01
October

अच्छे दिन का ख्वाब दिखाकर सरकार ने बना दिया भिखारी

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उद्योग धंधे ठप, अर्थव्यवस्था पस्त, मालिक-मजदूर सभी त्रस्त

मैनफोर्स

लखनऊ। देश में मंदी की मार और त्राहि-त्राहि कर रही आवाम हालत देखते ही बन रहा है। मंदी की मार से पीडि़त लोग भी दो वर्ग में विभाजित हो गये है। प्रथम वर्ग चिल्ला-चिल्लाकर भाजपा सरकार की कार्यशैली पर गालियां दे रहा है और कोस रहा है। भाजपा सरकार पर भड़ास निकालते हुए कह रहा है कि जिस सरकार को हम लोगों ने अच्छे दिन लाने के लिए चुना। आज वही सरकार आम आवाम के पीठ में छुरा भोकने का काम कर रही है। नित नये-नये हिटलरशाही कानून को जनता के ऊपर थोप कर जनता के जख्मों पर नमक रगडऩे का काम कर रही है। सरकार ने जनता की हालत धोबी के कुत्ते के जैसी कर रखी है। जो न तो चैन से खुद खा सकता है और ना ही अपने परिवार का पालन-पोषण कर सकता है। सम्पूर्ण उद्योग धंधों को ऐसे-ऐसे करों से आच्छादित कर दिया गया है कि उद्योग धंधे बंद होने लगे है और लोग बेरोजगार हो रहे है। वही दूसरा वर्ग मन ही मन घुट रहा है। कारण उद्योग धंधों की दयनीय होती दशा और स्वयं के रोजगार पर खड़े हो रहे संकट की चिन्ता है। मन में बहुत सारे गुबार है। मगर गुबार निकालने का परिणाम संबंधित कंपनी में प्राप्त रोजगार से हाथ धोना है। क्योंकि संबंधित कंपनी का यदि कर्मचारी कंपनी की दयनीय दशा का वर्णन करेगा तो सरकार उक्त कंपनी के मालिकान से खफा हो जायेगी और पुन: उक्त कंपनी पर जजिया कर लगा कर उसकी मंदी में भी धीरे-धीरे रेंगती हुई दुकान पर ताला लगा देगी। जिससे ना केवल संबंधित कर्मचारी प्रभावित होगा बल्कि संबंधित कंपनी का मालिक भी बुरी तरह से प्रभावित होगा। मगर इस भय के बावजूद भी देश के उद्योग धंधों में कार्यरत रोजगारपरक लोग भले ही खुलकर अपने मन का गुबार न निकाल पा रहे हो। मगर दबे मन गुबार को व्यक्त करने का प्रयास अवश्य कर रहे है। इसी का उदाहरण मैनफोर्स समाचार पत्र अपने पाठकों के समक्ष इस प्रकार वर्णित कर रहा है। इन दिनों राजधानी लखनऊ के चिनहट इंडस्ट्रीयल एरिया स्थित टाटा मोटर्स से अपना कार्य पूर्ण कर बाहर निकल रहे कर्मचारियों के मुंह से जो बाते निकल रही थी। वह बातेें हैरान कर देने वाली है।

यहां कर्मचारी एक दूसरे सहकर्मी से यह सवाल करते नजर आये कि बाजार में छाई मंदी की वजह से जब कंपनी के उत्पादन में कमी आ रही है और कर्मचारियों की कटौती हो रही है तो कैसे जीवन गुजारा जायेगा ? आज अन्य कर्मचारियों की छटनी हुई है तो कल हम लोगों की भी तो हो सकती है ? कंपनी छटनी करें, इससे पहले हम लोगों को अपनी जीविका चलाने के लिए कुछ ठोस प्रबंध करना ही होगा। अन्यथा हम लोग भी सड़क पर आ जायेगे। ऐसे ही सवालों के चक्र में फंसे कर्मचारी वर्तमान और भविष्य की चिन्ता अपने माथे पर लिए दिखाई दिए। मगर उसके बावजूद भी सरकार और उसके नुमाईन्दों को मंदी की मार नहीं दिखाई दे रही हैं। इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि लोगों के पास आंख होने के बावजूद भी लोग जानबूझकर स्वयं का हित साधने के उद्देश्य से अंधे बने हुए है। टाटा मोटर्स से कार्य समाप्त कर बाहर आने वाले कर्मचारियों की माने तो पूरे अगस्त माह में मात्र दस दिन ही कंपनी में कार्य हुआ। शेष दिन कंपनी बंद रही। कर्मचारियों की माने तो इसी प्रकार यदि मंदी रही तो आगामी दिनों में भी कंपनी का उत्पादन कार्य ठप रहेगा। कंपनी के कर्मचारियों की माने तो पहले जहां प्रतिमाह लगभग 5000 से 7000 वाहनों का उत्पादन होता था। अब बमुश्किल 1800 से 2000 वाहनों का उत्पादन हो रहा है। कर्मचारियों ने बताया कि अब तो अनिश्चितता का माहौल है। अब हमें भी नहीं पता कि अगले हफ्ते हमारी ड्यूटी लगेगी या नहीं ? हम लोगों की नौकरी रहेगी या नहीं ? यह भय सभी कर्मचारियों में व्याप्त हो गया है। पाठकों को बता दें कि भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार विगत 20 वर्षो में सबसे अधिक मंदी के दौर का सामना कर रहा है। सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्यूफैक्चर्स के आंकड़ों की माने तो अप्रैल-जुलाई 2019 की तिमाही में भारत में वाहनों की बिक्री विगत वर्ष की तुलना में 21.56 फीसदी कम रही। जहां कामर्शियल वाहनों की बिक्री में 13.57 फीसदी की गिरावट हुई। वहीं दोपहिया वाहनों की बिक्री में भी करीब 12.93 फीसदी की गिरावट देखने को मिली। सवारी ढोने वाले तिपहिया वाहनों की बिक्री में भी लगभग 7.43 फीसदी की कमी देखने को मिली। चूंकि बिक्री कम हो रही है। इसलिए वाहनों का उत्पादन भी कम हो रहा है। सियाम के ही आंकड़ों की माने तो अप्रैल-जुलाई 2019 के तिमाही में पिछले साल की तुलना में वाहनों का उत्पादन करीब 10.65 फीसदी की कम रहा। जहां अप्रैल से जुलाई 2018 की तिमाही में 10,883,730 वाहनों का उत्पादन हुआ। वहीं वर्ष 2019 के इसी तिमाही के दौरान सिर्फ 9,724,373 वाहनों का उत्पादन किया गया। जिन चीजों का उत्पादन कम हुआ है या बिक्री में गिरावट हुई। उसका सीधा प्रभाव ग्रामीण भारत से है। टाटा, होंडा और मारुती, महिद्रा जैसी बड़ी कंपनियों का उत्पादन प्रभावित होने से इन कंपनियों से संबंधित हजारों छोटी इकाईयों में सैकड़ों प्रकार के कार्य ठप हो गये है। जिससे लाखों लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा। इसमें काम करने वाले अधिकतर ऐसे लोग है। जिनका विवरण किसी रजिस्टर में दर्ज नहीं है। वाहनों के उत्पादन में कमी का यह सिलसिला जुलाई-सितंबर की तिमाही में भी जारी रहा। टाटा, मारूति सुजुकी, महिंद्रा, अशोक लेलैंड, हुंडई, होंडा, टोयोटा और हीरो जैसी बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियां लगातार अपने उत्पादन में कटौती कर रही हैं। प्लांट और गोदाम पर वाहनों की कतार लगी है। उत्पादन कम होने से ये कंपनियां कॉस्ट कटिंग के नाम पर कर्मचारियों की छंटनी कर रही हैं। जिस प्रकार राजधानी लखनऊ के टाटा मोर्टस की हालत है। ठीक उसी प्रकार जमशेदपुर, पुणे, चेन्नई, आदित्यनगर, जमशेदपुर-झारखंड और मानेसर-गुरूग्राम जैसे बड़े ऑटोमोबाइल औधोगिक क्षेत्रों की भी हालत दयनीय बनी हुई है। लगातार कर्मचारियों के छंटनी की खबर आ रही है। 

महिंद्रा और मारूति सुजुकी ने क्रमश: 1500 और 3000 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। फेडरेशन ऑफ  ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (फाडा) की माने तो ऑटोमोबाइल सेक्टर में आई मंदी से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अब तक लगभग दो लाख लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा है। फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन का अनुमान है कि यदि यही स्थिति बनी रहे तो आगामी दो माह में ऑटो सेक्टर से लगभग 10 लाख लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है। पाठकों को बता दें कि लखनऊ के इस औधोगिक क्षेत्र में टाटा मोटर्स के बड़े कॉमर्सियल वाहनों जैसे ट्रक, बस और पिकअप का उत्पादन होता है। इस कंपनी में करीब 5000 से अधिक कर्मचारी कार्य करते हैं। कंपनी के कर्मचारियों का कहना है कि पहले यहां तीन शिफ्ट में कार्य होता था। मगर अब सिर्फ  एक ही शिफ्ट में कार्य होता है। ओवर टाइम तो लगभग समाप्त ही हो चुका है। कर्मचारियों ने बताया कि आटो कंपनियों में लगातार छंटनी की बात सामने आ रही है। एक-दो कर्मचारियों के आत्महत्या की भी बात सामने आ रही है। कर्मचारियों ने कहाकि हमें नहीं पता कि अगले माह हमारी नौकरी रहेगी या नहीं ? कंपनी में कार्य ठप पड़ा है। सर्वाधिक नुकसान उन कर्मियों का हो रहा है। जो दिहाड़ी पर काम करते हैं। कंपनी में काम करने वाले दिहाड़ी मजदूरों ने भी बताया कि आजकल प्लांट में कार्य कम हैं। उनसे भी कार्य नहीं कराया जा रहा है। प्लांट कभी भी बंद हो जाता है। जिसकी वजह से दिन भर की दिहाड़ी चली जाती है। पाठकों को बता दें कि मंदी की मार सिर्फ ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में ही नहीं है। बल्कि मंदी की मार का शिकार पूरा अर्थतंत्र हो गया है। राजधानी लखनऊ के चिनहट इंडस्ट्रियल एरिया में स्थिति आरके पाल का ढाबा है। ढाबे पर जहां तीन माह पूर्व एक समय में 40 से 50 लोग बैठे रहते थे। आज उनके उसी ढाबे पर यह संख्या बमुश्किल चार से पांच लोगों तक सीमित रह गई है। ढाबे पर काम करने वाले एक कर्मचारी ने बताया कि दोपहर दो बजे तक ढाबे की बिक्री जहां पहले साढ़े तीन से चार हजार प्रतिदिन तक हो जाती थी। आज बमुश्किल सुबह से देर रात तक एक से डेढ़ हजार की ही बिक्री हो पाती है। पहले दिन भर में 10 किलो तक चावल समाप्त हो जाता था। अब दो या तीन किलो चावल खपाना मुश्किल हो रहा है। उक्त कर्मचारी ने बताया कि बिक्री कम होने की वजह से मालिक ने ढाबे पर काम करने वाले तीन कर्मचारियों को निकाल भी दिया है। इंडस्ट्रीयल एरिया के ही पास के गांवों में रहने वाले लोगों ने बताया कि पहले सड़क पर ट्रकों की लम्बी-लम्बी लाइने लगी रहती थी। हमेशा जाम का माहौल रहता था। अब टाटा मोटर्स से वाहनों का उत्पादन ही नहीं हो रहा है। जिसकी वजह से वाहनों की लाइने भी समाप्त हो गई है। 

40 वर्षो में आज तक इतनी भयानक मंदी नहीं देखी : मो. अबरार

पाठकों को बता दें कि मंदी की मार का शिकार मात्र बड़े उद्योग ही नहीं हुए बल्कि छोटे उद्योग भी लगभग बंद होने के कगार पर पहुंच गये है। राजधानी लखनऊ के नादरगंज औधोगिक क्षेत्र में नेशनल इंजीनियरिंग वक्र्स नाम से एक छोटी सी कंपनी चलाने वाले मो. अबरार का कहना है कि वे टाटा मोटर्स सहित अन्य आटो मोबाइल कंपनियों के लिए पार्ट बनाते थे। मगर मंदी की मार की वजह से टाटा मोटर्स में वाहनों के उत्पादन में कमी देखने को मिल रही है। उन्होंने बताया कि विगत 40 वर्षो के अपने कारोबारी जीवन में कभी भी ऐसी भयानक मंदी का दौर नहीं देखा था। मो. अबरार ने अपनी बंद पड़ी मशीनों को दिखाते हुए बताया कि पहले उनके यहां आठ नियमित मजदूर थे। इसके अलावा चार-पांच मजदूरों को प्रतिदिन दिहाड़ी पर रख कर कार्य कराते थे। कार्य अधिक होने से मजदूर ओवरटाइम तक करते थे। मगर अब कार्य इतना कम है कि अपने नियमित मजदूरों से साफ-सफाई का कार्य कराना पड़ रहा है। दिहाड़ी और ठेके के मजदूरों से पूरी तरह कार्य लेना बंद कर दिया गया है। नियमित वेतन वाले भी एक मजदूर की छंटनी कर दी गई है। उन्होंने बताया कि सारें मजदूरों को हटाया भी नहीं जा सकता है। क्योंकि बाद में इतने बेहतर कारीगर भी नहीं मिलेंगे। मो. अबरार ने बताया कि बड़े मुश्किल से काम चल रहा है। पाठकों को बता दें कि आटोमोबाइल सेक्टर में मंदी की मार की वजह से इससे संबंधित सभी छोटे उद्योगों को बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। ये सभी छोटे उद्योग टाटा और अन्य आटोमोबाइल कंपनियों के लिए नट, बोल्ट, रिम, बंपर, फ्रेम बोल्ट, क्लैम्प, स्टॉपर, सीट मेटल सहित कई बॉडी पाट्र्स बनाते हैं। इन छोटी कंपनियों में 10 से लेकर 200 तक कर्मचारी कार्य करते है। इस कारोबार से संबंधित 50 हजार से अधिक कर्मी सिर्फ लखनऊ इंडस्ट्रियल एरिया में प्रभावित हुए हैं। ऑटोमोबाइल सेक्टर से संबंधित इन कंपनियों के पास कार्य ना होने की वजह से इनकी मशीने और कर्मी सभी ठप पड़े है। 

मंदी की मार से 90 प्रतिशत छोटी कंपनियां पूरी तरह से ठप : बीके सिंह

एक छोटी सी कंपनी के मालिक बीके सिंह की माने तो उनकी जैसी करीब 1000 कंपनियां हैं। जो आटोमोबाइल कंपनियों के लिए पार्ट बनाती है। मगर मंदी की जबरदस्त मार की वजह से करीब ९0 प्रतिशत कंपनियां ठप पड़ गई है। इन सभी कंपनियों की हालत दयनीय हैं। पता नहीं कब मंदी की मार से बाजार ऊबर पायेगा? उन्होंने बताया कि विगत वर्षों में जो कमाया गया था। अब उसी जमा पूंजी को बैठकर खाया जा रहा है। बीके सिंह की माने तो विगत माह जमशेदपुर की सबसे बड़ी मोटर कंपनी टाटा मोटर्स माह में मात्र 15 दिन ही बमुश्किल कार्य कर रही है। इसी प्रकार आदित्यपुर लौह मंडी में भी मंदी की मार की वजह से कार्र्य का अभाव हो गया है। जिसकी वजह से करीब 30 हजार कर्मचारी बेरोजगार हो गये है। पाठकों को बता दें कि आदित्यपुर वही क्षेत्र है। जहां विगत दिनों एक कर्मचारी ने नौकरी जाने के भय से आत्महत्या कर लिया था। 

छोटे उद्यमियों का लोन चुकाना भी मुश्किल : पुनीत अरोरा

पाठकों को बता दें कि टाटा मोटर्स के लिए कार्यरत उपरोक्त फर्म जिस प्रकार से मंदी की मार से त्राहि-त्राहि कर रहे है। ठीक उसी प्रकार टाटा के लिए काम करने वाली कंपनी इंजीनियरिंग इंटरप्राइजेज लखनऊ के पुनीत अरोरा भी मंदी की मार से त्राहि-त्राहि कर रहे है। पुनित अरोरा के मुताबिक टाटा में वाहनों का उत्पादन कम होने की वजह से इससे संबंधित 50 लघु और मध्यम कंपनियां और इन कंपनियों से संबंधित 50 और कंपनियां लगभग पूरी तरह से बंदी के कगार पर पहुंच गई है। कई उद्यमियों ने अपने उद्योग के लिए लोन लिया है। अब ऐसे उद्यमियों के लिए लोन की राशि का ब्याज चुकाना भी मुश्किल हो गया है। मंदी की मार की उपरोक्त झलक पूरे देश में देखने को मिल रही है। पाठको बता दें कि जमशेदपुर के आदित्यपुर इंडस्ट्रीयल एरिया में भी वाहनों के लिए गियर बनाने वाली एग्जियोम  कंपनी भी करीब दो माह से ठप पड़ी है। कंपनी में करीब 10 लोग थे, जिन्हें निकाल दिया गया है। 

मंदी की वजह से उत्पादन में 70 प्रतिशत की गिरावट : यूके सिंह

पाठकों को बता दें कि टाटा मोटर्स लखनऊ के लिए फ्रे म बनाने वाले करीब 200 कामगारों वाली कंपनी ओमैक्स आटो के यू.के सिंह का भी मानना है कि विगत दिनों की अपेक्षा उत्पादों के उत्पादन में करीब 70 फीसदी से अधिक की गिरावट देखने को मिल रही है। इसलिए कंपनी को कॉस्ट कटिंग करनी पड़ रही है। इसके लिए वे कच्चा माल खरीद रहे हैं और मैनपावर में कमी कर रहे हैं। श्री सिंह ने स्वीकार किया कि कर्मचारियों की छंटनी की जा रही है। कितने कर्मचारी छांटे गये है। इसको बताने से उन्होंने इंकार कर दिया। 

मंदी की वजह से वाहनों के उत्पादन में भारी गिरावट : एसके राय

उपरोक्त की कंपनियों की भांति टाटा मोटर्स के लिए टायर, ब्रेक, एअर टैंक, आदि बनाने वाली कंपनी टीवीएस के प्रबंधन का जिम्मा संभालने वाले एसके राय ने बताया कि पहले की तुलना में सिर्फ 30 प्रतिशत कार्य संपादित हो पा रहा है। टाटा मोटर्स के वाहनों का उत्पादन कम होने की वजह से उनकी भी कंपनी के उत्पादों की बिक्री में भारी गिरावट देखने को मिल रही है। इसलिए कर्मचारियों की उपयोगिता लगभग समाप्त हो गई है। कंपनी ने सर्वप्रथम दिहाड़ी पर कार्य करने वाले कर्मचारियों की छटनी की है। यदि इसी प्रकार मंदी रही तो अगले माह से हो सकता है कि नियमित कर्मचारियों की भी छटनी हो जाये।

शर्म करो बुद्धिजीवियों !

कंपनियों के पास इतना भी काम नहीं है कि अपने नियमित कर्मचारियों से कार्य ले सके। कंपनियों में उत्पादन कार्य लगभग ठप है। इतने के बावजूद भी लोग विवेक शून्य होकर तमाशा देख रहे है। भाजपाई नुमाईन्दों को कही भी बेरोजगारी और मंदी की मार नजर नहीं आ रही है। धर्म-जाति के अफीम का नशा लोगों की नसों में इस कदर भाजपाई नुमाईन्दों ने घोल दिया है कि ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवि धर्म-जाति के अफीम के नशे में मदमस्त होकर बेरोजगारों की बेबशी पर नमक रगड़ते हुए कहते फिर रहे है कि ''भाजपा सरकार से पहले तुम क्या कलेक्टर थे कि आज बेरोजगार हो गये हो।'' ऐसे लोगों के इस प्रकार के वाक्यों से एक बात तो स्पष्टï हो गया कि यदि समाज में ऐसे लोग रहेगे तो निश्चय ही समाज का पतन हो जायेगा। ऐसे लोगों को यह पता नहीं कि भले ही भाजपा सरकार के पहले लोग चपरासी ही क्यों न रहे हो ? लोग 5-10 हजार रूपये ही क्यों ना प्रतिमाह कमाते रहे हो। मगर इसी कमाई के दम पर वे किसी कलेक्टर से कम स्वयं को नहीं समझते थे। मगर भाजपा की संवेदनहीन सरकार ने आम आवाम के साथ अनैतिकता की सारे हदें ही पार कर दी। भाजपा सरकार ने लोगों के अच्छे दिन लाते-लाते लोगों के हाथों में कटोरा थमा कर भिखारी तक बना दिया। फिर भी ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवियों की आंखे नहीं खुल रही है। इसे देश का दुभाग्र्य नहीं तो और क्या कहा जाये? 

 

 

 

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