03
July

निर्माणाधीन चिकित्सालय के संसाधनों हेतु मिले 5 करोड़ 44 लाख

पूर्व में हुए 1 करोड़ 20 लाख के खरीद घोटाले की अभी चल रही है जांच

मैनफोर्स

गोण्डा। जनपद में बन रहे 300 शैय्या वाले निर्माणाधीन चिकित्सालय में  संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित किये जाने के लिए शासन ने 5.44 करोड़ रूपये का बजट जारी कर दिया है। सीएमओ कार्यालय की माने तो यह बजट विभाग को प्राप्त भी हो चुका है। जिसका उपयोग शीघ्र ही संसाधनों की खरीद मेंं किया जायेगा। मगर सवाल यह उठता है कि पूर्व में 1.2 करोड की हुई खरीद में जिस तरह से घोटाला उजागर हुआ और उसकी जाचं भी चल रही है। क्या यह 5.44 करोड की खरीद भी कहीं घोटालों की भेंट न चढ जाये? हालाकि स्वास्थ्य विभाग के मुखिया यह दावा करते नहीं थक रहे कि सभी खरीद शासन की गाइडलाइन के अनुसार ही की जायेगी। जनपद के ही नहीं वरन मण्डल के जिलों से आने वाले ंमरीजों की भारी संख्या को देखते हुए जिले में महिला चिकित्सालय एवं पुरूष जिला चिकित्सालय को विस्तार देते हुए शासन द्वारा 300 शैय्या वाले नये चिकित्सालय भवन निर्माण की संस्तुति पूर्व समाजवादी शासन काल में की गयी थी। प्रदेश सरकार के अनुसार इन भवनों को तीन वर्ष में बनाकर जिले के स्वास्थ्य विभाग को हैण्डओवर करना था। किन्तु स्थानीय शासकीय लेटलतीफी और राजनैतिक हस्तक्षेप के चलते जिम्मेदारों ने इसके निर्माण मे रूचि नही दिखाई और चार वर्ष का समय व्यर्थ गवांं दिया। वर्तमान समय में अभी भी भवन में अनेकों महत्वपूर्ण कार्य पूर्ण होने बाकी हैं जिसके पूरे होने की संभावना आगामी 2 से लेकर तीन महीनों में है। वर्तमान प्रदेश सरकार ने इस भवन के संचालन के लिए आवश्यक उपकरणों की खरीद के लिए 5.44 करोड़ रूपये का बजट जारी किया। इस बजट के द्वारा आपरेशन कक्ष आपतकालीन कक्ष, गहन चिकित्सा कक्ष एवं वार्डो के संसाधनों की खरीद की जानी है। जिसके लिए शासन ने बजट जारी करते हुए खरीद की मंजूरी भी दे दी है। इसके लिए गाइडलाइन भी जारी किया गया है। विभाग इस गाइडलाइन का अध्ययन कर रहा है। इसके बाद ही खरीदी की जायेगी। विभाग का कहना है कि कौन कौन से उपकरण कितनी संख्या में खरीदे जायेगें ? इसका शासनादेश प्राप्त हुआ है। उसी के अनुरूप खरीदारी की जायेगी। जिसमें मुख्यत: आक्सीजन प्लाण्ट का निर्माण एक्सरे मशीन, सीटी स्कैन, अल्ट्रासाउण्ड मशीनों की खरीद की जानी है।

इस बारें मे सीएमओ डा. संतोष श्रीवास्तव का कहना है कि मण्डलीय चिकित्सालय के लिए शासन से उपकरणों की खरीद के लिए बजट विभाग को मिल गया है। शीघ्र ही चिकित्सालय बन कर तैयार हो जायेगा। हैण्डओवर होते ही आवश्यक उपकरणों और संसाधनों की खरीदारी की जायेगी। जिससे मण्डल के लिए बेहतर चिकित्सीय सुविधा जिले में उपलब्ध होगी। उल्लेखनीय है कि इस बजट के जारी होने से पूर्व ही इस नये 300 शैय्या वाले चिकित्सालय के लिए नियमों को ताक पर रखकर 1.2 करोड़ रूपये से तत्कालीन सीएमएस डा. आशुतोष कुमार गुप्त के कार्यकाल में ही खरीददारी की जा चुकी है। इस खरीद में दिखाई पड़ रहे संसाधनों में मात्र कुछ बिस्तर, सैकडों की संख्या में स्टूल ट्रे एवं दर्जनों की संख्या मेंं अलमारियों की खरीदारी कर करोडों रूपये के सरकारी धन का बदंरबांट कर लिया गया। मामलें ने जब तूल पकड़ा तो इस खरीद की जांच के लिए एक कमेटी गठित कर दी गयी। जिसका अभी तक कोई भी प्रभाव दिखाई नहीं पड़ रहा। पूर्व में हुयी इस खरीद घोटालें की जाचं अभी पूरी भी नही हुई थी कि नया 5.44 करोड का बजट और आ गया पूर्व में खरीदे गये उपकरण निर्माणाधीन भवन के बाहर खुले में ही रखें हुए है जिनकी सुरक्षा का भी अब तक कोई इंतजाम नहीं किया गया है। लापरवाही के साथ रखे ये करोडों के उपकरण धीरे धीरे कबाड में तब्दील हो रहे है। विभागीय सूत्रों की माने तो खुले मे रखे गये ये सामान वहां इसलिए रखे गये है कि बाद में इन्हें यह दिखा कर भारी गोलमाल किया जासके कि कई उपकरण चोरी हो गये। जिले के लोगों के साथ ही मण्डल के मरीजों को बेहतर चिकित्सीय सुविधा उपलब्ध कराने का आश्वासन दे रहा जिले का स्वास्थ्य विभाग अपने अन्दर ही व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगा पा रहा है। जिससे लोगों में यह आशंका घर कर रही है कि कही इस बजट का भी वही हाल न हो जैसे पूर्व का बजट घोटालों का भेंट चढ़ गया था। जिला स्वास्थ्य विभाग कब लोगों के लिए इस मण्डलीय चिकित्सालय का द्वार खोलेगा ? इसका जिले के जनता को वर्षो से एक लम्बा इंतजार है।

 

उलझी हुई हैं जिला चिकित्सालय की स्वास्थ्य व्यवस्था

जिला चिकित्सालय को मण्डल का मुख्यालय चिकित्सालय भी कहा जाता है। कहते है कि जब जिले के स्वास्थ्य सेवाओं को हाल देखना हो तो जिला चिकित्सालय में उपलब्ध सेवाओं को देखिए। यहां आम जनमानस को उपलब्ध करायी जा रही सेवाएं असल में जिले में उपलब्ध सेवाएं हैं। विगत की स्थिति को यदि छोड दिया जाये तो इस वर्ष जिला चिकित्सालय में बड़ी तेजी के साथ कई जन उपयोगी निर्माण कार्य कराये गये। साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए चिकित्सालय प्रशासन द्वारा कई प्रयास भी किये गये। यह पिछले कई वर्षों की तुलना में एक बडी उपलब्धि है। इनमें मुख्यत: बच्चों को नया बनाया गया पीकू वार्ड, तीमारदारों के लिए निर्मित प्रतीक्षालय, नेत्र विभाग के मरीजों के लिए प्रतीक्षालय, लाश घर का जीर्णाेद्वार व चिकित्सालय में मुख्य औषधीय पार्क शामिल है। इसके बाद पूर्व में कराये जा रहे चिकित्सायल के रंग रोगन कार्य में भी बदलाव किया गया और नये रंगों को चयन कर चिकित्सालय को एक नया रूप भी दिया गया। यह वर्ष समाप्त होते होते एक बार फिर जिले की जनता को दो स्वास्थ्य सेवाओं के लिए निराशा ही हाथ लगी जिनमें निर्माणाधीन एमआरआई सेन्टर यूनिट व डायलासिस यूनिट का कार्य पूरा न हो पाने की वजह से इस वर्ष भी लोगो को इस सुविधा से वचिंत रहना पडा। चिकित्सालय प्रशासन के अनुसार वर्ष 2019 में यह सेवाएं उपलब्ध करायी जा सकती हैं। चिकित्सालय प्रशासन के द्वारा तेजी से कराये जा रहे कार्यो को लेकर प्रदेश स्वास्थ्य प्रशासन ने जनपद के चिकित्सालय को प्रदेश के टाप फाइव चिकित्सालयों की सूची में जगह दी है यह भी जनपद के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। एक जनवरी को प्रदेश स्तरीय एक उच्चस्तरीय यूपीएचएसएसपी की टीम यहां पहुंची । जो कराये गये सभी अब निर्माण कार्यो का वीडियाग्राफी भी करायी। वर्ष 2018 समाप्त होते ही वर्ष 2019 में जिले को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए जिला चिकित्सालय प्रशासन एवं कर्मचारियों मे एक नया जोश दिखाई पड रहा है और वे इसके लिए प्रयासरत है।

 

 

 

07
June

हत्यारोपियों से साठगांठकर पीड़ित पर बना रही सुलह का दबाव

सीसीटीवी में हत्यारोपियों की स्पष्ट तश्वीर फिर भी पारा पुलिस की पहुंच से दूर हत्यारोपी

मैनफोर्स

लखनऊ। लखनऊ पुलिस की कार्यप्रणाली भी अजीबोगरीब है। एक तरफ वह कहती है कि लखनऊ पुलिस आपकी सेवा में तत्पर है। वही दूसरी ओर उसकी कार्यप्रणाली अपनी कहावत के बिल्कुल विपरीत है। आम आवाम पुलिस जब पुलिस से मदद मांगती है तो वह उसकी सुनती नहीं है। पुलिस का यह दोहरा चरित्र आम आदमी की परेशानी का समाधान कम, परेशानी का सबब ज्यादा बनती है। पुलिस अपराधियों पर नकेल लगाने में कम, आवाम से धन उगाही करने में ज्यादा दिलचस्पी लेती है। मामला चाहे सड़क का हो या फिर थाने का हो। मामला चोरी का हो या हत्या और बलात्कार हो। पुलिस प्रत्येक मामले का समाधान कम और अवैध धन उगाही ज्यादा करती हुई दिखाई देती है। इसका एक छोटा सा नमूना लखनऊ जनपद के थानाक्षेत्र पारा में देखने को मिल रहा है। आपको को बता दें कि दिनांक 30 अप्रैल 2019 को रामकली पत्नी स्व. कालिका निवासी ग्राम भपटामऊ पोस्ट राजाजीपुरम थाना पारा लखनऊ ने थाना प्रभारी पारा को यह लिखित सूचना दी कि उसके पुत्र श्याम की 30 अप्रैल की ही रात को गांव के ही विनीत पुत्र लालता, राहुल पुत्र रामचन्दर, परमेश्वर पुत्र अज्ञात ने हत्या कर दी। रामकली ने अपनी तहरीर में उल्लेखित किया था कि उपरोक्त तीनों आरोपी दिनांक 30 अप्रैल को रात के 10:30 बजे घर से बुलाकर ले गये थे। इन तीनों आरोपियों ने ही उसके बेटे श्याम को पुरानी रंजिश के कारण मारकर उसे परमेश्वर की छत से फेंक दिया था। रामकली ने उल्लेखित किया था कि उसे मोहल्ले वालों ने रात करीब 1 बजे सूचना दिया कि उसके बेटे की हत्या कर दी गई है। इतना ही नहीं रामकली ने उक्त तहरीर में यह भी उल्लेखित किया था कि उपरोक्त तीनों आरोपियों ने उसके पुत्र श्याम को दिसम्बर 2018 में जान से मारने का प्रयास किया था। रामकली द्वारा उपरोक्त आरोपियों पर लगाये गये गंभीर आरोपों में पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार भी किया था। मगर पुलिस द्वारा आरोपियों की यह गिरफ्तारी कार्यवाही करने के लिए नहीं थी बल्कि आरोपियों से धन उगाही कर मामले को रफा दफा करने के लिए थी। शायद यही वजह है कि पुलिस ने इन आरोपियों को गिरफ्तार करने के बाद भी धन उगाही करके छोड़ दिया।

जबकि रामकली के घर से कुछ ही दूरी पर स्थानीय निवासी जंगली उर्फ जय प्रकाश की किराने की दुकान में लगे सीसीटीवी कैमरे में 12 बजकर 44 मिनट पर घायल अवस्था में श्याम घर की तरफ आते हुए दिखाई दिया। जबकि इससे पूर्व 10:30 बजे के बाद विपिन पुत्र राकेश, राहुल पुत्र रामचन्दर, पूनम पुत्री मुन्ना के साथ उक्त कैमेरे में श्याम कई बार आता—जाता दिखाई दिया था। मृतक श्याम की मां रामकली ने बताया कि उसके पुत्र श्याम ने पूनम पुत्री मुन्ना निवासी डेढ़ेमऊ थाना मलिहाबाद से कोर्ट मैरेज अर्थात न्यायालय के समक्ष विवाह किया था। रामकली ने बताया कि इसकी उसे जानकारी उसे होली दिन हुई थी।

रामकली ने कहाकि जब उसे इस विवाह की जानकारी हुई तो उसने पूनम के भाई सूरज, राज और उसके माता पिता से बात की। जिन्होंने शादी होने की बात को नकारा दिया। पूनम के घर वालों ने बताया कि पूनम विपिन से शादी करना चाहती है। रामकली ने बताया कि इसके बाद उसने पूनम से बात किया तो पूनम ने कहाकि श्याम मेरी जरूरतों को पूरा नहीं कर पायेगा। इसलिए वह उससे शादी नहीं करना चाहती हैं। उसने कहाकि वह विपिन से शादी करेगी। रामकली ने बताया कि इसी रंजिश में पूनम का भाई सूरज और आदित्य पुत्र इश्वरदीन ने कतिकी के गंगा स्नान के दिन रात में चलती हुई मोटरसाइकिल से मेरे पुत्र श्याम को धक्का मार दिया। इस घटना में मेरा पुत्र श्याम घायल भी हो गया था। श्याम की चोट लगने से नाक फट गया था। घटना स्थल से गुजर रहे अंकित निवासी मायापुरम ने श्याम को अस्पताल में ले जाकर इलाज करवाया। श्याम की नाक में सात टांके लगे थे। रामकली ने बताया कि आदित्य पुत्र ईश्वरदीन उसी के गांव है। पूनम आदित्य की रिश्ते में साली लगती है। अक्सर पूनम आदित्य के घर पर आती जाती थी। रामकली ने बताया कि घटना के दिन के 15 दिन पूर्व से ही पूनम आदित्य के घर पर ही रूकी हुई थी।

रामकली ने बताया कि घटना के रात श्याम के साथ पूनम, विपिन, राहुल कई बार आते जाते दिखे। जो जंगली के सीसीटीवी कैमरे में रिकार्ड है। विपिन के साथ अन्य लोग भी आते दिखे है। रामकली ने कहाकि जब उसका पुत्र श्याम मृत अवस्था में मिला तो उसके पूरे शरीर पर चोट के निशान थे। घुटना छिला हुआ था। दोनों पैरों का तलवा पूरी तरह से काला हो गया था। दाहिने पैर की अंगुली के नाखुन गायब थे। नाक और कान से खून बह रहा था। रामकली ने बताया कि श्याम की हत्या पूनम और विपिन ने ही उपरोक्त लोगों के माध्यम से करायी है। क्योंकि पूनम और विपिन दोनों की शादी करना चाहते थे। इसलिए ने पूनम और विपिन ने मेरे बेटे को रास्ते से हटाने के लिए उपरोक्त लोगों के साथ मिलकर हत्या करा दी। रामकली ने कहाकि वह पढ़ी लिखी नहीं है। इसलिए पुलिस ने तहरीर में जो बाते लिखने के लिए कही थी। पुलिस ने वह नहीं लिखा। रामकली ने कहाकि पुलिस से जब वह पोस्टमार्टम की रिपोर्ट मांगती है तो पुलिस रिपोर्ट तक नहीं देती है।

रामकली ने कहाकि उपरोक्त लोगों के साथ—साथ पुुलिस भी इस मामले में सुलह करने का जबरन दबाव बना रही है। पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी दी जा रही है। मगर उसके बावजूद भी पुलिस उसकी एक नहीं सुन रही है। रामकली ने कहाकि उसका पूरा परिवार हर डर—डर कर जी रहा है। मगर पुलिस कार्यवाही करने की बजाय आरोपियों के साथ साठगांठ कर उसे ही सुलह करने के लिए भयभीत कर रही है। 

 

 

 

30
April

नबाबी शौक पूरा कराने के लिए वन्य जीव संरक्षण विभाग करा रहा बाघों की हत्या

योगेश पाण्डेय

लखनऊ। वन्य जीवों पर हो रहे अत्याचार को रोकने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 1972 में भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम पारित किया था। इसका मकसद वन्य जीवों के अवैध शिकार, मांस और खाल के व्यापार पर रोक लगाना था। इस अधिनियम में वर्ष 2003 में संशोधन किया गया। जिसका नाम भारतीय वन्य जीव संरक्षण (संशोधित) अधिनियम 2002 रखा गया। इस अधिनियम के तहत दंड और जुर्माना के साथ कठोर सजा देने का भी प्रावधान किया गया था। मगर इस अधिनियम का इस्तेमाल सिर्फ वन संरक्षित क्षेत्रों में रहने वाले गरीबों और मजलूमों पर किया जाता है। मगर रसूखदार लोगों पर इस अधिनियम प्रयोग मात्र मजाक बन कर रह गया है। जिसका परिणाम है कि वन्य जीवों का शिकार प्रतिबंधित होने के बावजूद भी अमीरों के मनोरंजन का मात्र साधन बनकर रहा गया है। यही वजह है कि खुलेआम बड़े-बड़े धन्ना सेठों और नबाबों द्वारा वन्य जीव विभाग के अधिकारियों को नोटों की सूंघनी सूंघाकर वन्य परिक्षेत्रों में खुलेआम वन्य जीवों का धड़ल्ले से शिकार किया जा रहा है। यदि अमीर शिकारी प्रतिबंधित वन्य जीवों का शिकार करने में कामयाब हो जाते है तो वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी ऐसे वन्य जीवों की खुलेआम हत्या को छिपाने के लिए वन्यजीवों को मानव जीवन के लिए खतरनाक बताते हुए दस्तावेजों की खानापूर्ति कराते है और मीडिया को गुमराह कर या लोभ लालच देकर वन्य जीवों की हत्या को छिपाने के लिए वन्य जीवों को मानव जीवन के लिए खतरा बनाने का प्रोपोगण्डा रचवाते और उसका प्रचार करते है। ताकि उन्हें कानूनी स्वीकृति मिल जाये और उनके दामन पर वन्य जीवों की हत्या का दाग न लगे और ना ही उनकी भ्रष्ट कार्यशैली पर कभी सवाल उठे। मैनफोर्स समाचार पत्र पाठकों के समक्ष वर्ष 2009 में हुए ऐसे ही वन्य जीव की हत्या की वारदात का ससाक्ष्य वर्णन कर रहा है। जो इस प्रकार है:- पाठकों को बता दें कि 24 फ रवरी 2009 को फैजाबाद वन प्रभाग के कुमारगंज रेंज में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत संरक्षित वन्य जीव बाघ की हत्या कर दी गई। मगर इस बाघ की हत्या को वन प्रभाग फैजाबाद के प्रभागीय वनाधिकारी ओपी सिंह और सरयू वृत्त उप्र फैजाबाद के वन संरक्षक/क्षेत्रीय निदेशक आरएस मिश्रा ने आवश्यक बताते हुए वक्तव्य दिया कि उक्त बाघ मानव जीवन के लिए खतरानाक है। जबकि विगत दो-तीन दशक से आज तक की अवधि में वन प्रभाग फैजाबाद के कुमारगंज रेंज और रूदौली रेंज में कभी भी इस बात की सुगबुगाहट नहीं हुई कि उक्त वन प्रभाग परिक्षेत्र में किसी बाघ या अन्य वन्य जीवों ने मानव जीवन को हानि पहुंचायी हो। मगर वन प्रभाग फैजाबाद के प्रभागीय वनाधिकारी ओपी सिंह और सरयू वृत्त उप्र फैजाबाद के वन संरक्षक/क्षेत्रीय निदेशक ने अपने लखनऊ स्थित आकाओं के इशारे पर हैदराबाद के नबाब शफत अली के शिकार करने के नबाबी शौक को पूरा करने के लिए वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत संरक्षित वन्य जीव बाघ का शिकार करने की लिखित इजाजत दे दी। प्रतिबंधित वन्य जीव बाघ की हत्या कैसे, क्यों और किस प्रयोजन के लिए की गई। इसका पर्दाफाश सर्वप्रथम दिनांक 24 फ रवरी 2009 को प्रतिबंधित वन्य जीव बाघ को मारे जाने के संबंध में वन विभाग के द्वारा की गई कार्यवाही के पत्र से स्वत: हो जाता है। पाठकगण कृपया उक्त पत्र में उल्लेखित बातों को ध्यान पूर्वक अध्ययन करें, यथास्थिति स्वयं समझ में आ जायेगी। इस पत्र में यह उल्लेख किया गया है कि वन प्रभाग फैजाबाद के प्रभागीय वनाधिकारी ओपी सिंह और सरयू वृत्त उ प्र फैजाबाद के वन संरक्षक/क्षेत्रीय निदेशक ने यह उल्लेखित किया कि ट्रैकर्स टीमें कुमारगंज रेंज व रूदौली रेंज के स्थानीय वन कर्मी आज प्रात: ही बाघ की लोकेशन ज्ञात करने के लिए निकल पड़े थे। पत्र में उल्लेखित इस वाक्य से ऐसा प्रतीत हो रहा है। मानों उक्त बाघ मानव जाति के लिए हानिकारक नहीं बल्कि मानव जाति स्वयं उस बाघ के जीवन के लिए हानिकारक है। शायद यही वजह है कि एक बछिया की मौत पर वन विभाग के कर्मी आग बबूला होने का ढोंग रचते हुए एक राष्ट्रीय वन्य जीव की हत्या करने की साजिश कर रहे थे। अब सवाल यह है कि वन में बाघ बछिया का शिकार नहीं करेगा तो किसका करेंगा ? यदि वह शिकार नहीं करेगा तो खायेगा ? क्या उसके भोजन की व्यवस्था वन्य जीव प्रशासन ने कर रखी है ? यदि हां तो क्या ? उसे क्या खाने को दिया जाता है ? क्या उक्त वन में रहने वाले बाघों को प्रशिक्षित किया जाता  कि मानव जीवन या अन्य जानवरों को बाघ महाराज खतरा ना पहुंचाये ? क्या बाघों को सही और गलत सोचने की समझ विकसित करने के लिए वन विभाग के अधिकारियों द्वारा बाघों को प्रशिक्षित किया जाता है या वन विभाग बाघों के मस्तिष्क में सोच और समझ विकसित करने के लिए बाघों के शरीर में कोई इलेक्ट्रानिक चिप या डिवाइस लगायी जाती है ? ताकि बाघ महराज मानव जीवन या अन्य जीवों की सुरक्षा के संदर्र्भ में अपने मस्तिष्क में विचार विकसित कर सके ? यदि हां तो इसका जवाब तो वन विभाग के जिम्मेदारों को जरूर देना चाहिए। यदि ना तो कैसे वन विभाग ने यह निर्णय ले लिया कि उक्त बाघ मानव जीवन के लिए खतरा बना है ? भाई सीधी सी बात है कि बाघ या जंगली जानवर जंगल में नहीं रहेंगे तो क्या पिंजरे में रहेंगे ? जब मानव जाति स्वयं जंगल में जंगली जानवरों का शिकार करने और उन्हें अपने शौक के लिए हानि पहुंचाने का षडय़ंत्र करता है और इस बीच जानवर जब स्वयं की प्रतिरक्षा में मानव जाति को नुकसान पहुंचा देता है तो फिर उक्त जंगली जानवर दोषी कैसे ? जंगलों में प्रत्येक स्थानों पर यह लिखित रूप में अंकित किया जाता है कि जंगल में जंगली जानवरों का शिकार वर्जित है। जिधर जानवरों की संख्या ज्यादा रहती है। ऐसे क्षेत्रों में लिखित रूप अंकित गया होता है कि इस परिक्षेत्र में खतरनाक जानवर रहते है। आगे जाना मना है। कोई भी अप्रिय घटना हो सकती है। आदि आदि निर्देश वाक्य अंकित और मुद्रित किये गये होते है। यदि इसके बाद भी कोई मानव जाति उक्त प्रतिबंधित परिक्षेत्र में जाकर यदि वन्य जीवों का शिकार करता है और उसके साथ कोई अप्रिय घटना हो जाती है तो इसका दोषी कौन होगा ? वन्य जीव या मानव जाति ? इसका निर्धारण तो  पाठकगण और वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी स्वयं करें। पाठकों को स्पष्ट कर दें कि उक्त बाघ मानव जीवन के लिए खतरा नहीं था बल्कि वन विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों के लोभ और नबाब शफत अली खां के शिकार करने के नबाबी शौक उक्त बाघ के जीवन के लिए खतरा था। मानव जीवन की सुरक्षा की दुहाई देकर वन विभाग ने उक्त बाघ की नबाब शफत अली खां के शिकार के शौक को पूरा करने लिए हत्या कराने का षणयंत्र रचा था। खैर पुन: मूल मुद्दे पर आते है। पत्र में आगे यह भी उल्लेखित किया गया कि बकचुना वन रक्षक चौकी के समीप में ही बाघ के पद चिन्ह मिला व एक स्थान पर बाघ द्वारा मारी गई बछिया का मृत शव मिला। पाठकगण ध्यान दें कि यहां बछिया के शव के मिलने की बात कही गई है, ना कि मानव शव मिलने की बात कही गई है। इसके बाद पत्र में यह उल्लेख किया गया है कि बाघ के पद चिन्ह के आधार पर बाघ की लोकेशन बकचुना वन क्षेत्र में ही आंकी गई। अर्थात बाघ की हत्या करने के लिए उसकी तलाश वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा की जाने लगी ताकि नबाब शफत अली के शिकार के शौक को पूरा किया जा सके। इसके बाद उक्त पत्र में यह उल्लेखित किया गया कि बाघ द्वारा बछिया के मारे गये शव के मिलने की सूचना मिलते ही मौके पर श्री महेन्द्र सिंह मुख्य वन संरक्षक इको, प्रभागीय वनाधिकारी फैजाबाद, उप प्रभागीय वनाधिकारी फैजाबाद, क्षेत्रीय वनाधिकारी कुमारगंज पहुंचे। मौके का सूक्ष्म निरीक्षण कर बछिया के शव के पास ही आम के पेड़ पर मचान बनाने हेतु महेन्द्र सिंह मुख्य वन संरक्षक इको द्वारा निर्णय लिया गया। मचान आदि बनाने का कार्य अपरान्ह 2:00 बजे तक पूर्ण कर लिया गया। पाठकगण स्वत: ध्यान दें कि इस पत्र में कही भी यह उल्लेखित नहीं किया गया कि उक्त या किसी भी बाघ ने किसी मानव जाति को नुकसान पहुंचाया है। मगर मुख्य वन रक्षक ने बछिया की मौत को गंभीर विषय मानते हुए बाघ को मारने की इजाजत दे दी। दिलचस्प बात यह है कि बाघ के मारने का निर्देश बाद में दिया गया और बाघ को मारने की तैयारी पहले से ही की गई है। अर्थात बाघ की हत्या की साजिश पहले से ही तैयार की जा रही थी। इसी लिए तो पहले मचान बनाने का निर्देश दिया गया, उसके बाद बाघ को मारने का निर्देश दिया गया। यह सब कुछ इसलिए ताकि नबाब शफत अली खां के शिकार के शौक को पूरा किया जा सके। इस पत्र में आगे यह भी उल्लेखित किया गया कि वन क्षेत्र में दो अन्य मचान पर भी टीम बैठाने का निर्णय लिया गया। प्रमुख वन संरक्षक वन्य जीव उप्र लखनऊ ने दिनांक 24 फरवरी 2009 को ही नबाब हैदराबाद शफत अली को खां को इस बाघ को मारने के लिए अधिकृत कर दिया गया। अपरान्ह 5:00 बजे बछिया के शव के पास के मचान पर नबाब शफत अली खां बैठे थे। उनके साथ चिडिय़ाघर लखनऊ के कर्मी कमाल को सर्चलाइट दिखाने के लिए बैठाया गया। दूसरे मचान पर डिप्टी रेंजर संजय श्रीवास्तव तथा उनके साथ सर्च लाइट दिखाने के लिए वन रक्षक मदन गोपाल बैठे थे। तीसरे मचान पर डब्ल्यूटीआई के डा. एके सिंह व डा0 प्रशान्त बोरो अपनी ट्रांक्यूलाइजिंग गन (मूर्छित या बेहोश करने वाली बन्दूक) के साथ बैठे थे। ताकि बाघ को सामने आने पर ट्रांक्यूलाइज (मूर्छित या बेहोश) किया जा सके। पाठकगण ध्यान दें कि पत्र मेें नबाब शफत अली खां के साथ अन्य वनकर्मी और अधिकारी अगल-बगल मचानों पर बैठे बताये जा रहे है। साथ ही तीसरे मचान पर डब्ल्यूटीआई के डा. एके सिंह व डा. प्रशांत बोरो को ट्रांक्यूलाइजिंग गन (मूर्छित या बेहोश करने वाली बन्दूक) के साथ बैठा हुआ दिखाया गया। अर्थात इससे स्पष्ट हो रहा है कि बाघ को मारने की प्राथमिकता नहीं थी बल्कि उसे मूर्छित कर पकडऩे की प्राथमिकता थी। यह बात सत्य भी है कि लिखित रूप में बीके पटनायक प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक उत्तर प्रदेश ने अपने पत्र संख्या 2469-दिनांक 6 फरवरी 2009 को यह निर्देश दिया था कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 11(1)(ए) के प्राविधानों के अंतर्गत प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए उक्त बाघ को ट्रांक्यूलाइज/ट्रैप कर पकडऩे के लिए वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया नई दिल्ली के वन्य जीव विशेषज्ञ प्रशांत बोरों को प्राधिकृत किया था। फिर ऐसी क्या आवश्यकता आ पड़ी कि आनन-फानन में प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव उप्र ने दिनांक 24 फरवरी 2009 को उक्त बाघ को मारने के लिए अधिकृत कर दिया ? अब सवाल यह उठता है कि प्रमुख वन संरक्षक उक्त बाघ की सुरक्षा करते-करते कैसे अचानक उसे मारने का निर्देश दे दिये ? क्या उन्होंने अपने दिनांक 6 फरवरी 2009 के उपरोक्त पत्र पर विचार नहीं किया कि जिसमें उन्होंने उक्त बाघ को ट्रांक्यूलाइज करके जिन्दा पकडऩे का निर्देश दिया था ? क्या उक्त बाघ को मारने का निर्देश देते वक्त प्रमुख वन संरक्षक को यह आभास नहीं हुआ कि उन्होंने वन्य संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 11(1)(ए) का उल्लंघन किया और संरक्षित वन्य जीव की हत्या का अपराध कारित किया है? इस पत्र में उपरोक्त के बाद यह भी उल्लेखित किया गया कि वन्य जीव प्रभागीय वनाधिकारी फैजाबाद ने क्षेत्रीय वनाधिकारी कुमारगंज एवं रूदौली को निर्देशित कर बकचुना रौदपुर वन मार्ग को सायंकाल 4 बजकर 30 बजे सीलकर आवागमन अवरूद्ध करावा दिया। ताकि ट्रैक्टर आदि के आवागमन से अभियान बाधित ना हो। वनक्षेत्र में दो पिंजड़े भी लगाये गये थे। अंधेरा होने तक डब्ल्यूटीआई के मचान पर बाघ नहीं आया। महेन्द्र सिंह मुख्य वन संरक्षक इको, प्रभागीय वनाधिकारी फैजाबाद, क्षेत्रीय वन अधिकारी कुमारगंज, डब्ल्यूटीआई के एके सिंह व डा. प्रशांत बोरो लगभग 300 मीटर की दूरी पर बकचुना वन चौकी पर बैठकर अभियान की सफलता की प्रतीक्षा करने लगे। पाठकगण अब ध्यान दें कि जब बाघ को ट्रांक्यूलाइज करने के लिए डल्यूटीआई के डा. एके सिंह व डा. प्रशांत बोरो अपनी ट्रांक्यूलाइज गन के साथ नबाब शफत अली की मचान के अगल-बगल स्थित मचान पर बैठे थे ताकि बाघ आये और उसे मूर्छित कर सके। मगर अचानक ऐसा क्या हो गया कि डल्यूटीआई के डा. एके सिंह व डा. प्रशांत बोरो 300 मीटर दूर बकचुना वन चौकी पर बैठकर अभियान की सफलता का इंतजार करने लगे ? जिस व्यक्ति के कंधे पर इस बात की जिम्मेदारी थी कि वह अपनी विशेषज्ञता से उक्त बाघ को मूर्छित करके पकड़ ले। मगर वही व्यक्ति बाघ की मौत का इंतजार करना लगा ? ये बात समझ से परे है। डा. प्रशांत बोरो और प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव की कार्यप्रणाली उनके स्वयं के उल्लेखित दस्तावेजों में ही संदिग्ध प्रतीत हो रही है। उक्त दस्तावेजों के अध्ययन मात्र से यह स्पष्ट होता है कि उक्त बाघ मानव जीवन के लिए नहीं बल्कि वन विभाग और नवाब शफत अली खां के नबाबी शौक उक्त बाघ के जीवन के लिए खतरा था। मगर अफसोस कि उस अनबोलते बाघ ने 10 साल बाद आज अपनी हत्या की कहानी चिल्ला-चिल्ला कर बयां करने के लिए लोगों को विवश कर दिया है। उक्त बाघ ने अपने हत्यारों के लोभ और उनकी दूषित मानसिकता और कार्यशैली का इतने दिन बाद भाण्डा फोड़ दिया कि कैसे एक व्यक्ति के शिकार के शौक को पूरा करने के लिए वन्यजीव प्रशासन ने इतनी बड़ी साजिश की। उपरोक्त के बाद इस पत्र में यह वर्णित किया गया कि अपरान्ह लगभग 6:40 बजे बाघ के बछिया के शव के पास आने का आभास बछिया के शव के पास मंडरा रहे घरेलु कुत्तों को हुआ। बाघ कुत्तों पर हल्का गुर्राया भी, जिससे कुत्ते भाग गये। इस गुर्राहट से मचान पर बैठे नबाब हैदराबाद शफत अली खां व कमाल सावधान हो गये। तभी कमाल को अपरान्ह 6:50 बजे बछिया के शव के पास बाघ के आने का एहसास हुआ। तुरन्त कमाल ने सर्चलाइट का प्रकाश बाघ के ऊपर डाला। नबाब शफत अली खां ने बिना कोई विलम्ब किये बाघ पर गोली दाग दी। बाघ रोशनी की तरफ झपटा, तब तक नबाब शफत अली खां ने बाघ पर दूसरी गोली दाग दी। बाघ पुन: झपट कर गिर गया। नबाब शफत अली खां ने तीसरी गोली बाघ के सिर में मार दी। इस गोली के बाद बाघ उठ नहीं सका। कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद बाघ की मृत्यु सुनिश्चित हो गई। पाठकगण ध्यान दे कि बाघ को ट्रांक्यूलाइजर गन से ट्रांक्यूलाइज नहीं किया गया और ना ही ट्रांक्यूलाइज करने का प्रयास किया गया। जबकि पत्र में उल्लेखित किया गया है कि नबाब शफत अली के बगल में तीसरे मचान पर डब्ल्यूटीआई के डा. एके सिंह व डा0 प्रशान्त बोरो अपनी ट्रांक्यूलाइजिंग गन (मूर्छित या बेहोश करने वाली बन्दूक) के साथ बैठे थे। जब तीसरे मचान पर डब्ल्यूटीआई के डा. एके सिंह व डा0 प्रशान्त बोरो अपनी ट्रांक्यूलाइजिंग गन लेकर बैठे थे तो उन्होंने क्यों नहीं बाघ को मूर्छित करने का प्रयास किया ? ऐसी क्या वजह थी कि नबाब शफत अली खां ने बाघ को गोली मार दी ? नबाब शफत अली खां को किस हैसियत से प्रमुख वन संरक्षक उत्तर प्रदेश ने बाघ को गोली मारने की इजाजत दी थी। जब बाघ को आराम से मूर्छित किया जा सकता था तो फिर उसे गोली क्यों मारी गई ? कही ऐसा तो नहीं कि प्रमुख वन संरक्षक ने एक तीर से दो निशाना किया हो ताकि नबाब शफत अली के नबाबी शौक के बदले मोटी कमाई भी मिल जाये और बाघ के खाल को भी अवैध तरीके से बेचकर मोटा धन प्राप्त हो जाये? पाठक ध्यान दें कि बाघ को आराम से मूर्छित करके पकड़ा जा सकता था। मगर धन लोभ के कारण प्रमुख संरक्षक वन्य जीव उत्तर प्रदेश, प्रभागीय वनाधिकारी फैजाबाद और क्षेत्रीय वन संरक्षक सरयू वृत्त फैजाबाद ने नबाब शफत अली खां के नबाबी शौक को पूरा करने के लिए उक्त संरक्षित वन्य जीव बाघ की हत्या करा दी। बाघ की इस हत्या को छिपाने के लिए वन्य जीव प्रशासन ने खूब कागजी घोड़े दौड़ाये। मगर अफसोस की वन्य जीव प्रशासन स्वयं के बुने गये कागजी दस्तावेजों के जाल में फंस गया। इस पत्र में आगे यह भी उल्लेखित किया गया कि बाघ के मारे जाने के बाद महेन्द्र सिंह मुख्य वन संरक्षक इको, ओपी सिंह प्रभागीय वनाधिकारी फैजाबाद, जावेद अख्तर उप प्रभागीय वनाधिकारी फैजाबाद व एपी यादव क्षेत्रीय वनाधिकारी कुमारगंज, थानाध्यक्ष खण्डासव व अन्य वनकर्मी मौके पर पहुंच गये। घटना स्थल का निरीक्षण किया गया व बाघ के शव का भी निरीक्षण किया गया। आसपास के गामीणों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। अत: बाघ के शव को उठवाकर कुमारगंज विश्रामगृह ले जाने का निर्णय लिया गया। तत्काल सरकारी कैम्पर पर बाघ के शव को सुरक्षित व सम्मानजनक रूप से रखकर कुमारगंज वन विश्रामगृह लाया गया। मौके पर वन संरक्षक सरयू फैजाबाद भी पहुंच गये। वन विश्राम गृह पर ग्रामीणों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। पाठकों को बता दें कि यह भीड़ इसलिए नहीं बढ़ रही थी कि लोग मरे हुए बाघ को देखने के लिए आ रहे है बल्कि यह भीड़ इसलिए बढ़ रही थी कि वन्य जीव प्रेमियों और वन्य जीव प्रेमी सामाजिक संगठनों ने इस संरक्षित वन्य जीव बाघ के मारे जाने का विरोध शुरू कर दिया था। यह विरोध इतना व्यापक हो गया था कि वन्य जीव प्रशासन और पुलिस प्रशासन को वन्य जीव प्रेमियों और वन्य जीव संरक्षण संस्थाओं की भीड़ के विरोध के दबाना मुश्किल हो गया था। इसी विरोध के स्वर को दबाने के लिए प्रभागीय वनाधिकारी फैजाबाद ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक फैजाबाद से अनुरोध कर पर्याप्त पुलिस बुलवा लिया था। प्रमुख वन संरक्षक वन्य जीव उप्र लखनऊ द्वारा इस बाघ के शव को पोस्टमार्टम के लिए आईपीआरआई बरेली भेजने का निर्देश दिया गया। प्रमुख वन संरक्षक वन्य जीव उप्र लखनऊ के निर्देश के क्रम में प्रभागीय वनाधिकारी फैजाबाद ने अपने पत्रांक मेमो/35-5 दिनांक 24 फरवरी 2009 के द्वारा क्षेत्रीय वन अधिकारी कुमारगंज के नेतृत्व में गठित टीम के साथ बाघ के शव को आईवीआरआई बरेली रात्रि 9:30 बजे भेज दिया गया। पाठकगण ध्यान दें कि बाघ के शव को बरेली तो भेज दिया और पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी तैयार कर दी गई। मगर अफसोस की पोस्टमार्टम के बाद बाघ के मृत शव का क्या किया गया और उसके शव से उतारी गई खाल का क्या हुआ है ? यह सवाल सुनते ही सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश वन्य जीव संरक्षण विभाग और नबाब शफत अली का नबाबी शौक काफूर हो जाता है। पोस्टमार्टम के बाद बाघ के मृत शव का क्या किया गया और उसके शव से उतारी गई खाल का क्या हुआ है ? समाचार पत्र में स्थान के अभाव के कारण इसका पर्दाफाश आगामी अंको में क्रमवार जारी रहेगा। 

नबाब के नबाबी शौक को पूरा करने के लिए वन्यजीव संरक्षण विभाग ने की बाघ की हत्या

पाठक ध्यान दे कि उप्र वन्यजीव विभाग उत्तर प्रदेश ने फैजाबाद के कुमारगंज रेंज में बाघ की हत्या हैदराबाद के नबाब के नबाबी शौक को पूरा कराने के लिए कराया था। जबकि वन्यजीव प्रशासन ने यह तर्क दिया कि उक्त बाघ मानव जीवन के लिए हानिकारक था। यदि उक्त बाघ मानव जीवन के लिए हानिकारक था तो फिर तो स्थानीय नागरिकों ने बाघ के मारें जाने का विरोध क्यों किया ? क्यों वन्यजीव संरक्षण संस्थाओं ने वन्यजीव संरक्षण विभाग उत्तर प्रदेश और नबाब हैदराबाद शफत अली खां के द्वारा किये गये शिकार का विरोध किया ? क्या इन संस्थाओं और आम नागरिकों को मानव जीवन की सुरक्षा की चिन्ता नहीं थी कि वन्यजीव प्रशासन के इस फैसले का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया ? आम नागरिकों और वन्यजीव संरक्षण संस्थाओं के इस विरोध ने स्पष्ट कर दिया कि उक्त बाघ मानव जीवन के लिए खतरा नहीं था। जाहिर सी बात है कि उक्त बाघ की हत्या वन्यजीव प्रशासन ने अनैतिक रूप से कमाई करने के लिए हैदराबाद के नबाब शफत अली खां से साठगांठ किया। ताकि उनके नबाबी शौक को पूरा करके मोटी आमदनी की जा सके। इसलिए वन विभाग ने उक्त बाघ को मानव जीवन के लिए खतरा बताया और उसे मूर्छित करके जिन्दा पकडऩे का निर्देश दिया। कागजों में बाघ को जिन्दा पकडऩे का निर्देश दिया गया है। मगर जब तक उसको मारा नहीं जाता तो कैसे नबाब शफत अली खां की वीरता का परचम फहरता और उनका नबाबी शौक पूरा होता ? यदि बाघ को मारा नहीं जाता तो कैसे उसकी खाल को उतार अंतर्राष्ट्रीय बाजार में मोटी कीमत में बेचा जाता ? इसीलिए वन्यजीव प्रशासन ने बाघ को मूर्छित करने के अपने लिखित पत्र की परवाह नहीं कि और उसने हैदराबाद के नबाब शफत अली खां को बाघ की हत्या करने की खुली छूट दे दी। 

 

किस हैसियत से एक स्पोर्टस शूटर को वन्यजीव की हत्या की दी गई इजाजत ?

पाठकों को बता दें कि नवाब शफत अली खां और उनका पुत्र असगर अली खां ये दोनों स्वयं को राष्ट्रीय राइफल संघ का प्रसिद्ध निशानेबाज मानते है। मगर दोनों पिता-पुत्र निशानेबाजी की आड़ में वन्यजीवों का शिकार करते है। अक्सर कई राज्यों से यह देखने और सुनने को मिला कि हैदराबाद के नवाब शफत अली खां और उनके पुत्र असगर अली खां ने खूंखार बाघ का शिकार किया। पाठकों को स्पष्टï कर दें कि नबाब का नबाबी शौक सिर्फ बाघों को मारकर ही शांत होता है। अजीबगरीब बात यह है कि भारत के अक्सर राज्यों के प्रमुख वन्यजीव संरक्षकों द्वारा बाघों को मूर्छित कर पकड़वाने का निर्देश जारी किया जाता है। मगर बाघों को पकड़वाने के नाम पर हमेशा हैदराबाद के नबाब शफत अली खां और उनके पुत्र असगर अली खां से बाघों की हत्या करा दी जाती है। आखिर क्या बात है कि हैदराबाद के नबाब से ही सभी राज्यों के प्रमुख वन संरक्षकों द्वारा बाघों को पकड़वाने के नाम पर बाघों की हत्या करा दी जाती है। क्या हैदराबाद के नबाब वन्यजीव संरक्षण विभाग के अधिकारी या कर्मचारी या कुछ अन्य पदों की जिम्मेदारी देखते है? यदि हां तो इसकी जानकारी वन्यजीव संरक्षण विभाग के अधिकारियों द्वारा वर्णित क्यों नहीं किया जाता है ? पाठकों को बता दें कि प्रत्येक राज्यों में मारें गये खूंखार बाघों का पोस्टमार्टम तो किया जाता है मगर उसकी खाल और उसका शव गायब हो जाता है। कही भी बाघ के शव और उसकी खाल की जानकारी नहीं दी जाती है। क्योंकि बाघों की हत्या इसलिए करायी जाती है कि ताकि उसके खालों की तस्करी करायी जा सके। 

वन विभाग हर बार क्यों हैदराबाद के नबाब शफत अली खां को ही आमंत्रित करता है ? 

वन्यजीव विभाग हमेशा बाघों को मारने के अभियान में क्यों हैदराबाद के नबाब शफत अली खां को ही आमंत्रित करता है ? यह एक गंभीर जांच का विषय है। प्रत्येक अभियान में क्यों सिर्फ शफत अली खां ही बाघों को मारते है ? क्या वन्यजीव संरक्षण विभाग हर बार बाघों को ट्रांक्यूलाइज करने में असफल हो जाता है कि नबाब शफत अली खां  को बाघों को गोली मारने के लिए विवश होना पड़ता है। क्या वन्य  जीव संरक्षण विभाग के वन रक्षक और विशेषज्ञ इतने अक्षम है कि वे हर बार विफल हो जाते है कि अभियान सफल बनाने के लिए हैदराबाद के नबाब शफत अली खां को आमंत्रित करना पड़ता है ? कई साक्षात्कारों में नबाब शफत अली खां द्वारा यही दावा किया गया है। आखिर क्या कारण है कि इन साक्षात्कारों में वन्य जीव संरक्षण विभाग को अक्षम बताने वाले हैदराबाद के नबाब शफत अली खां को वन्यजीव प्रशासन बर्दाश्त करता है ? कही सचमुच में तो नहीं वन्यजीव संरक्षण विभाग अक्षम है ? जिसकी वजह से खामोश है। 

आखिर कौन है शफत अली खां ? 

शफत अली खां के पूर्वज शिकारी थे। शफत अली खां ने वर्ष 1963 में 10 वर्ष की आयु में एक चित्तीदार हिरण को गोली मार दिया था। मगर इस तथ्य पर ध्यान दिये बगैर कि भारतीय हथियार अधिनियम 1959 के अनुसार हथियार को संभालने के लिए कानूनी आयु 12 वर्ष होती है। उन्हें इसके लिए राज्यपाल द्वारा पुरस्कृत कर दिया गया। उस वक्त राज्यपाल ने भी यह विचार नहीं किया कि जीवन को मारना खेल नहीं  है बल्कि यह शिकारी के लिए अपने शिकार की इच्छा को तृप्त करने का माध्यम होता है। इन्हें कई बार नक्सलियों और माओवादी नेताओं को हथियार की आपूर्ति करने के आरोप में गिरफ्तार भी किया था। मगर ऊंची रसूख के दम पर शफत अली खां बरी हो गया। शेष जानकारी अगले अंक में उल्लेखित की जायेगी। 

 

 

 

10
April

डोर टू डोर कूड़ा कनेक्शन के नाम पर करोड़ों का खेल

मैनफोर्स

लखनऊ। स्वच्छ भारत अभियान के नाम पर कैसे जनपद प्रतापगढ के विकास भवन में भ्रष्टाचार का खेल अंजाम दिया जा रहा है। स्वच्छता अभियान के लिए जागरूकता के नाम पर 17 ब्लाकों में कार्यशाला और नुक्कड़ नाटक आदि कार्यों के नाम पर 8 करोड़ 15 लाख रुपये का बंदरबांट कर दिया। मगर किसी को कानों कान खबर तक नहीं हुई। एक कहावत है कि पानी में की गई गंदगी छुपती नहीं है। वो एक दिन जरूर बाहर आती है। ठीक इसी प्रकार भ्रष्टाचार की भी कार्यशैली है। कितने भी शातिराने तरीके से भ्रष्टाचार किये गये हो। वो एक ना एक दिन उजागर जरूरत होते है। उपरोक्त ब्लाकों में स्वच्छता अभियान के लिए जागरूकता के नाम पर किये गये भ्रष्टाचार जब गंधाने लगा तो पता चला कि इस भ्रष्टाचार की गंदगी ईमानदारी का ढोंग पीटने वाले तत्कालीन सीडीओ प्रतापगढ़ राजकमल यादव ने की है। शासन ने भी आननृफानन में भ्रष्टाचार की गंदगी फैलाने वाले सीडीओ राजकमल यादव को हटाकर अपने दायित्वों की इतिश्री कर ली। मगर शासन ने जांच बैठाने में परहेज किया। क्योंकि यदि जांच हो जाती तो शासन स्तर पर भी भ्रष्टाचार की गंदगी फैलाने वालों के नामों का उजागर होने लगता। तब शासन-सत्ता किस-किस को हटाकर अपना दामन बेदाग होने से बचाती है? शायद इसलिए शासन ने इस मामले में अभी तक जांच नहीं बैठायी। जिला पंचायत राज अधिकारी उमाकांत पांडेय के कंधों पर शासन ने भले सीडीओ राजकमल के पद की जिम्मेदारी सौंप दी हो। मगर 8 करोड़ 15 लाख का यह घोटाला अभी जिला पंचायत प्रतापगढ़ और शासन के आलाधिकारियों के गले की फांस बना हुआ है। पाठकों को बता दें कि यह लूट जनपद प्रतापगढ के 17 ब्लाकों में की गई है। नगरपालिका प्रतापगढ़ के 25 वार्डों में डोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन का कार्य कराना था। नगरपालिका में ठेकेदारी पद्धति से डोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन और उसके निष्पादन के लिए ग्वालियर मध्य प्रदेश की एक कम्पनी को ठेका दिया गया था। इसके पहले भी इसी ग्वालियर की कम्पनी को उक्त कार्य के लिए ठेका दिया गया था। उक्त कम्पनी की नगरपालिका के संसाधनों से नगरपालिका के सभी 25 वार्डो के कूड़े को डोर टू डोर एकत्रित कर उसे डम्पिंग प्वाइंट तक ले जाकर नगर को साफ  सुथरा व स्वच्छ बनाने की जिम्मेदारी थी। इस कार्य को नगरपालिका ने अपने पिछले कार्यकाल में प्रारम्भ किया था। जिसे बीच में ही बंद कर दिया गया था। अब पुन: उसे जीवित कर जेब भरने की तैयारी प्रारम्भ हो चुकी है। अंधेरगर्दी का आलम यह है कि पिछले कार्यकाल में नगरपालिका में एक माह में 20 लाख रुपये तक का भुगतान सिर्फ  डोर टू डोर कूड़ा निष्पादन के लिए खर्च किया जाता था। यदि इसमें किसी का शोषण हुआ था तो वे सिर्फ सफाई कर्मी है। जो कागज पर वेतन तो पाते थे 7 हजार और फर्म काटकर उन्हें 4 हजार रूपये देती थी। जबकि कूड़ा तौलकर बिलिंग की जाती थी और उसी तौल में घपले घोटालों को अंजाम दिया जाता था। बिलिंग कार्य के लिए सफाई पटल प्रभारी और सफाई इंस्पेक्टर की रिपोर्ट लगती है। तब कार्य करने वाली फर्म का भुगतान हो पाता है। इस 20 लाख में पचास फ ीसदी रकम चेयरमैन और अधिकारियों के कमीशन के काम आती थी। अर्थात नगरपालिका में सिर्फ स्वच्छता के नाम पर 10 लाख की कमाई स्वघोषित ईमानदारों की हो जाती थी। इसका खुलासा तब हुआ जब पिछले कार्यकाल में चेयरमैन रहे हरि प्रताप सिंह अपने मनपसंदीदा ईओ लाल चन्द्र भारती को लाकर महज पन्द्रह दिनों में करोड़ो रूपये का भुगतान थोक भाव में कर दिया। विवादित से विवादित धूल वाली सभी फाइलों का भुगतान उस वक्त चेयरमैन हरि प्रताप सिंह के इशारे पर ईओ लाल चन्द्र भारती ने कर दिया था। मजे की बात यह है कि डोर टू डोर वाली फाइल का भुगतान तो तत्कालीन सफाई इंस्पेक्टर ऋषिपाल सिंह के बिना हस्ताक्षर से ही कर दिया गया था। इस बात की जानकारी मुख्यमंत्री के जनसुनवाई पोर्टल आईजीआरएस पर ऑनलाइन शिकायत के माध्यम से दी गई। मामले की जांच करायी गई। जांच में पाया गया कि भुगतान गलत तरीके से किया गया है। शासन को रिपोर्ट भी प्रेषित की गई थी। मगर मामला ठांय-ठांय फिस्स हो गया और उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। उक्त फर्म की निविदा अवधि खत्म हो गई और उसके बाद उसका समय नहीं बढ़ाया गया। चूँकि तत्कालीन ईओ अवधेश कुमार यादव और सफाई इंस्पेक्टर रहे ऋषिपाल सिंह से ठेकेदार का विवाद गहरा गया। इस वजह से चेयरमैन रहे हरि प्रताप सिंह का इन अधिकारियों से व्यवहारिक पक्ष का कमजोर हो गया। इसी बीच निकाय चुनाव 2017 सम्पन्न हुआ। जिसके बाद विगत 15 माह से नगर पालिका अपने सफाई कर्मियों से ही सफाई का कार्य कराती रही। मार्च माह में पुन: ग्वालियर की फर्म को उक्त ठेका फिर से आवंटित किया गया। अर्थात इस कार्यकाल में भी डोर टू डोर के मद से लाखों रुपये कमीशन के मिलने की पूरी व्यवस्था की गई। इससे तो यही सिद्ध हुआ कि पूर्व चेयरमैन हरि प्रताप सिंह जो कार्य अपने कार्यकाल में किये थे। वही सारे कार्य अपनी पत्नी प्रेम लता सिंह के चेयरपर्सन रहते उनके हस्ताक्षर से कराना प्रारम्भ कर दिये। एक वर्ष तक बच बचाकर कार्य करने के बाद अब चेयरपर्सन प्रेमलता सिंह के पति हरि प्रताप सिंह फिर से नगरपालिका को दोनों हाथों से लूट रहे है। 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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