिकार किया। पाठकों को स्पष्टï कर दें कि नबाब का नबाबी शौक सिर्फ बाघों को मारकर ही शांत होता है। अजीबगरीब बात यह है कि भारत के अक्सर राज्यों के प्रमुख वन्यजीव संरक्षकों द्वारा बाघों को मूर्छित कर पकड़वाने का निर्देश जारी किया जाता है। मगर बाघों को पकड़वाने के नाम पर हमेशा हैदराबाद के नबाब शफत अली खां और उनके पुत्र असगर अली खां से बाघों की हत्या करा दी जाती है। आखिर क्या बात है कि हैदराबाद के नबाब से ही सभी राज्यों के प्रमुख वन संरक्षकों द्वारा बाघों को पकड़वाने के नाम पर बाघों की हत्या करा दी जाती है। क्या हैदराबाद के नबाब वन्यजीव संरक्षण विभाग के अधिकारी या कर्मचारी या कुछ अन्य पदों की जिम्मेदारी देखते है? यदि हां तो इसकी जानकारी वन्यजीव संरक्षण विभाग के अधिकारियों द्वारा वर्णित क्यों नहीं किया जाता है ? पाठकों को बता दें कि प्रत्येक राज्यों में मारें गये खूंखार बाघों का पोस्टमार्टम तो किया जाता है मगर उसकी खाल और उसका शव गायब हो जाता है। कही भी बाघ के शव और उसकी खाल की जानकारी नहीं दी जाती है। क्योंकि बाघों की हत्या इसलिए करायी जाती है कि ताकि उसके खालों की तस्करी करायी जा सके। 

वन विभाग हर बार क्यों हैदराबाद के नबाब शफत अली खां को ही आमंत्रित करता है ? 

वन्यजीव विभाग हमेशा बाघों को मारने के अभियान में क्यों हैदराबाद के नबाब शफत अली खां को ही आमंत्रित करता है ? यह एक गंभीर जांच का विषय है। प्रत्येक अभियान में क्यों सिर्फ शफत अली खां ही बाघों को मारते है ? क्या वन्यजीव संरक्षण विभाग हर बार बाघों को ट्रांक्यूलाइज करने में असफल हो जाता है कि नबाब शफत अली खां  को बाघों को गोली मारने के लिए विवश होना पड़ता है। क्या वन्य  जीव संरक्षण विभाग के वन रक्षक और विशेषज्ञ इतने अक्षम है कि वे हर बार विफल हो जाते है कि अभियान सफल बनाने के लिए हैदराबाद के नबाब शफत अली खां को आमंत्रित करना पड़ता है ? कई साक्षात्कारों में नबाब शफत अली खां द्वारा यही दावा किया गया है। आखिर क्या कारण है कि इन साक्षात्कारों में वन्य जीव संरक्षण विभाग को अक्षम बताने वाले हैदराबाद के नबाब शफत अली खां को वन्यजीव प्रशासन बर्दाश्त करता है ? कही सचमुच में तो नहीं वन्यजीव संरक्षण विभाग अक्षम है ? जिसकी वजह से खामोश है। 

आखिर कौन है शफत अली खां ? 

शफत अली खां के पूर्वज शिकारी थे। शफत अली खां ने वर्ष 1963 में 10 वर्ष की आयु में एक चित्तीदार हिरण को गोली मार दिया था। मगर इस तथ्य पर ध्यान दिये बगैर कि भारतीय हथियार अधिनियम 1959 के अनुसार हथियार को संभालने के लिए कानूनी आयु 12 वर्ष होती है। उन्हें इसके लिए राज्यपाल द्वारा पुरस्कृत कर दिया गया। उस वक्त राज्यपाल ने भी यह विचार नहीं किया कि जीवन को मारना खेल नहीं  है बल्कि यह शिकारी के लिए अपने शिकार की इच्छा को तृप्त करने का माध्यम होता है। इन्हें कई बार नक्सलियों और माओवादी नेताओं को हथियार की आपूर्ति करने के आरोप में गिरफ्तार भी किया था। मगर ऊंची रसूख के दम पर शफत अली खां बरी हो गया। शेष जानकारी अगले अंक में उल्लेखित की जायेगी। 

 

 

 

23
April

“अंतिम-आदमी” के साथ अमानवीय व्यवहार, व्यवस्था की जीवन शैली बन चुका है: विजय कुमार पाण्डेय

लखनऊ। सेना कोर्ट लखनऊ ने 16 वर्ष से लापता सैनिक की पत्नी को एक लाख रुपए जुर्माने के साथ पेंशन देते हुए जिम्मेदार अधिकारी की तनख्वाह से जुर्माने की राशि काटने का आदेश सुनाया है। गौरतलब हो कि श्रीमती बिट्टन देवी के पति गनर राजेश कुमार आर्टिलरी रेजिमेंट में 11 अगस्त 1995 को भर्ती हुए थे। 5 मार्च 2003 को आर्टिलरी स्कूल देवलाली से पीड़िता के पति सेना की डियूटी से लापता हो गए और उन्हें तीन साल बाद 20 अप्रैल 2006 को भगोड़ा घोषित करके सेना की धारा 20 (3) के तहत सेना से बर्खास्त कर दिया गया। श्रीमती बिट्टन देवी ने सेना के जिम्मेदार अधिकारियों को कई पत्र दिया गया था। मगर कोई कार्यवाही न होते देख अपने पति की गुमशुदगी की रिपोर्ट 13 अगस्त 2006 को फर्रुखाबाद जिले के कायमगंज थाने में दर्ज कराई।

12
April

शिकायत करने पर ग्राम प्रधान मिलन भाष्कर शिकायतकर्ताओं को देता है धमकी

मैनफोर्स

बहराइच। जनपद बहराइच में पीएम आवास के नाम पर ग्राम प्रधानों द्वारा खुलेआम लूट मचायी जा रही है। मगर उसके बावजूद भी जिम्मेदारों द्वारा इस अंधेरगर्दी पर लगाम नहीं लगाया जा रहा है। ग्राम प्रधानों द्वारा पैसे लेने के बाद भी लोगों को पीएम आवास का लाभ मुहैया नहीं कराया जा रहा है। इस अंधेरगर्दी की एक छोटा सा नमूना मैनफोर्स समाचार पत्र आपको जनपद बहराइच के ग्राम टिकुलियां, ब्लॉक फखरपुर, जनपद बहराइच का दिखाने का प्रयास कर रहा है। आपको को बता दें कि टिकुलियां, सिरौली आदि गांव ग्राम प्रधान मिलन भाष्कर के ग्राम पंचायत क्षेत्र में आता है।