09
August

मजदूरों के अधिकारों पर सरकार का हमला

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मैनफोर्स

लखनऊ। भाजपा ने बड़े ही शातिराने तरिके से वर्ष २014 में प्रचण्ड बहुमत के साथ सत्ता की बागडोर संभाली। जिसका सारा श्रेय नरेन्द्र मोदी और भाजपा की मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को दिया गया। भाजपा ने जिस कलाकारी से वर्ष 2014 में सत्ता हथियायी उसी कलाकारी से उसने एक बार फिर वर्ष  2019 में सत्ता को हथियाने की बाजीगरी दिखाई। इस बाजीगरी में एक बार फिर प्रचण्ड बहुमत के साथ देश की सत्ता भाजपा के हाथ में आ गई। भाजपा सरकार ने अपने पूर्ववर्ती कार्यकाल में जितने भी कार्य किये उसमें से दो-चार कार्यो को छोड़ दिया जाये तो ऐसा कोई भी कार्य जमीनी स्तर पर नहीं दिखा। जिसमें उसने कद्दू में तीर मारने की योग्यता का प्रदर्शन न किया हो। अर्थात अधिकतर विकास के कार्यो में उसने मात्र कागजी घोड़े ही दौड़ाने की महारत हासिल की। यदि भाजपा ने अपने वर्ष 2014 के प्रथम कार्यकाल की सम्पूर्ण अवधि में वास्तविकता के धरातल पर कोई तमगा पाने वाला कार्य किया है तो वह है विपक्षी दलों को कोसने और ताने मारने का कार्य। भाजपा ने इस अवधि में विकास के कार्यो को करने  से ज्यादा दिलचस्पी विपक्ष का पतन करने में दिखाया। इस कार्यकाल में भाजपा के वरिष्ठ और कनिष्क नेता जनता की समस्याओं का समाधान करने और विकासात्मक कार्यो की रूप रेखा बनाने की बजाय धार्मिक, जातिगत राजनीति की खिचड़ी पकाने में व्यर्थ किया। भाजपा सरकार के तोपचियों ने भले ही देश की अस्त-व्यस्त आंतरिक व्यवस्था को व्यवस्थित न कर पाये हो। मगर अंतराष्ट्रीय स्तर पर सम्पूर्ण राष्ट्रों में  नया भारत बनाने का तथाकथित डंका जरूर पीट दिया। भाजपा सरकार ने देश की आवाम के तथाकथित विकास के नाम पर भारी भरकम बजट की व्यवस्था का ऐलान भी किया। मगर उसके किसी भी बजट में  मेहनतकश मजदूरों के लिए कोई व्यवस्था नहीं हुई। मेहनतकश मजदूरों को निचोड़कर पूँजीपतियों के हित में भाजपा सरकार ने अर्थव्यवस्था को सरपट दौड़ाने ढोंग किया है। भाजपा सरकार का दूसरा कार्यकाल भी प्रारम्भ हो गया। अभी हाल ही में पहला पूर्णकालिक बजट भी घोषित कर दिया गया। इस बजट में तथाकथित कराये जाने वाले विकास के कार्यो का रोडमैप भी तैयार कर दिया गया। मगर अफसोस कि इस बजट के रोडमैप में एक बार फिर मेहनतकश मजदूर बलि का बकरा बन गया।

भाजपा सरकार मेहनतकश मजदूरों के हक पर हमला

भाजपा सरकार ने अपने दूसरे के कार्यकाल में जो पहला बजट पेश किया। उसमें अब तक की सरकारों के द्वारा 44 श्रम कानूनों के तहत बेखौफ  घोषित किये गये मजदूरों को चार श्रम संहिताओं में बदलकर असहाय बनाने का कुचक्र रचा गया है। अब इन चार श्रम संहिताओं के तहत कंपनियों को मेहनतकश मजदूरों को रखने और निकालने की खुली छूट दे दी गई। इतना ही नहीं स्वयं के अधिकारों के हनन के विरूद्ध आवाज उठाने वाली यूनियनों के विरोध मार्ग को भी संकुचित कर दिया गया है। इतना ही नहीं अब कंपनियों के स्वामियों को आयकर दाखिले और पंजीकरण में भी छूट दे दी गई है। इसके अतिरिक्त कंपनियों को विवादों को घटाने के बहाने मजदूर के अधिकारों पर खुलेआम हमला करने की भी भाजपा सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में खुली छूट दे दी है। इस कार्यकाल में भी मेहनकश मजदूर के कल्याण के लिए भाजपा सरकार के पास कोई नीति नहीं रहीं। कही भी, किसी भी प्रकार की, मेहनतकश मजदूरों के कल्याण के लिए भाजपा सरकार के कार्यकाल में कोई व्यवस्था नहीं की गई। फिर भाजपा सरकार सबका साथ, सबका विकास की ढपली तेजी से पीट रही है।

भाजपा सरकार मजदूरों की या धनकुबेरों की?

धन कुबेरों पर भाजपा सरकार ने गजब की नजरें इनायत की। धनकुबेरों पर सरचार्ज का जो ढोल पीटा गया। दरअसल, उसके पीछे की हकीकत चार हजार करोड़ रुपये तक के कारोबारियों की 99.3 फीसदी कम्पनियों के आयकर में पांच फीसदी की बड़ी राहत देना हैं। पूंजीपतियों को मिल रही छूट की अवधि पांच साल से बढ़ाकर 10 साल तक कर दिया गया है। उनके लाभ के लिए सम्पत्ति कर को पूर्ण विलोपित करने करने की घोषणा कर दी गई है। बैलेन्स शीट के माध्यम से विदेशी पूँजी की परतन्त्रता के लिए भाजपा सरकार ने सारे रास्ते खोल दिये है। बीमा क्षेत्र में 100 फीसदी एफ डीआई, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की खुली छूट दे दी है। सिंगल ब्रांड खुदरा व्यापार व मीडिया में भी एफ डीआई को बढ़ा दिया गया। भाजपा सरकार ने सरकारी कंपनियों को बेचकर डेढ़ लाख करोड़ रुपये का विनिवेश अर्थात शेष सरकारी कंपनियों को कौडिय़ों के मोल अम्बानी-अडानी को बेचने का षडय़ंत्र रचा है। भाजपा सरकार ने रेलवे ट्रैक, रेल इंजन, रेलकोच व वैगन निर्माण कार्य तथा यात्री माल सेवाएं पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत निजी हाथों में सौंपने का कुचक्र रचा है। भाजपा सरकार के इस कार्यकाल में भारतीय रेलवे निगमीकरण से निजीकरण के दिशा में तेजी से अग्रसित हो रहा है। सर्वाधिक रोजगार देने वाले रेलवे में स्थाई रोजगार खत्म करने का षडय़ंत्र किया गया है। इसी प्रकार वन नेशन, वन ग्रीड के तहत विद्युत विभाग के निजीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई है। पूँजीपतियों के भ्रष्टाचार की दरिया बने सरकारी बैंकों को 70 हजार करोड़ रुपये दिया जाएगा। इतना ही नहीं, पूँजीपतियों द्वारा मचायी जाने वाले लूट से सार्वजनिक बैंकों को होने वाले घाटे का 10 फीसदी खर्च 6 माह तक सरकार उठाने के लिए तैयार है। मगर देश के बेरोजगारों को रोजगार देने के लिए किसानों का कर्ज मांफ करने के लिए उसके पास धन नहीं है। भाजपा सरकार देश के लुटेरे पूँजीपतियों को को मजबूत कर रही है। मगर देश के मेहनतकश मजदूरों और किसानों का खून चुसने में लेस मात्र भी परहेज नहीं कर रही है। भाजपा सरकार भारतीय पासपोर्ट वाले एनआरआई को आधार कार्ड की सुविधा देने के लिए सशक्त है। मगर देश में रहने वाले गरीब नागरिकों को एनआरसी के तहत देश से भगाने में परहेज नहीं कर रही है। भाजपा सरकार ने अपने इस कार्यकाल में भी बेरोजगारी कम करने और कल्याणकारी योजनाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा के क्षेत्र में मेहनतकशों के लाभ और उनके विकास के लिए किसी प्रकार की योजना का साकारात्मक क्रियान्वयन नहीं किया है। मनरेगा के बजट में भी सरकार ने 1084 करोड़ रूपए की कटौती कर दी। गरीबों की एलपीजी योजना में 500 करोड़ की कटौती कर दी गई। प्रत्येक  गरीब परिवारों को दी जाने वाले बिजली विभाग की ग्राम ज्योति योजना के बजट में 1000 करोड़ रूपये की कमी कर दी गई। प्रधानमंत्री आवास योजना के बजट में भी 600 करोड़ रूपये की कमी कर दी गई। महिलाओं, बालिकाओं व बच्चों के पोषण और अन्य जनहितकारी मदों में भी कमी कर दी गई। महिलाओं के संरक्षण व सशक्तीकरण बजट में 36 करोड़ की कमी कर दी गई। अनुसूचित जाति के बजट को घटाकर 5445 करोड़ कर दिया गया। अल्पसंख्यकों के विकास के लिए आवंटित बजट को 2017 की तुलना में आधा कर दिया गया। दिव्यांगजनों और विधवा महिलाओं आदि जैसे वंचित समूहों के विकास के बजट में 400 करोड़ की कटौती कर दी गयी है। बुनियादी शिक्षा जहां गरीबों के बच्चे पढ़ते हैं। ऐसी शिक्षा व्यवस्था के बजट को घटाकर तीन फ ीसदी कर दिया गया। भाजपा सरकार की इस कार्यशैली से देश की आवाम स्वयं आंकलन करें कि वर्तमान सरकार किसकी ? आम आवाम की या धनकुबेरों की?

भाजपा सरकार में सच कहना बना सकता निराशावादी और देशद्रोही

भाजपा सरकार वरिष्ठ कर्णधार किसी चमत्कारी बाबाओं से कम नहीं है। सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ही ले लीजिए। उनका विकास भाजपा की मातृ संस्था ने चमत्कार दिखाने के लिए किया। जब से इन्हें भाजपा की कमान और सरकार का मुखिया बनाया गया। तब से इन्होंने विपक्ष को कोसने का नया-नया चमत्कार दिखाया है। इन्होंने शब्दों का इन्द्रजाल बुना कि अच्छे-अच्छे शब्दों के बाजीगर भी इनके शब्दोंके चमत्कार के आगे पानी मांगने लगे। प्रधानमंत्री मोदी की निगाहों में वह व्यक्ति पेशेवर निराशावादी जो उनके फैसलों और नीतियों पर सवाल उठाने की हिमाकत करें। चुनाव मौसम में इन्होंने शब्दों के इन्द्रजाल बुनकर देश में रोजगार की बाढ़ ला दी थी। जैसे ही चुनावी मौसम समाप्त हुआ। वैसे ही देश में सरकारी आंकड़ों के अनुसार रोजगार का अकाल पड़ गया। इन्हीं के सरकारी महकमों के आंकड़े रोजगार की भयावह स्थिति का चीख-चीख वर्णन करने लगे। मगर अफसोस कि यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नजर में पेशेवर निराशावादी दृष्टिकोण नहीं है। उनकी पार्टी के तमाम सांसद कभी मारपीट तो कभी अधिकारियों से अभद्र व्यवहार करने का सेहरा अपने सिर पर बांधते रहे, और हमहूं सजनी राजकुमार का ढोंग करते रहते। मगर उसके बावजूद भी प्रधानमंत्री की नजर में इस प्रकार की कार्यशैली पेशेवर निराशावाद के पैमाने पर खरी नहीं उतरी। प्रधानमंत्री के इस पेशेवर निराशावाद का सबसे बड़ा उदाहरण तो यह है कि यदि आज कोई तथाकथित निराशावादी उनकी पार्टी में शामिल हो जाए तो वह आशावादी हो जाता है। ऐसे बहुत सारे निराशावादियों को आशावादियों में परिवर्तित करने की प्रक्रिया देखते ही देखते उत्तर-पूर्व से प्रारम्भ होकर कोलकाता के मार्ग से कर्नाटक तक जा पहुंची। अब देखना यह है कि देश चलाने वाले और कहां तक  और किस हद तक जा सकते हैं? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सही कहते हैं कि सवाल पूछने वाले सभी व्यक्ति पेशेवर निराशावादी हैं। पेशेवर मतलब रोजगार धारक और पेशेवर कहकर कम से कम रोजगार के आंकड़े तो बढ़ाए ही जा सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ वे कैसे निराशावादी हैं? जो गाय के नाम पर किसी की हत्या करके भी सुरक्षित रहते हैं और जिसकी हत्या होती है, उसके ही घर वाले ही मुजरिम हो जाते हैं? वे कैसे निराशावादी हो सकते हैं जो सोशल मीडिया पर खुलेआम बलात्कार करने और गर्दन काटने की धमकी देते है ? वे कैसे निराशावादी हो सकते हैं, जो खुलेआम किसी को इसलिए भी अधमरा कर देते है कि अमुक व्यक्ति ने अमुक के कहने पर जय श्री राम नहीं कहा ? यह कितना आश्चर्यजनक है कि प्रधानमंत्री केवल पेशेवर निराशावादी शब्द का इन्द्रजाल बुनने और परिभाषा गढऩे के लिए वाराणसी तक का सफर किया। सन्दर्भ यह भी दिलचस्प है कि देश की अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन की  हो गई है। तमाम अर्थशास्त्री यही कह रहे हैं कि इस बजट में इसका सन्दर्भ जरूर था। मगर इसके लिए किसी प्रकार की कोई रूप रेखा नहीं बनायी है। भाजपा सरकार के दिग्गज अर्थशास्त्रियों के कला कौशल को देश की आवाम विगत पांच वर्षों से देखती आ रही है। भाजपा सरकार जिस सुद्ढ़ अर्थव्यवस्था का डंका पिटती आ रही है। दरअसल उक्त तथाकथित सुद्ढ़ता की पोल रिजर्ब बैंक के आंकड़े स्वत: खोलते है। भाजपा सरकार में रिजर्व बैंक कुछ और आंकड़ा देता है और सरकार के कुशल और काबिल अर्थशास्त्री कोई और आंकड़ा देते हैं। इनता ही नहीं अर्थव्यवस्था के मामले में वित्त मंत्री कुछ और आकड़ा प्रस्तुत करते है और प्रधानमंत्री कुछ आकड़ा प्रस्तुत करते है। जो सबसे अलग और आकर्षक आंकड़ा होता है। इतना नहीं नहीं इन आंकड़ों की बाजीगरी के कला प्रदर्शन को एक ही दिन में देश की अर्थव्यवस्था सहित अन्य सामानान्तर मुद्दों पर भाजपा सरकार के नेताओं के अलग-अलग भाषणों में दिये गये आंकड़ों के रूप में देखा जा सकता है। वास्तविक मायने में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यही आशावादी दृष्टिकोण है। जो आवाम को मूर्ख बनाने के लिए पर्याप्त है। यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आशावादी आत्मविश्वास है। इसी के माध्यम से वे अपनी कलाकारी का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते है। वैसे भी पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था से आर्थिक असमानता और गंभीर होगी। अर्थव्यवस्था बड़ी होने का तात्पर्य जो प्रधानमंत्री समझाते हैं कि सबका विकास होगा और गरीब अमीर हो जाएगा। यह सारी बातें मात्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शब्दों का इन्द्रजाल है। ये मात्र जुमला है। आज हमारे देश की अर्थव्यवस्था 2.4 ट्रिलियन है। मगर उसके बावजूद भी देश में जितनी व्यापक आर्थिक असमानता है, उतनी दुनिया में दो-चार देश को छोड़ दिया जाये तो किसी भी देश में नहीं है। तमाम काबिल और तजुर्बेकार अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वर्तमान में हमारे देश में व्याप्त आर्थिक असमानता विगत 100 वर्षों में सबसे अधिक है। अर्थात परतंत्र भारत के दौर में भी इस प्रकार की बद्तर हालत नहीं थी। आज हमारे देश की सम्पूर्ण आबादी में से मात्र 10 प्रतिशत लोग देश की सम्पूर्ण संपत्ति में से 52 प्रतिशत संपत्ति पर अपना अधिकार जमाये बैठे हैं। देश के सबसे अमीर 9 व्यक्तियों के पास जितनी संपत्ति है। उस संपत्ति से देश की 50 प्रतिशत जनता आसानी से जीवन यापन कर सकती है। ऑक्सफेम की रिपोर्ट की माने तो देश के अमीर दिन दूनी रात चौगुनी की रफ्तार से अमीर होते जा रहे हैं। जबकि गरीब उसी रफ्तार से और अधिक गरीब होता जा रहा है। देश के 10 प्रतिशत सबसे अमीर लोगों की संपत्ति में एक वर्ष के भीतर ही 39 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो गयी है। जबकि देश की सबसे गरीब 50 प्रतिशत आबादी की संपत्ति में मात्र तीन प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। देश के सबसे गरीब 60 प्रतिशत आबादी के पास कुल राष्ट्रीय संपत्ति में से मात्र 4.8 प्रतिशत संपत्ति है। वर्ष 2018 में देश के 10 प्रतिशत सबसे अमीर आबादी के पास देश की कुल 77.4 प्रतिशत संपत्ति थी। जबकि वर्ष 2017 में इनके पास 73 प्रतिशत संपत्ति थी। इसका सीधा सा तात्पर्य यह है कि अमीर पहले से अधिक अमीर हो रहे हैं। जबकि बजट के समय और योजनाओं को बनाते समय भी हमेशा गरीबों की बात कही जाती है। मगर ध्यान हमेशा अमीरों कर रखा जाता है। अर्थात आवाम को मात्र मूर्ख बनाया जाता है। वर्ष 2014 के बाद देश में केवल दो वर्ग थे। अमीर (आशावादी, देशभक्त) और गरीब  (निराशावादी, देशद्रोही)। यह अंतर साल दर साल बढ़ता रहा। मात्र यह फासला ही नहीं बढ़ा बल्कि इस अंतर का लाभ उठाते हुए पूंजीपति ने सरकार को बनाने और बिगाडऩे के खेल में भी हाथ आजमाना शुरू कर दिया। पूंजीपति अपनी मर्जी से सरकार बनाने और बिगाडऩे लगे। स्वयं के फायदे के लिए इन लोगों ने नीतियों को बनाने और बिगाडऩे का काम करने लगे। धीरे-धीरे इन लोगों ने सरकारों को अपने इशारें पर चलाना प्रारम्भ कर दिया। मगर इसके बाद भी सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास का नारा देने वाली भाजपा सरकार की ऐसी नीतियां आम आवाम की समझ में नहीं आ रही है। या यूं कहें कि समझ में आ रही है। मगर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा ? इसी के इंतजार में आवाम इंतजार की घडिय़ा गिन रही है। अडानी, अम्बानी समेत तमाम पूंजीपतियों की पूंजी कई गुना बढ़ती जाती है। मगर इसके बावजूद भी ये लोग बैंक के कर्ज को वापस नहीं करते है। एक तरफ  कई गुना बढ़ती पूंजी और दूसरी तरफ  दीवालियापन घोषित करना इन पूंजीपतियों का शगल बन गया है। वही दूसरी ओर ये वही बैंक हैं। जो किसानों को कुछ हजार या लाख का लोन देते हैं। मगर जो किसान समय से चुकाने में थोड़ा भी विलम्ब कर गया या नहीं चुका पाया। ऐसे किसानों को ये बैंक इतना अधिक परेशान कर देते है कि उक्त किसान आत्महत्या करने के लिए विवश हो जाता। पूंजीवाद की सबसे बड़ी कलाकारी यही है कि अर्थ व्यवस्था के साथ धीरे-धीरे सारे प्राकृतिक संसाधन उसकी गिरफ्त में हो जाते है। सम्पूर्ण प्राकृतिक संसाधन सम्पूर्ण आबादी के कुछ प्रतिशत लोगों के हाथ में चली जाती है। देश की जमीन इनके हाथ में चली जाती है। पहाड़़, नदियाँ सब कुछ इन्हीं का हो जाता है। देश की शेष आबादी जो इनका विरोध करती है। उसे नक्सली या माओवादी कहा जाता है। आज आजाद भारत में इसी प्रकार के कुकृत्यों को अंजाम दिया जा रहा है। जो लोग अपने अधिकारों के लिए या अपने जल, जमीन और जंगल की लड़ाई लड़ रहे है। उन्हें सरकार पूंजीपतियों के समर्थन में खड़ी होकर मार रही है। पूंजीवाद की प्रगति देखिए कि वर्ष 1990 में देश में कुल दो प्रतिशत अरबपति थे। 2016 में 84, 2017 में 101 और पिछले वर्ष 2018 में 119 अरबपति थे। इन्हीं के प्रगति के साथ-साथ देश में भूखे लोगों की संख्या में जबरदस्त बढ़ोत्तरी होती गई। साथ ही बैंकों का एनपीए भी बढ़ता गया। वर्ष 2016 में देश की कुल अर्थव्यवस्था 2.3 ट्रिलियन डॉलर थी और उस समय देश में 84 अरबपति थे। चीन में इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था 2006 में थी और तब वहां मात्र 10 अरबपति थे। वर्ष 2017 में जो 101 अरबपति थे, उनके पास सम्मिलित तौर पर 440 अरब डॉलर की पूंजी थी। अरबपतियों के पास इससे अधिक पूंजी केवल अमेरिका और चीन में है। वहीं इसके विपरीत देश की औसत आदमी की आय महज 1700 डॉलर प्रतिवर्ष है। भारत के धनाढ्यों ने किसी भी देश के किसी भी काल की तुलना में सबसे ज्यादा धन एकत्रित किया है। यह कहना मुश्किल नहीं है कि हाल के वर्षों में भारत में पूंजीपतियों ने आम आदमी को और संसाधनों को खूब लूटा है। वर्तमान भाजपा सरकार में इस लूटपाट की रफ्तार चार गुना अधिक बढ़ गई है। वर्ष 2016 में देश के सर्वाधिक अमीर 10 प्रतिशत आबादी के पास राष्ट्रीय आय का 55 प्रतिशत से अधिक धनराशि जमा थी। जो किसी भी देश की तुलना में सर्वाधिक थी। वर्ष 1980 में देश के सर्वाधिक अमीर एक प्रतिशत धनाढ्यों के पास 7 प्रतिशत संसाधन थे। जबकि सबसे गरीब 50 प्रतिशत आबादी 23 प्रतिशत संसाधनों पर निर्भर थी। वर्ष 2014 तक सबसे ऊपर के एक प्रतिशत अमीरों का हिस्सा बढ़कर 22 प्रतिशत तक पहुंच गया। जबकि सबसे नीचे के गरीबों की 50 प्रतिशत आबादी का हिस्सा घटकर 15 प्रतिशत हो गया। इससे स्पष्ट हो रहा है कि बढ़ती आर्थिक असमानताओं की इतनी बड़ी खाई कैसे भाजपा सरकार ने खींचा है। भाजपा सरकार के पूंजीपतियों प्रेम का अंजाम है कि गरीबों का जीवन जीना दूभर हो गया है। यह सब अंतर तब है। जब हमारे देश की अर्थव्यवस्था 2.4 ट्रिलियन की है। जाहिर है कि पांच ट्रिलियन का लाभ भी मात्र उन्हीं अमीरों के लिए है। जिसके पर भाजपा सरकार की निगेहबान हैं आंखे। इन बातों को समझाने के लिए उम्मीद है कि पेशेवर निराशावादी होना आवश्यक नहीं है। मगर सच को सच कहना शायद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नजर में आपको निराशावादी और देशद्रोही भी बना सकता है।

 

 

 

 

Read 119 times Last modified on Friday, 09 August 2019 11:54
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