13
October

आवास का पैसा खाकर ग्राम प्रधान कर रहा दबंगई, जनता को बना रहा मूर्ख

मैनफोर्स

बहराइच। आज के महंगाई के इस दौर में किसी भी चीज के बारे में जानकारी ली जाए तो सोने के भाव सा प्रतीत हो रहा है। ऐसे में कोई किसी को आर्थिक रूप से परेशान करता है या फिर मूर्ख बनाता है तो इसका अंदाजा आप लगा सकते है कि किसी पर क्या बीतेगी। मगर इन सारी बातों का जिम्मेदारों पर कोई फर्क दिखाई नहीं पडता है। आदमी इंसानियत के प्रति भाव शून्य होता जा रहा है। नतीजा लोगों को लोगों का शोषण करते हुए प्रताडित करते हुए देखा जा सकता है। इसी प्रकार का शोषण और प्रताडना का एक उदाहरण जनपद बहराइच के ब्लॉक फखरपुर के ग्राम सुरजना खुर्द में देखने को मिल रहा है। सरकार आम आवाम को आवासीय सुविधा का लाभ मुहैया कराने के लिए लोगों प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत सब्सिडी का लाभ दे रही है। जनपद में ग्राम प्रधानों द्वारा उन लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत सब्सिडी दी जा रही है, स्वयं का मकान बनावने के इच्छुक है। यूं तो ग्राम प्रधानों द्वारा सब्सिडी की रकम की 1 लाख 20 हजार रूपया दिलाया जा रहा है।

मगर इस सब्सिडी की रकम को दिलाने के लिए कुछ ग्राम प्रधानों द्वारा आम आवाम से 20 हजार रूपये की कमीशन की मांग की जाती है। इसके बाद इन लोगों के द्वारा उक्त सब्सिडी की रकम पास करायी जाती है। वही कुछ ऐसे भी प्रधान है जो लोगों का प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ दिलाने के नाम पर 1 लाख 20 हजार की पूरी रकम में आधे से ज्यादा का घूस अर्थात कमीशन की मांग कर रही है। ऐसे ही प्रधानों की सूची में ग्राम प्रधान सुरजना खुर्द त्रिलोकी सिंह का नाम सबसे ऊपर है। कुछ प्रधान तो दाल में हल्का नमक दाल कर खाना चाहते है। मगर त्रिलोकी सिंह पूरी की पूरी दाल ही खा जाने की कहावत को चरितार्थ कर रहे है। त्रिलोकी सिंह प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत ग्रामीणों का मकान बनवाने के नाम पर ग्रामीणों को मिलने वाली सब्सिडी की रकम में से आधा रकम बतौर कमीशन के रूप में मांग रहे है। सूत्रों का कहना है कि ग्राम प्रधान द्वारा जो पैसा आवास के लिए ग्रामीणों को दिलाया जाता है। उसमें ग्राम प्रधान त्रिलोकी सिंह आधा हिस्सा मांगते है। जो नहीं देता है उसको आवास ही नहीं देते और कहते कि आपका आवास के लिए ससब्सिडी नहीं मिली है। ग्राम प्रधान की इस प्रकार की अनैतिक कार्यशैली की शिकायत उपरोक्त ग्राम के निवासी हसमत अली ने बताया कि ग्राम प्रधान ने उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास बनाये जाने को लेकर दिये जाने वाले सब्सिडी की रकम को दिलाने के लिये उससे पहली किस्त में 10 हजार रूपया लिया कमीशन लिया था। अब सब्सिडी की राशि दिलाने के लिए उनके द्वारा सब्सिडी की 1 लाख 20 हजार रूपये की धनराशि का आधा पैसा बतौर कमीशन के रूप में मांगा जा रहा है। हसमत ने बताया कि पैसा कर्ज लेकर किसी तरह से आवास बनवाया था। उन्होंने बताया कि आवास बनवाने के लिए जो भी मैने पैसा कर्ज लिया था। उसका कर्ज मैं अभी तक भर नहीं पाया हूं। उन्होंने कहाकि वे इसके बारे में ग्राम प्रधान त्रिलोकी सिंह से बताया  तो उन्होंने कहा कि अगर सब्सिडी की रकम का आधा पैसा दे दो तो हम तुम्हारी सब्सिडी की रकम को पास करा देंगे। हसमत ने बताया कि ग्राम प्रधान ने मेरा पासबुक भी ले लिया है। वे कह रहे है कि जब तक सब्सिडी की रकम का आधा पैसा नहीं दोगे तब तक मैं न तो तुम्हारा पैसा पास कराऊंगा और ना ही मैं तुम्हारा पासबुक दूंगा। हसमत अली ने बताया कि गांव में इस प्रकार की प्रताडना का शिकार कई लोग है।

हसमत अली ने बताया कि ग्राम प्रधान ने ऐसे भी लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत सब्सिडी का लाभ दिला दिया है। जो वास्तव में पात्र ही नहीं है। जो पात्र है उन्हें इनके द्वारा सब्सिडी का लाभ दिया ही नहीं जा रहा है। हसमत अली ने बताया कि ग्राम प्रधान उनको इस वजह से सब्सिडी का लाभ नहीं दिला रहे है कि दे रहे हैं। हसमत ने बताया कि ग्राम प्रधान का कहना है कि उसके समुदाय के लोग वोट इन को नहीं दिये है दिया था और कहा भी कि आप लोगों को ना तो हमने आवास दिया है और ना ही देंगे। आपको जो करना है वह कर लीजिए अगर हम आवास देंगे तो भी सिर्फ उन्हीं को देंगे, जिन्होंने हम को वोट दिया है इसके अलावा हम किसी को भी आवास नहीं देंगे। कुछ ग्रामिणों ने कहा हम आपके ऊपर कार्रवाई करेंगे तो ग्राम प्रधान ने कहा कि आप कुछ भी कर लीजिए आप हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। इस मामले की शिकायत गांव वालों ने ब्लॉक फखरपुर में जाकर किया लेकिन इसके बावजूद कोई भी कार्यवाही नहीं की गई बल्कि उलटे ही ग्राम विकास अधिकारी ने ग्रामिणों को गाली देकर भगा दिया। ग्राम विकास अधिकारी ने कहाकि आप लोग आवास पाने के लायक नहीं हैं। लोग के घरों का यह हाल है कि लोग फूस के छप्पर ओर तीरपाल व प्लास्टिक की पन्नी से अपना सिर छुपाने के लिए विवश है।

रिपोर्ट: मोहम्मद इरशाद 

 

 

 

 

23
September

मैनफोर्स 

बहराइच। उत्तर प्रदेश के हर गांव में जहां कहीं भी देखा जाए समस्या ही समस्या नजर आती है। कहीं सड़क की समस्या है,तो कहीं नाली की समस्या है। कहीं बीमारी की समस्या है, तो कहीं कुछ अन्य समस्या है। बहर हाल आप जिधर भी देखेंगे कोई ना कोई मामलात सामने आते ही रहते हैं। इसी प्रकार यूपी के बहराइच जनपद में सडक की समस्या व्यापक पैमाने पर व्याप्त है। कहीं सड़क कि सफाई नहीं हो रही है तो कहीं नाली गंदी पड़ी है। जिसकी वजह से पानी ना निकल पाने से सड़क जलभराव हो जाता है और जो नित नई—नई बीमारियां पांव पसारने लगती है। हर शख्स इस प्रकार की परेशानियों से परेशान है। समाचार पत्रों में आये दिन सरकार सिर्फ विकास के दावे करती है। मगर विकास कहां और किसका हुआ है। यह सभी जानते है। अगर वास्तव में विकास हुआ होता तो गांवों की सडकों की दशा बदल जाती है। आवाम बेरोजगारी का दंश नहीं झेलता। सरकार की अव्यवस्था से लोग त्राहि—त्राहि नहीं करते। अगर वास्तव में देखा जाये तो सरकार ने विकास के नाम पर एक ढेला तक नहीं फोडा है। सरकारें सिर्फ और सिर्फ विकास का ढोंग कर रही है। सोशल मीडिया पर आम आवाम को गुमराह कर रही है। सरकार के विकास के दावों की एक दास्तां जनपद बहराइच के क्षेत्र थाना कैसरगंज के ग्राम भर्खुर पुरवा में देखने को मिल रहा है। यहां के लोगों का कहना है कि जब से हम लोग यहां रह रहे हैं। आज तक ना तो हमारे सामने ना कोई सफाई करने वाला आया है और ना ही कोई नाली साफ करने वाला आया है। चोक नालियों की वजह से बरसात का पानी घरों में घुस जाता है। आम सीजन में लोगों के घरो का पानी सडक पर खुलेआम बहता दिखाई देता है। सडक ये गंदे पानी आये दिन नई—नई बीमारियों को दावत देती रहती है। पानी की निकास नहीं होने की वजह से गंदा पानी सडक पर फैला रहता है। जिससे सडक पर चलना दुश्वार हो जाता है। वाहन चलाने वालों को यह पता नहीं चल पाता है कि सड़क पर किस जगह गड्ढा है और किस जगह बराबर है। जिससे आम आवाम को सडक पर चलते हुए धोखा हो जाता है और वह दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है। ग्राम भर्खुर पुरवा में होटलों के सामने सड़क के ऊपर जो गड्ढे हैं। उसने पानी भरे रहने की वजह से आम आवाम और होटल वालों को भी काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है प्रधान से  इसके बारे में जब कहा जाता है, तो प्रधान का कहना है कि वह इसके बारे में कुछ भी नहीं जानता है। वह कहता है कि हम को सरकार की तरफ से सड़क साफ कराने के लिए या इसके बारे में कोई भी पैसा नहीं मिलता है। प्रधान के इस बोल से सरकार के विकास के दावों की हकीकत स्वत: बयां हो जा रही है। 

प्रधान करें मजा और अवाम काटें सजा

सूबे में जब से भाजपा की सरकार बनी है। तबसे लगातार आम आवाम के साथ विकास के झूठे वादे किये जा रहे है और लोगों को बेवकूफ बनाया जा रहा है। इसका एक छोटा सा उदाहरण उत्तर प्रदेश के जनपद बहराइच के थाना  बौंडी क्षेत्र के ग्राम जिहुरा मरौचा में देखने को मिल रहा है। यहा अल्प आय वाले गरीब व्यक्तियों की तादाद कम से कम 70 प्रतिशत है। ऐसे लोगों के पास ना तो रहने के लिए कोई घर है और ना खाने के लिए राशन है। इतना ही नहीं सिर छिपाने के लिए खास फूंस के छप्पर से अधिक कोई साधन नहीं है। फिर भी सरकार खुद को गरीबों का माई—बाप मान रही है। फिर भी मजदूरों को उनके छोटे-छोटे मासूम बच्चों को कभी—कभी भूखा भी रहना पड़ता है। गरीबी की वजह से बड़ी ही समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। यूं तो सरकार गरीबों का पेट पालने के लिए सस्ते दर पर राशन मुहैया कराने का दावा करती है। मगर इन गरीबों का राशन कोटेदारों के भ्रष्टाचार का शिकार हो जाता है। जिससे इन्हें पेट भरने के लिए राशन के लिए जद्दोजहद करनी पड रही है। यहां के बच्चे सरेआम पेटे पालने के लिए होटलों पर काम कर रहे है। मगर सरकार को यह बाल श्रम दिखाई नहीं दे रहा है। जिन बच्चों को स्कूल जाना चाहिए। वे सरेआम होटलों काम करते देखे जा रहे है। फिर सरकार विकास के दावों को ताल ठोक के बयां कर रही है। 

रिपोर्ट—मो. इरशाद

 

 

 

10
August

स्कारपियों सवार युवकों ने अधिवक्ता को जान से मारने की नियत से बाइक में मारी टक्कर

मैनफोर्स

लखनऊ। राजधानी के पीजीआई थाना क्षेत्र के वृन्दावन कालोनी निवासी हाईकोर्ट के अधिवक्ता अनिल यादव को 10 अगस्त की रात करीब साढे ग्यारह—बारह बजे के आसपास एक काली रंग की स्कारपियों कार नम्बर यूपी 32 एचयू 2835 ने जानबूझकर ठोकर मार दी। इसके बाद से स्कारपियों में सवार कुछ लोगों ने अधिवक्ता अनिल यादव को जान से मारने के लिए दौडाया।

अनिल यादव मौके पर गाडी छोडकर अपना जान किसी प्रकार से बचाकर भाग निकले। अनिल के मुताबिक दिनांक 10 अगस्त की शाम करीब 5—6 बजे के आसपास उनके एक अधिवक्ता मित्र हाईकोर्ट से प्रेक्टिस करके अपने घर जा रहे थे। पीजीआई थाना क्षेत्र वृन्दावन कालोनी के आसपास कुछ युवक अवैध खनन करके टैक्टर से मिट्टी लेकर जा रहे थे। तभी उनके अधिवक्तता मित्र के कार को टैक्टर सवार युवकों ने टक्कर मर दी। जिससे दोनों लोगों के बीच वाद—विवाद शुरू हो गया।

 

टैक्टर सवार युवकों ने कहाकि तुम जानते नहीं हो कि हम लोग भुल्लन तिवारी के आदमी है। इतनी बात कहते हुए टैक्टर सवार युवकों ने अनिल यादव के अधिवक्ता मित्र से भिड गये। मामला गंभीर होने के बाद अधिवक्ता अनिल यादव के मित्र थाना पीजीआई में मुकदमा दर्ज कराने गये। उन्हीं के साथ अधिवक्ता अनिल यादव भी थाने में थे। थाने से जैसे ही अनिल यादव अपने घर के लिए निकले और कुछ दूर आगे बढे ही थे कि तभी पीछे से काले रंग की स्कारपियों नम्बर यूपी 32 एचयू 2835 ने टक्कर मार दी।

जिससे अनिल यादव घायल हो गये। पहले तो अनिल यादव को समझ में नहीं आया मामला क्या है। मगर जैसे ही स्कारपियों ने अनिल यादव की बाइक में टक्कर मारी और वे गिरे। वैसे ही स्कारपियों में सवार कुछ युवक बाहर निकलकर अनिल यादव को मारने के लिए दौडाये। अनिल यादव अपनी जान बचाकर किसी प्रकार से भागे। खबर लिखे जने तक मामले में एफआईआर लिखे जाने की पुष्टि नहीं हुई है।

 

 

 

02
August

नेशनल पीजी कालेज के स्टेडियम निर्माण के लिए यूजीसी से मिले ग्रांट के घोटाले के आरोप में डा0 एसपी सिंह व प्रबंधक डा0 डीपी सिंह के खिलाफ दर्ज है मुकदमा

मैनफोर्स

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में आज भ्रष्टाचार चहुंओर अपनी जड़े धंसा चुका है। ऐसा कोई स्थान या ऐसा कोई संस्थान नहीं बचा है। जो भ्रष्टाचार की आंकठ में पूरी तरह से न डूब गया हो। चिकित्सा और शिक्षा जैसे सरकारी गैर सरकारी संस्थान जिन्हें समाज में भगवान का दर्जा हासिल है। जो व्यक्ति के जीवन से लेकर मरण तक उसके सम्पूर्ण विकास की भागीदारी सुनिश्चत करते है। ऐसे पवित्र संस्थान भी आज भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गये है। उत्तर प्रदेश के लखनऊ जनपद में ऐसा एक शैक्षिक संस्थान है। जिसके दो रूप दिखाई देते है। पहला रूप यह कि उस शैक्षिक संस्थान का जो मुखिया था। उसी के दम पर और उसकी कर्मठता की वजह से उस शैक्षिक संस्थान का नाम विख्यात हुआ। दूसरा यह कि उस शैक्षिक संस्थान के मुखिया ने ही न केवल छात्रों को ऑटोनॉमस कालेज के नाम पर धोखा दिया और छात्रों के विकास के नाम पर यूजीसी द्वारा दिये जाने वाले लगभग 7 करोड़ रूपये के ग्रांट का बंदरबांट किया बल्कि अपनी मातृ संस्थान के साथ भी विश्वासघात किया। अब इतनी बात उल्लेखित करने के बाद पाठक भी सोच रहे होंगे कि आखिर कौन सा शैक्षिक संस्थान और उसका मुखिया है? समाचार पत्र पाठकों को बता कि यह शैक्षिक संस्थान लखनऊ जनपद में महाराणा प्रताप मार्ग पर स्थिति नेशनल पीजी कालेज और उसके पूर्व प्रधानाचार्या एसपी सिंह जो वर्तमान में लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति है और उनके सहयोगी और नेशनल कालेज के प्रबंधक डीपी सिंह अर्थात दुर्गा प्रसाद सिंह यूजीसी के पूर्व सदस्य है। वर्तमान में नेशनल पीजी कालेज लखनऊ के प्रबंधन को दुर्गा प्रसाद सिंह उर्फ डीपी सिंह असंवैधानिक तरीके से अपने बहुपाश में जकड़े हुए है। डा. डीपी सिंह वर्तमान में नेशनल पीजी कालेज की प्रबंध समिति में नियमों के विपरीत प्रबंधक पद पर काबिज है। जब कि नियमानुसार मोतीलाल मेमोरियल सोसाइटी की अंतरिम समिति के दोनों सदस्य क्रमश: न्यायमूर्मि खेमकरण और पूर्व डीजीपी उत्तर प्रदेश श्रीराम अरूण अपरिहार्य कारणों से कालेज की गवर्निंग बाडी से दूरी बनाए हुए है। ऐसी स्थिति में डा. डीपी सिंह के संरक्षण में खुलेआम भ्रष्टाचार को अंजाम दिया जा रहा है। पाठकों को बता दें कि यह आरोप समाचार पत्र नहीं लगा रहा है बल्कि नेशनल कालेज को संचालित करने वाली मातृ संस्था मोतीलाल मेमोरियल सोसाईटी के संस्थापक सदस्य विमल कुमार शर्मा द्वारा लगाया गया है। श्री शर्मा का कहना है कि नेशनल पीजी कालेज का संचालन मोतीलाल मेमोरियल सोसाईटी करती है। मोतीलाल मेमोरियल सोसाईटी नेशनल पीजी कालेज की मातृ संस्था है। नियमानुसार सोसाईटी ही नेशनल पीजी कालेज के प्रधानाचार्य की नियुक्ति करती है। कालेज का संचालन करने के लिए नियमानुसार मातृ संस्था मोतीलाल मेमोरियल सोसाईटी और उसका अध्यक्ष ही सर्वेसर्वा होता है। सोसाईटी द्वारा डा0 एसपी सिंह को नेशनल कालेज का कई वर्षो पूर्व प्रधानाचार्य चुना गया था। मगर प्रधानाचार्य का पद भार ग्रहण करने के बाद डा0 एसपी सिंह कालेज का संचालन अपने विवेक के आधार पर कूटरचित और असंवैधानिक तरीके से करने लगे थे। जिसकी शिकायत राज्यपाल से भी की गई थी। श्री शर्मा ने बताया कि लखनऊ विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति डा0 एसपी सिंह जब नेशनल पीजी कालेज के प्रधानाचार्य के पद पर थे। वे अपने सहयोगी और कालेज के प्रबंधक डा. डीपी सिंह से पारस्परिक दुरभि संधि करके भ्रष्टाचार को अंजाम देने लगे थे। नेशनल पीजी कालेज को स्टेडियम बनावाने के लिए यूजीसी द्वारा लगभग 7 करोड़ रूपये की धनराशि प्रदान की गई थी। मगर लखनऊ विकास प्राधिकरण की अनुमति के बिना निर्माण कार्य प्रारम्भ करा दिया गया। जो आज भी अधूरा पड़ा है। इस बात की प्रतिपुष्टिï लखनऊ विकास प्राधिकरण ने भी किया था और अनैतिक तरीके से संचालित निर्माण कार्य को रूकवा दिया था। यूजीजी द्वारा दिये गये 7 करोड़ की धनराशि का प्रबंधक डीपी सिंह और एसपी सिंह ने आपस में मिलकर बंदरबांट कर दिया। इस मामले की भी श्री शर्मा ने यूजीसी और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल से शिकायत की थी। शिकायत के बाद कालेज के प्रबंधक डीपी सिंह ने श्री शर्मा से कहाकि आप इस मामले को बिना मतलब तुल दे रहे है। सारे पैसे का यूटीलाईजेशन हो गया है। जांच होगी तो सब फंस जायेगे। इसलिए बिना मतलब इस मामले को तुल मत दीजिए। मगर जब चोर-चोर मौसेरे भाई निकल जाये तो फिर शिकायत करने के मायने ही नहीं रह जाते है। श्री शर्मा ने बताया कि जब लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति एसपी सिंह नेशनल कालेज के प्रधानाचार्य थे। तब वे और उनके सहयोगी प्रबंधक डीपी सिंह नेशनल पीजी कालेज के लेन देन के लिए कई एकल बैंक खाते को संचालित करते थे। इन लोगों ने कूटरचित तरीके से बचत खाते के रूप में कई खाते खुलवाये थे। जबकि नियमानुसार किसी भी संस्था या जिस संस्था का संचालन सोसाईटी के माध्यम से होता है। उसके बैंक खाते का प्रकार बचत खाता नहीं हो सकता है। ऐसे संस्थानों के खाते का प्रकार चालू खाता होता है। यदि संस्था का स्वामी और संचालन कर्ता सिंगल व्यक्ति है तो ऐसी दशा में उक्त संस्था का बैंक खाता सिंगल आपरेटिंग सिस्टम पर आधारित होता है। मगर जब किसी संस्था का संचालन सोसाईटी या कंपनी करती है तो ऐसी दशा में उस संस्था का आपरेटिंग सिस्टम सिंगल नहीं होता है। उस संस्था की कमेटी में शामिल अन्य महत्तवपूर्ण पदाधिकारी भी उक्त संस्था के बैंक खाते के आपरेटिंग सिस्टम में सम्मिलित होते है। मगर लखनऊ विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति व पूर्व प्रधानाचार्य नेशनल पीजी कालेज डा0 एसपी सिंह और कालेज के प्रबंधक डा0 डीपी सिंह द्वारा नेशनल पीजी कालेज के नाम पर कई खातों का संचालन किया जाता था। इन लोगों ने सारे के सारें खाते बचत खाते के रूप में खुलवाये थे। इन लोगों द्वारा किस तिथि को, किसके नाम से, किस प्रकार के बैंक खाते, और खाते का आपरेटर कौन था। उसका विवरण इस प्रकार है। दिनांक 16/01/1991 को नेशनल पीजी कालेज के नाम पर पहला बचत खाता संख्या 710601010008543 खोला गया था। जिसको सिर्फ तत्कालीन प्रधानाचार्य एसपी सिंह आपरेट करते थे। इसके बाद दिनांक 16/01/1991 को नेशनल पीजी कालेज के नाम पर दूसरा बचत खाता संख्या 710601010008544 खोला गया था। इस खाते को भी  सिर्फ तत्कालीन प्रधानाचार्य एसपी सिंह आपरेट करते थे। इसके बाद दिनांक 16/01/1991 को नेशनल पीजी कालेज के नाम पर तीसरा बचत खाता संख्या 710601010008548 खोला गया था। जिसको सिर्फ तत्कालीन प्रधानाचार्य एसपी सिंह आपरेट करते थे। इसके बाद दिनांक 16/01/1991 को नेशनल पीजी कालेज के नाम पर चौथा बचत खाता संख्या 710601010008549 खोला गया था। जिसको सिर्फ तत्कालीन प्रधानाचार्य एसपी सिंह आपरेट करते थे। इसके बाद दिनांक 16/01/1991 को नेशनल पीजी कालेज के नाम पर पांचवां बचत खाता संख्या 710601010008550 खोला गया था। जिसको सिर्फ तत्कालीन प्रधानाचार्य एसपी सिंह आपरेट करते थे। इसके बाद दिनांक 16/01/1991 को नेशनल पीजी कालेज के नाम पर छठवां बचत खाता संख्या 710601010008551 खोला गया था। जिसको सिर्फ तत्कालीन प्रधानाचार्य एसपी सिंह आपरेट करते थे। इसके बाद दिनांक 16/01/1991 को नेशनल पीजी कालेज के नाम पर सातवां बचत खाता संख्या 710601010012047 खोला गया था। जिसको सिर्फ तत्कालीन प्रधानाचार्य एसपी सिंह आपरेट करते थे। इसके बाद दिनांक 16/01/1991 को नेशनल पीजी कालेज के नाम पर आठवां बचत खाता संख्या 71060101000854७ खोला गया था। जिसको सिर्फ तत्कालीन प्रधानाचार्य एसपी सिंह आपरेट करते थे। इसके बाद दिनांक 22/08/1991 को नेशनल पीजी कालेज के नाम पर नौवां बचत खाता संख्या 710601010020908 खोला गया था। जिसको सिर्फ तत्कालीन प्रधानाचार्य एसपी सिंह आपरेट करते थे। इसके अतिरिक्त भी दिनांक 03/09/1996 को नेशनल पीजी कालेज के नाम पर दसवां बचत खाता संख्या 710601010023596 खोला गया था। जिसको सिर्फ तत्कालीन प्रधानाचार्य एसपी सिंह आपरेट करते थे। इसके बाद दिनांक 02/09/1997 को नेशनल पीजी कालेज के नाम पर ग्यारहवां बचत खाता संख्या 710601010024073 खोला गया था। जिसको सिर्फ तत्कालीन प्रधानाचार्य एसपी सिंह आपरेट करते थे। इसके बाद दिनांक 31/08/2000 को नेशनल पीजी कालेज के नाम पर बारहवां बचत खाता संख्या 710601010025626 खोला गया था। जिसको सिर्फ तत्कालीन प्रधानाचार्य एसपी सिंह आपरेट करते थे। इसके बाद दिनांक 23/04/2009 को नेशनल पीजी कालेज के नाम पर तेरहवां बचत खाता संख्या 710601011001964 खोला गया था। जिसको सिर्फ तत्कालीन प्रधानाचार्य एसपी सिंह आपरेट करते थे। इतने खाते खोलने के पीछे लखनऊ विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति व नेशनल पीजी कालेज के पूर्व प्रधानाचार्य डा0 एसपी सिंह की मंशा क्या थी। इसको शायद पाठकगण भी समझ गये होंगे। जिस प्रकार डा0 एसपी सिंह ने नेशनल पीजी कालेज के नाम पर खुद संचालित करने के लिए कालेज के बचत खाते खुलवाये ठीक उसी प्रकार से अपने सहयोगी और कालेज के प्रबंधक डीपी सिंह के संचालन में भी नेशनल पीजी कालेज के नाम पर बचत खाते खुलवाये। जिसका विवरण क्रमश: इस प्रकार है। दिनांक 30/08/1991 को नेशनल पीजी कालेज के नाम पर पहला बचत खाता संख्या 710601010020932 खोला गया। इस खाते को प्रबंधक डीपी सिंह आपरेट करते थे। इसके अलावा भी लखनऊ विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति व नेशनल पीजी कालेज के पूर्व प्रधानाचार्य ने कई अन्य बचत खाते खुलवाये थे। जिसका आपरेटिंग सिस्टम ज्वाईंट था। जिसे सिर्फ एसपी सिंह और डीपी सिंह ही संयुक्त रूप से आपरेट करते थे। इन खातों का विवरण क्रमश: इस प्रकार है। दिनांक 16/01/1991 को नेशनल पीजी कालेज के नाम पर पहला बचत खाता संख्या 710601010008545 खोला गया था। जिसको तत्कालीन प्रधानाचार्य एसपी सिंह और डीपी सिंह संयुक्त रूप से आपरेट करते थे। इसके बाद दिनांक 16/01/1991 को नेशनल पीजी कालेज के नाम पर दूसरा बचत खाता संख्या 710601010008552 खोला गया था। इस खाते को भी तत्कालीन प्रधानाचार्य एसपी सिंह और डीपी सिंह संयुक्त रूप से आपरेट करते थे। इसके बाद दिनांक 23/10/2010 को नेशनल पीजी कालेज के नाम पर तीसरा बचत खाता संख्या 710601011002287 खोला गया था। जिसको तत्कालीन प्रधानाचार्य एसपी सिंह और डीपी सिंह संयुक्त रूप से आपरेट करते थे। इसके बाद दिनांक 08/09/2011 को नेशनल पीजी कालेज के नाम पर चौथा बचत खाता संख्या 710601011002507 खोला गया था। जिसको तत्कालीन प्रधानाचार्य एसपी सिंह और डीपी सिंह संयुक्त रूप से आपरेट करते थे। इसके बाद दिनांक 07/11/2012 को नेशनल पीजी कालेज के नाम पर पांचवा बचत खाता संख्या 710601011002750 खोला गया था। जिसको तत्कालीन प्रधानाचार्य एसपी सिंह और डीपी सिंह संयुक्त रूप से आपरेट करते थे। नेशनल पीजी कालेज को किस प्रकार से पूर्व प्रधानाचार्य डा0 एसपी सिंह और प्रबंधक डा0 डीपी सिंह चलाते थे और इतने खातों का क्या करते थे। शायद पाठकगण समझ हो गये होंगे। श्री शर्मा द्वारा नेशनल पीजी कालेज के प्रबंधक डीपी सिंह और एसपी सिंह पर लगाये जाने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों में कितनी सत्यता है। इस बात का तो पता तभी चलेगा। जब इन दोनों जिम्मेदारों के सम्पूर्ण कार्यकाल में संपादित किये गये सभी प्रकार के कार्यो की जांच करा दी जाये। नेशनल कालेज के पूर्व प्रधानाचार्य डा0 एसपी सिंह और कालेज के प्रबंधक डा0 डीपी सिंह द्वारा कालेज के एकल खातों के संचालन के दौरान कालेज के निर्माण कार्य के नाम पर लाखों रूपये के फर्जी बिलों का भुगतान किया गया था। इन लोगों के इस अनैतिक कृत्य के विरूद्ध नेशनल पीजी कालेज को संचालित करने वाली मातृ संस्था मोतीलाल मेमोरियल सोसाईटी के तत्कालीन अध्यक्ष व पूर्व एमएलसी नागेन्द्र नाथ सिंह ने दिनांक 5 अगस्त 2011 को हजरतगंज कोतवाली में मुकदमा दर्ज कराया था। मगर नागेन्द्र सिंह के आकस्मिक निधन के बाद यह मामला दबा रहा गया। साथ ही लखनऊ विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति व नेशनल  कालेज के पूर्व प्रधानाचार्य एसपी सिंह और कालेज के प्रबंधक डीपी सिंह के जुगाड़ और प्रभाव के दम पर हजरतगंज कोतवाली में दर्ज एफआईआर भी फाइलों में दफन हो गया और भ्रष्टाचारी चैन की सांस लेने लगे। श्री शर्मा द्वारा डीपी सिंह पर लगाये गये आरोपों की प्रतिपुष्टि करने के लिए समाचार पत्र ने डीपी सिंह को कई बार फोन मिलाया। मगर उनकी तरह से कोई प्रति उत्तर नहीं मिला। समाचार पत्र ने लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति एसपी सिंह को भी फोन मिलाया। मगर उनका फोन किसी और व्यक्ति ने उठाया और कहाकि साहब व्यस्त है, आप बाद में बात कर लीजिए। समाचार पत्र के संवाददाता ने दो बार फोन मिलाया और दोनों बार ही कुलपति एसपी सिंह से बात नहीं करायी।  

एफआईआर में लगा गबन का आरोप

नेशनल पीजी कालेज के पूर्व प्रधानाचार्य डा0 एसपी सिंह और तथाकथित नेशनल पीजी कालेज के प्रबंधक डा0 डीपी सिंह द्वारा संयुक्त रूप से संस्था के धन का दुरूपयोग करने के आरोप में मोतीलाल मेमोरियल सोसाईटी के तत्कालीन अध्यक्ष और पूर्व एमएलसी नागेन्द्र सिंह द्वारा न्यायालय के माध्यम से दिनांक 5 अगस्त 2011 को कोतवाली हजरतगंज में मुकदमा संख्या 458/2011 दर्ज कराया गया था। एफआईआर में सोसाईटी के पूर्व अध्यक्ष नागेन्द्र सिंह ने वर्णित किया था कि मोतीलाल मेमोरियल सोसाईटी एक पंजीकृत संस्था है। संस्था के संविधान के अनुसार संस्था के प्रशासनिक परिषद का चुनाव दिनांक 31 दिसम्बर 2008 को तीन वर्ष बाद संपन्न हुआ। जिसमें प्रशासनिक परिषद के पदाधिकारियों को तीन वर्ष के लिए चयनित किया गया था। इसके बाद सोसाईटी के विभिन्न संस्थाओं के प्रबंध समिति का चुनाव दिनांक 21 फरवरी 2009 को संपन्न हुआ था। जिसमें नेशनल पीजी कालेज के प्रबंध समिति में डा0 डीपी सिंह को प्रबंधक बनाया गया था। दिनांक 21 फरवरी 2009 को संपन्न चुनाव में गठित समितियों को प्रशासन परिषद की बैठक में भंग कर दिया गया था। जिसके परिणामस्वरूपण डा0 डीपी सिंह नेशनल पीजी कालेज के प्रबंधक नहीं रह गये। संस्था के अध्यक्ष द्वारा सोसाईटी की सभी संस्थाओं के कार्यो के संचालन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था कर दी गई। अध्यक्ष ने अपने दिनांक 27 जून 2009 के आदेश संख्या एमएमएस/2009-10/71 के माध्यम से नेशनल पीजी कालेज के प्रशासनिक एवं वित्तीय कार्यो की जिम्मेदारी तत्कालीन प्राचार्य डा0 एसपी सिंह को सौंप दी। अध्यक्ष के दिशा निर्देश से संचालित करने के लिए आदेशित करते हुए अध्यक्ष एवं प्राचार्य के संयुक्त हस्ताक्षर से वित्तीय व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए सभी पत्रों के आदेशों की प्रति प्राचार्य को भेजने का निर्देश जारी किया गया था। मगर डा0 डीपी सिंह एवं डा0 एसपी सिंह ने परस्पर दुरभि संधि करके संस्था के धन का दुरूपयोग आरपी वर्मा, महेश्वर रथ और एमएस सिद्धू के साथ मिलकर प्रारम्भ कर दिया। जबकि सोसाईटी के तत्कालीन अध्यक्ष व पूर्व एमएलसी नागेन्द्र नाथ सिंह संस्था के सर्वोच्च कार्यकारी अधिकारी होने कारण नेशनल पीजी कालेज के प्रधानाचार्य एसपी सिंह को स्पष्टï आदेश दिया था कि संस्था की बैंक में जमा धनराशि की आरपी वर्मा, महेश्वर रथ, एमएस सिद्धू को आहरण-वितरण न करें। इसकी सूचना सोसाईटी के पूर्व अध्यक्ष नागेन्द्र सिंह ने बैंकों को भी दी थी। किन्तु एसपी सिंह ने तथाकथित डा0 डीपी सिंह को नेशनल पीजी कालेज का प्रबंधक दिखाते हुए अवैधानिक रूप से संस्था के बैंक खाते का संचालन करते हुए संस्था के धन का व्यापक पैमाने पर गबन किया। जबकि बैंक खाते के संचालन को बंद कराने के लिए विजया बैंक मेफेयर बिल्डिंग हजरतगंज लखनऊ, सिंडिकेट बैंक जल निगम शाखा राणा प्रताप मार्ग लखनऊ  और बैंक ऑफ बड़ौडा शाखा शाहनजफ रोड लखनऊ को स्पष्टï निर्देश दिया गया था। सोसाईटी के अध्यक्ष नागेन्द्र सिंह ने एफआईआर में स्पष्ट उल्लेख किया था कि डा0 एसपी सिंह और डा0 डीपी सिंह द्वारा परस्पर दुर्भाग्य पूर्ण उद्देश्य से संस्था के धन को हड़प कर संस्था को भारी वित्तीय नुकसान पहुंचाया जा रहा है। एफआईआर के अनुसार पूरे प्रकरण की सूचना सोसाईटी के अध्यक्ष नागेन्द्र नाथ सिंह ने थानाध्यक्ष कोतवाली हजरतगंज को भी दी थी। किन्तु इस पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। तत्पश्चात पुलिस के उच्चाधिकारियों से भी इस मामले में एफआईआर दर्ज कराने के लिए आग्रह किया गया। किन्तु उसके बाद भी इस प्रकरण में कोई कार्यवाही नहीं की गई। एफआईआर में सोसाईटी के अध्यक्ष ने आरोप लगाते हुए कहाकि डा0 डीपी सिंह एवं प्राचार्य डा0 एसपी अपने संयुक्त हस्ताक्षर से नेशनल पीजी कालेज के बैंक खाते में जमा धन को अवैधानिक तरीके से निकालकर गबन कर रहे है। इन लोगों की इस प्रकार की कार्यशैली मोतीलाल मेमोरियल सोसाईटी के संविधान में दिये गये नियमों और प्राविधानों के विपरीत है। एफआईआर में यह भी उल्लेखित किया गया था कि डा0 एसपी सिंह एवं डा0 डीपी सिंह ने आरपी वर्मा, महेश्वर रथ, एमएस सिद्धू के साथ मिलकर निरन्तर धन का गबन किया है। एफआईआर में सोसाईटी के तत्कालीन अध्यक्ष नागेन्द्र सिंह ने आरोप लगाया था कि डा0 एसपी सिंह और डा0 डीपी सिंह द्वारा संयुक्त रूप से संस्था को भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है। उन्होंने आशंका जताते हुए एफआईआर में यह वर्णित किया था कि इन लोगों की ऐसी कार्यप्रणाली की वजह से सोसाईटी अपने उद्देश्यों की पूर्ति नहीं कर पा रही है। एफआईआर में सोसाईटी के अध्यक्ष नागेन्द्र सिंह ने कहाकि जब उन्हें उपरोक्त वित्तीय अनियमितताओं के बारें जानकारी मिली थी तो उन्होंने दिनांक 10 जून 2011 को लिखित सूचना कोतवाली हजरतगंज को प्रस्तुत की थी। किन्तु कार्यवाही नहीं हुई। तब पुन: दिनांक 14 जून 2011 को सोसाईटी के अघ्यक्ष नागेन्द्र सिंह ने पंजीकृत डाक से लिखित तहरीर पुलिस उप महानिरीक्षक और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक लखनऊ को भेजी थी। मगर उसके बावजूद भी पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई। विवश होकर सोसाईटी के अध्यक्ष नागेन्द्र सिंह ने न्यायालय के माध्यम से एफआईआर दर्ज कराने के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। तब जाकर एफआईआर दर्ज हुई।

ऑटोनामस कालेज की नियमावली में खेल

मोतीलाल मेमोरियल सोसाइटी के संस्थापक सदस्य विमल कुमार शर्मा का कहना है कि लखनऊ विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति व पूर्व प्रधानाचार्य नेशनल पीजी कालेज डा0 एसपी सिंह और डा0 डीपी सिंह खुलेआम नेशनल पीजी कालेज में कानून के नाम पर नंगा नाच करते रहे है। श्री शर्मा के अनुसार नेशनल कालेज को संचालित करने वाली चुनी गई प्रबंध समिति को उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी थी। जिसके बाद उच्च न्यायालय द्वारा मनोनित अंतरिम समिति का प्रतिनिधित्व समाज के सर्वथा जागृत और उत्तरदायी व्यक्ति कर रहे थे। जिसमें अंतरिम समिति के एक सदस्य न्यायमूर्ति खेमकरन और दूसरे सदस्य प्रदेश के पूर्व डीजीपी श्रीराम अरूण थे। जो आज भी है। मगर इसके बावजूद भी डा0 एसपी और डा0 डीपी सिंह की मनमानी कम नहीं हुई। जिसका एक सीधा सा उदाहरण नेशनल पीजी कालेज के प्रवक्ता डा0 एएस वैश्य के प्रकरण के संबंध में देखा जा सकता है। श्री शर्मा के अनुसार जब नेशनल कालेज के प्रधानाचार्य डा0 एसपी सिंह लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति बने तब कालेज के प्रधानाचार्य की सीट खाली हो गई। नियमानुसार जो कालेज का सबसे वरिष्ठ प्राध्यापक है। उसी को कालेज का प्रधानाचार्य बनाना चाहिए था। मगर अंतरिम समिति के दोनों महत्वपूर्ण सदस्यों के रहने के बावजूद भी नेशनल कालेज के प्रबंधक डा0 डीपी सिंह ने अल्प वरिष्ठता वाले प्राध्यापक को प्रधानाचार्य बना दिया। कारण, सभी समझ रहे है। ऐसा क्यों किया गया। इस मामले में डा0 वैश्य ने विश्वविद्यालय के कुलाधिपति व उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रामनाईक को भी प्रतिवेदन दिया। मगर कुलाधिपति भी इस मामले पर मौन रहना ही श्रेयस्कर समझे। श्रीशर्मा ने बताया कि इसी दौरान पता चला कि डा0 डीपी सिंह न केवल नेशनल पीजी कालेज के प्रबंधक है बल्कि कालेज के गवर्निंग बोर्ड के चेयरमैन भी है। डा0 डीपी सिंह को कालेज का प्रबंधक और चेयरमैन बनाने की लिखित और अलिखित अनुमति अंतरिम समिति के दोनों सदस्य न्यायमूर्ति खेमकरन और पूर्व डीजीपी उत्तर प्रदेश श्रीराम अरूण ने दी है। श्री शर्मा के अनुसार ऑटोनामस कालेज की नियमावली में स्पष्ट उल्लेख है कि ऑटोनामस कालेज की गवर्निंग बाडी का चेयरमैन मातृ संस्था अर्थात मोतीलाल मेमोरियल सोसाइटी का अध्यक्ष होगा। चुनी गई प्रबंध परिषद अस्तित्व में नहीं है। इसलिए नेशनल पीजी कालेज की गवर्निंग बाडी के चेयरमैन अंतरिम समिति के सदस्य न्यायमूर्ति खेमकरन और पूर्व डीजीपी उत्तर प्रदेश श्रीराम अरूण हो सकते थे। मगर न्यायमूर्ति खेमकरन और पूर्व डीजीपी उत्तर प्रदेश श्रीराम अरूण ने संयुक्त रूप से डा0 डीपी सिंह को दोनों उत्तरदायित्वों को वहन की करने की अनुमति दे दी। मगर नियमानुसार अंतरिम समिति का मात्र सदस्य होने के नाते न्यायमूर्ति खेमकरन और पूर्व डीजीपी श्रीराम अरूण इसके लिए सक्षम नहीं थे। इन सम्पूर्ण मामलों से प्र्रदेश के वर्तमान राज्यपाल राम नाईक को कुलाधिपति होने के नाते अवगत कराया गया। मगर इस मामले में राज्पाल महोदय का मौन समझ से परें है।

ऑटोनामस के नाम पर छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़

नेशनल कालेज ने वर्ष 2013 में परीक्षा के नियमों में बदलाव करते हुए बैक पेपर की व्यवस्था को समाप्त कर दिया था। इस मामले की शिकायत लेकर कई छात्रों ने लखनऊ विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो. एसबी निमसे को पत्र लिखा था। मामला बढऩे पर कैंट विधायक डा0 रीता बहुगुणा जोशी ने कुलाधिपति को पत्र लिखकर मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की थी। राजभवन ने इस मामले में लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति से जवाब तलब किया। उस दौरान लखनऊ विश्वविद्यालय के पास नेशनल कालेज की स्वायत्ता से संबंधित पत्रवालियां गायब हो गई थी। जो ढूंढने से भी नहीं मिल रही थी। वहीं राजभवन से मांगे गये जवाब की तिथि भी बीत गई थी। 13 सितम्बर 2013 को लखनऊ विश्वविद्यालय ने नेशनल कालेज के प्रधानाचार्य रहे डा0 एसपी सिंह को पत्र लिखकर नेशनल पीजी कालेज की स्वायत्ता की जानकारी मांगी। कालेज के डेवलपमेन्ट काउन्सिल के डीन प्रो0 एके सेन गुप्ता को लिखे गये पत्र में कालेज की स्वायत्ता मिलने के वर्ष, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और विश्वविद्यालय की ओर से दी गई मंजूरी के बारें में उपलब्ध प्रमाणों को प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था। साथ ही परीक्षा के नियमों में किये गये बदलावों की वैधता संबंधी प्रमाण भी उपलब्ध कराने को कहा गया था। इस मामले में उस दौरान कालेज के प्रधानाचार्य रहे डा0 एसपी सिंह का कहना था कि कालेज को यूजीसी ने वर्ष 2008 में स्वायत्ता दी थी। विश्वविद्यालय के वीसी ने भी इसके लिए आर्डर जारी किया था। कालेज खुद परीक्षा करा सकता है। साथ ही नियमों में बदलाव भी कर सकता हे। कालेज की कमेटी में यूजीसी, सरकार के एक्सपर्ट शमिल किये जाते है। विश्वविद्यालय ने जो भी सूचनाएं मांगी है। उसे दे दिया जायेगा।

 

 

 

 

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