11
November

भ्रष्टाचार का खिलाड़ी बीएस तिवारी सब पर भारी

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विभाग के कर्णधार बीएस तिवारी की अनैतिक कार्यशैली का कर रहे बीच बचाव

मैनफोर्स

लखनऊ। मैनफोर्स समाचार पत्र अपने विगत कई अंकों से बिजली विभाग में कार्यरत निदेशक तकनीकी बीएस तिवारी की अनैतिक और भ्रष्ट कार्यशैली का पर्दाफाश किया था। उसी कड़ी में एक बार फिर समाचार पत्र बीएस तिवारी की अनैतिक कार्यशैली पर चर्चा कर रहा है। जो इस प्रकार है। बीएस तिवारी अपने रूतबे और ताकत से इस कदर बेखौफ था कि हरदुआगंज हादसे के बाद बिजली इंजीनियरों और कर्मियों की सामान्य सी बात भी उसे बर्दाश्त नहीं होती थी। बीएस तिवारी की इसी प्रकार की अनैतिक कार्यशैली से विवश होकर बिजली कर्मी और इंजीनियर उसके खिलाफ लामबंद होने लगे थे। बिजली कर्मियों और इंजीनियरों ने बीएस तिवारी की भ्रष्टï और अनैतिक कार्यशैली से विवश होकर उनके साथ काम नहीं करने का पत्र लिख डाला। जो बाद में बीएस तिवारी के गले की फांस बनने लगा। इसलिए बीएस तिवारी ने उक्त पत्रों को रिकार्ड से निकलवा कर जला दिया। दरअसल मजदूरों के खून से रंगे बीएस तिवारी से सभी कर्मी मुक्ति चाहते थे। मगर मिल नहीं पायी। अब तीन साल बाद फिर उस जलाई गयी चिट्ठी की राख से बीएस तिवारी की अनैतिक कार्यशैली का भूत सामने आ गया है। बिजली कर्मियों और इंजीनियरों का लिखा गया पत्र बीएस तिवारी के न चाहने के बाद भी उनके गले का फांस बनकर सामने आ गया है। आपको बता दें कि वर्ष 2015 में बीएस तिवारी की अनैतिक कार्यशैली से विवश होकर हरदुआगंज में तैनात लगभग सभी इंजीनियरों ने स्वयं को उनके साथ कार्य करने में असमर्थ जताने लगे थे। इसके लिए इंजीनियरों ने निगम हित में स्वयं की तैनाती हरदुआगंज से अन्यत्र किये जाने की मांग की थी। इस संबंध में इंजीनियरों ने सामूहिक रूप में स्व: हस्ताक्षरित पत्र तत्कालीन चेयरमैन व प्रबंध निदेशक को सौंपा था। यूं तो बीएस तिवारी ने इंजीनियरों द्वारा लिखे गए इस पत्र को रिकार्ड से निकलवाकर जलवा दिया था। मगर कुछ लोग बीएस तिवारी से भी कलाकार निकले। जिन्होंने उक्त पत्रों की छायाप्रतियां बचाकर रखी थी कि ताकि वक्त बेवक्त बीएस तिवारी की अनैतिक कार्यशैली के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके। यह बीएस तिवारी का दुर्भाग्य था कि वे लाख प्रयास के बाद भी सारे साक्ष्य नष्ट करने में सफल नहीं हो सके। आज वही साक्ष्य उनकी अनैतिक कार्यशैली को चिल्ला-चिल्ला कर बयां कर रहा है और उनके गले का फांस बना हुआ है। आपको बता दे कि हरदुआगंज के सभी इंजीनियरों जो पत्र अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को लिखा था, उसमें यह उल्लेख किया था कि वे समस्त अधिकारी हरदुआगंज तापी परियोजना में कार्यरत हैं। वह सभी हरदुआगंज तापी परियोजना में काम करने में स्वयं को असमर्थ महसूस कर रहे हैं। इंजीनियरों ने प्रबंध निदेशक से अनुरोध किया था कि समस्त अधिकारियों का स्थानांतरण निगम हित में शीघ्र हरदुआगंज तापीय परियोजना से अन्यत्र कर दें। वर्ष 2015 में हरदुआगंज में बीएस तिवारी के नीचे काम करने वाले अधिकारियों की स्थिति यह थी कि कोई भी उनके साथ कार्य करने को तैयार नहीं था। इसलिए वे सभी स्थानांतरण के लिए पत्र लिखे थे। मगर अपने प्रभुत्व और दब दबे के दम पर बीएस तिवारी ने उक्त पत्रों पर कार्यवाही को ठंडे बस्ते में डलवा दिया। आश्यर्च की बात है कि यह सब कुछ चेयरमैन संजय अग्रवाल की नाक के नीचे होता रहा। मगर वे सब कुछ जानने के बाद भी सारे मामले को ठंडे बस्ते में डलवा दिये। उन्होंने इस मामले में मजिस्ट्रेटी जांच के साथ-साथ विभागीय जांच बैठाकर पूरे मामले पर पर्दा डलवा दे दिया। जबकि विभागीय जांच जिस अधिकारी को दी गयी थी। वह अधिकारी बीएस तिवारी से जूनियर था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कैसे कोई जूनियर अधिकारी अपने सीनियर अधिकारी के खिलाफ  निष्पक्ष जांच करने की हिमाकत कर सकता है। इतना ही नहीं यह विभागीय नियमावली के भी खिलाफ है। कोई जूनियर अधिकारी अपने सीनियर अधिकारी की जांच करने के लिए अर्ह नहीं माना जाता है। इतना ही नहीं समकक्ष पद पर कार्यरत अधिकारी भी जांच नहीं कर सकता है। जांच का अधिकार वरिष्ठï अधिकारी ही कर सकता है। मगर बिजली विभाग में सारे के सारे नियम कानून तार-तार हो गये। सभी ने अपने ही घोड़े दौड़ाये है। चाहे वह ठीक से दौड़ा हो या गस्त खाकर गिर गया हो। इस बात से किसी का कोई लेना देना नहीं रहा। आपको बता दें कि हरदुआगंज पावर हाउस में हुई मजदूरों की मौत के जिम्मेदार बीएस तिवारी को बचाने के लिए भले ही तत्कालीन चेयरमैन संजय अग्रवाल ने कारखाना रिपोर्ट को दरकिनार कर दिया हो। मजिस्ट्रेटी जांच के उपर जांच बैठाकर मामले को रफादफा कर दिया हो। मगर किया गया गुनाह कभी भी किसी का पीछा नहीं छोड़ता है। वह आज नहीं तो कल गले का फांस बनकर सामने जरूर आयेगा। यह फांस आज खुद बखुद बीएस तिवारी के गले में पड़ गया। आपको बता दें कि हरदुआगंज में मजदूरों की मौत के बाद हुई कारखाना आगरा और मजिस्ट्रेटी जांच में बीएस तिवारी को घटना का जिम्मेदार बताया गया था। बीएस तिवारी के संबंध में संजय अग्रवाल की भूमिका की तर्ज पर वर्तमान चेयरमैन अलोक कुमार की भी रही है। इसी हरदुआगंज काण्ड की जांच करीब 8 माह पूर्व उस संजय तिवारी को सौंपी गई थी। जहां पर निदेशक बनने से पूर्व बीएस तिवारी तैनात थे। इस प्रकार एक जूनियर अधिकारी को जांच देकर चेयरमैन आलोक कुमार ने न केवल वर्तमान सरकार के उस आदेश की अवहेलना की है। जिसमें यह उल्लेखित किया गया है किसी भी आरोपी की जांच उससे एक पद का सीनियर अधिकारी ही करेगा। बल्कि सरकार की निष्ठा पर सवालिया निशान लगाया है। हरदुआगंज कांड के जिस प्रकरण में कारखाना आगरा की रिपोर्ट, मजिस्ट्रेट जांच की रिपोर्ट, तत्कालीन प्रमुख सचिव श्रम द्वारा केस चलाये जाने की अनुमति पत्र और 20 से ज्यादा इंजीनियरों का निगम हित में निगम के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक को लिखा पत्र यह साबित करता है कि बीएस तिवारी की कार्यशैली कैसी है ?  मगर इतने के बावजूद भी सेटिंग में माहिर और पैसे के खिलाड़ी बीएस तिवारी को तत्कालीन चेयरमैन संजय अग्रवाल अपनी आंखों पर पट्टी बाँधकर खुद को बचाने में जुटे हुए है। 

काली कमाई करने वालों पर रहम, ईमानदारों पर सितम

बिजली विभाग में स्थानांतरण भी रस्म अदायगी के है। चेयरमैन की इच्छा है कि स्थानांतरण के बाद भी उनके हमराहों का अहित न हो और वे अपने पुराने और मलाईदार पदों पर बने रहे। मलाईदार पदों पर बैठे इंजीनियरों का स्थानांतरण महज रस्म अदायगी है। वास्तविक मायने में वे अपने इच्छित पदों पर ही बने रहते हैं। अलबत्ता परेशानियों और कठिनाईयों का सामना ईमानदार इंजीनियर को करना पड़ता है। उन्हें स्थानांतरण का दंश झेलना पड़ता है। ऐसे में विभागीय कर्मियों की नाराजगी सरकार के सामने विरोध के रूप में मुखर होता है। जो आये दिन कोई न कोई एक नयी मुसीबत खड़ी करता है। बिजली विभाग के मुखिया और प्रबंधन की इस भेदभावपूर्ण कार्यशैली को लेकर कर्मचारियों में व्याप्त नाराजगी आगाती चुनावी वर्ष में कितना लाभदायक सिद्ध होगी। इसका अंदाजा शायद ही सत्ताधारी दल की पार्टी को हो। आपको बता दें कि अधिकारियों व कर्मचारियों के स्थानान्तरण की समीक्षा प्रत्येक वर्ष होती है। मगर परियोजना प्रबंधक और डायरेक्टर पर्सनल की आपसी मिली भगत से मलाईदार पदों पर तैनात अधिशाषी अभियंताओं को रिलीव नहीं किया जाता है। जिसके कारण वे वहीं पर लगभग 1 वर्ष और 6 माह से तैनात होते है और रिलीव नही पाते है। आश्चर्यजनक बात यह है कि स्थानांतरित हुए इन अधिकारियों और कर्मचारियों को यथावत बनाये रखने जैसे किसी आदेश के बिना ही ये वहां तैनात होते है। आदेश में वेतन रोकने की बात लिखने के बाद भी जब उसका पालन नहीं किया जाता है तो डायरेक्टर पर्सनल द्वारा उस पर कोई कार्यवाहीं नहीं की जाती। जबकि कई ऐसे अफसरों/कर्मचारियों को जिनकी खुद अथवा पारिवारिक समस्याएं होती है। संज्ञान में होने के बावजूद उस पर ध्यान नहीं दिया जाता है। मात्र इनकी गलती यह है कि यह सब नान मलाईदार पदों पर तैनात होते है। बिजली विभाग के चेयरमैन आलोक कुमार के एक फ रमान से मामूली तनख्वाह पर काम करने वाले संविदाकर्मीयों को उनके मूल निवास से इतर दूसरी तहसील में स्थानांतरित तो कर दिया जाता है। मगर उसी बिजली विभाग में अलोक कुमार की नाक के नीचे बैठे तमाम अधिशाषी अभियंताओं को वर्षों से नहीं हटाया जाता है। स्थानांतरण की भी मानकों के अनुरूप हर वर्ष समीक्षा भी की गयी होती और स्थान्तरित होने वाले अफ सरों/कर्मचारियों को रिलीव करने के आदेश भी परियोजना प्रबंधकों को जारी किये गए होते तो मलाईदार पदों पर बैठे अधिशाषी अभियंताओं को हटाने में केवल लीपापोती नहीं करनी पड़ती। उच्चाधिकारियों के इस प्रकार के दोहरे वर्ताव और निर्णय से कर्मियों में असंतोष व्याप्त है। जोकि इस चुनावी वर्ष में रोजगार को लेकर दावों, वादों मे उलझी वर्तमान सरकार की उलझनें बढाने वाली चुनौति साबित हो रही हैं और आने वाले समय में हड़ताल की समस्या से जूझ रही सरकार के सामने एक और हड़ताल की स्थिति कर सकती है। कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे पावर कारपोरेशन के लिए संविदा कर्मियों को लेकर आलोक कुमार का फ रमान और भ्रष्ट व मलाईदार पदों पर तैनात अधिशाषी अभियंताओं को संरक्षण दिया जाना मुसीबतों को और बढ़ाने वाला है। कर्मियों में बिजली विभाग के मुखिया का इस तरह का कदम एकदम तानाशाही वाला करार दिया जा रहा है। जहां छोटे कर्मचारियों पर चाबुक और बड़ों को संरक्षण देने का काम किया जा रहा है। दरअसल शासन में पावर कारपोरेशन प्रबंधन को विभिन्न स्रोतों से शिकायतें मिल रही थी कि तहसील में तैनात आउटसोर्स श्रमिक बिजली कंपनियों के हितों के विपरीत काम कर रहे हैं और स्थानीय प्रभाव के चलते यह श्रमिक पक्षपात पूर्ण तरीके से काम करते हैं। जिसके मद्देनजर निर्णय किया गया कि आउट आउटसोर्स श्रमिकों की तैनाती उनके गृह तहसील से बाहर किया जाए। जबकि इसके विपरीत खुद चेयरमैन आलोक कुमार की नाक के नीचे हो रहे कारनामे उनको दिखाई नहीं दे रहे। संविदा कर्मियों पर चाबुक चलाने वाले आलोक कुमार बताएं कि उन अधिशाषी अभियंताओं पर चाबुक क्यूं नहीं चलाया जा रहा है। जिन्हें डायरेक्टर पर्सनल संजय तिवारी के 19 सितम्बर  2018 के आदेश में कहा गया कि स्थान्तरित होने वाले अधिकारी/ कर्मचारी अपनी तैनाती 1 अक्टूबर तक नयी जगह पर कर लें। फिर भी उनको परियोजना प्रबंधक द्वारा रिलीव नहीं किया गया। आदेशों को दरकिनार करते हुए उनके वेतन को रोकने की बात केवल कागजों में ही की गई। वास्तविकता के धरातल पर लेसमात्र भी नहीं उतरी। कई तो ऐसे कर्मचारी/अधिकारी हैं जोकि 3 दशक से एक ही जगह पर तैनात हैं। ऐसे अफ सरों पर मेबरवानी की वजह क्या है। इस संबंध जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब क्यूं नहीं लिया गया। जिन्होंने कागजी खाना पूर्ति करके तैनाती को यथावत बनाये रखा।  करीब छह माह या वर्ष भर से बिना किसी अनुमति के रिलीव न होने वाले ये अधिकारी क्यूं मुखिया आलोक कुमार को दिखाई नहीं दे रहे हैं। इसके अतिरिक्त जनपद एटा के जवाहरपुर तापीय परियोजना के चर्चित सरिया चोरी प्रकरण के सरगना यूएस गुप्ता जिसको एटा जिला प्रशासन अपनी प्रथम रिपोर्ट में दोषी मान रहा है। उसे सजा देने के बजाय विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा यूएस गुप्ता को आफि स अटैच क्यों बताया जा रहा है। जबकि उसके आदेश में अटैच जैसे किसी शब्द का उल्लेख ही नहीं किया गया है। मामले की लीपापोती करते हुए यूएस गुप्ता को जवाहरपुर से हटाकर निदेशालय में जिस मुख्य अभियंता प्रगति ईकाई के पद पर तैनाती दी गयी। मूलत: वह पद सृजत ही नहीं है। जबकि इसी प्रकरण में यूएस गुप्ता के सहयोगी रहे और जिला प्रशासन की रिपोर्ट में दोषी जेई सुरेन्द्र कुमार को सोनभद्र में परियोजना प्रबंधक के साथ अटैच कर दिया गया है। यूएस गुप्ता को निदेशालय पर इसलिए बैठाया गया ताकि वह पूरे मामले को मैनेज कर सके और वह इस काम में जिसे वे पूरी शिद्दत से कर रहे है। निदेशालय स्तर पर ही तैनात निदेशक तकनीकी बीएस तिवारी के कारनामें अलोक कुमार को नजर नहीं आ रहेेे। सरिया चोरी के सरगना यूएस गुप्ता भ्रष्टाचार और घोटाले के जनक उत्पादन निगम के तकनीकी निदेशक बीएस तिवारी और डायरेक्टर पर्सनल संजय तिवारी के स्थानांतरण को लेकर लीपापोती करने के बाद भी इन सब पर मेहरबानी दिखाई जा रही है। जबकि छोटे कर्मचारियों पर हंटर चलाया जा रहा है। आखिर विभाग के आलाधिकारियों की मंशा क्या ? आलोक कुमार का यह कदम शासन की पारदर्शिता को कितना सटीक व उचित ठहराता है ? यह एक गंभीर सवाल है।  

 

बीएस तिवारी की भांति रिपोर्ट में दोषी करार दिये जाने वाले यूएस गुप्ता को बचाने के लिए हो रही जबरदस्त पैरोकारी

जवाहरपुर की सरिया चोरी के मामले जिला प्रशासन की प्रथम जांच रिपोर्ट में संलिप्त पाए जाने के बाद भी दोषी अफ सर यूएस गुप्ता और जेई सुरेन्द्र कुमार को बिजली विभाग के आलाधिकारी बचाने की कवायद में जुटे हुए है। सूत्रों से मिली ताजा जानकारी के अनुसार एटा के जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन ने अपनी जांच में यूएस गुप्ता और सुरेन्द्र कुमार की संलिप्तता को पाते हुए अपनी प्रथम रिपोर्ट शासन को भेज दी है। शासन द्वारा इस फाईल को कार्यवाही के लिए बिजली विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों के पास भेजा गया है। मगर उर्जा विभाग में शीर्ष पर बैठे अधिकारी शासन व मुख्यमंत्री की की आंखों में धूल झोकने का कार्य कर रहे है और दोषी यूएस गुप्ता और जेई सुरेन्द्र कुमार को बचाने की जुगत लगा रहे है। एटा के जवाहरपुर परियोजना की सरिया चोरी के प्रकरण की लीपापोती करने के लिए पहले तो विभाग के आलाधिकारियों ने यूएस गुप्ता को वहीं तैनात रखा था। मगर चौतरफ  ा दबाव के कारण यूएस गुप्ता को जवाहरपुर से हटाकर मुख्यालय में तैनाती दे दी गई। ताकि वह मुख्यालय में बैठकर अपने कारनामों पर पर्दा डाल सके। विभाग के नियुक्ति प्रभाग की जिम्मेदारी देख रहे यूएस गुप्ता के हमराहों ने सरिया चोरी के इस खिलाड़ी यूएस गुप्ता को निदेशालय में तैनाती बिना पद के ही दे दी। जबकि दूसरे सुरेन्द्र कुमार को सोनभद्र भेज दिया। अब सवाल यह है कि पैसे और प्रभाव के बल पर तैनाती पाने वाला यूएस गुप्ता मुख्यालय पर बैठकर क्या जांच को प्रभावित नहीं करेगा या फिर उसके कर्णधारों द्वारा उसे मौका दिया जा रहा है। सूत्रों की माने तो यूएस गुप्ता खुद को बचाने के लिए अपने आकाओं के परिक्रमा कर रहा है। जानकारी में तो यह तक है कि यूएस गुप्ता को बचाने के लिए बिजली विभाग के कुछ अधिकारी लाबिंग करते हुए प्रबंध निदेशक पर दबाव बना रहे है। नवनियुक्त एमडी को विभाग में हड़ताल का काल्पनिक भय भी दिखाया जा रहा  है। आपको बता दें कि पिछले दिनों एटा जनपद के जवाहरपुर तापीय परियोजना में इस्तेमाल होने वाली सरिया की चोरी के एक बड़े गैंग का खुलासा वहां के एसडीएम के द्वारा किया गया। सरिया चोरी के इस पूरे प्रकरण में विभागीय संलिप्तता का भी मुद्दा उठाया तो शासन भी हरकत में आ गया और मुख्यमंत्री सचिवालय द्वारा पूरे प्रकरण की मानिटरिंग शुरू कर दी गई। इसके अतिरिक्त यूएस गुप्ता को जवाहरपुर परियोजना का जनरल मैनेजर बनवाने में कुछ विभागीय अधिकारियों के अतिरिक्त एक बीजेपी के प्रवक्ता का भी नाम सामने आ रहा है। यूूएस गुप्ता अपने राजनैतिक रसूख और बिजली विभाग में शीर्ष पर बैठी अफ सरशाही की मेहरबानियों के चलते जवाहरपुर के साथ ही साथ हरदुआगंज में बिना स्वीकृत पद के ही अतिरिक्त प्रभार लेने में कामयाब थे। मगर जब इस सवाल को प्रमुखता से उठाया गया तो दूसरे ही दिन यूएस गुप्ता के पास से यह प्रभार अधिकारियों ने अपनी गर्दन फंसने के भय से हटा लिया। इसी तरह एटा की सरिया चोरी के इस प्रकरण का खुलासा होने के बाद भी जनरल मैनेजर यूएस गुप्ता और जेई सुरेन्द्र कुमार को कई दिनों तक वहीं तैनात रखा गया था। वहीं चेयरमैन आलोक कुमार के भेजे गए जांच अधिकारी सुबीर चक्रवर्ती भी पूरे प्रकरण की जांच के नाम पर लीपापोती करके लौट आये थे। मगर जब यूएस गुप्ता और सुरेन्द्र कुमार की तैनाती को लेकर सवाल खड़ा किया गया कि आखिर निष्पक्ष जांच कैसे होगी ? तब यूएस गुप्ता को जवाहरपुर से हटा कर निदेशालय में तैनात कर दिया गया। मगर इंजीनियर सुरेन्द्र कुमार की तैनाती वही रही। जब दोबारा यह सवाल उठाया गया तब इंजीनियर को भी वहां से हटाकर सोनभद्र मेंं तैनात कर दिया गया। ऐसे में अफ सरों की इस तरह की लीपापोती के पीछे की वजह राजनैतिक है  उनका कुछ व्यक्तिगत हित है। 

एमडी पांडियन ने दिखाया कड़ा तेवर, यूएस गुप्ता को किया शंट 

जवाहरपुर तापीय बिजली परियोजना में निर्माण सामाग्री की चोरी के मामले में सीधे शामिल रहने वाले महाप्रबंधक यूएस गुप्ता पर एक बार फिर गाज गिर गई है। पहले जवाहरपुर से हटाए गए यूएस गुप्ता को मुख्यालय में महत्वपूर्ण पद पर बैठाया गया था। मगर अब जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है। यूएस गुप्ता की एक-एक करतूत सामने आ रही हैं। यूएस गुप्ता की अनैतिक कार्यशैली का लगातार प्रकाश में आने पर विद्युत उत्पादन निगम के प्रबंध निदेशक सेंथिल पांडियन ने कड़क रुख अपनाया है। एमडी पांडियन ने गुप्ता को झांसी स्थित पारीछा परियोजना के परियोजना प्रबंधक के साथ अटैच कर दिया। इसके पूर्व गुप्ता को विभाग के जिम्मेदारों ने मामले की लीपापोती करते हुए एटा से हटाकर मुख्यालय पर तैनात किया था। एक आदेश जारी कर एमडी पांडियन ने घोटाले के आरोपी यूएस गुप्ता को झांसी में परीछा बिजली परियोजना के महाप्रबंधक के साथ अटैच कर दिया है। अर्थात अब सरकारी माल की लूट करने वाला यूएस गुप्ता अपने ही समकक्ष एक अधिकारी का मातहत बन कर रह गया है। परीछा का महाप्रबंधक भी चीफ  इंजीनियर स्तर का अधिकारी होता है। जबकि यूएस गुप्ता भी चीफ  इंजीनियर ही है। प्रबंध निदेशक सैंथिल पांडियन का कहना है कि जवाहरपुर में जैसे-जैसे सरकारी धन के लूट की जांच आगे बढ़ेगी वैसे-वैसे यूएस गुप्ता सहित अन्य पर विभागीय कारवाई कड़ी की जाती रहेगी। साथ ही भ्रष्टाचार के अन्य मामलों में भी उचित कार्यवाई करते हुए दोषियों पर शिकंजा कसा जाएगा। गौरतलब हो कि इससे पूर्व बिजली विभाग के जिम्मेदारानों ने यूएस गुप्ता की तैनाती को लेकर प्रबंध निदेशक को गुमराह करने की कोशिश भी किया था। मगर अपनी छवि और कार्यशैली के अनुरूप जिस तरह से प्रबंध निदेशक ने यूएस गुप्ता पर जिला प्रशासन की प्रथम रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए विभागीय कार्यवाही की है। उससे यह स्पष्ट हो रहा है कि विभाग इस प्रकरण में न्याय की राह पर आगे बढ़ रहा है। 

बीएस तिवारी ने एमडी को खुश करने के लिए संचालित की खराब यूनिट

ओबरा बिजली घर में हुआ हादसा बेहद गंभीर और दु:खद था। ओबरा बिजली घर के हादसे के पीछे भी बीएस तिवारी की ही मुख्य भूमिका है। उत्पादन निगम के प्रबंध निदेशक सेंथिल पांडियन के दौरे से ऐन पहले निदेशक तकनीकी बीएस तिवारी ओबरा पहुंचता और वहां के जनरल मैनेजर व सीजीएम को तकनीकी रूप से खराब दो यूनिटों को जबरन चलाने का निर्देश दिया। आग लगने के कारणों की ताजा जानकारी यह है कि बंद पड़ी यूनिट को लेकर सवालों से बचने के लिए निदेशक तकनीकी होने के नाते बीएस तिवारी ने ओबरा यूनिट की 2 बंद पड़ीं वाल मिल को चलाने का निर्देश परियोजना प्रबंधक और मुख्य परियोजना प्रबंधक को दे दिया। बीएस तिवारी ने इन अधिकारियों पर इतना दबाव डाला कि ये दोनों अधिकारी स्वयं जाकर आपरेशन रूम में बैठ गए और इंजीनियर्स पर दबाव बनाने लगे। यह सारी प्रक्रिया सामान्य दिनचर्या से हटकर रही। सामान्यत: होता यह था कि वाल मिल चलावाने के लिए कभी परियोजना प्रबंधक अथवा मुख्य परियोजना प्रबंधक उस आपरेशन रूम में नहीं जाता था। वाल मिल चलाने के काम में एक्सपर्ट इंजीनियर्स की जांच पड़ताल के बाद उस वाल मिल को चालू किया जाता था। बीएस तिवारी द्वारा परियोजना प्रबंधक और मुख्य प्रबंधक पर दबाव इतना था कि वह आपरेशन रूम में पहुंच गए और इंजीनियर्स पर वाल मिल को चलाने के लिए दबाव बनाया। वाल मिल में खराबी और चेकिंग की बात इंजीनियर्स द्वारा कहे जाने के बावजूद वाल मिल को चलवा दिया गया। पहले एक वाल मिल के न चलने पर दूसरी वाल मिल को चलाने का आदेश दिया गया। इस तरह दोनों वाल मिल के चलाये जाने से वाल मिल और ट्रांसफ ार्मर के बीच का पावर केबल गर्म होकर जलना शुरू हो गया। दबाव और जबरदस्ती झेल रहे इंजीनियर्स भी ट्रांसफार्मर की जांच किये बिना सुबह करीब 3 बजे घर चले गए। यही केबल जलते हुए इतना बड़ा रूप ले लिया कि यह हादसा हो गया। इसके पूर्व भी वर्ष 2013 में अनपरा तापीय परियोजना पर महाप्रबंधक के पद पर रहते हुए बीएस तिवारी ने 500 मेगावाट की इकाईयों का जीटी जनरेटर ट्रांसफार्मर अपने भ्रष्टाचारी रवैये के कारण समय से नहीं खरीदा था। जिसकी वजह से अनपरा की 500 मेगावाट की इकाई की जीटी के खराब हो गई। जिसके उपरांत नये जीटी के अभाव में इकाई को बहुत समय तक नहीं चलाया जा सका था। इस मामले में आरोप पत्र भी दाखिल हुआ था लेकिन बीएस तिवारी इस मामले से बच निकला। फिर 2015 में हरदुआगंज में भी इनके परियोजना प्रबंधक रहने के दौरान एक बड़ा हादसा हुआ और मजदूरों की मौत हो गई। मजिस्ट्रेटी जांच में दोषी पाए जाने के बाद भी यह बच निकला और अब ओबरा में भी इसने अपने कारनामों को दोहरा दिया। पाठकों को बता दें कि ओबरा थाना इलाके के ओबरा विद्युत बी परियोजना के बिटीपीएस माइनस के केबिल गैलरी में शार्ट सर्किट से घटना के दिन सुबह  आग लग गई थी। परियोजना में लगी आग से ओबरा बी परियोजना की 200 मेगावाट की तीन इकाई 9,10 और 11 ट्रिप हो गयी। आग पर काबू पाने के लिए सीआईएसएफ की 6 फ ायर बिग्रेड गाडिय़ां लगाई गई और साथ ही 5 ट्रक बालू और 5 एम्बुलेंस भी लगाई गई थी। परियोजना की सुरक्षा के लिए लगी सीआईएसएफ  और जिला प्रशासन ने आग पर काबू पाने के लिए व्यापक इंतजाम किये और आग पर काबू पा लिया था। अब आग लगने के कारणों और नुकसान का पता लगाने के लिए जांच की जा रही है। जानकारों का कहना है कि यह अत्यंत दुखद है। आग लगने की वजह जो भी रही हो। मगर इस सम्पूर्ण मामले में हर स्तर पर लापरवाही उजागर हो रही है। जिसके कारण आग लगी और परियोजना को लाखों का नुकसान हुआ है। 

 

 

 

 

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