03
April

मैनफोर्स

लखनऊ। उप्र के बिजनौर का अफ जलगढ़ विकासखंड राष्ट्रीय फलक पर तो चमका लेकिन यह चमक फीकी साबित हुई। अमरोहा के जोया और धनौरा में भी यही स्थिति मिली। यहां अनेक गरीब परिवार अब भी आवास को तरस रहे हैं। उप्र के इन विकासखंडों को प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया है। प्रधानमंत्री आवास योजना यानी 2022 तक हर परिवार को पक्का मकान। जनवरी 1996 से चली आ रही इंदिरा आवास योजना को दुरुस्त कर 01 अप्रैल, 2016 को नया नाम दे दिया गया। प्रधानमंत्री आवास योजना। प्रथम चरण के तहत 2016—17 से 2018-19 तक प्रारंभिक तीन वर्ष में देश के एक करोड़ वंचित परिवारों को पक्का मकान मुहैया कराने का लक्ष्य रखा गया। इस समय सीमा की समाप्ति में अब महज छह माह का समय शेष है। बीते दिनों केंद्रीय ग्र्रामीण विकास मंत्रालय ने आवास योजना सहित ग्रामीण विकास की अन्य योजनाओं में बेहतर प्रदर्शन के आधार पर उत्तर प्रदेश को सर्वाधिक 12 राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा। सात पुरस्कारों के साथ छत्तीसगढ़ दूसरे स्थान पर रहा। यूपी के दो जिलों और पांच विकासखंडों को पुरस्कार हासिल हुआ। राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल करने वाले बिजनौर के अफ जलगढ़, कासमपुर गढ़ी विकासखंड ने कोई अलग करिश्मा नहीं किया है। केवल प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण को लागू करने में तत्परता दिखाई। इसी तरह अमरोहा के जोया और धनौरा ब्लॉक में ऑनलाइन फीडिंग का काम तत्परता से किया गया। इसे ही पुरस्कार का आधार बनाया गया न कि आवास की उपलब्धता को। आंकड़ों में अब इन विकासखंडों में कोई गरीब बेघर नहीं है। मगर हकीकत यह है कि बारिश से धराशायी दर्जनों कच्चे मकानों में गरीब परिवारों को अब पन्नी का सहारा है। कई के पास तो यह भी नहीं है। 76 ग्राम पंचायतों वाले अफ जलगढ़ ब्लॉक में लक्ष्य महज 30 आवासों का ही था। लिहाजा समय से पूरा कर लिया गया। पहले वर्ष 16.17 में तो मात्र तीन आवासों का ही लक्ष्य थाए जबकि वर्ष 17.18 में 27 आवास स्वीकृत किए गए। चालू वर्ष में ब्लॉक का लक्ष्य शून्य है। जबकि ग्राम पंचायत आसफाबाद चमन में ओमप्रकाश, अशोक, फूल सिंह, बिजेंद्र आदि अनेक लोग आवास की राह देख रहे हैं। ग्राम प्रधान सुधा देवी का कहना है कि पात्रों की सूची ब्लॉक को दे दी है। अमरोहा जिले के जोया विकास खंड ने वित्तीय वर्ष 2016.17 और 2017.18 में प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत केवल 9 ही आवास बनाए हैं। इसी तरह धनौरा में 21 आवास दो साल में बनाए गए हैं। मौजूदा वित्तीय वर्ष में भी 32 आवास का लक्ष्य आया था, लेकिन अधिकारियों ने इसको वापस यह कहते हुए भेज दिया कि जिले में अब कोई पात्र लाभार्थी नहीं है, सर्वे कराया जा रहा है। सचाई यह है कि आज भी कई पात्र परिवार आवास को तरस रहे हैं। ग्राम्य विकास विभाग उ.प्र. के आधिकारिक पोर्टल में सितंबर के दूसरे सप्ताह में जारी की गई प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण की भौतिक प्रगति रिपोर्ट 2016-17, 2017—18 एवं 2018—19 के लक्ष्य के सापेक्ष में यह कहीं भी दर्ज नहीं है कि कुल कितने आवास बनकर तैयार हो गए। प्रथम किस्त जारी कर देने को ही प्रगति का पैमाना दर्शा दिया गया है। इस प्रगति रिपोर्ट के अनुसार उक्त अवधि में उ.प्र. में कुल 11 लाख 71 हजार 852 आवासों का लक्ष्य था। इनमें से 10 लाख 83 हजार 118 स्वीकृत हुए। जबकि 10 लाख 70 हजार 294 लाभार्थियों को प्रथम किस्त की राशि प्रदान कर दी गई। प्रथम किस्त प्राप्त लाभार्थियों का प्रतिशत 91.33 रहा। सूची में पहले और दूसरे नंबर पर दर्ज संत कबीर नगर और रामपुर जिले ने तो 100 प्रतिशत का आंकड़ा भी पार कर दिया है। यहां प्रथम किस्त प्राप्त लाभार्थियों का प्रतिशत क्रमश 100.88 और 100.31 है। संत कबीर नगर में 13 हजार 996 आवास का लक्ष्य था, जबकि 14 हजार 175 आवास स्वीकृत हुए। रामपुर में 2572 आवास का लक्ष्य था, 2559 आवास स्वीकृत हुए। जबकि 2580 लाभार्थियों को प्रथम किस्त जारी की गई। यानी स्वीकृति हुई 2559 की और किस्त जारी कर दी गई 2580 अर्थात 100.31 प्रतिशत हो गया । गौतम बुद्ध नगर और बागपत में सभी आंकड़े शून्य के रूप में दर्ज हैं यानी यहां योजना लागू ही नहीं हुई। उप्र में 8.85 लाख पक्के मकान बनाए जा चुके हैैं। जबकि अक्टूबर तक यह संख्या 11 लाख को पार कर जाएगी। यह देश में किसी भी राज्य के मुकाबले सबसे अधिक है। उप्र ग्रसम्य विकास विभाग को पहली बार राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है।

पात्रता सूची में नाम फिर भी नहीं मिला आवास

सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाये गरीब पात्र परिवारों को न देकर अपात्रो को दिए जाते है। पात्रता सूची में नाम होने के बाद भी गरीब परिवारों को आवास नहीं मिल पा रहा है। ऐसा ही एक मामला प्रकाश में आया है। जहां निगोहा नगराम में नगर पंचायत नगराम में रहने वाला एक परिवार बदनसीबी का दंश झेल रहा है। प्रधानमंत्री आवास योजना मेंं नाम होने के बावजूद अब तक प्रधानमंत्री आवास नहीं मिला। नगर पंचायत नगराम के रहने वाले अशोक कुमार पुत्र गुरु प्रसाद वार्ड नंबर 10 में रहते हैं। उनका कहना है की उनका नाम प्रधानमंत्री आवास योजना में है। मगर उन्हें अब तक प्रधानमंत्री आवास नहीं नसीब हुआ। अशोक कुमार ने बताया कि कई बार प्रधानमंत्री आवास योजना का आवेदन किया। इसके लिए वे नगराम टाउन एरिया के कार्यालय गये। मगर उन्हें वहां के कर्मचारियों ने दुत्कार कर भगा दिया गया और उन्हें सरकारी आवास से वंचित रखा गया। अशोक कुमार के छोटे.छोटे चार बच्चे हैं। जिनका भरण पोषण कर छप्पर के नीचे रहने को मजबूर है। अशोक कुमार ने बताया बीते 31 अक्टूबर 2016 को उनकी 8 व 9 वर्षीय दो मासूम बेटियों के साथ पड़ोस के एक मुस्लिम युवक ने अपनी हवस का शिकार बना डाला था। जिसकी शिकायत पीडि़ता ने नगराम थाने में की थी। मगर आरोपी चेयरमैन प्रतिनिधि के करीबी होने के कारण नगराम थाने में कोई सुनवाई नहीं हुई थी। जिसके कारण पीडि़ता ने लखनऊ विधानसभा गेट नंबर 3 के सामने पूरे परिवार के साथ आत्महत्या का प्रयास किया था तो वहां पर मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने दौड़कर पीडि़त परिवार की जान बचाई थी। उसके बाद सकते में आए प्रशासन ने दुष्कर्म के आरोपी को पकड़कर पास्को एक्ट के तहत जेल भेज दिया था। उसके बाद से लगातार पीडि़त परिवार को समझौता कराने के लिए जान मान की धमकी देकर दबाव बनाया जा रहा था। पीडि़ता के समझौता ना करने पर नगराम चेयरमैन प्रतिनिधि द्वारा उसे सरकारी योजनाओं से वंचित रखा जा रहा है। बदनसीब पीडि़त परिवार का नाम प्रधानमंत्री आवास योजना में होने के बावजूद भी अब तक नहीं दिया गया सरकारी आवास बदनसीब छोटे—छोटे बच्चों को झेलना पड़ रहा है।

 

 

 

01
April

अपर संचालक चकबंदी प्राविधिक अधिकारी कम भूमाफिया ज्यादा

लोगों की भूमि के रकबों में हेरफेर करने, ट्रांसफर पोस्टिंग कराने, मुआवजे की रकम में बंदरबांट करने, स्टाम्प चोरी कराने का माहिर खिलाड़ी

मैनफोर्स

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में किस प्रकार से भ्रष्टाचार होता है। इसका एक छोटा सा उदाहरण उत्तर प्रदेश चकबंदी विभाग में देखने को मिल रहा है। यहां खुलेआम कैसे अपर संचालक चकबंदी प्राविधिक सुरेश सिंह यादव ने सरकारी धन के बंदरबांट खेल खेला है और कैसे जांच के बाद भी इस भ्रष्ट अधिकरी पर कार्यवाही नहीं होती हैं। इसका  खुलासा स्वयं चकबंदी विभाग के एक पूर्व जांच अधिकारी डा. पुनीत शुक्ला ने किया है। पाठकों को बता दें कि डा. पुनीत शुक्ल चकबंदी विभाग में वर्ष 2017 में उप संचालक चकबंदी प्रशासन के पद पर कार्यरत थे। उनके पास पूरे प्रदेश का स्टेबलिसमेन्ट, एसओसी, सीओएसी आदि का कार्य था। डा. पुनीत ने बताया कि शासन के समक्ष एक शिकायत पत्र श्री राजमन सचिव अनुज जन सेवा संस्थान इलाहाबाद ने नोयडा के भूमि घोटालों के संबंध में दिया था। जिसके संबंध में शासन के राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव रंजन कुमार, संयुक्त सचिव राजस्व जय प्रकाश तिवारी, अनुसचिव संजय कुमार दुबे के पत्र के माध्यम से अलग-अलग जांचें विभाग के पास आई थी। जिसके संबंध में चकबंदी आयुक्त द्वारा कमीशनर मेरठ को जांच कराने के लिए पत्र भेजा गया था। कमीशनर मेरठ ने इस मामले की जांच एडीएम नोयडा  कुमार विनीत को सौंप दी। जब एडीएम नोयडा कुमार विनीत की जांच लखनऊ आई तो तत्कालीन चकबंदी आयुक्त/प्रमुख सचिव राजस्व रजनीश दुबे ने उक्त जांच को संयुक्त रूप से उप संचालक चकबंदी प्रशासन डा. पुनीत शुक्ला और संयुक्त संचालक चकबंदी प्रशासन डा. एसके भट्ट को सौंपी। डा. पुनीत शुक्ला ने बताया कि उन्होंने जांच में पाया कि नोयडा में एक गांव है जमालपुर दनकौर जहां बहुत बड़ा घोटाल हुआ है। यह घोटाला चकबंदी विभाग के उन अधिकारियों ने किया है जो वर्ष 2005 से पूर्व तैनात थे। वर्ष 1997-98 में सुरेश सिंह यादव जो वर्तमान में अपर संचालक चकबंदी प्राविधिक के पद पर तैनात है वे उक्त समय वहां चकबंदी विभाग में बंदोबस्त अधिकारी के पद पर कार्यरत थे। बतौर बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी सुरेश यादव ने ग्राम दनकौर के प्रेम चन्द्र शर्मा के मामले में व्यापक भ्रष्टाचार का खेल खेला। उक्त गांव में गाटा संख्या 1104 की भूमि असंक्रमणीय थी। जिसका क्षेत्रफल चार बीघा चौदह बिस्वा पक्का था। उक्त जमीन करीब 10 हजार वर्ग मीटर से अधिक थी। उक्त भूमि असंक्रमणीय थी, जिसकी फाइल बतौर बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी सुरेश सिंह यादव के पास थी। उक्त भूमि के पट्टे के संबंध में बताया जाता है कि वर्ष 1996 में राजस्व परिषद ने निरस्त कर दिया था। इससे पूर्व उक्त भूमि के पट्टे को 1970 में एसडीएम ने निरस्त किया था। उसके बाद अपर आयुक्त मेरठ ने भी निरस्त किया था। उक्त भूमि की निगरानी राजस्व परिषद की थी। अंतिम रूप से राजस्व परिषद ने भी उक्त भूमि के पट्टे को निरस्त कर दिया था। मगर उसके बावजूद भी सुरेश सिंह यादव ने समझौते के आधार पर बिना किसी बैनामे के व्यापक पैमाने पर दुरभि संधि करके न केवल स्टाम्प चोरी करके राजस्व चोरी की बल्कि बाहरी जनपद के निवासी प्रेम सिंह आदि को उक्त भूमि आंतरण स्वत्र कर दिया। उक्त भूमि का क्षेत्र यमुना एक्सप्रेस वे इंडस्ट्रीयल डेवलेपमेन्ट अथारिटी के अधिग्रहण वाले क्षेत्र के पास है। जब सुरेश सिंह यादव ने बतौर बंदोबस्त चकबंदी अधिकारी उक्त जमीन को इन लोगों को नाम कर दी। जब यमुना एक्सप्रेस वे इंडस्ट्रीयल डेवलपमेन्ट अथारिटी ने उक्त भूमि अधिग्रहीत की तो इन लोगों ने अधिग्रहण के नाम पर मोटा मुआवजा अर्जित किया।

बिना स्टाम्प के असंक्रमणीय भूमि का करा दिया बैनामा

भूमि स्वामीत्व संबंधी कानून के तहत रजिस्ट्रीकरण अधिनियम 1908 की धारा 17-1बी के प्राविधान में कोई भी जीवित व्यक्ति कृषि भूमि बिना बैनामा रजिस्ट्रीकरण ड्यूली स्टाम्प समय प्रूफ स्टाम्प के हस्तानांतरित नहीं कर सकता है। यह एक अपराधिक कृत्य है। जिसे बतौर बंदोबस्त चकबंदी अधिकारी के रूप में सुरेश सिंह यादव ने दुरभि संधि करके किया और कराया है। यह कृत्य भारतीय दंड संहिता के अनुसार अपराधिक कृत्य है। बतौर बंदोबस्त चकबंदी अधिकारी के रूप में सुरेश सिंह यादव पर भ्रष्टाचार का दूसरा आरोप है कि ये आदर्श खालसा संयुक्त सहकारी समिति लिमिटेड बादौली बांगर से संयुक्त रूप से दुरभि संघि करके करोड़ों रूपये की जमीनों का वारा न्यारा कर दिया था। इस संस्था ने जमीने कम खरीदी थी। मगर सुरेश सिंह यादव ने इस संस्था की जमीनों का रकबा बढ़ाकर भ्रष्टाचार का जघन्य अपराध किया है। जबकि चकबंदी अधिनियम के सेक्सन 19 ए में यह प्राविधान है कि जब चक का हम विनियम लगाते है तो हम 25 प्रतिशत से अधिक या कम हम किसी की जमीन को नहीं बढ़ाते है। मगर इस संस्था की भी जमीनों का रकबा बढ़ाया गया। इसी प्रकार एक चिमटा नाम के व्यक्ति के चक की जमीन का मामला था। जिसकी चक की जमीन का रकबा इन्होंने काफी बढ़ाया था। इस जमीन की भी जो फाइल थी। उसमें इसकी जमीन की भूमि की संक्रमणीय होने की कोई भी खतौनी का नकल नहीं था। जबकि चकबंदी अधिकारी का जो जजमेन्ट था उसमें साफ उल्लेखित था कि उक्त भूमि असंक्रमणीय है। बतौर बंदोबस्त चकबंदी अधिकारी के रूप में सुरेश सिंह यादव ने ऐसे लोगों को जमीनों का बैनामा कर दिया जिनके पट्टे राजस्व विभाग से निरस्त हो चुके थे। ऐसे लोगों ने इन्होंने कान्टीन्यूट खतौनी में टाईटील दिया। बिना किसी बैनामे दर्ज किया। इन्होंने चकबंदी प्रक्रिया समाप्त होने के बाद यह कहकर कि पुरानी जमीनों के बैनामें के रेखांकन में रकबा ज्यादा था। इन्होंने 6 बीघा की जमीन को 16 बीघा कर दिया। इन्होंने मौके पर जमीन का मुआयना भी नहीं किया। बिना मौका मुआयना किये जमीनों का रकबा बढ़ाना कानून गलत है। बिना मौका मुआयना किये 6 बीघा की जमीन को 16 बीघा नहीं कर सकते है। ये सब जमीनें भी इस लिए बढ़ाई गई कि दस्तावेजों में जमीनों का क्षेत्रफल बढ़ जाये। दस्तावेजों में क्षेत्रफल बढ़ाकर उक्त जमीन के बदला उतना ही अधिक मुआवजा दिलाया जा सके। वर्ष 2017 तक सरकार ने करीब 34 करोड़ रूपया मुआवजे की रकम की रिकवरी का आदेश दिया था। डीएम भू अध्याप्ति नोयडा और डीएम ने करीब 3 करोड़ रूपये की रिकवरी भी की थी। इस पूरे मामले की जब डा. पुनीत शुक्ला ने जांच की तो 6 गंभीर भ्रष्टाचार के कृत्यों में बतौर बंदोबस्त चकबंदी अधिकारी के रूप में सुरेश सिंह यादव दोषी पाये गये थे। बंदोबस्त चकबंदी अधिकारी सुरेश सिंह यादव की भ्रष्ट कार्यशैली की जांच रिपोर्ट को चकबंदी आयुक्त रजनीश दुबे ने शासन  को सौंपी। शासन ने इस संबंध में एक उन्हें चार्जशीट दी। चार्जशीट की जांच आईएएस अधिकारी कामती रतन चौहान ने की। कामती रतन चौहान ने आख्या लगाकर करीब 6 माह पूर्व फाइल शासन को भेज दी थी। शासन से फाइल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पास गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ही अधीन वर्तमान में राजस्व विभाग है। मुख्यमंत्री को ही इस मामले में दंड का निर्धारण करना है। मगर जिन अधिकारियों के नियुक्ति अधिकारी राज्य सरकार होते है। उन अधिकारियों के दंड का परामर्श देने का जो कानून है वो उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग के परामर्श के उपरान्त ही दिया जाता है। मुख्यमंत्री ने जो सुरेश सिंह यादव की भ्रष्ट कार्यशैली से संबंधित जो दंड का निर्णय लिया है, उससे संबंधित फाइल लोक सेवा आयोग के समक्ष दंड के संबंध में परामर्श देने के लिए भेजा गया है। करीब चाह माह हो गये है। मगर अभी तक लोक सेवा आयोग द्वारा सुरेश सिंह यादव की भ्रष्ट कार्यशैली के संबंध में मुख्यमंत्री को दंड के संबंध में किसी भी प्रकार का परामर्श नहीं दिया गया है। एक अधिकारी भ्रष्टाचार के कृत्य में दोषी पाया गया है। मगर उसके बावजूद भी उसके गंभीर कृत्यों की सजा देने में सरकार और उसके नुमाइन्दें आनाकानी कर रहे है। इससे भाजपा सरकार के सुशासन की नीति और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्यवाही किये जाने वाले थोथले दावों की हकीकत को बखूबी से समझा जा सकता है।

भ्रष्टाचार के मामले में सुरेश सिंह यादव पर दर्ज है एफआईआर

तत्कालीन चकबंदी अधिकारी ने सुरेश यादव पर वर्ष 2013 में थाना दनकौर जिला गौतमबुद्धनगर में मुकदमा संख्या 266 दर्ज कराया गया था। जिसके तहत आईपीसी की धारा 220 ई, 219,  409, 420, 466, 467, 468, 471 दर्ज कर विवेचना की गई। इस मामले की विवेचना क्राईम ब्रांच गौतमबुद्धनगर के इंसपेक्टर जगत सिंह शर्मा ने की थी। इंसपेक्टर जगत सिंह शर्मा ने अपनी विवेचना आरआर पपत्र 016 में जो उल्लेखित किया। उसमें उन्होंने वर्ष 1990 के जो चकबंदी अधिकारी थे। जिन्होंने गलत आदेश किया था। उनका नाम तो लिख दिया। इस मामले में उन्होंने तमाम अधिकारियों और कास्तकारों पर भी कोर्ट में आरोप पत्र दायर किया है। मगर इंस्पेक्टर जगत सिंह शर्मा ने सुरेश सिंह यादव पर मेहरबानी दिखाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा है। उन्होंने सुरेश सिंह यादव के बारें में अपनी विवेचना के पृष्ठों  में मेहरबानी दिखाई। इसी प्रकार उन्होनें अपनी विवेचना के पृष्ठ संख्या 595788-ए ,595789, 595778 में यह उल्लेखित किया कि सुरेश सिंह यादव के हस्ताक्षर अपठनीय है। बाद में नाम तलाशा जाये आदि शब्द उल्लेखित कर सुरेश सिंह यादव पर मेहबरबानी बनाने का हर संभव प्रयास करते रहे है। अंतिम विवेचना रिपोर्ट में इंसपेक्टर महोदय ने सुरेश सिंह यादव को क्लीनचीट दे दिया। 

आरोप सिद्ध होने के बाद भी सुरेश यादव पर  बरकरार

चकबंदी विभाग के पूर्व बंदोबस्त अधिकारी और वर्तमान अपर संचालक चकबंदी प्राविधिक सुुरेश सिंह यादव पर भ्रष्टाचार कारित करने का आरोप साबित होने के बाद भी आज तक उन पर कार्यवाही नहीं हुई। वे आज भी अपने पद पर बरकरार है। आज भी सुरेश सिंह यादव चकबंदी विभाग के महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर रहे हैं। जिन जांच अधिकारियों ने दोषारोपण किया और दोष सिद्ध किया उनकी जांच रिपोर्ट अभी भी धूल खा रही है। जिसका विवरण मैनफोर्स समाचार पत्र ने उपरोक्त कथनों में किया है। सुरेश सिंह यादव पर यूं तो कई मामलों में जांच लम्बित है। मगर मुख्य रूप से इन्हें भ्रष्टाचार के उन 6 मामलों में दोषी करार दिया गया है। जिन मामलों में उन्होंने भ्रष्टाचार के कृत्य को बतौर बंदोबस्त चकबंदी अधिकारी के रूप में कारित किया था। कई सारे दोषारोपण किए गए, जिसकी जांच भी हुई और जांच अधिकारियों ने अपनी जांच रिपोर्ट को चकबंदी आयुक्त को इस आशय के साथ सौंपा कि इस मामले में सुरेश सिंह यादव को दण्डित किया जायेगा। मगर आज तक इन पर कार्यवाही तो दूर की बात है। इसके विपरीत इन्हें महत्तपूर्ण पदों पर आसिन कर विभाग के आलाधिकारियों ने इन्हें भारी भ्रष्टाचार के कृत्य को करने की आजादी दे दी। यदि ऐसा नहीं है तो अब तक सुरेश सिंह यादव को उपरोक्त मामलों में दोषी पाये जाने पर दण्डित किया जा चुका होता। आज भी सुरेश सिंह यादव अति महत्वपूर्ण पद पर कार्य कर रहे है और अपने ही नियम कानून से विभाग को चला रहे है। वर्ष 2017 में सुरेश सिंह यादव की कार्यप्रणाली की जांच करने वाले कई अधिकारी सेवानिवृत्त हो चुके है। मगर अभी तक भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी करार दिये गये अपर संचालक चकबंदी प्राविधिक सुरेश सिंह यादव अपने पद पर विराजमान है। इनके खिलाफ कई शिकायतें हुई। शिकायतों में उनकी कार्यप्रणाली को लेकर कई गंभीर आरोप भी लगे। मगर आज तक सुरेश सिंह यादव का बाल बांका नहीं हुआ। शिकायकर्ताओं में कई विधायकों के साथ-साथ पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री ओमप्रकाश राजभर और अध्यक्ष राजस्व परिषद आईएएस प्रवीण कुमार द्वारा भी तथ्यात्मक साक्ष्यों के आधार पर जांच कराने का निर्देश दिया गया था। मगर आज तक सुरेश सिंह यादव के खिलाफ भाजपा सरकार ने कोई कार्यवाही नहीं की। सुरेश सिंह यादव के भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा सरकार की खामोशी यह स्वत: बयान कर रही है कि सरकार कितनी भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के प्रति कार्यवाही करने के लिए संवेदनशील है। 

सरकारी जमीन कब्जाने के आरोप में भी सुरेश सिंह यादव निलंबित 

भ्रष्टाचार और अनुशासनहीता के आरोप में चकबंदी विभाग में पूर्व में जहां तीन अधिकारी निलंबित हुए वहीं एक अधिकारी को पदावनत कर दिया गया। निलंबित होने वालों अधिकारियों की सूची में एक नाम पर अपर संचालक चकबंदी सुरेश सिंह यादव का भी था। जबकि अन्य में इलाहाबाद के उप संचालक चकबंदी रमाकांत शुक्ला, कुशीनगर के बंदाबेस्त अधिकारी विजय कुमार के नाम शामिल हैं। बिजनौर के चकबंदी अधिकारी राजेश कुमार देवरार को पदावनत किया गया था। प्रमुख सचिव राजस्व और चकबंदी रजनीश दुबे ने सुरेश सिंह यादव के निलंबन के दौरान यह बताया कि सुरेश सिंह यादव ने बुलंदशहर में  और दनकौर में तैनाती के दौरान बड़े पैमाने पर सरकारी जमीन कब्जाने के लिए विधि विरुद्ध आदेश पारित किया था। इसकी जांच का जिम्मा आईजी स्टांप कामिनी रतन चौहान को दिया गया। सुरेश सिंह यादव पर आरोप साबित भी हुआ और उनका निलंबन भी हुआ। यहां तक बात समझ में आती है। मगर बहाली की बात आलाधिकारियों की निष्ठा और सरकारी अधिकारियों पर दण्डात्मक निर्णय पर सवालियां निशान लगा रही है।

तबादला निरस्त कराने के लिए सुरेश यादव ने पूर्व चकबंदी आयुक्त पर कराया हमला

समाजवादी पार्टी की सरकार में जहां अपराधी-माफि या बेलगाम हो चुके थे तो दूसरी ओर प्रशासनिक ढांचा बुरी तरह से भ्रष्टाचार का शिकार हो गया था। स्थिति यह थी कि भ्रष्टाचारियों पर लगाम लगाने वाले विभाग के आलाधिकारियों पर खुलेआम हमले कराये जा रहे थे। विडम्बना यह थी कि नौकरशाही पर हमलावरों को बचाने में सत्ता से जुड़े कुछ नेताओं से लेकर कुछ अधिकारियों तक के नाम शामिल थे। आश्चर्र्य तो तब हुआ जब ईमानदारी की पाठ पढ़ाने वाली भाजपा सरकार में बेलगाम समाजवादी गुण्डों और माफियाओं को संरक्षण दिया जाने लगा। समाचार अपने पाठकों को बता दें कि चकबंदी विभाग में एक आईएएस अधिकारी थे। जिनका नाम डा. हरिओम था। चकबंदी विभाग में ही एक अधिकारी थे। जिनका नाम राकेश पाण्डेय था। चकबंदी विभाग के सूत्रों की माने तो राकेश पाण्डेय ने अपने विभाग के आयुक्त डा. हरिओम से तबादला निरस्त कराने का दबाव बनाया था। मगर डा. हरिओम ने तबादला निरस्त करने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया। इस मामले से क्षुब्ध होकर चकबंदी विभाग के अधिकारी राकेश पाण्डेय अपने बेटे दिनेश के साथ इन्दिरा भवन स्थित कार्यालय गये और चकबंदी आयुक्त डा. हरिओम से बहस करने लगे। बहस के दौरान ही राकेश और उनके बेटे दिनेश ने आयुक्त डा. हरिओम की कमरे में बंदकर पीटाई कर दी। आयुक्त के पिटाई का मामला शासन के समक्ष पहुंचा। मगर मामला ढाक के तीन पात हो गया। एक आईएएस अधिकारी की खुलेआम पीटाई तत्कालीन सरकार की मंशा पर जहां एक तरह सवालियां निशान लगाया तो वही दूसरी ओर इस बात को प्रकाश में लाया कि विभागीय मंत्री की शह पर सुरेश सिंह यादव ने ही चकबंदी आयुक्त डा. हरिओम की पीटाई कराने का षणयंत्र रचा था। आयुक्त की पीटाई की पृष्ठभूमि सुरेश सिंह यादव  की अगुवाई में तैयार की गयी थी। सरकार के एक कद्दावर कैबिनेट मंत्री से करीब का सम्बन्ध रखने वाले सुरेश सिंह यादव के निर्देश पर ही सारी साजिश रची गई थी। राकेश पाण्डेय को उम्मीद थी कि चकबंदी आयुक्त पर हमला करने के बाद भी सुरेश सिंह यादव के दबाव के चलते उसके खिलाफ  कार्रवाई नहीं होगी। हालांकि आईएएस अधिकारी के प्रार्थना पत्र पर पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर हमलावर चकबंदी अधिकारी के बेटे दिनेश को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। मगर राकेश पाण्डेय बीमारी का बहाना बनाकर अस्पताल में भर्ती हो गया। उसके बाद सुरेश सिंह यादव द्वारा हर स्तर से राकेश को बचाने की तैयारी प्रारम्भ की गई। हालांकि पुलिस ने राकेश के स्वस्थ होने के बाद उसे गिरफ्तार करने की बात कही थी। मगर धीरे-धीरे विभाग के मंत्री का दबाव विभाग के तत्कालीन आयुक्त डा. हरिओम पर बढ़ता गया कि वे उक्त मामले में समझौता कर ले। विभागीय मंत्री अपने इस प्रयास में सफल भी रहे। धीरे-धीरे मामला शांत हो गया। डा. हरिओम की खामोशी का परिणाम था कि आज सुरेश सिंह यादव की दबंगई सिर चढ़कर बोलने लगी। कुछ माल पूर्व दस्तावेजों के आधार पर बेशकीमती सरकारी जमीनों के बंदरबांट करने का मामला भी सामना आया। जिसमें अपर संचालक चकबंदी सुरेश सिंह यादव की भूमिका सामने आई। जून वर्ष 2015 में जगनपुर अफ जलपुर निवासी अजीत सिंह ने उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार कार्यालय में सुरेश सिंह यादव के खिलाफ  एक शिकायत दर्ज कराई थी। जिसकी प्रतिलिपि उन्होंने प्रदेश के मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव, राजस्व विभाग और गौतमबुद्धनगर के जिलाधिकारी सहित प्रधानमंत्री को भी प्रेषित की थी। दिनांक 24 जून 2014 में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने प्रमुख सचिव राजस्व को आदेश दिया था कि ग्राम सभा की जमीनों में बंदरबांट करने वाले संलिप्त प्राधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ  भारतीय दण्ड संहिता की सुसंगत धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई जाए। उच्च न्यायालय ने सम्पूर्ण प्रकरण की जांच के लिए चकबंदी विभाग के आलाधिकारियों को निर्देश दिया था। उच्च न्यायालय के आदेशों का अनुपालन कराने के लिए शासन स्तर से उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की गयी। जांच समिति के गठन में ही भ्रष्टाचार के खेल को अंजाम दे दिया गया। तथाकथित भ्रष्टाचारियों के गिरोह के सरदार एवं प्रकरण के मुख्य अभियुक्त ने शीर्ष अधिकारियों से साठगांठ कर जांच समिति में सदस्य के रूप में स्वयं का नाम शामिल सम्मिलित करा दिया। ऐसे में जांच प्रभावित होना स्वाभाविक था। हुआ भी कुछ ऐसा ही। कोर्ट के आदेश का अनुपालन त्रुटिपूर्ण एवं आंशिक कराया गया। कथित भ्रष्टाचार के पोषक शीर्ष अधिकारियों का तर्क था कि सुरेश सिंह यादव को चकबंदी प्रक्रिया का तकनीकी जानकार होने के कारण समिति में शामिल किया गया था। सुरेश सिंह यादव ग्राम अट्टा दनकौर, जगनपुर, अफ जलपुर में बंदोबस्त अधिकारी के पद पर 1996 से 1998 तक कार्यरत थे। उन पर आरोप था कि उक्त अवधि में भी सुरेश सिंह यादव ने ग्राम सभा की जमीनों को अनियमित तरीके से बंदरबांट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। जिसका वर्णन समाचार पत्र ने उपरोक्त कथनों में वर्णित किया है।

बुलंदशहर में 25 प्रतिशत से अधिक  रकबा लोगों के चकों में पैसे लेकर दर्ज किया

सुरेश सिंह यादव ने बतौर बंदोबस्त चकबंदी अधिकारी के रूप में जनपद बुलन्दशहर में कार्यकाल के दौरान ग्राम सभा खिरिया, कल्याणपुर में चकबंदी अधिनियम के विरूद्ध कीमत निर्धारित कर तकरीबन 25 प्रतिशत से अधिक रकबा लोगों के चकों में दर्ज करा दिया। जिसके एवज में इन्होंने मोटी धन उगाही की। सुरेश सिंह यादव की इस अनैतिक कार्यशैली की वजह से ग्राम समाज की सैकड़ों बीघा जमीन हाथ से चली गयी। हालांकि बाद में इतनी बड़ी अनियमितता उजागर होने पर डीडीसीए बुलन्दशहर ने उक्त दोषपूर्ण कार्यवाही को समाप्त करते हुए ग्राम समाज की जमीनें वापस करा दी और लाभार्थियों को भी दण्डित किया गया। मगर बंदोबस्त चकबंदी अधिकारी के रूप में सुरेश सिंह यादव के खिलाफ  कोई कार्रवाई नहीं की गयी। जो इस पूरे मामले का असली और मुख्य षणयंत्रकारी और दोषी था। इसी तरह से जनपद ललितपुर में सुरेश सिंह यादव ने अपने कार्यकाल के दौरान कुछ ऐसा ही गुल खिलाया था। सुरेश यादव ने बतौर बंदोबस्त चकबंदी अधिकारी के रूप में धारा 122 बी-4 एफ  के तहत गांव सभा की बहुमूल्य सैकड़ों बीघा जमीनों का बंदरबांट करने में महत्तपूर्ण भूमिका निभाई थी। हालांकि यह कार्य सुरेश सिंह यादव के अधिकार क्षेत्र में नहीं था। मगर उसके बावजूद भी ग्राम सभा की जमीनों का बंदरबांट कर दिया। पाठकों को बता दें कि उपरोक्त धारा के तहत आदेश पारित करने का अधिकार असिस्टेंट कलेक्टर का होता है न कि चकबन्दी प्राधिकारियों का होता है। मगर इसके बावजूद सुरेश सिंह यादव ने नियम विरुद्ध तरीके से आदेश पारित कर बेशकीमती कृषि भूमि का बंदरबांट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। आश्चर्यजनक बात है कि दोष सिद्ध होने के बाद भी इनके खिलाफ न तो विभागीय स्तर पर कार्यवाही की गयी और न ही शासन द्वारा विधि सम्मत कार्रवाई को अंजाम दिया गया। यहां तक कि इनको प्रतिकूल प्रविष्टि तक नहीं दी गयी। इस मामले को भाजपा सरकार में इस उम्मीद के साथ भी उछाला गया कि भाजपा सरकार भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों पर कार्यवाही करने के लिए गंभीर है। मगर अफसोस कि एक साल से अधिक की अवधि होने वाली है। मगर अभी सरकार ने यह निर्णय नहीं लिया कि सुरेश सिंह यादव को क्या दण्ड दिया जाये ? भाजपा सरकार की यह मेहरबानी यह स्पष्ट कर रही है कि वह कितना भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के प्रति गंभीर है ?

 

 

 

 

 

 

 

30
March

एक ही डबल फोर्टिफाइड साल्ट को दो अलग अलग कीमतों में खरीदने का कारनामा

मनचाही खरीद फरोख्त से राज्य कर्मचारी कल्यण निगम के अधिकारियों ने सरकार को लगाया 30 करोड़ का चूना

मैनफोर्स

लखनऊ। सूबे की भाजपा सरकार एक तरफ भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों पर अंकुश लगाने का दम भर रही है तो वही दूसरी ओर सरकार के राजनेता, नौकरशाह सरकार के भ्रष्टाचार नियंत्रण पर अंकुश लगाने के मंसूबे पर पानी फेरने का काम कर रहे है। इसका एक छोटा सा उदाहरण मैनफोर्स समाचार पत्र ने अपने पूर्व के अंकों में प्रकाशित किया। उसी के क्रम में पुन: उक्त समाचार की अगली कड़ी इस प्रकार से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा है। पाठकों को बता दे कि खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग उत्तर प्रदेश की एजेन्सी राज्य कर्मचारी कल्याण निगम के अधिकारियों स्वयं की स्वार्थ सिद्ध के लिए धन के लोभ में अपनी मनचाही कंपनियों को खाद्य उत्पादों की क्रय-विक्रय हेतु निलाली गई निविदा में लाभान्वित करने के उद्देश्य से निकाली गई निविदा में खुलेआम हेरफेर किया जा रहा है। मामले की शिकायत भी लोगों ने की। मगर ऊंची रसूख के दम पर भ्रष्टïचारियों का परचम बुलंद रहा। पाठकों को बता दें कि सरकार एक है। राज्य एक है। मगर एक ही राज्य में एक उत्पाद की दो अलग कीमते निर्धारित कर, उत्पादों का क्रय-विक्रय किया जा रहा है। खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की एजेन्सी राज्य कर्मचारी कल्याण निगम डबल फोर्टिफाइड साल्ट को दो अलग-अलग कीमतों पर खरीद रहा है। पाठकों को बता दें कि उत्तर प्रदेश उपभोक्ता सहकारी संघ जहां एक तरफ  वाइब्रेन्ट ग्लोबल कंपनी से डबल फोर्टिफाइड साल्ट को 8 रूपये 50 पैसे मे खरीद रहा है तो वही खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग  की एजेन्सी कर्मचारी कल्याण निगम अंकुर केम फूड कंपनी से वही डबल फोर्टिफाइड साल्ट 11 रूपये 97 पैसे मे खरीद रहा है। अर्थात तीन रूपया सैत्तालिस पैसे मंहगा खरीद रहा है। इस नमक की खरीद में अजीबोगरीब असमंजश देखने को मिल रहा है। दोनो एजेन्सिया प्रदेश के दस-दस जनपदों मे नमक की आपूर्ति कर रही हैं। जबकि दोनों कंपनियों द्वारा नमक आपूर्ति किये जाने वाले जनपदों में तीन जनपद फर्रूखाबाद, इटावा और औरेया कामन जनपद है। अर्थात यह कहा जा सकता है कि एक ही सरकार के एक ही राज्य के तीन जनपदों में एक ही खाद्य उत्पाद में की कीमत में 3 रूपये 47 पैसे का बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। अर्थात यह अन्तर 30 करोड़ रूपये का भारी अन्तर है। इस अन्तर को देखते हुए कहाकि जा सकता है कि दाल में कुछ काला है। खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग के अधिकारी अंकुर केम फूड कंपनी को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से अधिक कीमत पर नमक खरीद कर रहे है। खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की नोडल एजेन्सी कर्मचारी कल्याण निगम के अधिकारी उक्त कंपनी से साठगांठ करके सरकार को 30 करोड का चूना लगा रहे है। आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश के 10 जनपदों सिद्धार्थनगर, संकबीरनगर, फैजाबाद, मऊ, मेरठ, फर्रूखाबाद, मुरादाबाद, हमीपुर, इटावा और औरेया में एनीमिया नामक बीमारी से पीडित मरीजों को खिलाने वाली डबल फोर्टिफाइड नमक का वितरण कराने के कार्य का जिम्मा सरकार ने खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग को दिया था। खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग ने यह कार्य अपनी एजेन्सी राज्य कर्मचारी कल्याण निगम के माध्यम से कराना प्रारम्भ किया था। उपरोक्त कार्य को ही विभाग ने उत्तर प्रदेश उपभोक्ता सहकारी संघ लि0 से भी सूबे के पीलीभीत, देवरिया, इटावा, फर्रूखाबाद,औरेया, प्रतापगढ़, बांदा, लखनऊ, शाहजहापुर और बदायूं जनपद में आपूर्ति करने का जिम्मा सौंपा था। वही खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग सिद्धार्थनगर, सन्तकबीरनगर, फैजाबाद, मऊ, मेरठ, फर्रूखाबाद, मुरादाबाद, हमीपुर, इटावा, और औरेया आदि जनपद में आपूर्ति करा रही है। आश्र्चयजनक बात यह है कि इन दोनों एजेन्सियों को वितरण के लिए आवंटित जनपदों में से तीन जनपद फर्रूखाबाद, इटावा और औरेया कामन है। अर्थात एक ही जैसे तीन जनपदों में एक ही एक ही नमक के उत्पाद को दो अलग-अलग कीमतों पर खरीद कर आपूर्ति किया गया। जिसके इस नमक के उत्पाद की बिक्री से उपभोक्ताओं में भी भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है।

बैक डोर से दे दिया 100 करोड़ का ठेका

सूबे में नियमों और कानूनों को ताक पर रखने की प्रथा आम हो गई है। आज नियम और कानून मात्र मजाक बन कर रह गये है। यही कारण है कि जिस कम्पनी को ब्लैक लिस्टेड करना चाहिए था। जिसकी 6 करोड रूपये की सिक्युरिटी मनी को जब्त करना चाहिये था। आज उसकी कंपनी को नियम और कानून को ताक पर रखकर खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की एजेन्सी कर्मचारी कल्याण निगम ने उसे बगैर निविदा के 100 करोड़ का ठेका बैक डोर से दे दिया। आपको को बता दें कि एनीमिया पीडि़त लोगों के लिए डबल फोर्टिफाइड नमक के वितरण के लिये पूर्ववर्ती समाजवादी पार्टी की सरकार ने नवम्बर 2016 मे अंकुर केम फूड कंपनी को सूबे के जनपद सिद्धार्थनगर, सन्तकबीरनगर, फैजाबाद, मऊ, मेरठ, फर्रूखाबाद, मुरादाबाद, हमीपुर, इटावा और औरेया का ठेका दिया था। उपरोक्त जनपदों में नमक की आपूर्ति को एक वर्ष तक करना था। मगर अंकुर नमक वालों ने तीन महीने दिसम्बर 2016 जनवरी 2017 और फ रवरी 2017 मे आपूर्ति करने के बाद सरकार को बिना कोई कारण बताये नमक की आपूर्ति करना बन्द कर दी। अंकुर केम फूड को एनिमिया पीडि़त लोगों को पूरे एक वर्ष तक बिना किसी अन्तराल के डबल फोर्टिफाइड साल्ट को प्रदेश के 10 जिलों में आपूर्ति करना था। करीब एक साल बाद बनायी गई कमेटी को यह पता करना था कि उपरोक्त डबल फोर्टिफाइड नमक के खाने से एनिमिया पीडि़त लोगों फायदा हुआ या नहीं। मगर सरकार के इस अहम प्रोजेक्ट को विभाग के अधिकारी और कंपनी ने संयुक्त रूप से पलीता लगाने का काम किया। अंकुर केम फूड ने डबल फोर्टिफाइड नमक को तीन महीने की आपूर्ति किया और करोड़ों रूपये का भुगतान लेकर फ रार हो गयी। जबकि नियमानुसार अंकुर केम फूड के इस कृत्य के लिये विभाग को चाहिए था कि उसे ब्लैक लिस्टेड कर उसकी सिक्योरिटी मनी को जब्त कर लेना चाहिए था। मगर विभाग के अधिकारी भी चोर-चोर मैसेरे भाई की कहावत को चरितार्थ करते हुए कंपनी के मालिकान पर अपनी दयादृष्टि बनाये रहे। जबकि टेन्डर की धारा 10:18 मे यह प्रावधान था कि आपूर्ति न करने पर सिक्योरिटी मनी जब्त कर ली जाये और कम्पनी को ब्लैक लिस्ट में डाल दिया जाये। मगर अंकुर केम फूड को ब्लैक लिस्ट में डालने और सिक्योरिटी मनी जब्त करने के बजाय जनवरी 2018 मे बगैर निविदा के 100 करोड़ के डबल फ फोर्टिफाइड साल्ट का ठेका कर्मचारी कल्याण निगम ने दे दिया। अंकुर कंपनी को फ ायदा पहुंचाने के लिये कर्मचारी कल्याण निगम के अधिकारियो ने अनुबंध संख्या 15 पर शब्दों मे हेरा-फेरी करते हुए उसमे बाद में एक लाइन जोड़कर इस बार बैकडोर से अंकुर कंपनी को नमक को काम दिया गया। जबकि निविदा में किसी भी प्रकार का छेड़छाड़ नही होने की बात कर्मचारी कल्याण निगम ने अपने ही अनुबंध के अनुबंध संख्या 32 पर लिखा है। इसके बावजूद निविदा के सारे नियम और कानून को ताक पर रखकर लगभग 100 करोड़ के डबल फोर्टिफाइड नमक का ठेका अंकुर कंपनी को दिया गया। ऐसा करके खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की एजेन्सी कर्मचारी कल्याण निगम ने सूबे की भाजपा सरकार की भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की मुहीम पर कालिख पोतने का काम किया है। जब इस मामले की गहराई से अध्ययन किया गया तो परत दर परत भ्रष्टाचार की पोल स्वत: खुलती गई  और पता चला कि कैसे अंकुर केम फूड कंपनी को 100 करोड़ का ठेका देने के लिए अधिकारियो ने सारे नियम कानून ताक पर रख दिया। आपको बता दे कि एक तरफ  आम आदमी जब किसी सरकारी को ठेके को लेना चाहता तो उसे 10 लाख का काम लेने के लिये निविदा प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। जबकि एक अंकुर केम फूड कंपनी है। जिसे ब्लैक लिस्टेड करने के बजाय अधिकारी 100 करोड़ का ठेका देकर घूसखोरी का स्वाद चखने में मशगूल है।

 

 

 

29
March

हर महीनों रेलवे को करोड़ों के टैक्स का चूना लगा रहे दलाल

अवैध माल को चेकिंग के लिए नहीं होता स्कैनर मशीन का इस्तेमाल

मैनफोर्स

लखनऊ । सूबे की भाजपा सरकार में रेलवे के दलालों की पौ-बारह हो गई है। जब से जीएसटी लागू हुआ है। तब से रेलवे के दलालों टैक्स चोरी की नई-नई विधा की इजाद कर रहे है। ऐसे टैक्स चोरों के पास चोरी करने के लिए दांव-पैतरें है। रेलवे लीज व पार्सल से आवागमन होने वाले माल पर टैक्स चोरी करने के लिए रेलवे के दलाल चोरी के सारे फार्मूलों का इस्तेमाल कर रहे है। टैक्स चोर और रेलवे के दलाल जीएसटी के निरीक्षक और सिपाहियों की निगरानी के कारण रेलवे के दलालों का सहारा ले रहे है। रेलवे के दलाल नये-नये जुगाड़े तलाश कर जीएसटी विभाग को ही धूल चटाने में माहिर साबित हो रहे हैं। पाठकों को बता दें कि टैक्स चोरी से बचने के लिये रेलवे से रेडीमेड गारमेंट्स और होजरी के माल में टैक्स चोरी करने वाले सबसे बड़े दलाल धर्मेंद्र जायसवाल सुतरखाना निवासी बॉबी खान छोटा और बड़ा चिग्गू पान मसाला सुपारी और केमिकल के सबसे बड़े स्मगलर पप्पू मीठे उर्फ दिलीप कुमार गुप्ता ने संयुक्त रूप से रेलवे के दलालों और जीएसटी निरीक्षकों से सांठगांठ कर सरकार को हर माह करोड़ों रूपये टैक्स की चोरी कर रहे है। पाठकों को बता दें कि विगत 18 वर्ष पूर्व एक नंबर प्लेटफार्म के 3 नंबर गेट के सामने अपने पिता के साथ केले का ठेला लगाने वाला पप्पू मीठा आज राजनैतिक दलाल की भूमिका में लोगों के सामने आ चुका है। टैक्स चोरी के इस खेल में एक सत्ताधारी नेता के साये में इन लोगों का अवैध कारोबार फल फूल रहा है। वह सत्ताधारी दल का नेता ही टैक्स और रेलवे की दलाली का मुख्य सूत्रधार बताया जा रहा है। टैक्स चोरी की इस नये गठजोड़ के अनुसार राज्य जीएसटी के चौकीदार खाली दरवाजे को ताकते रह जाते हैं। जबकि सारा अवैध माल उनकी नाके के नीचे से 9 व 10 नम्बर प्लेटफार्म की सुरंगों के माध्यम से नौ दो ग्यारह हो जाता है। पाठकों को बता दें कि इस खेल के लिये निर्धारित रकम हजारों में न हो कर लाखों में है। जिसमें नीचे से ले कर ऊपर तक सबका हिस्सा निर्धारित है। इस व्यवस्था में इतना फायदा जरूर है कि जब कोई जांच हो तो चौकीदार दरवाजे पर हमेशा मुस्तैद मिलेंगे और चोर दरवाजे से सारा खेल बदस्तूर जारी रखेंगे। स्टेशन पर आने-जाने वाले इस अवैध माल को चेक करने के लिए कोई भी कहीं भी किसी स्कैनर मशीन का इस्तेमाल नहीं करता। जबकि गत दिनों स्टेशन की सुरक्षा को लेकर डी.आर.एम से लेकर कई बड़े अधिकारी खासे नाराज दिखाई दिये थे। मगर पार्सल कर्मचारियों की सेहत पर इसका कोई असर नहीं दिखाई पड़ा। उन्हें किसी का भय नहीं है। उन्हें तो बस अपनी जेबें भरने से मतलब है। कार्रवाई के नाम पर सभी जिम्मेदार विभाग खामोश हैं। सुरक्षा व्यवस्था में हर जगह झोल  है। जो आज नहीं कल बड़ी घटना का कारण जरूर बनेगा।

जीएसटी भी चढ़ गई भ्रष्टाचारियों की भेंट

पीएम नरेंद्र मोदी और उनकी पूरी सरकार भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए बड़े-बड़े दावे करती है। भाजपा की केन्द्र सरकार ने जीएसटी लागू किया। मगर भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से कानपुर सेंट्रल स्टेशन पर रेलवे के दलाल सरकार को हर माह सौ करोड़ से ज्यादा की चपत लगा रहे हैं। सेंट्रल स्टेशन कानपुर से बड़े पैमाने पर बिना ई-बिल के माध्यम से गुटखा देश के कई शहरों में आपूर्ति किया जा रहा है। इन्हें ले जाने और वहां से बाहर निकालने के लिए पूरा गैंग काम कर रहा है। बाहर से बड़े पैमाने पर सुपारी, होजरी प्रोडक्ट्स, इलायची, तम्बाकू, रेडीमेड कपड़े और इलेक्ट्रानिक्स का सामान कानपुर में आता है। कानपुर सेंट्रल पर आने-जाने वाली करीब 300 से ज्यादा ट्रेनों में स्टेट जीएसटी और रेलवे के कर्मचारियों के साथ मिलकर दलाल करोड़ों की टैक्स चोरी हर माह कर रहे हैं। विगत दिनों जीएसटी के एडिशनल कमिश्नर केशव लाल को काली कमाई के आरोप में पकड़ा दबोचा गया था। केशव लाल ने अपनी 26 साल की नौकरी में सौ करोड़ से ज्यादा की रकम काली कमाई के माध्यम से बिस्तरों में छिपा कर रखा था। पाठकों को बता दें कि केशवलाल के पकड़े  जाने के बाद खुलासा हुआ कि जितना माल ट्रेनों से आता था। उसके आधे वजन पर भी टैक्स सरकारी खाते में जमा नहीं होता था। जिसके बदले में बाकी रकम का कुछ हिस्सा व्यापारी को वापस हो जाता था और बाकी केशवलाल और उसकी टीम के अतिरिक्त रेलवे के कर्मचारियों को बांट दिया जाता था। इसमें सारा खेल दलालों के माध्यम से खेला जाता था।जीएसटी घोटाले के का पर्दा उठाने के बाद ऐसा प्रतीत हुआ कि टैक्स चोरी थम जायेगी। मगर स्थिति बिल्कुल विपरीत है। क्योंकि अभी भी कानपुर सेंट्रल स्टेशन पर पार्सल का खेल धड़ल्ले से जारी है। यहां खुलेआम जीआरपी, आरपीएफ और जीएसटी अधिकारियों की नाक के नीचे से दलाल बगैर ई वे बिल के माल निकलवा रहे हैं। इन सामानों को ट्रेनों के माध्यम से दिल्ली से कानपुर भेजा जाता है। सूत्रों के अनुसार दिल्ली से भी माल बिना बिल के लोड होता है। कानपुर पहुंच कर बिना बिल के ही अनलोड करके बाहर निकल दिया जाता है। रेलवे स्टेशन पर दलालों का गठजोड़ इस कदर हावी है कि सरेआम करोड़ों रुपये की जीएसटी चोरी बेफिक्र होकर की जा रही है।  स्टेशन के दलाल इन अधिकारियोंं को भारी भी रिश्वत देते हैं।  सरकारी मशीनरी की निष्क्रियता की वजह से देश के राजस्व को हर माह करीब सौ करोड़ का चूना लग रहा है। 

प्रतिबंधित पान मसाला के लिए रेलवे के लीज पार्सल यानों का हो रहा प्रयोग

प्रतिबंधित होने के बाद भी कानपुर में बने गुटखे और पान मसाले की आपूर्ति बिहार और दिल्ली में लगातार जारी है। रेलवे के सक्रिय दलाल कानपुर सेंट्रल और अनवरगंज स्टेशन पर इस सप्लाई में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। बिहार और दिल्ली में गुटखा-पान मसाला प्रतिबंधित होने के बाद भी कानपुर से वहां आपूर्ति की जा रही है। इसके लिए लीज पर लिए गये रेलवे के वीपीए पार्सल यान का धड़ल्ले से प्रयोग किया जा रहा है। किसी भी प्रकार की चेकिंग नहीं होने के कारण टैक्स चोरों के लिए रेलवे के दलाल सबसे उपयुक्त होते है।  सूत्रों के अनुसार कानपुर के दादानगर में स्थित तलब पान मसाला फैक्ट्री, ट्रांसपोर्टनगर स्थित मधु तंबाकू फैक्ट्री, केसर गुटखा, तिरंगा गुटखा फैक्ट्री, ट्रांसपोर्टनगर में ही स्थित राजश्री पान मसाले के विशाल डिपो व शहर के अन्य क्षेत्रों में स्थित कमला पसंद, पान बहार पान मसाला के गोदामों से मसाले व इन्ही ब्रांडों के पैक्ड तंबाकू के 3 से 4 हजार बोरे कालिंदी, श्रमशक्ति, महाबोध सहित दिल्ली, बिहार, कोलकाता तक जाने वाली ट्रेनों के लीज पार्सल यानों से भेजे जा रहे हैं। इतना ही नहीं रेलवे की लीज वाली इसी वीपी यान से पान मसाले में मिलावट के लिये जहरीली पामलेट सुपाड़ी भी कानपुर तक आयात की जाती है। जबकि ये पूरी तरह प्रतिबंधित होती है। सूत्रों की माने तो चोरी किये जा रहे टैक्स की एवज में सेल्स टैक्स के दो खास सचल दल अधिकारियों को 10 से 15 लाख रुपये प्रति माह दिया जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि पान मसाला और तंबाकू उद्योग सम्बन्धी टैक्स चोरी के धन्धे में एक दलाल का एकछत्र राज है। जिसका नाम पप्पू मीठा है। पान मसाला और किराना सामग्री में टैक्स चोरी के किंग कहलाने वाले रेलवे के सबसे बड़े दलाल पप्पू मीठे का ठिकाना कानपुर में ही हरबंस मोहाल थानाक्षेत्र का सुतरखाना है। इसी थाना क्षेत्र के रेलबाजार में उक्त दलाल के अपने खुद के और दूसरे दलालों के साथ पार्टनरशिप में कई होटल भी हैं। उसका यह क्षेत्र कानपुर सेंट्रल स्टेशन और स्टेशन के माल गोदाम से महज चंद कदमों की दूरी पर ही है। पप्पू मीठा के घर, आफि स आदि ठिकानों पर सूबे की पिछली सरकारों के समय दर्जनों शिकायतों के बाद दो बार छापा मारा गया था। एक्साइज डिपार्टमेंट की डीआरआई टीम और वाणिज्य कर विभाग की स्पेशल टीमों ने बाकायदा पप्पू मीठा के घर व कार्यालयों पर छापे मारकर करोड़ों रुपये टैक्स चोरी के सबूत जमा किये थे। पप्पू मीठे के एक बड़े कारखास ने ही उसके खिलाफ  बयान दिया था। मगर सत्ता और शासन में बैठे पप्पू मीठे के मित्रों ने जांच को दबा दिया और फाइलों को गायब कर दिया। पिछली बसपा शासनकाल में पप्पू मीठा का नाम सबसे ज्यादा टैक्स चोरी करने वाले रेलवे के दलाल के रूप में शासन की की सूची में सर्वोच्च स्थान पर थी। थाने में उसके खिलाफ भारी धाराओं में रिपोर्ट लिखे जाने की तैयारी हुई थी। मगर अचानक मामला ढीला हुआ और फिर धीरे-धीरे खत्म हो गया। पप्पू मीठा के अलावा टैक्स चोरी की दलाली के बाकी बड़े खिलाडिय़ों में रेलबाजार निवासी अंकल उर्फ  वसी, श्यामनगर निवासी धमेंद्र जायसवाल, सुतरखाना निवासी बॉबी खान, छोटा और बड़ा चिग्ग, संजय प्रजापति, अजय और शनी प्रजापति, आदि प्रमुख हैं। सूत्रों की माने तो इन दलालों को किराना और पान मसाला, गुटखा जैसे व्यापार में उसके आकाओं ने हर बार बचाया। सम्पूर्ण भारत में सबसे ज्यादा टैक्स देने वाले कानपुर शहर में ही सबसे ज्यादा टैक्स चोरी करने वाले व्यापारियों के ये दलाल पान मसाला-गुटखा, किराना, इलेक्ट्रानिक्स सामग्रियों, रेडीमेड कपड़ों व होजरी व्यापारियों को रोजाना करोड़ों की टैक्स चोरी करवाते करवाते खुद भी करोड़पति हो गये हैं।  सूत्र बताते हैं कि अब इन दलालों ने दो नंबर के गैरकानूनी कामों से काली कमाई करने के बाद से दान-धर्म-पुण्य में पैसा लगाना प्रारम्भ कर दिया है। 

रेडीमेड कपड़ों में टैक्स चोरी के लिए पार्सल में किया जा रहा घोटाला

किस प्रकार कानपुर में रेलवे के माध्यम से बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी हो रही है। इस टैक्स चोरी का एक बड़ा हिस्सा कानपुर के गम्मू खां के हाते में स्थित रेडीमेड गारमेंट्स बच्चों के कपड़ों और होजरी के विशाल कारखानों से संचालित हो रहा है। यह सिलाई और रेडीमेड के कारखाने व शोरूम गम्मू खां के हाते और बांसमंडी स्थित हमराज कांप्लेक्स व उसके आसपास हैं। सूत्रों के अनुसार इन क्षेत्रों से निकलने वाली माल की पेटियां हाते की विभिन्न गलियों से ही सील पैक्ड होकर रिक्शों ट्रॉलियों व लोडरों में लदकर सीधे हरबंस मोहाल स्थित रेलवे के मुख्य मालगोदाम में रात 12 बजे के बाद से ही पहुंचना शुरू हो जाती हैं। इसके बाद सारा माल गोदाम से सीधे बिना किसी क्रॉस चेकिंग के सुरंगों के रास्ते प्लेटफ ार्म पर पहुंचा दी  जाती है। ट्रेन आते ही पार्सल वैगन खोलकर उसमें सीधे लोड कर दिया जाता है। सूत्रों की माने तो कानपुर से बनकर पैक होकर देशभर में और कई पड़ोसी मुल्कों तक एक्सपोर्ट हो रहे इन बच्चों के कपड़ों और रेडीमेड गारमेंट्स के डिब्बों को पैक कराके पहुंचाने का जिम्मा जेल में बंद एक खतरनाक हिस्ट्रीशीटर और उसके भाई ने ले रखी है। इतना ही नहीं रेडीमेड कपड़ों के इन पार्सलों-डिब्बों में हवाले की मोटी रकम और दूसरी खतरनाक चीजें भेजी जा रही हैं। मगर आरोप है कि स्थानीय पुलिस, टैक्स डिपार्टमेंट और रेलवे सहित जिम्मेदार लोग सुविधा शुल्क के कारण आंखें मीचे हैं। सेल्स टैक्स या एक्साइज आदि विभागों के पास तो रेडीमेड के इस एक्सपोर्ट का जैसे कोई हिसाब-किताब ही नहीं है। स्टेशन पर इन रेडीमेड गार्मेंट्स के पहुंचने, पार्सल यानों में रेडीमेड या दूसरी चीजों को लोड किये जाते वक्त आसपास खड़े एक-दो आरपीएफ  और जीआरपी के जवान दूर कहीं हंसी-ठिठोली में व्यस्त रहते हैं। चीफ पार्सल सुपरवाइजर, उनके सहायक या रेलवे विजलेंस का कोई अधिकारी तो आसपास कभी दिखता ही नहीं। माल के लिये वैगन के लीज होल्डर या ठेकेदार द्वारा भरा गया मनमाना डिक्लेरेशन तो पहले ही जमा हो चुका होता है। पीएमएस में या कोरियर में इनके बिल, बिल्टी या रसीदें कोई मांगता नहीं है, टैक्स बचाने के लिये ये कागज भी मनमाने तरीके से बनाकर लगा दिये जाते हैं। कर्नलगंज से निकलने वाली रेडीमेड कपड़ों की पेटियां दो प्रकार की हैं। पहली तो छोटी, यानि कि 80 एमएम और दूसरी 120 एमएम की। ये लकड़ी के बॉक्सेज होते हैं, जो इलाके में ही लकड़ी के पुराने टालों पर बनते हैं। इनका वजन एक कुंटल से सवा कुंटल के बीच होता है। इनके अंदर भरा रहता है बेहद कीमती और महंगा कपड़ा, एक्सपोर्ट क्वालिटी वाले रेडीमेड गारमेंट्स। एक पेटी की कीमत एक लाख से डेढ़ लाख रुपये तक होती है। यूं तो सेंट्रल स्टेशन पर छुटभैया बहुत से दलाल हैं, लेकिन जो सरकार को बड़े स्तर पर टैक्स का चूना लगा रहे हैं और जिनकी रेडीमेड कपड़ों की ही कम से कम 100 पेटी सेंट्रल स्टेशन से रोज जाती हैं। इस तरह से दो कथित बड़े दलाल दिलीप कुमार गुप्ता उर्फ  पप्पू मीठे तथा अंकल उर्फ वसी हैं। ये सभी दलाल थाना कर्नलगंज क्षेत्र में स्थित रेडीमेड के बड़े-बड़े कारखानों से रेडीमेड के करोड़ों रुपये मूल्य के डिब्बे पैक करवा के लीज वाले पार्सल यानों में भरकर कर बिना फूटी कौड़ी टैक्स दिये, रेलवे के नाम पर बनाई गई फ र्जी बिल-बिल्टियों के माध्यम से सीधे गंतव्य तक पहुंचाते हैं। अनवरगंज स्टेशन पर दिल्ली से आने वाली कालिंदी एक्सप्रेस से उतरने के बाद महंगी महीन तंबाकू, विदेशी एक्सपोर्ट की गई सिगरेट आदि तुरंत पीछे के गेटों से बाहर निकाल कर, लोडरों से अनवरगंज थानाक्षेत्र में पहुंचा दी जाती है। ये माल अनवरगंज थाने के एकदम बगल वाली, पान दरीबा कहलाने वाली गली में पहुंचता है। जहां पर सिगरेट, पान मसाला, महंगी तंबाकू सहित किराना के भी ढेरोंं स्टाकिस्टों की दुकानें हैं। वहीं आसपास के गोदामों में इस कर अपवंचित माल को स्टोर कर लिया जाता हैं। सभी को जानकारी होने के बावजूद सेल्स टैक्स या एक्साइज विभाग कभी भी पान दरीबा के गोदामों या दुकानों पर छापा नहीं मारता। आखिर क्यों ? ये राज की बात है। लीज वाले पार्सल यान में भरे माल को चेक करने के नाम पर केवल दिखावा किया जा रहा है। जबकि पैसेंजर ट्रेन में ये माल लादे जाने के कारण सुरक्षा की दृष्टि से सघन चेकिंग होनी चाहिये। रेलवे सुरक्षा के लिये आरपीएफ  की सीआईबी, जैसी शाखाओं पर निर्भर है। पर रेलवे में पीएमएस सहित लीज्ड यान में करापवंचित माल का हाल देखकर लगता है कि सीआईबी का भी भगवान मालिक है। बताते चलें कि सामान्य एसएलआर या पार्सल यान की क्षमता 3 से 4 टन होती है, इतना माल भेजना ही स्वीकृत है। मगर लीज होल्डर यानि ठेकेदार इन बोगियों में 5 से 7 टन तक माल भर डालते हैं। इससे रेलवे के वैगन बहुत जल्दी जर्जर होकर खराब हो जाते है।

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