01
September

संवेदनहीन सरकार और बेरोजगारी की मार

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मैनफोर्स

लखनऊ। आज देश और देशवासियों की दयनीय हालत पर तरस आ रहा है। तरस इसलिए कि जो शिक्षित और प्रबुद्ध वर्ग कहे जाते है। दरअसल वे राजनैतिक पार्टियों के हाथों में अपना जमीर और उत्तरदायित्व बेच चुके है। ऐसे लोग कुछ संक्षिप्त लाभ अथवा स्वार्थपूर्ति हेतु अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ रहे है। ऐसे पढ़े लिखे लोग शिक्षित होने के बावजूद भी किसी मूर्ख से कम नहीं है। ऐसे लोग रानैतिक दलों के इशारों पर अपने ही समाज में, अपने ही परिवार में विघटन डालने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे है। जो अशिक्षित वर्ग है। वह लोगों के बहकावे में आकर जातिगत आग में झुलस रहा है। ये दोनों वर्ग समाज का विघटन करने के लिए राजनैतिक दलों के हाथों से हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहे है और स्वयं के समाज और स्वयं का विनाश कर रहे है। इन दोनों वर्गो के पास एक दूसरे का विनाश करने के अतिरिक्त इतनी भी फु र्सत नहीं है कि ये अपनी सामाजिक, आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ कर सके। समाज में ऐसे तथाकथित शिक्षित और अशिक्षित वर्गो की संख्या इन दिनों दिन दूनी रात चौगुनी की रफ्तार से बढ़ रही है। ऐसे ही वर्गो को इन दिनों भारतीय जनता पार्टी हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है। ऐसे ही वर्गो के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी समाज में जातिगत विद्वेश डालकर समाज को विघटित करने का प्रयास कर रही है। मात्र इसलिए कि वह समाज में फूट डालकर राज कर सके। इतनी सी बात हैं। जो ऐसे तथाकथित समाज के शिक्षित वर्गो और अशिक्षित वर्ग के मूखों को समझ में नहीं आ रही है। ऐसे लोग भारतीय जनता पार्टी का प्रवक्ता बनकर स्वयं के संक्षिप्त लाभों के लिए समाज में जहर घोल रहे है। ऐसे तथाकथित प्रबुद्ध वर्गो को हिन्दू-मुस्लिम और तथाकथित देशभक्ति के अतिरिक्त कुछ और दिखाई नहीं दे रहा है। आज राजनेताओं के बहकावें में आकर ऐसे तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग के लोग जातिगत राजनीति के रंग में रंगकर सरेआम हिन्दू-मुस्लिम, गाय-सूअर, राम-रहीम के नाम पर एक दूसरे का कत्लेआम कर रहे है। मगर अफसोस की बात है कि इसे देशद्रोह नहीं कहा जा रहा है। मगर जो व्यक्ति सरकार की कार्यशैली पर सवालियां निशान लगा दे। उसे देशद्रोही करार दिया जा रहा है। आज लोगों को देशभक्ति दिखाने के लिए प्रमाण की आवश्यकता पड़ रही। यह शर्मनाक बात है कि जिस भारत देश ने एक से आले-आले वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, समाजसेविओं, दार्शनिकों को न केवल जन्म देकर भारत को गौरवान्वित किया बल्कि विदेशी राष्ट्रों को भी गौरवान्वित किया। आज उसी देश में ना जाने कहां से ऐसे लोग पैदा हो गये हैं। जो स्वयं को सबसे श्रेष्ठ और शिक्षित व्यक्ति मानते हैं। वे भारतीय जनता पार्टी के हाथों हथियार के रूप में इस्तेमाल होकर अपनी शिक्षा से समाज का विघटन कर रहे हैं। आज ऐसे ही लोगों की मूर्खता की वजह से देश की सत्ता की बागडोर संभालने वाली भारतीय जनता पार्टी देश की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था का पतन कर रही है। जब से केन्द्र और उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में भाजपा सत्ता में आयी है। तब से लगातार देश की आर्थिक व्यवस्था चरमराती जा रही है। मगर देश के इन तथाकथित शिक्षित वर्गो को समझ में नहीं आ रहा है। घर में भूजी भांग नहीं है। महंगाई आसमान पर है। निजी कंपनियों लगातार बंद हो रही है। लोग धड़धड़ा बेरोजगार हो रहे है। भ्रष्टाचार पूर्व की सरकारों के कार्यकाल की अपेक्षा की चार गुना अधिक बढ़ गया है। मगर उसके बावजूद भी ऐसे तथाकथित शिक्षित और प्रबुद्ध वर्गो को यदि सरकार चाहिए तो सिर्फ भारतीय जनता पार्टी की ही चाहिए। यदि ऐसे तथाकथित शिक्षित और प्रबुद्ध वर्गो से यह पूछा जाता है कि आखिर सरकार ने क्या विकास कार्य किया है कि आपको सरकार भारतीय जनता पार्टी की चाहिए ? ऐसे लोग झटपट भारतीय जनता पार्टी का प्रवक्ता बनकर उत्तर देते है कि क्या सरकार ने नहीं किया है। आप ही बता दीजिए। लोग उल्टा सवाल पूछने वालों पर ही चढ़ जाते है और पूछते है कि आजादी से अब तक 70 सालों में क्या हुआ जरा बताईये। हमारे प्रधानमंत्री पाकिस्तान पर सर्जिकल स्टाईक किये। पाकिस्तान पर गोले दागे है। यह कौन सी सरकार ने किया है। जरा बताईये। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अयोध्या में मंदिर बनाने का वादा किया है। जब से सत्ता में आये है, तबसे मुसलमानों की बोलती बंद है, और कितना विकास चाहिए आपको। यदि किसी ने भूल वश यह पूछ लिया कि देश में दिनों दिन महंगाई बढ़ रही है, लोग बेरोजगार हो रहे है, क्या आपको नहीं लगता कि देश की आर्थिक व्यस्था गड़बड़ा रही है ? ऐसे तथाकथित शिक्षित और प्रबुद्ध वर्ग के लोग तत्काल भाजपा का प्रवक्ता बनकर मुंह से जुबान खिचने के लिए तैयार हो जाते है। जब आगे वाला भारी पड़ जाता है। तब ऐसे लोगों को जवाब ही नहीं सूझता है। तब ऐसे तथाकथित वर्ग के लोग कहते है कि मात्र एक ही दो कार्यकाल में क्या आप सोचते है कि 70 साल की बीमारी दूर हो जायेगी? आदि-आदि तर्क देकर वर्तमान भाजपा सरकार की निष्क्रियता और नाकामी पर पानी फेरने का प्रयास करते है। जब सवाल पूछने वाला व्यक्ति ऐसे तथाकथित शिक्षित व्यक्तियों से जर्जर हो रही देश की आर्थिक व्यवस्था से संबंधित कुछ अन्य गंभीर सवाल करता है तो ऐसे तथाकथित शिक्षित व्यक्ति सवाल पूछने वाले का मुंह नोंचने लगते है और कहते है कि तुम कांग्रेसी हो। तुम लोग देश के गद्दार हो। आदि-आदि तर्क देकर स्वयं को भाजपा का प्रवक्ता और देश का सबसे बड़ा देशभक्त घोषित करने का प्रयास करते है। आज मैनफोर्स समाचार पत्र ऐसे तथाकथित शिक्षित प्रबुद्ध वर्गो को देश की जर्जर आर्थिक व्यवस्था का दिग्दर्शन कराने का प्रयास कर रहा है। जो स्वयं को देश का सबसे बड़ा देशभक्त घोषित करते है। मगर उन्हें देश के गरीबों, मजदूरों, रोजगार विहीन हो रहे लोगों की परवाह नहीं है। ऐसे तथाकथित देशभक्त यह देखे कि कैसे व्यसायिक संस्थानों, उद्योगों, व्यवसायों का पतन हो रहा है। लोगों का पेट पालना दुभर हो रहा है। यदि थोड़ा भी जेहन में जमीर शेष हो तो वास्तविक परिस्थितियों का अवलोकन करों। यदि इसके बावजूद भी बहुत बड़ा देशभक्त बनने का शौक चर्रा रहा हो तो समाज के बीच आओ और लोगों का पेट पालने में सहयोग करों, लोगों को रोजगार दो, डूबती हुए व्यवासायिक प्रतिष्ठानों और संस्थओं को बचाओ, उद्योगों की खस्ताहाल हो रही हालत को दुरूस्त करों। अन्यथा देशभक्ति का ढोंग रचना बंद करों।

सबसे बड़ी पत्थर मंडी बंद, दो लाख मजदूर बेरोजगार

पाठकों को बता दें कि जबसे केन्द्र की सत्ता पर भारतीय जनता पार्टी आसिन हुई है। तबसे लगातार उसकी गलत नीतियों के चलते देश की अर्थव्यवस्था चरमाराती जा रही है। देश में इन दिनों जबरदस्त मंदी का दौर चल रहा है। जिसका परिणाम यह हुआ कि उत्तर प्रदेश के महोबा जनपद स्थित एशिया की सबसे बड़ी पत्थर मंडी की आर्थिक व्यवस्था चरमरा गई गई। उक्त पत्थर मंडी तालाबंदी के दौर से गुजर रही है। पाठकों को बता दें कि इतनी बड़ी पत्थर मंडी के बंद होने के कारण लगभग 2 लाख मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का व्यापक संकट खड़ा हो गया है। मजदूरों की बेरोजगारी के अतिरिक्त भी पत्थर मंडी से हो रहे आयात-निर्यात के साधन में सम्मिलित लगभग 6 हजार ट्रक बेकार खड़े हो गये है। पाठकों को बता दें कि इस पत्थर मंडी की ऐसी दशा यूपी की सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी की सरकार की नई खनिज नीति के कारण हुआ है। स्टोन क्रेशर मालिकों ने सरकार की नई खनिज नीति के विरोध में हड़ताल भी किया। हालात दिनों दिन बिगड़ता जा रहा है। स्टोन क्रेशर की नीलामी तक बिगडऩे लगी है। पाठकों को बता दें कि जो नेशनल हाइवे 34, पत्थर मंडी के सामान ढोने वाले ट्रकों व मजदूरों से गुलजार रहता था। आज वह सन्नाटें के दौर से गुजर रहा है। क्रेशर मालिकों का कहना है कि शासन की नई खनिज नीति के कारण अनिश्चितकालीन हड़ताल करने के लिए विवश होना पड़ा रहा है। पाठकों को बता दें कि उत्तर प्रदेश के महोबा जनपद के कबरई कस्बा पत्थर उद्योग की नगरी के नाम से जाना जाता है।  यह एशिया का सबसे बड़ा पत्थर बाजार है। पत्थर मंडी के चारों ओर तकरीबन 350 स्टोन क्रेशर लगे हैं। मगर अब यह सन्नाटें के दौर से गुजर रहा है। पत्थर मंडी के ठेकेदारों और स्टोन क्रेशर के मालिकों ने सरकार की नई खनिज नीति के विरोध में जिला प्रशासन को ज्ञापन भी सौंपा था। जिसमें उल्लेखित किया गया था कि सरकार इस प्रकार की अनैतिक नीति लागू करके मजदूरों, मालिकों के पेट पर लात न मारे। मगर जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो क्रेशर मालिक ठेकेदार सभी संयुक्त रूप से 17 अगस्त 2019 को अनिश्चितकालिन हड़ताल पर चले गये।

पारले बिस्किट कंपनी पर पड़ी मंदी की मार दस हजार श्रमिक होंगे बेरोजगार 

जिस प्रकार उत्तर प्रदेश की पत्थर मंडी सरकार की गलत नीति का शिकार हुई। ठीक इसी प्रकार केन्द्र सरकार की गलत नीतियों के कारण अब खाद्य पदार्थों के उत्पादन पर भी मंदी का जबदरस्त साया मंडरा रहा है। आर्थिक मंदी की यह जबरदस्त मार बिस्किट बनाने वाली जानी मानी मशहूर कंपनी पारले के प्रोडक्ट्स पर भी पड़ रही है। पारले कंपनी से जुड़े 8 से 10 हजार श्रमिक बेरोजगारी की कगार पर है। कंपनी की माने तो यदि आर्थिक हालातों पर सरकार ने शीघ्र विचार नहीं किया तो उन्हें कड़े फैसले लेने के लिए विवश होना पड़ेगा। कंपनी के मुताबिक पारले बिस्किट की बिक्री में लगातार गिरावट हो रही है। इसी प्रकार अन्य बिस्किट कंपनियों के उत्पादों की बिक्री में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। पारले प्रोडक्ट्स के कैटेगरी हेड मयंक शाह का कहना है कि उन्होंने सरकार से मांग है कि 100 रुपये प्रति किलो या उससे कम कीमत वाले बिस्किट पर जीएसटी घटा दें। उन्होंने कहाकि यूं तो यह बिस्किट आमतौर पर 5 रुपये या उससे भी कम के पैक में बिकता हैं। यदि सरकार ने हमारी मांग नहीं मानी तो हमें अपनी फैक्टरियों में काम करने वाले आठ से दस हजार कर्मचारियों को न चाहते हुए भी नौकरी से निकालना पड़ेगा। उन्होंने कहाकि महंगाई की वजह से सेल्स घटने से हमें भारी नुकसान हो रहा है। पाठकों को बता दें कि इसी प्रकार पिछले हफ्ते बिस्किट निर्माता कंपनी ब्रिटानिया के प्रबंध निदेशक वरुण वैरी ने भी कहा था कि यदि सरकार ने आर्थिक नीतियों पर गंभीरता से विचार नहीं किया तो वर्तमान हालात में उपभोक्ता को 5 रुपये का बिस्कुट खरीदने के लिए भी सोचना पड़ेगा। पाठकों को बता दें कि नुस्ली वाडिया की कंपनी ब्रिटानिया का शुद्ध लाभ जून माह की तिमाही में 3.5 प्रतिशत से घटकर 249 करोड़ रुपये रहा गया है। इतना ही नहीं ब्रिटानिया कंपनी ने भी मजदूरों की छटनी शुरू कर दी है। कंपनी का रूख आगे भी बड़े पैमाने पर मजदूरों को छांटने की है। पारले कंपनी की सबसे ज्यादा बिकने वाले बिस्किट पारले जी, मोनेको और मैरी ब्रांड है। कंपनी की बिक्री 10,000 करोड़ से अधिक है। यूं तो कंपनी के सीधे तौर पर 10 प्लांट है। जहां एक लाख श्रमिक काम करते हैं। इतना ही नहीं पारले के पास 125 थर्ड पार्टी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट भी है। जब से केन्द्र की भाजपा सरकार ने सत्ता संभाला है। उसने जीएसटी के नाम पर व्यवसायियोंं की कमर तोड़ दी है। कंपनी के अधिकारियों का कहना है कि देश में जीएसटी लागू होने से पूर्व 100 रुपये प्रति किलो से कम कीमत वाले बिस्किट पर 12 प्रतिशत टैक्स वसूला जाता था। मगर जब से भाजपा सरकार ने जीएसटी लागू किया है। तब से कंपनियों से सभी बिस्किटों पर 18 प्रतिशत के स्लेब में जीएसटी वसूला जा रहा है। जैसे ही जीएसटी बढ़ा वैसे ही कंपनियों को भी अपने बिस्किटों के दाम बढ़ाने पड़े। जिसका सीधा असर बिक्री पर पड़ा। जिस तरह से अन्य क्षेत्रों में व्याप्त जबरदस्त मंदी के कारण लोगों को बेहाल और बेरोजगार होना पड़ा। ठीक ऐसे ही खाद्य सामग्रियों के क्षेत्र में भी लाखों लोगों को बेहाल और बेरोजगार होना पड़ रहा है। लाखों-करोड़ों लोग बेरोजगारी के कगार पर है। फिर भी देश के तथाकथित शिक्षित प्रबुद्ध वर्ग के लोगों को भारतीय जनता पार्टी की प्रवक्तागिरी और धर्म-जाति की गंदी राजनीति से फुर्सत नहीं मिल रही है कि देशवासियों की पीड़ा को समझ सके। लोग बेरोगारी के दंश से मर रहे है। मगर इन्हें देश को विघटित करने वाले राजनीतिक प्रपंच से फु र्सत नहीं है। शर्म आनी चाहिए कि ऐसे लोग स्वयं को मानव कहते है।

टैक्सटाइल कारोबार में हुए लाखों बेरोजगार

देश के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि पूंजीपतियों की समस्या और बाजार की मंदी का समाचार देश का कोई अखबार या चैनल नहीं दिखा रहा है। पूंजीपति अपने क्षेत्र की मंदी का समाचार भी बतौर विज्ञापन के तौर पर पैसे देकर छपवाने के लिए विवश हो रहे है। इसी प्रकार का एक वाकया टैक्सटाईल क्षेत्र से आ रहा है। जिस प्रकार लोग आटोमोबाइल, खाद्य सामग्रियों के उत्पादन आदि अन्य क्षेत्रों से बेरोजगार हो रहे है। ठीक उसी प्रकार टैक्सटाइल और चाय के क्षेत्र से भी बेरोगार हो रहे है। मगर अफ सोस की इतने गंभीर विषयों पर आज की बिकाऊ मीडिया प्रकाश डालने का साहस नहीं कर पा रही है। लाखों लोगों के बेरोजगार होने का समाचार आज की पत्रकारिता के लिए समाचार नहीं है। मगर एक नेता बीमार हो जाये या उसके घर बच्चा पैदा हो जाये या शादी विवाह हो जाये तो उसके लिए पहले पन्ने की खबर या 20 से 30 मिनट के टीवी चैनल के मनोरंजन का साधन बन जाता है। धर्म के नाम पर उन्माद फैलाने के लिए विवादास्पद खबरों को परोसना उसके लिए आवश्यक है। मगर जब बात देश के भविष्य की हो, देश में व्याप्त बेरोगारी की हो, देश की अर्थ व्यवस्था की हो, समाज के दिनों दिन हो रहे विघटन की हो, तो यह उसके लिए समाचार नहीं है। मीडिया की निरंकुशता का परिणाम है कि देश की अर्थव्यवस्था का रीढ़ माने जाने वाले टैक्सटाइल कारोबार के कारोबारियों को देश में व्याप्त मंदी की खबरें विज्ञापन के रूप में छपवाने के लिए विवश होना पड़ रहा है। इसका एक छोटा सा उदाहरण अभी हाल ही में 20 अगस्त 2019 को एक तथाकथित सम्मानित समाचार पत्र में देखने को मिला। उक्त तथाकथित सम्मानित समाचार पत्र के पहले पृष्ठ पर विज्ञापन के तौर यह उल्लेखित किया किया गया था कि नॉर्दन इंडिया टैक्सटाइल मिल्स भारी मंदी के दौर से गुजर रही है। मिल को लगातार घाटा हो रहा है। जिसके कारण बड़ी संख्या में नौकरियां जा रही हैं। उक्त प्रकाशित विज्ञापन में भारी तादाद में मजदूरों की नौकरियां जाने के बाद फैक्ट्री से बाहर आते लोगों के स्केच को भी दशार्या गया था। बहुत छोटे शब्दों में यह भी लिखा था कि एक तिहाई धागा मिलें अब तक बंद हो चुकी हैं और जो चल रही हैं, वो भारी घाटे में हैं। अर्थात मिलों की हालत इतनी अधिक खराब है कि वे कपास खरीदने की हालत में भी नहीं है। इसका सीधा असर किसानों पर पड़ेगा। क्योंकि आगे उनकी कपास की तैयार फ सल का कोई खरीददार नहीं होगा। करोड़ों रुपये की कपास की फ सल किसान कहां खपाएंगे? इतने गंभीर मुद्दे के इस समाचार को उक्त तथाकथित सम्मानित समाचार पत्र नि: शुल्क और समाजहित में प्रकशित करने में दिलचस्पी नहीं दिखाया। बड़े अफ सोस के साथ यह कहना पड़ रहा है कि जिन अखबारों के पहले पृष्ठ की यह सुर्खिया होनी चाहिए। उन्हीं अखबारों में यह खबर विज्ञापन का रूप धारण कर लिया। जो समाचार जनहित में नि: शुल्क प्रकाशित होना चाहिए। वही समाचार पैसे लेकर विज्ञापन के स्वरूप में प्रकाशित किया जा रहा है। जब समाज का वह आधार जिसके कंधे पर समाज की वास्तविकता का आईना दिखाना है। जब वही सूरदास बन जाये तो फिर समाज का क्या होगा ? इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। जब से केन्द्र की सत्ता में भाजपा की सरकार शासित हुई है। तबसे लगातार देश की अर्थव्यवस्था धाराशायी होती जा रही है। मगर इतने गंभीर मुद्दे भी हमारे तथाकथित शिक्षित प्रबुद्ध वर्गो के लिए कोई मायने नहीं रखती है। इससे स्पष्ट होता है कि समाज और देश गर्त में जा रहा है। 

आटोमोबाइल सेक्टर में भयंकर मंदी

पाठकों को बता दें कि उपरोक्त के अतिरिक्त भी आटोमोबाइल के क्षेत्र में भारी मंदी देखने के मिली है। जिस प्रकार अशोक लेलैंड, टाटा आदि कंपनियां मंदी की मार झेल रही है। ठीक उसी प्रकार मंदी की मार का शिकार मारूति सुजुकी भी हुई है। इस कंपनी ने भी 3,000 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। मारुति सुजुकी ने पिछले सात महीनों में काफी प्रोडक्शन घटाया है। जिसका सीधा असर मजदूरों के रोजगार पर पड़ा है। जुलाई माह 2019 में मारुति सुजुकी की पैसेंजर कारों की बिक्री में 36.2 फीसदी की गिरावट आयी। दक्षिण भारत के ऑटो सेक्टर में भी भारी गिरावट आयी। दक्षिण भारत के आटो सेक्टर में काम करने वाले मजदूरों को भी छंटनी का शिकार होना पड़ा है। पाठकों को बता दें कि चेन्नई के ऑटो इंडस्ट्री हब में 5000 से अधिक ठेका मजदूरों और ट्रेनी मजदूरों की छंटनी कर दी गई है। विगत जनवरी माह से लेकर मई माह तक यात्री वाहनों की बिक्री में पिछले वर्ष के मुकाबले 8.9 प्रतिशत व दोपहिया वाहनों की बिक्री में 11.3 प्रतिशत की भारी कमी दर्ज की गयी है। करीब 35 हजार करोड़ रुपए मूल्य के 5 लाख यात्री वाहन व 17500 करोड़ रुपए मूल्य के 30 लाख दो पहिया वाहन, खरीददारों की प्रतीक्षा में बाजारों में धूल फांक रहे हैं। सरकार ने भले ही इनकी बिक्री बढ़ाने के लिए ब्याज दरों में कटौती की हो। मगर उसके बावजूद भी यह नीति ग्राहकों को आकर्षित करने में असफ ल रही। सोसायटी आफ इंडियन आटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर के मुताबिक मई 2019 में मई 2018 के मुकाबले यात्री वाहनों की बिक्री में पिछले 18 वर्षों की सबसे भारी गिरावट देखने को मिल रही है। मई 2018 में 301238 यात्री वाहनों की बिक्री हुई थी। जबकि मई 2019 में 20.55 प्रतिशत घटकर 239347 रह गई। वहीं कॉमर्शियल वाहनों में 10.02 प्रतिशत, तिपहिया में 5.76 की कमी दर्ज की गयी। जबकि दो पहिया वाहनों की बिक्री पिछले मई 2018 में 1850698 के मुकाबले 8.62 प्रतिशत घटकर 1726206 ही रह गयी। मगर इसके बावजूद भी देश के तथाकथित बुद्धिजीवी बड़े बेशर्मी के साथ देश बदल रहा है का नारा लगाते-लगाते देश को गर्त में धकेले जा रहे है। इसी विकास के पैमाने पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार ताल ठोंक रही है।

ट्रक कंपनी अशोक लेलैंड में छंटनी तालाबंदी का दौर जारी

जिस प्रकार सरकार की गलत नीतियों के कारण अन्य क्षेत्रों में मंदी का जबरदस्त दौर देखने को मिला। ठीक उसी प्रकार देश की प्रतिष्ठित ट्रक निर्माता कंपनी अशोक लेलैंड में भी देखने को मिल रहा है। पाठकों को बता दें कि ट्रक निर्माता कंपनी अशोक लेलैंड के पंतनगर प्लांट में 14 अगस्त 2019 से 22 अगस्त 2019 तक लेऑफ अर्थात कर्मचारियों से कार्य लेना बंद कर दिया गया था। इससे पूर्व पिछले माह भी अशोक लेलैंड का पंतनगर संयंत्र 16 जुलाई 2019 से 15 दिन तक बंद था। वर्तमान में प्लांट में कंपनी के स्थाई श्रमिक बेहद कम हैं। पाठकों को बता दें कि ऐसी कंपनियों में बड़ी संख्या में ठेका मजदूर कार्य करते है। जब मंदी का दौर प्रारम्भ होता है तो सीधे तौर पर ऐसे मजदूर बेरोजगार हो जाते हैं। इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है। अशोक लेलैंड जैसी कंपनियां अपने यहां उत्पादों को तैयार कराने के लिए सीमेंस आदि जैसी कंपनियों से ठेके पर मजदूरों की सेवा लेती है। जैसे ही मंदी का दौर प्रारम्भ होता है। अशोक लेलैंड जैसी कंपनियां सर्वप्रथम सीमेंस जैसी कंपनियों से ठेके पर लिये गये मजदूरों की संख्या को धीरे-धीरे कम करने लगती है। कभी-कभी तो अचानक 30 प्रतिशत से लेकर 50 प्रतिशत तक की कटौती कर दी जाती है। अर्थात एक ही झटके में हजारों से अधिक लोग बेरोजगार हो जाते है। कभी-कभी तो ये कंपनियां मंदी की मार के चलते अपने कर्मचारियों को जबरन निकालने लगती है। इसी प्रकार का हथकण्डा अपनाने के लिए इस बार अशोक लेलैंड को विवश होना पड़ा। वाहन क्षेत्र में भारी सुस्ती के के कारण अशोक लेलैंड की चेन्नई शाखा ने अपने कर्मचारियों के लिए नौकरी छोडऩे की एक योजना की घोषणा की। इस घोषणा के तहत उसने छंटनी की दो योजना शुरू की है। पहली योजना यह कि कर्मचारी स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति अर्थात  वीआरएस ले ले। जो कर्मचारी वीआरएस के दायरे में नहीं आ रहे है, उनके लिए दूसरी योजना है एम्प्लाई सेपरेशन स्कीम (ईएसएस)। कंपनी के सूत्रों के मुताबिक ये योजनाएं एक्जीक्यूटिव स्तर के लिए घोषित की गई हैं। ईएसएस योजना के तहत ए श्रेणी में आने वाले एक्जीक्यूटिव को अधिकतम 30 लाख रुपये मिलेंगे। इसी तरह से बी श्रेणी में आने वाले एक्जीक्यूटिव को नौकरी छोडऩे पर न्यूनतम 60 लाख रुपये दिए जाएंगे। इस प्रकार की योजनाएं प्रारम्भ कर अशोक लेलैंड ने अपने कर्मचारियों से पल्ला झाडऩे का काम किया है। कंपनी ने जून और जुलाई में मांग में कमी को देखते हुए उत्पादन घटाने के लिए उत्तराखंड के पंतनगर के प्लांट को छह दिनों के लिए बंद करने का निर्देश दिया था। वाहन क्षेत्र की सुस्ती के कारण कई वाहन निर्माता कंपनियों और कंपोनेंट आपूर्तिकर्ताओं को उत्पादन घटाना पड़ा है और अस्थायी तौर पर कुछ दिनों के लिए प्लांट को बंद करना पड़ा है। इसी प्रकार इस कंपनी की जुलाई माह 2019 में पैसेंजर वाहनों की घरेलू बिक्री में करीब 31 फीसदी की गिरावट हो गई। जिसका मुख्य कारण गलत नीतियों के चलते अर्थव्यवस्था का चरमराना है। यह गिरावट दो दशक की सबसे बड़ी गिरावट है। इतने के बावजूद भी भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र सरकार विकास के बड़े-बड़े दम्भ भरने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है। ऐसे ही तथाककथित विकास के दावों के दम पर भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र शासित सरकार देश की अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन डॉलर करने का ख्वाब देख रही है।

टाटा मोटर्स की उत्तराखण्ड यूनिट अस्थायी रूप से बंद

जिस प्रकार अशोक लेलैण्ड के प्लांट बंद हुई। ठीक उसी प्रकार टाटा मोटर्स लिमिटेड के पंतनगर प्लांट में भी ब्लॉक क्लोजर (ले.ऑफ जैसा जो केवल टाटा में काम बंदी के लिए अपनी मर्जी का कानून है। जिसमें स्थाई श्रमिकों की अपनी छुट्टी जाती है) के तहत 11 से 20 अगस्त तक प्लांट बंद हो गया। टाटा से जुड़ी सभी वेंडर कंपनियां भी बंद हैं। इससे बड़े पैमाने पर अस्थाई-ठेका, ट्रेनी मजदूर प्रभावित हुए हैं। यह हाल केवल पंतनगर प्लांट का नहीं है बल्कि टाटा के जमशेदपुर से लेकर पुणे तक सभी प्लांटों का यही हाल है। जहां एक तरफ  ब्लॉक क्लोजर के तहत प्लांट और वेंडर कंपनियां बंदी का शिकार हैं। वही दूसरी तरफ बंदी और छंटनी का यह दौर देश के सम्पूर्ण आटोमोबाइल क्षेत्र में जारी है। लोग धड़ाधड़ बेरोजगार हो रहे है। घर परिवार चलाने के लिए दाने-दाने के लिए मोहताज हो रहे है। मगर उसके बावजूद देश के तथाकथित शिक्षित प्रबुद्ध वर्ग धर्म और जातिगत राजनीति के गंदी मानसिकता से उबर नहीं पा रहे है। देश की इतनी दयनीय दशा होने के बावजूद भी ऐसे लोग बेरोगारी की मार से जख्मी लोगों के घावों पर नमक रगडऩे से बाज नहीं आ रहे है।

 

 

 

 

 

 

 

 

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