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17
December

मैनफोर्स

बहराइच। जनपद में बेरोजगारी इस कदर हावी हो गई है कि रोजगार दिलाने के नाम पर दलालों द्वारा धड़ल्ले से बेरोजगारों को ठगा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई रोजगार दिलाने के नाम पर हड़प लिया जा रहा है। बेरोजगारों को धन देने के बाद भी रोजगार मिल जाये तब भी गनीमत की बात है। मगर दलाल बेरोजगारों की बेरोजगारी का फायदा उठाते हुए उन्हें रोजगार की लालच देकर न केवल ठग रहे है बल्कि उनकी आर्थिक स्थिति को भी पूरी तरह से ध्वस्त कर दे रहे है। रोजगार के नाम पर ठगी का एक नायाब धंधा जनपद बहराइच के थाना क्षेत्र बौड़ी में देखने को मिला। थाना क्षेत्र बौड़ी के ग्राम कोदही निवासी मो. जुबेर मुम्बई में किसी प्रकार से हाथ गाड़ी खिचकर अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहा था। भले ही वह हाथ गाड़ी खिच रहा था। मगर इस कार्य से भी उसका और उसके परिवार का गुजर बसर हो जा रहा था। मगर ना जाने किसकी नजर लगी कि उसकी खाला ने उसे मुम्बई से फोन कर मलेषिया में नौकरी दिलाने और बेहतर तनख्वाह दिलाने का झांसा देकर घर बुला लिया। जब जुबेर घर पर आया तो उसकी खाला ने उसे बताया कि उसके जानने वाला एक व्यक्ति है, जिसका नाम तबरेज अंसारी निवासी नौगईयां थाना कैसरगंज, जनपद बहराइच है। वह मलेषिया में लोगों को नौकरी दिलाता है। मलेषिया में अच्छी खासी तनख्वाह मिलती है। तुम किसी प्रकार से 80 हजार रूपये की व्यवस्था कर लो तो मैं तबरेज से कहकर तुम्हे मलेशिया में नौकरी दिलवा दूंगी। इतनी बड़ी धनराषि की व्यवस्था करना तबरेज के लिए कुंआ खोदकर पानी निकालने जैसा था। जुबैर की खाला ने उसे एक व्यक्ति से 10 रूपये सैकड़ा के हिसाब से ब्याज पर 80 हजार रूपया दिलवा दिया। फिर उक्त रूपये को उसने नौकरी दिलाने वाले तबरेज अंसारी को दिला दिया। तबरेज अंसारी रूपया पाते ही बदल गया। आज मलेशिया भेज दूंगा कल भेज दूंगा आदि-आदि बातें कहते हुए जुबेर को टहलाने लगा। चार महीने बार जुबेर और उसकी खाला के दबाब में तबरेज मलेशिया के बजाय दुबई भेजने के लिए तैयार हुआ। मगर जुबेर दुबई जाने के लिए तैयार नहीं हुआ। जुबेर ने कहाकि जब तुम मलेषिया भेजने की बात कहे थे तो तुम दुबई क्यों भेज रहे हो ? जुबेर ने कहाकि मेरा पैसा वापस दो। मैं दुबई नहीं जाऊंगा। इस पर तबरेज ने कहाकि पैसा तो नहीं मिलेगा। जो तुम्हें करना है। वह कर लो। ज्यादा बोलोगें को मारपीट कर तुम्हे सही कर देंगे। यदि दुबई जाना हो जाओं वर्ना पैसे नहीं मिलेंगे। जुबेर की हालत वही हो गई कि मरता, क्या ना करता। जुबेर थक हारकर दुबई जाने के लिए तैयार हो गया। तबरेज ने कहाकि तुम्हें एक कंपनी के माध्यम से भेज रहा हूं। तुम्हारी तनख्वाह दुबई के हिसाब से एक हजार रूपये होगी। तुम्हे खाना, पीना, रहना मुफ्त में मिलेगा। तुम्हे कोई परेशानी नहीं होगी। तबरेज ने कहाकि दुबई में मेरा भाई और मेरा भान्जा है। मेरे कई रिष्तेदार है। वहां पर तुम्हे कोई तकलीफ नहीं होगी। इसके बाद तबरेज ने जुबेर को दुबई भेजने के लिए जब एअरपोर्ट पर गया तो वहां तबरेज ने मोबाइल से वीडियों बनाया। जिसमें स्वयं कहाकि मैं तुम्हे दुबई भेज रहा हूं। यदि काम नहीं करोंगे तो मेरी जिम्मेदारी नहीं होगी। तुम काम नहीं कर पाओगों तो तुम्हें वापस आना पड़ेगा आदि बाते कहकर वीडियों बनाया। जुबेर ने कहाकि तबरेज के मन पहले से ही गंदा था। इसलिए उसने वीडियो स्वयं कहाकि काम नहीं कर पाओगों तो तुम्हें वापस आना पड़ेगा। जुबेर ने बताया कि जब वह दुबई में एअरपोर्ट पर पहुंचा तो वहां जिस कंपनी के पास तबरेज ने जुबेरा को भेजा था। उक्त कंपनी की तरफ से कोई तबरेज को लेने नहीं आया। जुबेर ने बताया कि वह 24 घंटे तक एअरपोर्ट पर ही पड़ा रहा लेकिन उसको कंपनी की तरफ से या तबरेज के रिश्तेदारों की तरफ से कोई भी लेने नहीं आया। दो-तीन दिन तक एअरपोर्ट के पास ही भूखे-प्यासे जुबेर ने गुजारे। मगर कोई भी उसे लेने नहीं आया। तब थक हारकर जुबेर ने अपने घर पर अपनी पत्नी को फोन करके सारी बतायी। जुबेर की पत्नी ने दुबई से आने के लिए टिकट कटाने के खातिर अपने गहने बेच कर कुण्डास पारा के ही मो. सलमान से आनलाइन टिकट कटाकर अपने पति जुबेर के पास दुबई भेजा। जिससे कि जुबेर पुनः अपने घर जनपद बहराइच वापस आया। तबरेज अंसारी की धोखाधड़ी से नाराज होकर जुबेर जब उससे अपना पैसा मांगने लगा तब पुनः जान से मारने-पीटने की धमकी देकर। जुबेर को भगा दिया। जुबेर ने मामले की षिकायत जिम्मेदार अधिकारियों से की। मगर अभी तक इस मामले में कोई कार्यवाही नहीं हो सकी।

 

 

 

17
December

रौंदोपुर ग्राम पंचायत प्रधान और सचिव ने शौचालय निर्माण के नाम पर की जबरदस्त धांधली

ग्राम प्रधान सुआगाड़ा ने ग्रामीणों के खाते से धोखे से निकलवाया शौचालय निर्माण की धनराशि

मैनफोर्स

बहराइच। जनपद बहराइच में भ्रष्टाचार इस कदर हावी हो गया है कि आम आदमी की जीना दुभर हो गया है। जनपद में केन्द्र और प्रदेश सरकार द्वारा चलायी जाने वाली ऐसी कोई भी योजना नहीं है। जो भ्रष्टाचार का शिकार न हो गई हो। चाहे वह उज्जवला योजना हो या फिर आयुष्मान योजना हो, चाहे प्रधानमंत्री आवास योजना हो या फिर खुले में शौच मुक्त के लिए चलायी जाने वाली शौचालय योजना हो। सभी की सभी योजनाएं भ्रष्टाचार का शिकार हो गई है। जनपद बहराइच की ऐसी कोई भी ग्राम सभा नहीं है, जहां के ग्राम प्रधान और सचिव उपरोक्त योजनाओं का बंटाधार करने में कोई कोर कसर छोड़े हो। ग्राम प्रधानों और सचिवों के भ्रष्ट कार्यशैली को इन दिनों जनपद बहराइच के फखरपुर ग्राम पंचायत रौंदोपुर के गांव सुआगाड़ा में खुलेआम देखा जा सकता है। ग्राम पंचायत सुआगाड़ा में कराये गये कार्य स्वयं चिल्ला-चिल्ला कर निर्माण में किये गये भ्रष्टाचार की कहानी को बयां कर रहे है। इसके बाद रही सही कसर सुआगाड़ा गांव के निवासी अपने आक्रोश को व्यक्त करके बयां कर रहे है।

रौंदोपुर ग्राम पंचायत के सुआगाड़ा निवासी छोटू बताते है कि हमारे गांव के ग्राम प्रधान हरि किशुन ने गांव को खुले में शौच मुक्ति के लिए शौचालय का निर्माण कराने के लिए लाभार्थियों के खाते में सरकार की तरफ से पैसा भिजवाया। ग्राम प्रधान हरि किशुन जिस-जिस लाभार्थी के खाते में पैसा आया। उसे बैंक ले जाकर उसके खाते से शौचालय निर्माण के लिए सरकार द्वारा भेजी गई धनराशि को निकलवाकर ले लिया। ग्राम प्रधान ने कहाकि आप लोगों के पास पैसा रहेगा तो आप लोग खर्च कर दोगे और शौचालय नहीं बन पायेगा आदि बातें बनाकर सुआगाड़ा निवासियों के शौचालय की धनराशि को हड़प लिया। ग्राम प्रधान ने इसके अतिरिक्त भी शौचालय बनावाने के लिए शौचालय की सूची में नाम सम्मिलित करने के नाम पर प्रत्येक लाभार्थी से पांच-पांस सौ से लेकर एक-एक हजार रूपये तक लिया। मगर उसके बावजूद भी ग्राम प्रधान हरि किशुन ने लाभार्थियों के शौचालय का निर्माण पूरी तरह से नहीं करवाया। छोटू ने बताया कि ग्राम प्रधान ने जितने भी इस गांव में शौचालय बनवाये है। उनमें से किसी भी शौचालय पर छत या टीन नहीं डलवाया है। इतना ही नहीं ग्राम प्रधान ने शौचालय के लिए बनवाये जाने वाले गड्ढे को भी आधा-अधूरा ही खुदवाया है। ग्राम में प्रधान ने शौचालय की दीवारों को इस कदर बनवाया है कि कोई भी हाथ से धक्का दे दे तो गिर जायेगा। छोटू ने बताया कि आज तक शौचालयों में न तो शीट लगाई गई है और न ही दरवाजा लगाया गया है। ऐसा शौचालय बनवाने और न बनवाने के बराबर ही है।

छोटू ने कहाकि एक साल से अधिक की अवधि हो गई है। मगर न तो प्रधान ने शौचालय का निर्माण पूर्ण कराया और न ही लाभार्थियों को पैसा दिया। छोटू ने बताया कि जब हम लोग प्रधान से पूछते है कि आखिर शौचालय कब बनेगा ? तो प्रधान कहते है कि जब दोबारा पैसा आयेगा तो बनेगा आदि बात कहकर टाल देता है। छोटू ने बताया कि आज तक इस गांव में ग्राम प्रधान ने कोई भी विकास कार्य नहीं किया। जो किया भी है, वह इस आधे-अधूरे शौचालय के रूप में आपके समक्ष दिख रहा है। सुआगाड़ा निवासी लच्छीराम ने बताया कि ग्राम प्रधान हरि किशुन ने शौचालय के निर्माण के लिए आई गई धनराशि में से बारह हजार रूपया ले लिया है। मगर आज तक शौचालय पर न तो छत बनवाया गया और न ही शौचालय में शीट लगवाया गया है। गांव का कोई भी शौचालय पूर्ण रूप से नहीं बना हुआ है। किसी भी शौचालय में दरवाजा नहीं लगाया गया है। प्रधान ने शौचालय के नाम पर गांव के लोगों को जबरदस्त तरीके से ठगा है। सुआगाड़ा गांव के रामधनी ने बताया कि ग्राम प्रधान से उसने कई बार शौचालय बनवाने के लिए कहा था। मगर ग्राम प्रधान बिना पैसे लिये शौचालय बनावाने के लिए लाभार्थियों की सूची में मेरा नाम नहीं डाला और ना ही मेरे परिवार के लिए शौचालय बनवाया। गांव के लोगों ने बताया कि कई बार ब्लाक के सचिव से शिकायत की गई। मगर उसके बावजूद भी आज तक सचिव या किसी अन्य अधिकारी की तरफ से कोई कार्यवाही नहीं की गई है। गांव के लोगों ने कहाकि यदि शीघ्र ही ग्राम प्रधान हरि किशुन द्वारा गांव के लोगों के लिए बनाये गये आधे-अधूरे शौचालय का निर्माण पूर्ण नहीं किया तो सभी लोग संयुक्त होकर जिलाधिकारी, सीडीओ, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री से शिकायत करेंगे। गांव के लोगों ने कहाकि शौचालय निर्माण और प्रधानमंत्री आवास के नाम पर ग्राम प्रधान हरि किशुन और सचिव ने मिलकर व्यापक पैमाने पर सरकारी धन का बंदरबांट किया है। यदि सीधे तरीके से प्रधान शौचालय का निर्माण करा देंते है तो ठीक है, नहीं तो सभी ग्रामीण मिलकर जिलाधिकारी के समक्ष विरोध दर्ज करायेंगे। 

ग्राम प्रधान ने मैनफोर्स संवादसूत्र को धमकाने का किया प्रयास

ग्राम पंचायत रौंदोपुर के गांव सुआगाड़ा से जब मैनफोर्स संवादसूत्र मो. इसरार समाचार संकलन करके वापस घर की तरफ जा रहा था तो उसके मोबाईल नंबर 8451934807 पर ग्राम प्रधान हरि किशुन ने अपने मोबाईल नंबर 6307072190 से काल किया। काल कनेक्ट होने पर ग्राम प्रधान हरि किशुन ने समाचार पत्र के संवादसूत्र को धमकाते हुए कहाकि तुम किससे पूछकर गांव में शौचालयों की फोटों ले रहे थे और लोगों से बयान ले रहे थे। इस पर संवादसूत्र ने कहाकि इसमें किसी से पूछने की क्या आवश्यकता है। ये तो मेरा कार्य है। मेरा कार्य समाचार संकलित करने के अतिरिक्त और क्या हो सकता है। इसके बाद संवादसूत्र से ग्राम प्रधान ने उसका नाम और समाचार पत्र का नाम पूछा। संवादसूत्र ने अपना नाम और समाचार पत्र का नाम बताते हुए ग्राम प्रधान से ग्रामीणों द्वारा शौचालय के अधूरे निर्माण कार्य और शौचालय निर्माण के नाम पर ग्राम प्रधान द्वारा वसूली जाने वाली धनराशि के संबंध में उनका पक्ष जानना चाहा। तब ग्राम प्रधान ने कहाकि तुम मेरा पक्ष जानने से पहले अपने बाप का नाम बताओ। समाचार पत्र के संवादसूत्र ने कहाकि आपको मेरे और मेरे समाचार पत्र से लेना देना है या मेरे पूरे खानदान से लेना देना है। मैं जो सवाल पूछ रहा हूं, पहले उसके संबंध में आप अपना पक्ष रखिये। मगर ग्राम प्रधान हरि किशुन अपना पक्ष व्यक्त करने के बजाय संवादसूत्र के बाप का नाम जानने में ज्यादा दिलचस्पी लेते हुए दोबारा ग्राम पंचायत रौंदोपुर में समाचार संकलन और फोटों खिचने की मनाही करते हुए धमकाया और फोन को काट दिया।

 

 

 

 

04
October

मुकाम फाउण्डेशन ने डालीगंज बरौलिया के प्राथमिक विद्यालय के 124 बच्चों को वितरित किया शैक्षणिक सामग्री

प्राथमिक विद्यालय बरौलियां की प्रधानाचार्य ने सहयोग के लिए संस्था का जताया आभार

मैनफोर्स
लखनऊ। राजधानी लखनऊ के बरौलिया, निकट डेला हाउस स्थित प्राथमिक विद्यालय में आज दिनांक 04 अक्टूबर 2019 को सामाजिक संस्था मुकाम फाउण्डेशन द्वारा गरीब बच्चों को निशुल्क शैक्षणिक सामग्री वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में मुकाम फाउण्डेशन ने कक्षा 1 से 5 तक के छात्र और छात्राओं करीब 124 बच्चों को निशुल्क हिन्दी, गणित, अंग्रेजी की पाठ्य पुस्तके और वितरित किया। इसके अतिरिक्त भी संस्थाएं कक्षा 3 से 4 तक के छात्र और छात्राओं को जेमेट्री बाक्स, पेसिंल बाक्स, पेसिंल, रबर, स्केल आदि शैक्षणिक सामग्री वितरित किया गया। इस अवसर पर प्राथमिक विद्यालय की प्रधानाचार्य लक्ष्मी रस्तोगी ने संस्था के द्वारा गरीब बच्चों को शैक्षणिक सामग्री की सहायता प्रदान करने के लिए आभार जताया।

साथ ही संस्था कुछ अन्य आवश्यक सामग्रियां भी मुहैया कराने का निवेदन किया। संस्था ने प्रधानाचार्य के निवेदन को स्वीकार करते हुए शीघ्र ही अन्य सामग्रियों को मुहैया कराने का आश्वासन दिया। इस अवसर पर संस्था के अध्यक्ष ने विनीत कुमार ने कहाकि यदि समाज का बेहतर निर्माण करना है तो समाज के भविष्य अर्थात हमारे समाज के वे बच्चे जो गरीब, निरीह है। उन्हें शैक्षणिक सामग्रियों सहित अन्य प्रकार के सहयोग प्रदान कर सशक्त बनाना ही होगा। जब समाज सशक्त होगा, तो राज्य सशक्त होगा।

 

जब राज्य सशक्त होगा तभी देश सशक्त होगा और यह तभी संभव है जब देश का भविष्य अर्थात हमारे बच्चे शिक्षित हो। जब देश का बच्चा पढेगा तभी इंडिया बढेगा। इसलिए देश को सशक्त बनाने के लिए हमें अपने भविष्य को सशक्त बनाना ही होगा। संस्था समाज के सभी वर्गो से अपील करती है कि वे संस्था के इस उद्देश्य को सार्थक बनाने के लिए संस्था के साथ कदम से कदम मिलाते हुए समाज की सेवा में अग्रणी भूमिका निभाये।

इस अवसर पर संस्था की प्रबंधक शशिप्रभा शर्मा और कोषाध्यक्ष विष्णुमाया और संस्था की कार्यकारिणी सदस्य नीलिमा सिंह, सदस्य अल्पना कटियार ने संयुक्त रूप से कहाकि हमारी संस्था का उद्देश्य गरीब, निरीह और आवश्यकताओं के अभाव में शिक्षा से वंचित रहने वाले बच्चों की आवश्यकताओं को पूर्ण कर बेहतर शिक्षा प्रदान करना है। इसके लिए संस्था ऐसे बच्चों को प्रत्येक प्रकार का सहयोग मुहैया कराने के लिए दृढ संकल्पित है।

संस्था समाज के धनाभाव वाले इन कमजोर वर्ग के बच्चों बेहतर शिक्षा प्राप्त कर बेहतर समाज का निर्माण करने के लिए प्रयासरत् है ताकि समाज का भविष्य सुदृढ हो सके। कार्यक्रम में मुख्य रूप से संस्था के उपाध्यक्ष रंजीत शर्मा, संस्था की कार्यकारिणी सदस्य सविता, संस्था के प्रचार मंत्री सुनील कुमार, नीलिमा सिंह, संस्था के सहयोगी यशी कटियार, यशवंत सिंह कटियार, पुष्पेन्द्र कुमार सिंह राजवंशी, पुष्पलता कटियार आदि ने संयुक्त रूप से एक—एक कर बच्चों को शैक्षणिक सामग्री का वितरण किया। शैक्षणिक सामग्री पाते ही बच्चों का चेहरा खुशी से खिल गया। सभी बच्चों ने एक स्वर में मुकाम फाउण्डेशन को धन्यवाद दिया।

 

 

 

01
September

 

 

 

मैनफोर्स

लखनऊ। आज देश और देशवासियों की दयनीय हालत पर तरस आ रहा है। तरस इसलिए कि जो शिक्षित और प्रबुद्ध वर्ग कहे जाते है। दरअसल वे राजनैतिक पार्टियों के हाथों में अपना जमीर और उत्तरदायित्व बेच चुके है। ऐसे लोग कुछ संक्षिप्त लाभ अथवा स्वार्थपूर्ति हेतु अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ रहे है। ऐसे पढ़े लिखे लोग शिक्षित होने के बावजूद भी किसी मूर्ख से कम नहीं है। ऐसे लोग रानैतिक दलों के इशारों पर अपने ही समाज में, अपने ही परिवार में विघटन डालने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे है। जो अशिक्षित वर्ग है। वह लोगों के बहकावे में आकर जातिगत आग में झुलस रहा है। ये दोनों वर्ग समाज का विघटन करने के लिए राजनैतिक दलों के हाथों से हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहे है और स्वयं के समाज और स्वयं का विनाश कर रहे है। इन दोनों वर्गो के पास एक दूसरे का विनाश करने के अतिरिक्त इतनी भी फु र्सत नहीं है कि ये अपनी सामाजिक, आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ कर सके। समाज में ऐसे तथाकथित शिक्षित और अशिक्षित वर्गो की संख्या इन दिनों दिन दूनी रात चौगुनी की रफ्तार से बढ़ रही है। ऐसे ही वर्गो को इन दिनों भारतीय जनता पार्टी हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है। ऐसे ही वर्गो के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी समाज में जातिगत विद्वेश डालकर समाज को विघटित करने का प्रयास कर रही है। मात्र इसलिए कि वह समाज में फूट डालकर राज कर सके। इतनी सी बात हैं। जो ऐसे तथाकथित समाज के शिक्षित वर्गो और अशिक्षित वर्ग के मूखों को समझ में नहीं आ रही है। ऐसे लोग भारतीय जनता पार्टी का प्रवक्ता बनकर स्वयं के संक्षिप्त लाभों के लिए समाज में जहर घोल रहे है। ऐसे तथाकथित प्रबुद्ध वर्गो को हिन्दू-मुस्लिम और तथाकथित देशभक्ति के अतिरिक्त कुछ और दिखाई नहीं दे रहा है। आज राजनेताओं के बहकावें में आकर ऐसे तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग के लोग जातिगत राजनीति के रंग में रंगकर सरेआम हिन्दू-मुस्लिम, गाय-सूअर, राम-रहीम के नाम पर एक दूसरे का कत्लेआम कर रहे है। मगर अफसोस की बात है कि इसे देशद्रोह नहीं कहा जा रहा है। मगर जो व्यक्ति सरकार की कार्यशैली पर सवालियां निशान लगा दे। उसे देशद्रोही करार दिया जा रहा है। आज लोगों को देशभक्ति दिखाने के लिए प्रमाण की आवश्यकता पड़ रही। यह शर्मनाक बात है कि जिस भारत देश ने एक से आले-आले वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, समाजसेविओं, दार्शनिकों को न केवल जन्म देकर भारत को गौरवान्वित किया बल्कि विदेशी राष्ट्रों को भी गौरवान्वित किया। आज उसी देश में ना जाने कहां से ऐसे लोग पैदा हो गये हैं। जो स्वयं को सबसे श्रेष्ठ और शिक्षित व्यक्ति मानते हैं। वे भारतीय जनता पार्टी के हाथों हथियार के रूप में इस्तेमाल होकर अपनी शिक्षा से समाज का विघटन कर रहे हैं। आज ऐसे ही लोगों की मूर्खता की वजह से देश की सत्ता की बागडोर संभालने वाली भारतीय जनता पार्टी देश की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था का पतन कर रही है। जब से केन्द्र और उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में भाजपा सत्ता में आयी है। तब से लगातार देश की आर्थिक व्यवस्था चरमराती जा रही है। मगर देश के इन तथाकथित शिक्षित वर्गो को समझ में नहीं आ रहा है। घर में भूजी भांग नहीं है। महंगाई आसमान पर है। निजी कंपनियों लगातार बंद हो रही है। लोग धड़धड़ा बेरोजगार हो रहे है। भ्रष्टाचार पूर्व की सरकारों के कार्यकाल की अपेक्षा की चार गुना अधिक बढ़ गया है। मगर उसके बावजूद भी ऐसे तथाकथित शिक्षित और प्रबुद्ध वर्गो को यदि सरकार चाहिए तो सिर्फ भारतीय जनता पार्टी की ही चाहिए। यदि ऐसे तथाकथित शिक्षित और प्रबुद्ध वर्गो से यह पूछा जाता है कि आखिर सरकार ने क्या विकास कार्य किया है कि आपको सरकार भारतीय जनता पार्टी की चाहिए ? ऐसे लोग झटपट भारतीय जनता पार्टी का प्रवक्ता बनकर उत्तर देते है कि क्या सरकार ने नहीं किया है। आप ही बता दीजिए। लोग उल्टा सवाल पूछने वालों पर ही चढ़ जाते है और पूछते है कि आजादी से अब तक 70 सालों में क्या हुआ जरा बताईये। हमारे प्रधानमंत्री पाकिस्तान पर सर्जिकल स्टाईक किये। पाकिस्तान पर गोले दागे है। यह कौन सी सरकार ने किया है। जरा बताईये। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अयोध्या में मंदिर बनाने का वादा किया है। जब से सत्ता में आये है, तबसे मुसलमानों की बोलती बंद है, और कितना विकास चाहिए आपको। यदि किसी ने भूल वश यह पूछ लिया कि देश में दिनों दिन महंगाई बढ़ रही है, लोग बेरोजगार हो रहे है, क्या आपको नहीं लगता कि देश की आर्थिक व्यस्था गड़बड़ा रही है ? ऐसे तथाकथित शिक्षित और प्रबुद्ध वर्ग के लोग तत्काल भाजपा का प्रवक्ता बनकर मुंह से जुबान खिचने के लिए तैयार हो जाते है। जब आगे वाला भारी पड़ जाता है। तब ऐसे लोगों को जवाब ही नहीं सूझता है। तब ऐसे तथाकथित वर्ग के लोग कहते है कि मात्र एक ही दो कार्यकाल में क्या आप सोचते है कि 70 साल की बीमारी दूर हो जायेगी? आदि-आदि तर्क देकर वर्तमान भाजपा सरकार की निष्क्रियता और नाकामी पर पानी फेरने का प्रयास करते है। जब सवाल पूछने वाला व्यक्ति ऐसे तथाकथित शिक्षित व्यक्तियों से जर्जर हो रही देश की आर्थिक व्यवस्था से संबंधित कुछ अन्य गंभीर सवाल करता है तो ऐसे तथाकथित शिक्षित व्यक्ति सवाल पूछने वाले का मुंह नोंचने लगते है और कहते है कि तुम कांग्रेसी हो। तुम लोग देश के गद्दार हो। आदि-आदि तर्क देकर स्वयं को भाजपा का प्रवक्ता और देश का सबसे बड़ा देशभक्त घोषित करने का प्रयास करते है। आज मैनफोर्स समाचार पत्र ऐसे तथाकथित शिक्षित प्रबुद्ध वर्गो को देश की जर्जर आर्थिक व्यवस्था का दिग्दर्शन कराने का प्रयास कर रहा है। जो स्वयं को देश का सबसे बड़ा देशभक्त घोषित करते है। मगर उन्हें देश के गरीबों, मजदूरों, रोजगार विहीन हो रहे लोगों की परवाह नहीं है। ऐसे तथाकथित देशभक्त यह देखे कि कैसे व्यसायिक संस्थानों, उद्योगों, व्यवसायों का पतन हो रहा है। लोगों का पेट पालना दुभर हो रहा है। यदि थोड़ा भी जेहन में जमीर शेष हो तो वास्तविक परिस्थितियों का अवलोकन करों। यदि इसके बावजूद भी बहुत बड़ा देशभक्त बनने का शौक चर्रा रहा हो तो समाज के बीच आओ और लोगों का पेट पालने में सहयोग करों, लोगों को रोजगार दो, डूबती हुए व्यवासायिक प्रतिष्ठानों और संस्थओं को बचाओ, उद्योगों की खस्ताहाल हो रही हालत को दुरूस्त करों। अन्यथा देशभक्ति का ढोंग रचना बंद करों।

सबसे बड़ी पत्थर मंडी बंद, दो लाख मजदूर बेरोजगार

पाठकों को बता दें कि जबसे केन्द्र की सत्ता पर भारतीय जनता पार्टी आसिन हुई है। तबसे लगातार उसकी गलत नीतियों के चलते देश की अर्थव्यवस्था चरमाराती जा रही है। देश में इन दिनों जबरदस्त मंदी का दौर चल रहा है। जिसका परिणाम यह हुआ कि उत्तर प्रदेश के महोबा जनपद स्थित एशिया की सबसे बड़ी पत्थर मंडी की आर्थिक व्यवस्था चरमरा गई गई। उक्त पत्थर मंडी तालाबंदी के दौर से गुजर रही है। पाठकों को बता दें कि इतनी बड़ी पत्थर मंडी के बंद होने के कारण लगभग 2 लाख मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का व्यापक संकट खड़ा हो गया है। मजदूरों की बेरोजगारी के अतिरिक्त भी पत्थर मंडी से हो रहे आयात-निर्यात के साधन में सम्मिलित लगभग 6 हजार ट्रक बेकार खड़े हो गये है। पाठकों को बता दें कि इस पत्थर मंडी की ऐसी दशा यूपी की सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी की सरकार की नई खनिज नीति के कारण हुआ है। स्टोन क्रेशर मालिकों ने सरकार की नई खनिज नीति के विरोध में हड़ताल भी किया। हालात दिनों दिन बिगड़ता जा रहा है। स्टोन क्रेशर की नीलामी तक बिगडऩे लगी है। पाठकों को बता दें कि जो नेशनल हाइवे 34, पत्थर मंडी के सामान ढोने वाले ट्रकों व मजदूरों से गुलजार रहता था। आज वह सन्नाटें के दौर से गुजर रहा है। क्रेशर मालिकों का कहना है कि शासन की नई खनिज नीति के कारण अनिश्चितकालीन हड़ताल करने के लिए विवश होना पड़ा रहा है। पाठकों को बता दें कि उत्तर प्रदेश के महोबा जनपद के कबरई कस्बा पत्थर उद्योग की नगरी के नाम से जाना जाता है।  यह एशिया का सबसे बड़ा पत्थर बाजार है। पत्थर मंडी के चारों ओर तकरीबन 350 स्टोन क्रेशर लगे हैं। मगर अब यह सन्नाटें के दौर से गुजर रहा है। पत्थर मंडी के ठेकेदारों और स्टोन क्रेशर के मालिकों ने सरकार की नई खनिज नीति के विरोध में जिला प्रशासन को ज्ञापन भी सौंपा था। जिसमें उल्लेखित किया गया था कि सरकार इस प्रकार की अनैतिक नीति लागू करके मजदूरों, मालिकों के पेट पर लात न मारे। मगर जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो क्रेशर मालिक ठेकेदार सभी संयुक्त रूप से 17 अगस्त 2019 को अनिश्चितकालिन हड़ताल पर चले गये।

पारले बिस्किट कंपनी पर पड़ी मंदी की मार दस हजार श्रमिक होंगे बेरोजगार 

जिस प्रकार उत्तर प्रदेश की पत्थर मंडी सरकार की गलत नीति का शिकार हुई। ठीक इसी प्रकार केन्द्र सरकार की गलत नीतियों के कारण अब खाद्य पदार्थों के उत्पादन पर भी मंदी का जबदरस्त साया मंडरा रहा है। आर्थिक मंदी की यह जबरदस्त मार बिस्किट बनाने वाली जानी मानी मशहूर कंपनी पारले के प्रोडक्ट्स पर भी पड़ रही है। पारले कंपनी से जुड़े 8 से 10 हजार श्रमिक बेरोजगारी की कगार पर है। कंपनी की माने तो यदि आर्थिक हालातों पर सरकार ने शीघ्र विचार नहीं किया तो उन्हें कड़े फैसले लेने के लिए विवश होना पड़ेगा। कंपनी के मुताबिक पारले बिस्किट की बिक्री में लगातार गिरावट हो रही है। इसी प्रकार अन्य बिस्किट कंपनियों के उत्पादों की बिक्री में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। पारले प्रोडक्ट्स के कैटेगरी हेड मयंक शाह का कहना है कि उन्होंने सरकार से मांग है कि 100 रुपये प्रति किलो या उससे कम कीमत वाले बिस्किट पर जीएसटी घटा दें। उन्होंने कहाकि यूं तो यह बिस्किट आमतौर पर 5 रुपये या उससे भी कम के पैक में बिकता हैं। यदि सरकार ने हमारी मांग नहीं मानी तो हमें अपनी फैक्टरियों में काम करने वाले आठ से दस हजार कर्मचारियों को न चाहते हुए भी नौकरी से निकालना पड़ेगा। उन्होंने कहाकि महंगाई की वजह से सेल्स घटने से हमें भारी नुकसान हो रहा है। पाठकों को बता दें कि इसी प्रकार पिछले हफ्ते बिस्किट निर्माता कंपनी ब्रिटानिया के प्रबंध निदेशक वरुण वैरी ने भी कहा था कि यदि सरकार ने आर्थिक नीतियों पर गंभीरता से विचार नहीं किया तो वर्तमान हालात में उपभोक्ता को 5 रुपये का बिस्कुट खरीदने के लिए भी सोचना पड़ेगा। पाठकों को बता दें कि नुस्ली वाडिया की कंपनी ब्रिटानिया का शुद्ध लाभ जून माह की तिमाही में 3.5 प्रतिशत से घटकर 249 करोड़ रुपये रहा गया है। इतना ही नहीं ब्रिटानिया कंपनी ने भी मजदूरों की छटनी शुरू कर दी है। कंपनी का रूख आगे भी बड़े पैमाने पर मजदूरों को छांटने की है। पारले कंपनी की सबसे ज्यादा बिकने वाले बिस्किट पारले जी, मोनेको और मैरी ब्रांड है। कंपनी की बिक्री 10,000 करोड़ से अधिक है। यूं तो कंपनी के सीधे तौर पर 10 प्लांट है। जहां एक लाख श्रमिक काम करते हैं। इतना ही नहीं पारले के पास 125 थर्ड पार्टी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट भी है। जब से केन्द्र की भाजपा सरकार ने सत्ता संभाला है। उसने जीएसटी के नाम पर व्यवसायियोंं की कमर तोड़ दी है। कंपनी के अधिकारियों का कहना है कि देश में जीएसटी लागू होने से पूर्व 100 रुपये प्रति किलो से कम कीमत वाले बिस्किट पर 12 प्रतिशत टैक्स वसूला जाता था। मगर जब से भाजपा सरकार ने जीएसटी लागू किया है। तब से कंपनियों से सभी बिस्किटों पर 18 प्रतिशत के स्लेब में जीएसटी वसूला जा रहा है। जैसे ही जीएसटी बढ़ा वैसे ही कंपनियों को भी अपने बिस्किटों के दाम बढ़ाने पड़े। जिसका सीधा असर बिक्री पर पड़ा। जिस तरह से अन्य क्षेत्रों में व्याप्त जबरदस्त मंदी के कारण लोगों को बेहाल और बेरोजगार होना पड़ा। ठीक ऐसे ही खाद्य सामग्रियों के क्षेत्र में भी लाखों लोगों को बेहाल और बेरोजगार होना पड़ रहा है। लाखों-करोड़ों लोग बेरोजगारी के कगार पर है। फिर भी देश के तथाकथित शिक्षित प्रबुद्ध वर्ग के लोगों को भारतीय जनता पार्टी की प्रवक्तागिरी और धर्म-जाति की गंदी राजनीति से फुर्सत नहीं मिल रही है कि देशवासियों की पीड़ा को समझ सके। लोग बेरोगारी के दंश से मर रहे है। मगर इन्हें देश को विघटित करने वाले राजनीतिक प्रपंच से फु र्सत नहीं है। शर्म आनी चाहिए कि ऐसे लोग स्वयं को मानव कहते है।

टैक्सटाइल कारोबार में हुए लाखों बेरोजगार

देश के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि पूंजीपतियों की समस्या और बाजार की मंदी का समाचार देश का कोई अखबार या चैनल नहीं दिखा रहा है। पूंजीपति अपने क्षेत्र की मंदी का समाचार भी बतौर विज्ञापन के तौर पर पैसे देकर छपवाने के लिए विवश हो रहे है। इसी प्रकार का एक वाकया टैक्सटाईल क्षेत्र से आ रहा है। जिस प्रकार लोग आटोमोबाइल, खाद्य सामग्रियों के उत्पादन आदि अन्य क्षेत्रों से बेरोजगार हो रहे है। ठीक उसी प्रकार टैक्सटाइल और चाय के क्षेत्र से भी बेरोगार हो रहे है। मगर अफ सोस की इतने गंभीर विषयों पर आज की बिकाऊ मीडिया प्रकाश डालने का साहस नहीं कर पा रही है। लाखों लोगों के बेरोजगार होने का समाचार आज की पत्रकारिता के लिए समाचार नहीं है। मगर एक नेता बीमार हो जाये या उसके घर बच्चा पैदा हो जाये या शादी विवाह हो जाये तो उसके लिए पहले पन्ने की खबर या 20 से 30 मिनट के टीवी चैनल के मनोरंजन का साधन बन जाता है। धर्म के नाम पर उन्माद फैलाने के लिए विवादास्पद खबरों को परोसना उसके लिए आवश्यक है। मगर जब बात देश के भविष्य की हो, देश में व्याप्त बेरोगारी की हो, देश की अर्थ व्यवस्था की हो, समाज के दिनों दिन हो रहे विघटन की हो, तो यह उसके लिए समाचार नहीं है। मीडिया की निरंकुशता का परिणाम है कि देश की अर्थव्यवस्था का रीढ़ माने जाने वाले टैक्सटाइल कारोबार के कारोबारियों को देश में व्याप्त मंदी की खबरें विज्ञापन के रूप में छपवाने के लिए विवश होना पड़ रहा है। इसका एक छोटा सा उदाहरण अभी हाल ही में 20 अगस्त 2019 को एक तथाकथित सम्मानित समाचार पत्र में देखने को मिला। उक्त तथाकथित सम्मानित समाचार पत्र के पहले पृष्ठ पर विज्ञापन के तौर यह उल्लेखित किया किया गया था कि नॉर्दन इंडिया टैक्सटाइल मिल्स भारी मंदी के दौर से गुजर रही है। मिल को लगातार घाटा हो रहा है। जिसके कारण बड़ी संख्या में नौकरियां जा रही हैं। उक्त प्रकाशित विज्ञापन में भारी तादाद में मजदूरों की नौकरियां जाने के बाद फैक्ट्री से बाहर आते लोगों के स्केच को भी दशार्या गया था। बहुत छोटे शब्दों में यह भी लिखा था कि एक तिहाई धागा मिलें अब तक बंद हो चुकी हैं और जो चल रही हैं, वो भारी घाटे में हैं। अर्थात मिलों की हालत इतनी अधिक खराब है कि वे कपास खरीदने की हालत में भी नहीं है। इसका सीधा असर किसानों पर पड़ेगा। क्योंकि आगे उनकी कपास की तैयार फ सल का कोई खरीददार नहीं होगा। करोड़ों रुपये की कपास की फ सल किसान कहां खपाएंगे? इतने गंभीर मुद्दे के इस समाचार को उक्त तथाकथित सम्मानित समाचार पत्र नि: शुल्क और समाजहित में प्रकशित करने में दिलचस्पी नहीं दिखाया। बड़े अफ सोस के साथ यह कहना पड़ रहा है कि जिन अखबारों के पहले पृष्ठ की यह सुर्खिया होनी चाहिए। उन्हीं अखबारों में यह खबर विज्ञापन का रूप धारण कर लिया। जो समाचार जनहित में नि: शुल्क प्रकाशित होना चाहिए। वही समाचार पैसे लेकर विज्ञापन के स्वरूप में प्रकाशित किया जा रहा है। जब समाज का वह आधार जिसके कंधे पर समाज की वास्तविकता का आईना दिखाना है। जब वही सूरदास बन जाये तो फिर समाज का क्या होगा ? इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। जब से केन्द्र की सत्ता में भाजपा की सरकार शासित हुई है। तबसे लगातार देश की अर्थव्यवस्था धाराशायी होती जा रही है। मगर इतने गंभीर मुद्दे भी हमारे तथाकथित शिक्षित प्रबुद्ध वर्गो के लिए कोई मायने नहीं रखती है। इससे स्पष्ट होता है कि समाज और देश गर्त में जा रहा है। 

आटोमोबाइल सेक्टर में भयंकर मंदी

पाठकों को बता दें कि उपरोक्त के अतिरिक्त भी आटोमोबाइल के क्षेत्र में भारी मंदी देखने के मिली है। जिस प्रकार अशोक लेलैंड, टाटा आदि कंपनियां मंदी की मार झेल रही है। ठीक उसी प्रकार मंदी की मार का शिकार मारूति सुजुकी भी हुई है। इस कंपनी ने भी 3,000 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। मारुति सुजुकी ने पिछले सात महीनों में काफी प्रोडक्शन घटाया है। जिसका सीधा असर मजदूरों के रोजगार पर पड़ा है। जुलाई माह 2019 में मारुति सुजुकी की पैसेंजर कारों की बिक्री में 36.2 फीसदी की गिरावट आयी। दक्षिण भारत के ऑटो सेक्टर में भी भारी गिरावट आयी। दक्षिण भारत के आटो सेक्टर में काम करने वाले मजदूरों को भी छंटनी का शिकार होना पड़ा है। पाठकों को बता दें कि चेन्नई के ऑटो इंडस्ट्री हब में 5000 से अधिक ठेका मजदूरों और ट्रेनी मजदूरों की छंटनी कर दी गई है। विगत जनवरी माह से लेकर मई माह तक यात्री वाहनों की बिक्री में पिछले वर्ष के मुकाबले 8.9 प्रतिशत व दोपहिया वाहनों की बिक्री में 11.3 प्रतिशत की भारी कमी दर्ज की गयी है। करीब 35 हजार करोड़ रुपए मूल्य के 5 लाख यात्री वाहन व 17500 करोड़ रुपए मूल्य के 30 लाख दो पहिया वाहन, खरीददारों की प्रतीक्षा में बाजारों में धूल फांक रहे हैं। सरकार ने भले ही इनकी बिक्री बढ़ाने के लिए ब्याज दरों में कटौती की हो। मगर उसके बावजूद भी यह नीति ग्राहकों को आकर्षित करने में असफ ल रही। सोसायटी आफ इंडियन आटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर के मुताबिक मई 2019 में मई 2018 के मुकाबले यात्री वाहनों की बिक्री में पिछले 18 वर्षों की सबसे भारी गिरावट देखने को मिल रही है। मई 2018 में 301238 यात्री वाहनों की बिक्री हुई थी। जबकि मई 2019 में 20.55 प्रतिशत घटकर 239347 रह गई। वहीं कॉमर्शियल वाहनों में 10.02 प्रतिशत, तिपहिया में 5.76 की कमी दर्ज की गयी। जबकि दो पहिया वाहनों की बिक्री पिछले मई 2018 में 1850698 के मुकाबले 8.62 प्रतिशत घटकर 1726206 ही रह गयी। मगर इसके बावजूद भी देश के तथाकथित बुद्धिजीवी बड़े बेशर्मी के साथ देश बदल रहा है का नारा लगाते-लगाते देश को गर्त में धकेले जा रहे है। इसी विकास के पैमाने पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार ताल ठोंक रही है।

ट्रक कंपनी अशोक लेलैंड में छंटनी तालाबंदी का दौर जारी

जिस प्रकार सरकार की गलत नीतियों के कारण अन्य क्षेत्रों में मंदी का जबरदस्त दौर देखने को मिला। ठीक उसी प्रकार देश की प्रतिष्ठित ट्रक निर्माता कंपनी अशोक लेलैंड में भी देखने को मिल रहा है। पाठकों को बता दें कि ट्रक निर्माता कंपनी अशोक लेलैंड के पंतनगर प्लांट में 14 अगस्त 2019 से 22 अगस्त 2019 तक लेऑफ अर्थात कर्मचारियों से कार्य लेना बंद कर दिया गया था। इससे पूर्व पिछले माह भी अशोक लेलैंड का पंतनगर संयंत्र 16 जुलाई 2019 से 15 दिन तक बंद था। वर्तमान में प्लांट में कंपनी के स्थाई श्रमिक बेहद कम हैं। पाठकों को बता दें कि ऐसी कंपनियों में बड़ी संख्या में ठेका मजदूर कार्य करते है। जब मंदी का दौर प्रारम्भ होता है तो सीधे तौर पर ऐसे मजदूर बेरोजगार हो जाते हैं। इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है। अशोक लेलैंड जैसी कंपनियां अपने यहां उत्पादों को तैयार कराने के लिए सीमेंस आदि जैसी कंपनियों से ठेके पर मजदूरों की सेवा लेती है। जैसे ही मंदी का दौर प्रारम्भ होता है। अशोक लेलैंड जैसी कंपनियां सर्वप्रथम सीमेंस जैसी कंपनियों से ठेके पर लिये गये मजदूरों की संख्या को धीरे-धीरे कम करने लगती है। कभी-कभी तो अचानक 30 प्रतिशत से लेकर 50 प्रतिशत तक की कटौती कर दी जाती है। अर्थात एक ही झटके में हजारों से अधिक लोग बेरोजगार हो जाते है। कभी-कभी तो ये कंपनियां मंदी की मार के चलते अपने कर्मचारियों को जबरन निकालने लगती है। इसी प्रकार का हथकण्डा अपनाने के लिए इस बार अशोक लेलैंड को विवश होना पड़ा। वाहन क्षेत्र में भारी सुस्ती के के कारण अशोक लेलैंड की चेन्नई शाखा ने अपने कर्मचारियों के लिए नौकरी छोडऩे की एक योजना की घोषणा की। इस घोषणा के तहत उसने छंटनी की दो योजना शुरू की है। पहली योजना यह कि कर्मचारी स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति अर्थात  वीआरएस ले ले। जो कर्मचारी वीआरएस के दायरे में नहीं आ रहे है, उनके लिए दूसरी योजना है एम्प्लाई सेपरेशन स्कीम (ईएसएस)। कंपनी के सूत्रों के मुताबिक ये योजनाएं एक्जीक्यूटिव स्तर के लिए घोषित की गई हैं। ईएसएस योजना के तहत ए श्रेणी में आने वाले एक्जीक्यूटिव को अधिकतम 30 लाख रुपये मिलेंगे। इसी तरह से बी श्रेणी में आने वाले एक्जीक्यूटिव को नौकरी छोडऩे पर न्यूनतम 60 लाख रुपये दिए जाएंगे। इस प्रकार की योजनाएं प्रारम्भ कर अशोक लेलैंड ने अपने कर्मचारियों से पल्ला झाडऩे का काम किया है। कंपनी ने जून और जुलाई में मांग में कमी को देखते हुए उत्पादन घटाने के लिए उत्तराखंड के पंतनगर के प्लांट को छह दिनों के लिए बंद करने का निर्देश दिया था। वाहन क्षेत्र की सुस्ती के कारण कई वाहन निर्माता कंपनियों और कंपोनेंट आपूर्तिकर्ताओं को उत्पादन घटाना पड़ा है और अस्थायी तौर पर कुछ दिनों के लिए प्लांट को बंद करना पड़ा है। इसी प्रकार इस कंपनी की जुलाई माह 2019 में पैसेंजर वाहनों की घरेलू बिक्री में करीब 31 फीसदी की गिरावट हो गई। जिसका मुख्य कारण गलत नीतियों के चलते अर्थव्यवस्था का चरमराना है। यह गिरावट दो दशक की सबसे बड़ी गिरावट है। इतने के बावजूद भी भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र सरकार विकास के बड़े-बड़े दम्भ भरने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है। ऐसे ही तथाककथित विकास के दावों के दम पर भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र शासित सरकार देश की अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन डॉलर करने का ख्वाब देख रही है।

टाटा मोटर्स की उत्तराखण्ड यूनिट अस्थायी रूप से बंद

जिस प्रकार अशोक लेलैण्ड के प्लांट बंद हुई। ठीक उसी प्रकार टाटा मोटर्स लिमिटेड के पंतनगर प्लांट में भी ब्लॉक क्लोजर (ले.ऑफ जैसा जो केवल टाटा में काम बंदी के लिए अपनी मर्जी का कानून है। जिसमें स्थाई श्रमिकों की अपनी छुट्टी जाती है) के तहत 11 से 20 अगस्त तक प्लांट बंद हो गया। टाटा से जुड़ी सभी वेंडर कंपनियां भी बंद हैं। इससे बड़े पैमाने पर अस्थाई-ठेका, ट्रेनी मजदूर प्रभावित हुए हैं। यह हाल केवल पंतनगर प्लांट का नहीं है बल्कि टाटा के जमशेदपुर से लेकर पुणे तक सभी प्लांटों का यही हाल है। जहां एक तरफ  ब्लॉक क्लोजर के तहत प्लांट और वेंडर कंपनियां बंदी का शिकार हैं। वही दूसरी तरफ बंदी और छंटनी का यह दौर देश के सम्पूर्ण आटोमोबाइल क्षेत्र में जारी है। लोग धड़ाधड़ बेरोजगार हो रहे है। घर परिवार चलाने के लिए दाने-दाने के लिए मोहताज हो रहे है। मगर उसके बावजूद देश के तथाकथित शिक्षित प्रबुद्ध वर्ग धर्म और जातिगत राजनीति के गंदी मानसिकता से उबर नहीं पा रहे है। देश की इतनी दयनीय दशा होने के बावजूद भी ऐसे लोग बेरोगारी की मार से जख्मी लोगों के घावों पर नमक रगडऩे से बाज नहीं आ रहे है।

 

 

 

 

 

 

 

 

09
August

फ्लाईओवर के लिए हुई साढ़े तीन करोड़ की निविदा में बंदरबांट का षणयंत्रकारी

मैनफोर्स

लखनऊ। यूं तो भाजपा सरकार देश और प्रदेश के सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए तमाम बड़े-बड़े दावे और वादे करती रही है। पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार को नजीर बनाकर कोसती रही है। मगर जब स्वयं सत्तासीन हुई तो उसे स्वयं के कार्यकाल में हो रहे भ्रष्टाचार पर नजर फिराने की भी फुर्सत नहीं रही है। बल्कि इसके विपरीत वह भ्रष्टाचार की शिकायत करने वाले लोगों के साथ ''उल्टा चोर, कोतवाल को डांटे'' वाली कहावत को चरितार्थ करने लगी है। भाजपा सरकार में कैसे सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार पुष्पित और पल्लवित हो रहा हैं। इसका एक ताजा उदाहरण उत्तर प्रदेश लोक निर्माण विभाग में देखने को मिल रहा है। कुछ माह पूर्व खुर्रमनगर फ्लाईओवर का लगभग साढ़े तीन करोड़ की निविदा निकाली गई थी। निविदा निकालने के बाद कार्यो को क्रियान्वित किया जाने लगा। मगर क्रियान्वित कार्यो में खुलेआम मानकों की धज्जियां उड़ाकर कार्यो को संपादित किया जाने लगा। पाठकों को बता दें कि इसका श्रेय किसी और का नहीं बल्कि अधिशासी अभियंता  एसपी सक्सेना को जाता है। इससे पूर्व भी एसपी सक्सेना अपने काले कारनामों की वजह से लोक निर्माण विभाग के चर्चित अभियंताओं में शुमार है। अधिशासी अभियन्ता एसपी सक्सेना न केवल पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में भ्रष्टाचार का गुल खिलाये थे बल्कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में भी भ्रष्टाचार का गुल खिलाने में परहेज नहीं कर रहे है। एसपी सक्सेना ने उपरोक्त निकाली गई निविदा के माध्यम से क्रियान्वित कार्यो के लिए आवंटित सरकारी धन का भी बंदरबांट करने में परहेज नहीं कर रहे हैं। भ्रष्टाचार की कला में महारत हासिल करने वाले अधिशासी अभियन्ता एसपी सक्सेना अपनी भ्रष्ट कार्यशैली से भ्रष्टाचार के कीचड़ में कमल को सड़ाने का कार्य कर रहे है। अधिशासी अभियंता एसपी सक्सेना ने खुर्रमनगर फ्लाईओवर पर जो पोल और हाईमास्क लगवा है और लगवा रहे है वह सभी के सभी मानक के विपरीत है। निविदा में जो मानक निर्धारित किया गया हैं। दरअसल वह वास्तविकता के धरातल से कोसों दूर है। यह अनैतिक कार्या जांच का विषय है। हालांकि कुल लोगों ने इनके अनैतिक कार्यो की शिकायत की है। मगर वर्तमान सरकार के कार्यकाल में शिकायतकर्ताओं की हालत ''भैस के आगे बीन बजाओ, भैंस लगे पघुराये'' की कहावत पर चरितार्थ हो रही है। जो काम मानक के अनुरूप होना चाहिए, वही कार्य एसपी सक्सेना के कार्यकाल में मानक के विपरीत हो रहे है। वह दिन दूर नहीं कि कुछ ही  दिनों के बाद पोल और हाईमास्क जमीन पर पड़ा जर्जर हालत में दिखाई देगा। इस फ्लाईओवर पर कराये जाने वाले इस विद्युत कार्य की टीएसी से जांच करा दी जाये तो स्वत: अधिशासी अभियंता एसपी सिंह के भ्रष्टाचार की पोल खुल जायेगी। 

लोक निर्माण विभाग के विभागाध्यक्ष को भी एसपी सक्सेना ने किया गुमराह
 
 

मुख्य अभियंता 

एसपी सक्सेना

खुर्रमनगर फ्लाईओवर के निर्माण के अतिरिक्त भी एसपी सक्सेना ने भ्रष्टाचार का गुल खिलाया है। इनके द्वारा बभनान से गौर, टिनिच वाया वाल्टरगंज, भीटिया चौराहा जनपद बस्ती के लिए हुई निविदा में भी खेल खेला गया है। जब मुख्य अभियंता एसपी सक्सेना से बभनान से गौर, टिनिच वाया वाल्टरगंज, भीटिया चौराहा जनपद बस्ती के लिए हुई निविदा को निरस्त करने का कारण पूछा गया तो उन्होंने बताया कि जो मैं कह रहा हूं। उसे ध्यान से सुनो। 24 मई को चार निविदा आये थे। जिसकी फ ाइनेंशियल बिड खोली गई थी। जबकि 26 मई को आचार संहिता समाप्त हो गई थी। आचार संहिता बिना समाप्त हुए कैसे फ ाइनेंशियल बिड नहीं खोली गई ? इसके बारे में एसपी सक्सेना लेसमात्र भी बोलना पंसद नहीं करते है। एसपी सक्सेना को झूठ बोलने की महारत हासिल है। उन्होंने कहाकि कई ठेकेदारों और मीडिया के लोगों ने शिकायत की इसलिए टेंडर निरस्त कर दिया गया था। जब एसपी सक्सेना के इस कृत्य के बारें में लोक निर्माण विभाग के विभागाध्यक्ष वीके सिंह से पूछा गया तो उन्होंने भी वही बात कही जो एसपी सक्सेना ने कही। एसपी सक्सेना ने लोक निर्माण विभाग के विभागाध्यक्ष को भी गुमराह करते हुए वही बात बतायी जो उन्होंने पत्रकारों से कही। अब गंभीर सवाल यह है कि क्या मुख्य अभियंता एसपी सक्सेना ने गौर टिनिच वाया वाल्टरगंज, भीटिया चौराहा जिला बस्ती की उक्त निविदा को निरस्त करने का जो कारण जो बताया क्या वह कारण जायज है ? यदि जायज तो क्यों एसपी सक्सेना ने आचार संहिता के दौरान निविदा की फाइनेन्सियल बिड खोलने के अनैतिक कार्यप्रणाली पर खामोशी साध ली। पाठकों को बता दें कि मॉडल कोड आफ कंडक्ट ईसीएल के क्रमांक 52(9) जी क्रमांक के अनुसार यदि निविदा आचार संहिता के पूर्व मांगी गई हो तो उसका एब्यूलूशन किया जा सकता है। मगर उसका अन्तिम निर्णय बिना अनुमोदन के निर्गत नहीं किया जा सकता है। यदि निविदा मांगी नहीं गई है तो चुनाव आयुक्त के अनुमति बिना निविदा नहीं मांगी जा सकती है। इसका अर्थ यह है कि पूर्व में मांगी गई निविद की बिड को खोल कर एब्यूलूशन किया जा सकता है। किन्तु उस पर अन्तिम निर्णय अर्थात निविदा की स्वीकृति नहीं दी जा सकती है। ऐसी स्थिति में जब 24 मई को फ ाइनेंशियल बिड खोली गई थी तो इसको आचार संहिता के पश्चात 26 मई को स्वीकृति या निर्गत की जा सकती थी। मुख्य अभियंता एसपी सक्सेना ने जो आचार संहिता का हवाला दिया है। यदि उस पर ही भरोसा कर लिया जाये तो फि र निविदा खोली ही क्यों गई ? इन सवालों का जवाब न तो विभाग के जिम्मेदार आलाधिकारी दे रहे है और नहीं एसपी सक्सेना स्वयं दे रहे है। एसपी सक्सेना की इस कार्यप्रणाली से जाहिर है कि दाल में ही कुछ काला नहीं है बल्कि पूरी की पूरी दाल ही काली है।

निविदा मैनेजमेन्ट में एसपी सक्सेना को महारत हासिल

एसपी सक्सेना मुख्य अभियन्ता गोरखपुर एवं बस्ती का सबसे ज्यादा जोर भ्रष्टाचार पर रहा। मगर इसका असर सिर्फ  बभनान से गौर, टिनिच वाया वाल्टरगंज भीटिया चौराहा जिला बस्ती की निरस्त निविदा  तक सीमित नहीं रहा है। बल्कि ऐसे अनेक मामले देखे गये। जिसमें उनकी प्रत्येक निविदा में संतुलनकारी भूमिका स्पष्ट रूप से दिखाई दी। एसपी सक्सेना निविदा मैनेज करने में भाजपा शासन काल में भी अपनी खास पहचान बना लिए है। एसपी सक्सेना की खास बात यह कि भाजपा के कद्दावर नेताओं को बतौर अतिथि के रूप में पूजते हुए दिखाई देते है। 

दोनों हाथों से धन बटोरने में व्यस्त है एसपी सक्सेना

बभनान से गौर टिनिच वाया वाल्टरगंज भीटिया चौराहा जिला बस्ती में हुई निविदा को निरस्त करवाने में मुख्य भूमिका निभाने वाले एसपी सक्सेना के पास मुख्य अभियंता गोरखपुर का भी अतिरिक्त चार्ज है। पाठकों को बता दें कि एसपी सक्सेना 30 सितम्बर 2019 सेवानिवृत हो रहे है। एसपी सक्सेना लोक निर्माण विभाग  में ऐसे दागदार अभियंता के रूप में मशहूर है। जो भ्रष्टाचार के मामले में भ्रष्टाचार के दैत्यासुर को पीछे छोड़ दे। एसपी सक्सेना ने अपने पूरे कार्यकाल में शायद ही कोई कार्य बिना रिश्वत के किया हो। इसी प्रकार की कार्यशैली इन्होंने बभनान से गौर, टिनिच वाया वाल्टरगंज भीटिया चौराहा जिला-बस्ती की हुई निविदा में खेलने का प्रयास किया। जबकि इनके पूर्व तैनात मुख्य अभियन्ता ने उक्त निविदा को ईमानदारी से खुलवाने के साथ ही अपनी बेदाग छवि के साथ सेवानिवृत हो गये। मगर एसपी सक्सेना ने उक्त निविदा के माध्यम से धन बटोरने की खातिर उक्त खोली गई निविदा को निरस्त कर दिया। पाठकों बतो दें कि एसपी सक्सेना की कार्यप्रणाली से संबंधित मात्र उपरोक्त ही मामले नहीं है बल्कि इससे पूर्व भी इन्होंने बसपा के शासन काल में भी जनपद उन्नाव में अधिशासी अभियन्ता रहने के दौरान निर्माण कार्यो में घटिया सामग्री का इस्तेमाल कर अनैतिक तरीके से धन का गबन किया था और अकूत संपत्ति बनायी थी। निविदा निरस्त करने के मामले में प्रमुख सचिव लोक निर्माण विभाग श्री गोकर्ण ने पत्रावली तलब कर ली। उन्होंने दोषियों पर सख्त कार्रवाई करने का निर्देश भी दिया। उन्होंंने बताया कि मैन्युअल कोड ऑफ कडक्ट पेज नम्बर-182 पैरा-8 पर साफ.-साफ मोटे शब्दों में लिखा हुआ है कि जो निविदायें पहले से ही मांगी गई है। उनका मूल्यांकन किया जा सकता है। मगर आयोग की पूर्व स्वीकृति के बिना अंतिम रूप से स्वीकृत नहीं की जा सकती है। यदि निविदाएं पहले से नहीं मांगी गई तो वे आयोग की पूर्व स्वीकृति के बिना जारी नहीं की जाएंगी। मगर इन वाक्यों पर एसपी सक्सेना ने ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा। उपरोक्त लाइनों को पीके सक्सेना को निविदा निरस्त करने से पूर्व पढ़ लेनी चाहिए थी। 

 

 

 

19
July

स्व0 अम्बिका प्रसाद राय की पुण्यतिथि पर गोमतीनगर के जनेश्वर मिश्र पार्क के सामने आयोजित हुआ शैक्षिक सामग्री वितरण कार्यक्रम

लखनऊ। समाज के गरीबों, असहायजनों के सामाजिक विकास के लिए प्रतिबद्ध सामाजिक संगठन मुकाम फाउण्डेशन द्वारा आज राजधानी के गोमतीनगर स्थित जनेश्वर मिश्रा पार्क के सामने स्व0 अम्बिका प्रसाद राय अपर पुलिस अधीक्षक उत्तर प्रदेश की पुण्यतिथि के अवसर समाज के आर्थिक रूप से कमजोर जनों के बच्चों को शैक्षिक सामग्री का वितरण किया गया। जिससे समाज के ये गरीब बच्चे बेहतर शिक्षा ग्रहण कर स्वयं और समाज को सशक्त कर सके। इस अवसर पर मुकाम फाउण्डेशन के संरक्षकगण सरोज राय, आभा राय, एडवोकेट प्रदीप कुमार राय ने अपने हाथों से आर्थिक रूप से कमजोर गरीब परिवारों के बच्चों को टीफिन, थर्मस, पेन्सिल बाक्स, रबर, पेन्सिल, स्केल, पाठ्य पुस्तकें सहित अन्य पठन-पाठन सामग्रियों का वितरण किया।

इस अवसर पर संस्था की संरक्षक आभा राय ने कहाकि शिक्षा प्रत्येक राष्ट्र के लिए विकास और सशक्तिकरण का आधार है। शिक्षा आज की दुनिया की दैनिक गतिविधियों को समझने और इसमें भाग लेने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह एक सुदृढ़ चरित्र का निर्माण करती है। मगर अफसोस की हमारे देश में शिक्षा इतनी महंगी हो गई है कि उससे गरीब तबका एक दम विरक्त होता है। भले ही सरकार ने कक्षा 1 से 8 तक की शिक्षा को निःशुल्क देने की घोषणा की हो। मगर इसके बावजूद भी गरीबी के अभाव में अधिकांश गरीब परिवार अपने बच्चों को शिक्षा देने में असहाय महसूस करते है। धन के अभाव में गरीब बच्चों को न तो पर्याप्त मात्रा में शैक्षिक सामग्रियां मिल पाती है और ना ही पर्याप्त मात्रा में बेहतर शिक्षा ही मिल पाती है। समाज के ऐसे गरीब और असहाय बच्चों को निःशुल्क शैक्षिक सामग्री वितरित कर मुकाम फाउण्डेशन समाज को सशक्त करने का एक छोटा सा प्रयास कर रहा है। यह प्रयास यूं तो कई वर्षो से क्रियान्वित है। मगर संगनात्मक तौर पर यह कार्य विगत वर्ष से प्रारम्भ है। इस अवसर पर संगठन के अध्यक्ष विनीत कुमार ने कहाकि मुकाम फाउण्डेशन गरीबों, असहायों को सशक्त बनाकर विकास के श्रेष्ठतम मुकाम पर पहुंचाना चाहता है। गरीब बच्चों को निःशुल्क शैक्षिक सामग्री मुहैया कराकर संस्था सामाजिक तौर पर एक सहयोगात्मक प्रयास कर रही है। इसके अतिरिक्त संस्था लखनऊ, बहराइच, बाराबंकी और अमेठी में निर्धन और निःशक्त बालिकाओं और महिलाओं को सिलाई कढाई आदि की शिक्षा प्रदान कर उन्हें स्वालम्बी बनाने का प्रयास कर रही है।

इस अवसर पर संस्था की कोषाध्यक्ष विष्णुमाया ने कहाकि मुकाम फाउण्डेशन न केवल समाज के लोगों को शैक्षिक रूप से सुदृढ करने का प्रयास कर रहा है बल्कि लोगों को रोजगारपरक शिक्षा मुहैया कराकर लोगों को आर्थिक रूप से भी मजबूत कर रहा है। संस्था लोगों को नैतिक, चारित्रिक शिक्षा मुहैया कराने के लिए विभिन्न प्रकार के सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यो का संचालन करती है। जिससे समाज नैतिक और चारित्रिक रूप से भी सुदृढ हो। विष्णुमाया ने बताया कि आज के कार्यक्रम में 50 बच्चों को टिफिन, पेन्सिल बाक्स, थर्मस, पेन्सिल, रबर, नोटबुक सहित अन्य पठन-पाठन सामग्रियों का वितरण किया गया है। संस्था द्वारा शैक्षिक सामग्री वितरण कार्यक्रम में संस्था के संरक्षकगण प्रदीप कुमार राय, समीर राय, संजय राय, मधुलिका राय, आरजू राय, संस्था के प्रचार मंत्री सुनील कुमार, संस्था की कार्यकारिणी सदस्य सविता, नीलिमा सिंह, सुशील कुमार, संस्था के जनपद बहराइच के जिला उपाध्यक्ष मो. इसरार सहित मीडिया के प्रतिष्ठित पत्रकार बन्धु उपस्थित रहे। 

 

 

 

01
July

नौकरशाही की ढिलाई से विकास की योजनाएं वास्तविकता के धरातल से कोसों दूर

मैनफोर्स

लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी की सरकार को उत्तर प्रदेश की सत्ता का बागडोर संभालते हुए दो साल हो गये। मगर आज तक सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी सरकार के नौकरशाहों पर नियंत्रण करने में असफ ल रहे। जिसका परिणाम यह रहा कि उनकी सरकार द्वारा चलाई जाने वाली योजनाएं वास्तविकता के धरातल पर उतरने से पहले ही प्रशासनिक अधिकारियों के कार्यालय में दम तोड़ दी। जिसका परिणाम यह रहा है कि यूपी की जनता के मन में सरकार की नाकारात्मक छवि प्रस्तुत होने लगी। योगी सरकार के दो साल के कार्यकाल में हर वक्त नौकरशाही और उसके संवर्गों के मध्य आपसी खींचतान चर्चा का केन्द्र बनी रही। नौकरशाही के मध्य सरकार की योजनाओं को साकार करने के लिए किसी बेहतर नीति पर भले ही चर्चा नहीं की गई। मगर अपने संवर्गो के मध्य विवाद उपजाने और उस पर चर्चा करने से नौकरशाहों को फुर्सत ही नहीं मिली कि वे आम आवाम तक सरकारी योजनाओं को पहुंचाएं और सरकार की छवि जनता के मध्य स्थापित करें। नौकरशाहों के इस विवाद में कई बार तो स्वयंमुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी हस्तक्षेप भी करना पडा। जनता की शिकायतों को सुनने और सहूलियतें देने के लिए बैठे इन नौकरशाहों के ठाठ एकदम निराले है। नौकरशाहों के इस निराले ठाठ बाट में एक नाम प्रमुख सचिव ऊर्जा अलोक कुमार और प्रमुख सचिव औद्योगिक विकास का है। जिनसे मिलने के लिए खास लोगों को छोड़कर किसी भी जन सामान्य को पापड़ बेलने पड़ते है। विभाग के लोगों को को यहां तक कहते हुए सुना जाता है कि मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव से मिलना आसान है लेकिन इन दोनों नौकरशाहों से नहीं एवरेस्ट पर चढऩे के समान है। इन नौकरशाहों ने गोवंश संरक्षण योजना जो स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की महत्वपूर्ण योजना है। इस योजना में भी नौकरशाहों ने ऐसा कारनामा कर दिखाया कि लोगों के दांतों तले अंगुलियां दब जाये। नौकरशाहों ने गायों के चारे के बजट पर भी कैंची चलाने में कोई कसर नहीं छोड़ा है। गायों के चारों के लिए जो पहले 50 रूपये प्रतिदिन दिया जाता था उसे अब 30 रूपये प्रतिदिन कर दिया गया। नौकरशाहों का ये करतब नंगा निचोड़ेगा क्या और खायेगा का क्या ? की कहावत पर शत प्रतिशत सटीक बैठ रहा है। भूसे का कारोबार करने वालों का कहना है कि एक गाय पर एक दिन का खर्च औसतन 100 रूपये आता है। इसके अतिरिक्त अभी हाल ही में आईएएस वीक से पहले सूबे के जनपदों में गोवंश आश्रय केंद्र बनाये जाने के लिए दिए जाने वाले धन को सीधे जिलाधिकारी के खाते में न डालकर एक बदनाम एजेंसियों के खाते में ट्रांसफ र कर दिया गया। नौकरशाहों के कलाकारी से मुख्यमंत्री खासे नाराज भी दिखे। मगर अफ सोस कि जब सब चोर मौसेरे भाई है तो किसी चोर के डांटने और फ टकारने का मतलब का क्या औचित्य रह जाता है। मुख्यमंत्री ने इस मामले में प्रमुख सचिव सुधीर बोबडे को सार्वजनिक रूप से फ टकार लगाई थी। पिछले यदि खबरियां समाचार पत्रों की सुखिऱ्यों पर यदि गौर फ रमाये तो आये दिन किसी न किसी नौकरशाह को कोर्ट में तलब किये जाने का मामला देखने को मिलता था। कोर्ट द्वारा नौकरशाहों को फ टकार लगाये जाने, जुर्माना लगाए जाने और नसीहत देकर छोड़े जाने की खबरें सामान्य रूप से देखने को मिलती थी। इसी प्रकार का एक ताजा मामले जिसमें कोर्ट ने एक प्रकरण में पेशाब पर भी पाबंदी अर्थात आदेश मिलने के बाद पेशाब करने की सख्त सजा सुनाई थी। इस प्रकार की घटना को देखते हुए यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि नौकरशाहों पर मुख्यमंत्री की ढिली पकड़ का परिणाम है कि सरकार को कोर्ट में जलील होना पड़ता है। सरकार की किरकिरी कराने में ऊर्जा विभागए वित्त विभाग सचिवालय प्रशासनएऔद्योगिक विकास विभागए ग्राम विकास विभाग और बेसिक शिक्षा विभाग जैसे अहम महकमों के नौकरशाह सरकार की नाक काटने में पीछे नहीं रहे है। इन नौकरशाहों के कारनामों की वजह से सिर्फ आम आवाम को ही नहीं बल्कि सरकारी महकमों के लाखों अधिकारियों और कर्मचारियों को भी भुगतना पड़ता है। 

सरकार की नाक काटने और उसकी फ जीहत कराने वाले कुछ विभागों और उसके नौकरशाहों की कार्य प्रणाली का वर्णन मैनफ ोर्स समाचार पत्र पाठकों के समक्ष इस प्रकार कर रहा है।

प्रमुख सचिव ग्राम विकास अनुराग श्रीवास्तव

70 भूतपूर्व सैनिको का चयन ग्राम विकास अधिकारी पद पर हुआ था। जिसमें   विभाग द्वारा इनके भूतपूर्व सैनिक होने का प्रमाण मांगा गया था। चयनित भूतपूर्व सैनिकों का वेरि िकेशन प्रमाण पत्र रक्षा मंत्रालय द्वारा पिछले वर्ष 7 सितम्बर को भेज दिया था। मगर 9 माह गुजर जाने के बाद भी इन चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र नहीं दि गया। जिससे नाराज होकर कोर्ट ने प्रमुख सचिव ग्राम विकास अनुराग श्रीवास्तव को दिनांक 10 अप्रैल कोहाईकोर्ट में तलब किया था।

प्रमुख सचिव बेसिक शिक्षा प्रभात कुमार

 पिछली सरकार से लेकर योगी सरकार तक शिक्षामित्र सरकार के गले की 1हड्डी बनते रहें और शिक्षा विभाग नौकरियों के लिहाज से सबसे अहम और संवेदनशील रहा है। गौरतलब हो कि 69 हजार रिक्त पदों पर शिक्षकों की भर्तियां होनी है लेकिन विभाग के अफ सरों की लापरवाही और मनमानी यहां भी देखने को मिली। पहली भर्ती में कटऑफ रखा गया था। मगर दूसरी भर्ती का विज्ञापन निकाला गया तो कट ऑफ को गायब कर दिया। जिससे अभ्यर्थियों के असंतोष और सरकारी दबाव के चलते विभाग ने फि र से कट आफ तय कर दिया। जोकि पिछली बार से भी ज्यादा था और शिक्षामित्रों द्वारा मामले को हाई कोर्ट ले जाया गया। जिस पर कोर्ट ने बाद में तय की गई कट ऑफ को रद्द करते हुए प्रमुख सचिव बेसिक शिक्षा प्रभात कुमार को काफ ी फ टकार लगाई। शिक्षा विभाग के नौकरशाहों की यह कार्यशैली कोर्ट के निर्णय के बाद योगी सरकार द्वारा शिक्षामित्रों को संतुष्ट करने के लिए 10000 रूपये के दिए गए मानदेय पर भी पानी फेर दिया गया।

प्रमुख सचिव वित्त विभाग संजीव मित्तल 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का वित्त विभाग और उसके नौकरशाह प्रमुख सचिव वित्त विभाग संजीव मित्तल ने उनकी किरकिरी कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चुनाव से पहले केंद्र सरकार द्वारा बढाये गए डीए को लागू करने में वित्त विभाग के नौकरशाहों ने अपनी मनमानी दिखाई और सरकार के एजेंडे और पार्टी की प्राथमिकताओं को दरकिनार करते हुए सरकार की छवि को निखारने के बजाय गिराने का प्रयास किया। जिस महंगाई भत्ते को बढ़ाने का फैसला केंद्र सरकार ने समय से किया था। उसी महंगाई भत्ते को वित्त के अफसरों ने आचार संहिता से पहले पास कर लिया। शेष कर्मचारियों और पेंशनरों को छोड़ दिया। बाद में सरकार की नाराजगी और मीडिया में चली खबरों के दबाव के बाद छुट्टी के दिन दफ्तर खोलकर चुनाव आयोग से अनुमति लेकर कर्मचारियों के भत्ते को पास किया। मगर उसके बावजूद भी पेंशनरों को छोड़ दिया। पुन: दबाव पडऩे पर उसको जारी किया गया। इस सम्बन्ध में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नाराजगी की खबरें भी आयीं। फि लहाल सूबे में इन अधिकारियों/कर्मचारियों तथा पेंशनरों की कुल संख्या लगभग 40 से ऊपर होगी 

प्रमुख सचिव ऊर्जा विभाग आलोक कुमार

ऊर्जा विभाग के मुखिया आलोक कुमार के कारनामे उपरोक्त नौकरशाहों से दो कदम आगे है। जिस उर्जा और पुलिस विभाग की कामयाबी का गुणगान सूबे की योगी सरकार करते हुए नहीं थकती है। उसी उर्जा विभाग के मुखिया प्रमुख सचिव आलोक कुमार ने उज्जवल योजना में अनियमितताएं बिजली के मीटर खरीद में धांधली, मीटर रीडिंग से लेकर बिलिंग तक में गडबड़ी करने का नायाब खेल खेला है। जिसका शिकार खुद विभाग के पूर्व चेयरमैन अवनीश अवस्थी भी हो चुके हैं। जिस पुलिस व्यवस्था की बात सरकार करती है। उसकी हकीकत का अंदाजा एटा के जवाहरपुर परियोजना में हुई सरिया चोरी प्रकरण में पुलिस की जांच रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। जिसमें आरोपी के बयान लिए बिना पैसे के बल पर जवाब दाखिल कर दिया गया। आलोक कुमार, बीएस तिवारी और संजय तिवारी जैसे निदेशकों को भरपूर संरक्षण देने का काम कर रहे हैं और तमाम तरह के प्रमाणित आरोप होने के बावजूद उन पर कार्यवाही करने के बजाय उनको बचाने के प्रयास में लगे हैं। इन कारनामों का असली खिलाड़ी प्रमुख सचिव ऊर्जा आलोक कुमार है। चुनाव से कुछ दिन पूर्व जो संविदा कर्मी पावर कारपोरेशन के पैरोल पर नहीं थे। उनका भी अंतर तहसील तबादला करने का प्रमुख सचिव आलोक कुमार ने कारनामा कर दिखाया। ऐसे डिस्कॉम के इन कर्मचारियों की संख्या लगभग 50 हजार से अधिक है। आलोक कुमार का फैसला एकदम नियम विरुद्ध है। इन संविदा कर्मियों के संबंध में जो विभागीय आदेश जारी किए जाते हैं उनमें इनको संविदा कर्मी बताया जाता है। जबकि वास्तविकता में ये निविदा कर्मी अर्थात ठेकेदारी अथवा कार्यदायी संस्था के कर्मचारी हैं।

अपर मुख्य सचिव सचिवालय प्रशासन महेश गुप्ता 

सचिवालय प्रशासन के अपर मुख्य सचिव महेश गुप्ता को दिनभर कोर्ट में बैठाए जाने और बिना अनुमति के पेशाब नहीं करने की भी सजा सुनाई गई थी। क्योंकि इन्होंने कोर्ट की अवमानना किया था। कार्यवाई प्रस्तावित होने और किसी भी स्तर से राहत न मिलने के बावजूद अपर मुख्य सचिव महेश कुमार गुप्ता अपनी जिद पर अड़े रहे और सहायक समीक्षा अधिकारियों की वरिष्ठता का विवाद निपटाते-निपटाते खुद ही पक्षकार बन गए। महेश गुप्ता के इस कदम से समीक्षा अधिकारियों में काफ ी रोष व्याप्त था। इनकी इस कार्यप्रणाली से सरकार की किरकिरी भी हुई। कोर्ट ने महेश गुप्ता पर इसके लिए 25 हजार का जुर्माना भी लगाया था और इसको खुद अपनी जेब से भरने को कहा था।

प्रमुख सचिव औद्योगिक विकास राजेश सिंह

योगी आदित्यनाथ के सत्ता संभालते ही इन्वेस्टर्स समिट कर सूबे केबेरोजगारों को रोजगार का सपना भले ही प्रमुख सचिव औद्योगिक विकास राजेश सिंह ने दिखाया हो। मगर उनके अधिनस्थ अधिकारियों ने इस औद्योगिक विकास का पहला शिलान्यास समारोह 5 महीने में किया तो दूसरा साल भर में भी नहीं कर पाया। मगर जबरदस्ती के दावे और पर्दे के पीछे के खेल का शिकार मुख्यमंत्री का मंसूबा हुआ। गौरतलब हो कि पहले इन्वेस्टर समिट में सरकार से उद्यमियों के 4.68 लाख करोड़ के एमओयू साइन हुए थे। सरकार ने एक तय समय में निवेशकों के प्रस्तावित प्रोजेक्ट के शिलान्यास समारोह की योजना बनाई थी। जिसमें पहली ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी 5 महीने में हो गयी। दूसरी का ऐलान सरकार द्वारा अगले 6 महीने में किए जाने की बात कही और जिसमें पहली ब्रेकिंग सेरिमनी से ज्यादा की धनराशि जमीन पर आएगी। इसकी तैयारी के लिए एक नए प्रमुख सचिव की भी तैनाती की गई। मगर मुख्यमंत्री का यह प्रोजेक्ट भी प्रमुख सचिव औद्योगिक विकास राजेश सिंह की ढिलाई का शिकार हो गया और तैयारियों में कमी के चलते इसको रद्द करना पडा।

 

 

 

 

11
May

पैसा देकर वोट खरीदा हूं ! पैसा लेकर ही विकास कार्य करूंगा: ग्राम प्रधान मो. तारिक

मो. इसरार

बहराइच। केन्द्र और प्रदेश में सत्ता की बागडोर संभालने वाली भाजपा की देश और प्रदेश में विकास के दावों का जोर शोर से ताल ठोक रही हैं। मगर इनके विकास के दावों में कितनी हकीकत और कितना फंसाना है। इसका पर्दाफाश मैनफोर्स समाचार पाठकों के समक्ष जनपद बहराइच में हुए तथाकथित विकास के दावों की हकीकत आम जनता की जुबानी सुनाकर कर रहा है। जो अग्रलिखित इस प्रकार है—पाठकों को बता दें कि जनपद बहराइच के फखरपुर ब्लॉक स्थिति कुण्डास पारा नामक गांव है। इस गांव को प्रधान का नाम मो. तारिक है। पाठकों को अवगत करा दें कि यहां कि आवाम का आरोप है कि जब से मो. तारिक ग्राम प्रधानी की बागडोर संभाले है। तब से उनके पास जनता से मिलने का समय नहीं है। इसका एक कारण यह है भी है कि प्रधान जी को नींद लेने से ही फुर्सत नहीं है तो भला अपने गांव की जनता को क्या समय देंगे।

ग्रामिणों को कहना है कि ग्राम प्रधान दिन के 10 बजे तक सोते है। जब उठते है तो जनता उन्हें तलाशती रह जाती है। ग्रामिण अपनी समस्याओं के समाधान के लिए अपनी—अपनी अर्जी लेकर उनके दरवाजे पर खडे रहे है। मगर प्रधान  जी अर्जी तो लेते है। मगर उनके पास अर्जी में उल्लेखित समस्याओं के समाधान के संदर्भ में ग्रामिणों से वार्ता करने की फुर्सत नहीं है। जिस प्रधान के पास अपने ही ग्राम प्रधानी क्षेत्र के ग्रामिणों से वार्ता करने की फुर्सत नहीं है तो वह भला क्या विकास के दावों की ताल ठोकेंगे ? पाठकगण इसका अंदाजा स्वयं लगा लिए होगे। अब समाचार पत्र अपने पाठकों को ले चलता है कि ग्राम प्रधान मो. तारिक के द्वारा कराये गये विकास के तथाकथित कार्यो के दावों की हकीकत से रूबरू कराने के लिए है। पाठकों को बता दें कि केन्द्र सरकार ने गरीबों को आवास मुहैया कराने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना का शुभारम्भ किया गया। ग्राम प्रधान दस्तावेजों में दावा कर रहे है कि उन्होंने केन्द्र सरकार की मंशा के अनुरूप गरीबों को आवास मुहैया कराने के लिए शत प्रतिशत प्रयास किया गया है। मगर उन्हीं की ग्राम पंचायत के नागरिकों का आरोप है कि जो गरीब इस के लिए पात्र है, उसे ग्राम प्रधान ने आवास नहीं दिया है। इन गरीबों से पैसा लेने के बावजूद भी ग्राम प्रधान मो. तारिक ने उन्हें आवास नहीं दिया। जो व्यक्ति पैसा ज्यादा दिया, ग्राम प्रधान ने उसे ही प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभार्थी घोषित कर दिया। जो व्यक्ति इस योजना का पात्र नहीं है, उससे अधिक पैसा लेकर ग्राम प्रधान मो. तारिक ने आवास पाने की पात्रता सूची में नाम डाल दिया।

ग्राम प्रधान मो. तारिक ने वास्तविक लाभार्थियों और तथाकथित लाभार्थियों दोनों से पैसा लिया। मगर दो—चार को छोड दिया जाये तो ग्राम प्रधान मो. तारिक ने किसी भी गरीब नागरिक को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास का लाभ नहीं दिया। ग्रामिणों ने आरोप लगाते हुए कहाकि एक तरफ केन्द्र सरकार और राज्य सरकार खुले में शौच मुक्त अभियान चलाकर लोगों को शौचालय बनवाने के लिए प्रेरित कर रही और लोगों को आर्थिक सहयोग दे रही है तो वही दूसरी ग्राम कुण्डास पारा का प्रधान लोगोंं से शौचालय बनवाने के नाम पर पैसा ऐंठ रहा है। ग्राम प्रधान मो. तारिक शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं को देने के नाम पर भी पैसा लेने में परहेज नहीं कर रहा है। ग्राम कुण्डासा की ग्रामीण महिला फईदा ने बताया कि वह निहायत ही गरीब है। वह झुग्गी झोपडी में बमुश्किल अपना जीवन गुजारती है। जब सरकार ने आवासीय सुविधा का लाभ देने की घोषणा की थी तो से भी ऐसा लगा कि अब झुग्गी झोपडी से राहत मिलेगी और उसे भी पक्का मकान मिल जायेगा। वह अपने ग्राम प्रधान मो. तारिक के पास गई और पीएम आवास योजना के तहत आवास की मांग की।

फईदा ने बताया कि उसने प्रधान ने आवास पाने के बाबत बात की तो प्रधान ने उससे पैसे की मांग की। फईदा ने प्रधान मो. तारिक को 5 हजार रूपये पीएम आवास के नाम पर घूस देने की बात कही। फईदा का कहना है कि करीब साल डेढ होने वाला है। अभी तक उसे न तो आवास की सुविधा का लाभ मिला और ना ही शौचालय की सुविधा का लाभ मिला। जब वह प्रधान से मिलने जाती है तो प्रधान मिलता ही नहीं है। जब कभी मिल जाता है तो कहता है कि जब आवास बनेगा तो मिलेगा। मगर आज तक ना तो आवास बना और ना ही मिला। ग्राम कुण्डास पारा निवासी सोहराब ने बताया कि जब मो. तारिक प्रधान हुआ है तब से आज तक ना तो सडक बन पाई है और ना ही घरों से निकले वाली नालियों के जल निकासी के लिए नालियों का निर्माण हो पाया है। सोहराब ने बताया कि केन्द्र सरकार ने घर—घर शौचालय बनाने का निर्देश दिया था।

मगर बिना पैसे लिये ग्राम प्रधान मो. तारिक शौचालय नहीं बनवा रहा है। कुछ लोग कम पैसा दिये थे तो उनका ना तो पैसा वापस किया और ना ही उन्हें शौचालय की सुविधा का लाभ दिया है। कुछ लोगों से शौचालय बनवाने के लिए गड्ढे खुदवा दिया था। मगर उक्त गड्ढों पर न तो आज तक शौचालय की टायलेट सीट लगी और ना ही शौचालय की दीवार ही खडी हुई। सोहराब ने कई बार नालियों की सफाई और मरम्मत और शौचालय बनवाने के लिए ग्राम प्रधान मो. तारिक से संपर्क किया तो उसने कहाकि तुम लोगों ने हमको तो वोट दिया नहीं था तो हमसे काम कराने के लिए क्यों कहते हो ? मैं तुम लोगों का ठेका नहीं लिया हूं। मैं कुछ भी नहीं करूंगा। जाओ जो मन करें कर लो। ग्राम कुण्डास पारा के नागरिक फरीद ने कहाकि गर्मी का मौसम है।

घरों का गंदा पानी ऐसे ही खुले में बह रहा है। जिससे मच्छरों का प्रकोप बढ रहा है। मच्छरों के प्रकोप से आये दिन बीमारियां हो रही है। इसका समाधान करने के लिए प्रधान से मुलाकात करने जब हम लोग उसके घर जाते है तो प्रधान सोता हुआ मिलता है। बमुश्किल किसी प्रकार यदि प्रधान से मुलाकत हो भी गई तो प्रधान समस्या का समाधान करने का आश्वासन देता है। मगर काम नहीं कराता है। फरीद ने आरोप लगाया कि प्रधान कहता है कि वह पैसे देकर वोट खरीदा है। इसलिए किसी को कोई काम कराना है तो उसके बदले पैसा देना ही होगा। बिना पैसे के एक भी काम नहीं किया जायेगा। अब शायद पाठकगण भी समझ गये होंगे कि जब एक जनता का प्रतिनिधि ग्राम प्रधान खुलेआम विकास कार्य कराने के नाम पर अपने ही ग्रामवासियों से पैसा मांग रहा है तो देश किस प्रकार विकास के मार्ग पर प्रशस्त हो रहा है ?

 

 

 

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